KRIYA

Sunday, 28 September 2014

अवतारें

                                    ॐ श्रीकृष्ण परब्रह्मणेनमः  

शक्ति  को कोई भी उत्पन्न नहीं कर सकते है,  नाश् भी नहीं कर सकते है!  एक शक्ति को दूसरे शक्ती में बदल सकते है!  विद्युतशक्ति को यान्त्रिकशक्ति में बदल कर इलेक्ट्रिक पंखे इत्यादि वस्तुवों को चलाया जासकता है! वैसा ही टर्बाइनों को  चलाकर विद्युतशक्ति का उत्पादन कर सकते है! ब्रह्माण्ड में जो  भी होरहा है वों सब प्रगति के लिए ही है! उस प्रगति मे जब अवरोध होता है तब परामात्मा अपने आप को व्यक्तिकरण करते है! 
अवतारें:--  
1) मत्स्य--- संदेह सागर से विज्ञान कहानी को प्राप्त करो  
2)कूर्म:-- वैराग्य से जीवन को बिताओ  
3) वराह:- भक्ति और क्रमशिक्षण दो दंत द्वय है!  व का  अर्थ  वरिष्ठ, राह का अर्थ रास्ता! इस दंत द्वय से वरिष्ठ रास्ता मे चलते हुवे तुम्हारा कर्तव्य निभाओ! 
4) नारसिंह:-- तुम नररूप मे रहा हुआ सिंह है! सिंह तीन वर्ष में  एक  बार शेरनी का साथ मिलता है! वैसा ही ओ साधक, तुम भी अपना अहंकार को वर्जित करके, कामभावना  को  नियंत्रित  करके  परामात्मा  का साथ अनुसंधान प्राप्त करो! 
5)वामन:-- वा का अर्थ वरिष्ट, मन का अर्थ मन!          वरिष्ट            मन का  माध्यम  से  आदिभौतिक,  आदिदैविक,  और  आध्यात्मिक  बाधाएं जीत के अंकित भाव में  परामात्मा का अनुसंधान प्राप्त करो!
6)परशुराम:-- ज्ञानपरशु (कुल्हाडी) से  अज्ञान  निर्मूलन  करो,  ज्ञानमार्ग में चलकर परामात्मा का अनुसंधान प्राप्त करो!
7)श्रीराम:-  परामात्मा ने हमें इच्छाशक्ती और स्वयंकृषी दिया है! जीवन में आनेवाले  विधिनिर्णय्    को  इन शक्तियों से सामना करो  व  परामात्मा का अनुसंधा प्राप्त करें! 
8)श्रीकृष्ण:-- परामात्मा का वश होंकर साधना करो! 
गजेन्द्रमोक्ष:-- गज का अर्थ हाथी, ग अक्षर ज्ञान का प्रतीक, ज का अर्थ साथ, यानी गज का अर्थ ज्ञानयुक्त! 
गज इन्द्रिय का अर्थ मन! 
मन एव मनुष्याणां बंधमोक्षा कारणं
मन ही बंधन अथवा मोक्ष का हेतू है!  
घड़ियाल संसार का प्रतीक है! 
क्रियायोगसाधना के माध्यम से  स्थिर होकर सहस्रारचक्र का दर्शन  प्राप्त कर के संसार बंधन से मुक्त होने को  ही गजेन्द्रमोक्ष कहते है! सहस्रारचक्र ही सुदर्शनचक्र है! सुदर्शन का अर्थ है दिखानेलायक!
अहंकार से अंधे हुवे मनुष्य को  ‘तुम नर नहीं हो,  दिव्यात्मस्वरूप हो, शेर हो’ यह समझाने के  लिए  ही नरसिंहावतार है! नरसिंह के अवतार में क्रियायोग साधक बनाकर, सिंह प्रयत्न यानी 
तीव्र प्रयत्न करने से अहंकार  मुक्त हो सकते हैं, हिरण्थकशिपू वध यही उद्बोधन करता है!  
