KRIYA

Wednesday, 3 December 2014

संक्षिप्त रामायण

                       संक्षिप्त रामायण
अयोध्या का राजा दशरथ है! कौसल्या सुमित्रा और कैकेयी तीन पत्नियों है! दशरथ ने पुत्रकामेष्टि याग किया! इस का हेतु प्रथम भार्य कौसल्या को ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम, द्वितीय पत्नि सुमित्रा को तीसरा पुत्र लक्षमण और चौथा पुत्र शतृघ्न, तीसरा पत्नि कैकेयी को द्वितीय पुत्र भरत जन्म हुआ! महर्षि श्री वशिस्ट का सलहा का हेतू श्रीराम और लक्षमण को यागसम्रक्षनार्थ के लिए महर्षि श्री विश्वामित्र का साथ बेझता है! मार्गमध्य में त्राटक नाम राक्षसी को वध करता है श्रीराम! संतुस्ट होकर महर्षि श्री विश्वामित्र दोनों को अस्त्र और शस्त्र देता है! श्री विश्वामित्र का याग विध्वंस करने आया सुबाहु राक्षस को आग्नेय अस्त्र से वध करता है श्रीराम! दूसरा राक्षस मारीच को मानवास्त्र से वध करा के शत योजन दूर में समुद्र में फेक देता है! याग समाप्त होने पर श्री विश्वामित्र महर्षि श्री राम लक्षमण दोनों को लेकर सीता स्वयंवर में भाग लेने मिथिला नगर को लेजाते है! मार्गमध्य में पत्थर का रूप में पडा हुआ अहल्या को शापविमोचन करा के नाती बनाता है! सीता स्वयंवर में रावण  शिवधनुस को तोड नहीं करा सकेगा और अपमान हो कर लंका नगरी को वापस चलाजाता है!
श्रीराम सीता को, भरत मांडवी को, लक्षमण ऊर्मिला को और शत्रुघ्न श्रुतकीर्ति को विवाह करता है! परशुराम का इच्छा पूरा करनेवास्ते उस का धनुष से भी बाण संधान करके अपना शक्ति का प्रदर्शन करता है! श्रीराम अपना भ्रात्रुजनों पितुः दशरथ और माताओं को लेकर वापस अयोध्या को लौटजाते है!
दशरथ श्रीराम का राज्य पट्टाभिषेकं करने महर्षि वशिष्ट को पूछताछ करके मुहूर्त निश्चय करता है!
दासी मंधर का प्रोद्भल से कैकयी भूतकाल में दशरथ ने वाग्दान दियाहुआ दो वर  को अब देने के लिए जिद करती है! अनिवार्य परिस्थितियों में पत्नी कैकयी का मांग को पूरा करता है! वे है 1)श्रीराम को 14 वर्ष वनवास भेजना और  2) कैकयी का पुत्र को राज्य पट्टाभिषेकं करना! अपना पति जहा होगा वह ही मेरा अयोध्या करके सीता और अपना बड़ा भाई बिना रहा नहीं सकता करके लक्ष्मण दोनों श्रीरामजी का साथ वनवास जाते है! उस समय में शतृघ्ण और भरत अयोध्या में नहीं होते है! पश्चात् पुत्रवियोग का हेतु दशरथ पार्थिव देह त्याग करता है!
गुह ने श्रीराम लक्षमण और सीता को सरयू नदी अपना नाव में नदी पार करवाता है! उस को अपना महद्भाग्य समझता है! वह तीनों भरद्वाज महर्षी का आश्रम पहुँच जाता है! उधर से चित्रकूट में महर्षी वाल्मीकि का आश्रम पहुँच जाता है! उधर एक पर्णशाला निर्माण करते है! उस में प्रशान्त जीवन बिताना आरंभ करते है!
भरत अपना मामा का घर से लौट आता है! श्रीराम लक्षमण और सीता का वृत्तान्त जाना कर दुखित होता है! माता कैकेयी को अच्छा नहीं कियाबोल के उन तीनों को वापस अयोध्य लाने को चला जाता है! गुह का सहायता से भरद्वाज महर्षी का आश्रम पहुँच जाता है! पर्णशाला जाकर उन तीनों को अयोध्या वापस लौटने के लिए आग्रह करता है! पित्रुवाक्य परिपालन अत्यंत आवश्यक और उस का उल्लंघन करना धर्मविरुद्ध कर के समझाता है श्रीराम! भरत का इच्छा का मुताबिक़ अपना पादुकाओं को देता है! उन पादुकाओं को श्रीराम का प्रतिनिधि का रूप में स्थापित करता है भरत! श्रीराम को अयोध्या वापस लौटने के लिए 14 वर्ष प्रतीक्षा करूँगा, उससे एक मिनट भी देर होने से आत्मसमर्पण करूँगा करा के प्रतिज्ञा करता है!
