KRIYA

Wednesday, 25 June 2014

Vasudeva kriya 3 & 4 in Hindi. ( वासुदेवक्रिया)


                                                  ओं श्री योगानंद गुरुपरब्रह्मने नमः
क्रिया 3:-- 
वासुदेवक्रिया—

सीधा वज्रासन, पद्मासन अथवा सुखासन मे ज्ञानमुद्रा लगाके बैठिए! कूटस्थ मे दृष्टि रखे! पूरब दिशा अथवा उत्तर दिशा की और मुँह करके बैठिए! शरीर को थोडा ढीला रखीए! खेचरी मुद्रा में रहिये! मुह पूरा खोलके ही रखना चाहिये! जीब को पीछे मूड के तालु में रखना चाहिए! इसी को खेचरी मुद्रा कहते है!
दोनों हाथो के अंगुलियों एक दूसरे का अन्दर दबाके मिलाके रखना चाहिए! उन दोनों हाथो को नाभी का नीचे रखना चाहिए! अब आस्था आस्था (slowly & tenderly) सरलता से नाभी का नीचे वाला उदर यानी पेट दबाते हुए श्वास को अन्दर लेते हुए मूलाधाराचक्र में ‘ॐ’, स्वाधिष्ठान में ‘न’, मनिपुरचक्र में ‘मो’, अनाहताचक्र में ‘भ’, विशुद्धचक्र में ‘ग’, आज्ञा पाजिटिव चक्र में ‘व’ कहते हुए कूटस्थ तक श्वास को अन्दर खीचते हुए आरोहणा क्रम में  लेजाने चाहिए!
कूटस्थ में मन और दृष्टी रखना चाहिए! अंतःकुंभक करना चाहिए! अंतःकुंभक करते हुए गर्दन को दाहिने तरफ घुमाके आज्ञा नेगटिव चक्र में ‘ते’, बाए तरफ घुमाके ‘वा’ और गर्दन को नीचे घुमाके अनाहत चक्र में ‘सु’ कहना चाहिए! इस समय चिबुक हृदय को जहा तक हो सके वहा तक स्पर्शन करना चाहिए! अब गर्दन को सीदा रखके श्वास को आस्था आस्था (slowly & tenderly) सरलता से दोनों हाथो के अंगुलियों को पकड़ ढीला करते हुए मणिपुरचक्र में ‘दे’, स्वाधिष्ठानचक्र में ‘वा’, और मूलाधाराचक्र में ‘या’ कहते हुए श्वास को  अवरोहणा क्रम में पूरा छोडना चाहिए!  
वैसा ऐ क्रिया बारह बार प्रातः और सायंकाल दोनों समय करना चाहिए!  
आज्ञा पाजिटिव चक्र  ‘व’      ‘ते’   आज्ञा नेगटिव चक्र
विशुद्धचक्र           ‘ग’     ‘वा’   विशुद्धाचक्र
अनाहताचक्र        ‘भ”    ‘सु’  अनाहताचक्र  
मणिपुरचक्र         ‘मो’    ‘दे’  मणिपुरचक्र
स्वाधिष्ठानचक्र         ‘न’      ‘वा’ स्वाधिष्ठानचक्र
मूलाधाराचक्र           ‘ॐ’      ‘य’ मूलाधाराचक्र
 ओं श्री योगानंद गुरुपरब्रह्मणे नमः

क्रिया 4:-- 
वासुदेवक्रिया—

इस क्रिया भी उप्पर जैसा ही करना चाहिए! ‘ते’ ‘वा’  ‘सु’ करके 24 अपना अपना शक्ति का मुताबिक़ पर्याय साधक अपना गर्दन को घुमासकता है!  
समां= सैम होना, अधि= परमात्मा! यानी समाधि का अर्थ परमात्मा में ऐक्य होना ही इन करियो का प्राथमिक उद्देश्य है!
जो प्राणशक्ति मूलाधार से बाहर वृधा निकलरहे है उस प्राणशक्ति को वापस मेरुदंड का माध्यम से कूटस्थ में भेजना ही इन क्रियों का प्रधान उद्देश्य है! इस पद्धती में शिर एक अयस्कांत अथवा चुम्बक बना जाता है! प्राणशक्ति को पीनियल ग्लांड्स मेदुल्ला  (Medulla and Cerebrum) और भेजा में केन्द्रीकरण करा सकता है साधक!
तब ध्याता ध्येयं और ध्यानं एक होजायेगा! 

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