व-वरिष्ट राह-मार्ग, वराह का अर्थ वरिष्ट मार्ग, क्रियायोग साधना मार्ग वरिष्ट मार्ग है! वराह अवतार में पृथ्वी को  पानी के   अंदर  से परमात्म अपना दोनों दंतों द्वारा ऊपर उठाते है!मनुष्य  पृथ्वी का प्रतीक है! संसार पानी का प्रतीक है! मनुष्य को ज्ञानदंत  बड़े  होने  के बाद आता है! यह ज्ञान का प्रतीक है! 
हे मनुष्य, संसार नाम के पानी में  डुबो मत, क्रियायोग  साधना से लभ्य हुवे ज्ञान द्वारा संसार से  मुक्त  होजाओ,  परमात्मा के साथ अनुसंधान प्राप्त करो! इस के लिए उद्देश्यित है वराहावतार!
  वराहावतार में स्थूलशरीर सम्बंधित ब्रह्मग्रंथी विच्छेदन होता है ! 
अहंकार और कामं साधक का रावण लक्षण है! खूब खाके सोना यानी निद्रा और तंद्रा साधक का कुम्भकर्ण लक्षण है! इन दोनों को क्रियायोग साधना से निर्मूलन करने और परामात्मा से अनुसंधान का उद्देश्य है श्रीरामावतार! सूक्ष्म शरीर संबंधित रुद्रग्रंथी विच्छेदन होता है 
श्रीरामावतार में!  
शिशु यानी शिशुप्रवृत्ति को पालनेवाला शिशुपाल! 
दंतावक्र यानी नया नया दांत आते समय रहनेवालि  शिशुप्रवृत्ति जो शिशु में होति है! 
हे साधक तुम्हारे अंदर की बचीहुइ शिशुप्रवृत्ति  यानी ‘मै, और मेरा’ अहंकार का नाम है शिशुपाल और दंतावक्त्र  दोनों को क्रियायोग साधना से निर्मूलित करने और परामात्मा  से अनुसंधान के उद्देश्यित है श्रीकृष्णावतार! श्रीकृष्णावतार में कारणशरीर संबंधित 
विष्णुग्रंथी विच्छेदन होता है ! 
परित्राणाय साधूनां विनाशायच दुष्कृताम् 
धर्मासंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे              8
साधू सज्जन संरक्षितार्थ, दुष्टजनों विनाश के लिए, और धर्म स्थापन के लिए, मै हर एक युग में अवतार ले रहा हू! 
मनुष्यों, दुष्ट और शिष्ट, सब परमात्मा स्वरूपि ही है! सारे लहरों में समुद्र का पानी ही है! राक्षस का हो अथावा देवता का हो प्रतिमायें उसी पत्थर से ही बनाता है! 
श्रीकृष्ण, महावतार बाबाजी, लाहिरी महाशय, स्वामी श्री युक्तेस्वर्जी, परमहम्सा श्री योगानान्दा इत्यादि महापुरुषों में भी वही परमात्म चैतन्य रहता है! केवल संकल्प मात्र से जगत को सर्वनाश  कर सकते है! परंतु लक्ष्य नाश् के लिए नहीं, लक्ष्य परामात्मा का  अनुसंधान के लिए है! साधारण मनुष्य को इन महापुरुषों से डरने की आवश्यकता नहीं है! ये लोग हमको प्रेम के माध्यम से  आकर्षीत करके परामात्मा का तरफ जाने का मार्ग हमको उद्भोधन करते है! 
अपने संतान जितना भी दुष्ट होने से भी, माॅ बाप वे सुधारने के लिए उचित सलाह देते रहते है! संतान उनकी  सलाह का मुताबिक़ प्रवर्तन बदलने से ठीक है, नहीं तों माॅ बाप उनका कर्म कर के छोडदेते है, उनका वध नही करेंगे! हम सबके माता पिता परमात्मा ही है! वे हममें अच्छा परिवर्तन आने के लिया चाहते है! मगर हमारा दुष्ट स्वभाव देख के वध करने नही चाहेंगे! 

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