कुछ समय पश्चात् चित्रकूट से रवाणा होकर चित्रकूट पहुँच कर महर्षि अत्रि का आश्रम पहुँचते है! उसका दर्शन करते है! विराध राक्षस को वध करके शरभंग पश्चात सुतीक्ष्ण आश्रम पहुँचते है! उधर से रवाणा होकर महर्षि अगस्त्य को उसका आश्रम में दर्शन करते है! महर्षि अगस्त्य से महत्वपूर्ण धनुर्बाणों और खद्द्ग को स्वीकार करते है! उधर से पॅंचवटि पहुँचते है! उधर पर्णशाला निर्माण करते है! उस में प्रशान्त जीवन बिताना आरंभ करते है! उधर जटायु पक्षी से मित्रता होता है! उस पक्षी से सकल सहायता मिलते है! कुछ समय बाद लंकाधिपती रावण का सोदरी शूर्पणखा पॅंचवटि का पास श्रीराम को देख करमोहित होजाता है! कामपीडिता होकर श्रीराम को चाहता है! श्रीराम का तिरस्कार पाकर होकर लक्ष्मण का पास जाता है! लक्ष्मण कुपित होकर शूर्पणखा का कान और नाक काट देता है! अपमान पाकर अपना भ्रातृजायां खर और दूषणों को बोलकर रोता है! भ्रातृजन खर दूषणों और14000 राक्षसों का साथ श्रीराम लक्ष्मणों को वध करने संकल्प करते है! इन सब को श्रीराम संहारण करता है! इस वार्त को सुनकर रावण क्रोधित होकर मारीच को भेजदेता है! स्वर्ण हिरण का रूप में सीता को मभ्य करता है! सीता का इच्छा से लक्ष्मण को सीता का रक्षा करने आदेश देकर उस स्वर्ण हिरण को लाने श्रीराम जाता है! हे सीता हे लक्ष्मण करके श्रीराम का आवाज अनुकरण करते हुआ आर्तनाद करके श्रीराम का बाण से मारीच मरजाता है! मारीच का धोखा नहीं समझते हुए श्रीराम को अपाय हुआ समझता है! श्रीराम को सहायता करने के लिए लक्ष्मण को विवश करता है सीता! उस पर्णशाला का चारों ओर एक रक्षरेखावृत्त बनाके श्रीराम को सहायता करने लक्ष्मण जाता है! इसी को लक्ष्मणरेखा कहते है! समय के लिए देखनेवाले रावण साधू सन्यासी वेषधारण करके सीता को लक्ष्मणरेखा पार करके बिक्षा देने को विवश करके चोरी से उठा के लेजाता है! आकाशमार्गा में पक्षी जटायु सीता को रक्षा करने रुकावट करता है! रावण ने पक्षी का पॅक काटदेता है! किष्किंधा का समीप मार्ग मध्य में अपना आभरणों को डालदेता है! श्रीराम मारीच को वध करके पर्णशाला को वापस अता है! सीता का अदृष्य से चिंताक्रांत् होता है! श्रीराम लक्ष्मण दोनों सीता को खोजने निकल पड़ते है! मार्ग मध्य में भूमि का उप्पर गिरा पडा जटायु रावण ने सीता को अपहरण करके लेगया का वार्ता देता है! इस  वृत्तान्त को सुनकर श्रीराम लक्ष्मण दोनों चकित होजाते है! मार्गमध्य में कबंध नाम का राक्षस को श्रीराम वध करता है! उस से शाप विमोचन होकर एक गंधर्व उस राक्षस शरीर से बाहर निकलाता है! संतुष्ट होकर वानरों का राजा सुग्रीव का सहायता मांगने के लिए कृतज्ञतापूर्वक कहकर अदृश्य होता है!सीता को खोजते हुए पंपा सरोवर प्रांत पहुंचटा है! उधर भक्त शबरी का आश्रम दर्शन करते है! उसका प्रेमपूर्वक आतिथ्य स्वीकार कर के ऋष्यमूकपर्वत का समीप में आते है! उधर सुग्रीव और हनुमानजी का साथ मित्रता होता है! हनुमानजीने लभ्य हुआ सीता का आभरणों को दिखाता है! उन को देखकर श्रीराम व्याकुल होजाता है! इधर वाली ने अपना भाई सुग्रीव का भार्या तारा को अपहरण करके उसको कड़ी यातना में डालता है! श्रीराम वाली को संहरण करता है! कृतज्ञतापूर्ण सुग्रीव सीता को अन्वेषण करने हनुमान का सहित समस्त वानरसेना को सारे दिशामे नियोगित करता है! हनुमान को और सुग्रीव का पुत्र अंगद को दक्षिण दिशा में भेजता है!
हनुमान समुद्र का किनारा पहुंचता है! उधर जटायु का भाई सम्पाती से सीता का अपहरण प्रदेश का बारे में पता लगता है! जांबवंत ने हनुमान का शक्ति सामर्थ्यो को श्लाघन करता है! 100 योजना दूर में रहा समुद्र का उस पार में रहा लंकानगरी पहुँचता है! उधर रास्ता में लंकिनी राक्षसी को वध करता है! अशोकवन का नीचे उपस्थित हुआ सीता को देखता है! श्रीराम ने दिया अंगुळीयकं को पहचान के लिए देता है! श्रीराम शीघ्र में आएगा और वापस अयोध्या लेजएगा करके धैर्य देता है! सीता से चूडामणिं को श्रीराम को देने के लिए लेता है!
अशोकाउद्यानवन् में राक्षसों वध करते हुए और उद्यानवन् का वृक्ष ध्वंस करते हुए हनुमान को ब्रह्मास्त्र से बाँध के रावण का सामने खडा करदेता है रावण का पुत्र इन्द्रजीत! हनुमान को वध करने आज्ञा देता है रावण! राजदूत को वध करना अधर्म है, कुछ कठिण शिक्षा देकर छोड़ने के लिए कहते है अनुज विभीषण! इस का कहने पर रावण का आज्ञा का अनुसार हनुमान का पूंछ को आग लगा कर छोडदेते है राक्षसों! इधर उधर खुदते हुए लंकानगरी का गृहों को आग लगाके श्रीराम का वापस लौट आता है हनुमानजी! हनुमानजी का शक्तिसामार्थ्यो और कार्यदीक्षता को संतोषजनक होता है श्रीरामजी!
इधर सीता ने श्रीरामजी को वापस लौटाने अग्रज रावण को विभीषण कहता है! क्रोधित होकर अनुज विभीषण को देशबहिस्कार करता है रावण! शरणागति माँगा विभीषण को अपना पक्ष में लेता है श्रीरामजी!
तत् पश्चात् नल का पर्यवेक्षण् मे श्रीरामजी करुणा से समुद्र का उप्पर वारधि का निर्माण हुआ! रावण का हित बोलने के लिए अंगद को राजदूत बनाके भेजता है श्रीरामजी! रावण युद्ध के ही संसिद्ध होता है! भीषणसंग्राम होता है! दोनों सेनाओं में बहुत लोग देहांत होते है! लक्ष्मण का हाथ में विरूपाक्ष मरजाता है! अग्निकेतु रश्मिकेतु सुप्तघ्न यज्ञकोप धूम्राक्ष वज्रदंष्ट्र अकम्पन प्रहस्त कुम्भकर्ण देवांतक नरान्तक अतिकाय महोदर त्रिशिर महापार्श्य इत्यादि श्रीरामजी का तीक्ष्ण बाणों से निहन्त होगये! रोषपूरित् होकर इन्द्रजीत लक्ष्मण को मूर्छित करता है! जांबवंत का सलहा का मुताबिक़ दिव्यौषधिवाला दिव्यौषधि समायोगात् संजीवनी पर्वत को हिमालयपर्वतों से  उठाके ले आते है हनुमानजी! दिव्यौषधिवाला संजीवनी पर्वत का सुगंधों का आघ्राण करके लक्ष्मण को पुनः जीवित होजाते है! संजीवनी पर्वत को फिर यथास्थान में रख कर वापस आता है हनुमानजी! तत् पश्चात् कुंभकर्ण का पुत्रों कुंभ निकुंभ यूपाक्ष शोणिताक्ष प्रजंघ कम्पन मकराक्ष इत्याधि राक्षसों अपना प्राणों खो बैठा! लक्ष्मण ने इन्द्रजीत को वध करता है! विरूपाक्ष महोदर उभायु को सुग्रीव वध करता है! अंगद महापार्श्व को वध करता है! आखरी में विभीषण का सलहा का मुताबिक़ श्रीरामजी ने रावण का उदर में बाण लगाके वध करता है! 
श्रीरामजी विभीषण लंका का राज्याभिषिक्त करता है! सीता अग्निप्रवेश करा के अपना पवित्रता को निरूपण करता है! सीता लक्षमण सपरिवारासमेत श्रीरामजी पुष्पक विमान में अयोध्या पहुँचजाता है! अग्रज को देख कर भरत आनंदभरित होता है! श्रीरामजी को पटट्टाभिषिक्त करके परम संतुष्ट होता है! 
                             






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