KRIYA

Wednesday, 28 November 2012

SPL KRIYA YOGA TECHNIQUES PART 2 IN HINDI


6) चक्रों मे बीजाक्षरो का ध्यान्
सीधा वज्रासन, पद्मासन अथवा सुखासन मे ज्ञानमुद्रा लगाके बैठिए! अनामिका अंगुलि के आग्रभाग को अंगुष्ठ के आग्रभाग से लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। कूटस्थ मे दृष्टि रखे! मन को जिस चक्र मे ध्यान कर रहे है उस चक्र मे रखिए और उसी चक्र पर तनाव डालिए! पूरब दिशा अथवा उत्तर दिशा की और मुँह करके बैठिए! शरीर को थोडा ढीला रखीए!मूलाधारचक्र मे तनाव डालिये! अनामिका अंगुलि को अंगुष्ठ से लगायें और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। अब मूलाधारचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखए!मूलाधारचक्र मे चार पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार लंबा श्वास लेते हुवे मन ही मन बीजाक्षर ‘’लं‘’ का उच्चारण करे और छोडते हुवे भी मन ही मन बीजाक्षर ‘’लं‘’ का उच्चारण करे! श्वास को रोके नही! ऐसा चार बार ‘’लं‘’ बीजाक्षर का उच्चारण करे!  
अब स्वाधिस्ठानचक्र मे जाएतनाव डालले! वरुण मुद्रा लगाए! कनिष्ठा  अंगुलि को अंगुष्ठ से लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें।  स्वाधिस्ठानचक्र मे  मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखएस्वाधिस्ठानचक्र मे छः पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार लंबा श्वास लेते हुवे मन ही मन बीजाक्षर वं‘’ का उच्चारण करे और छोडते हुवे भी मन ही मन बीजाक्षर ‘’वंका उच्चारण करे!  श्वास को रोके नही! ऐसा छ्ह बार ‘’वं‘’ बीजाक्षर का उच्चारण करे!
अब मणिपुरचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, अग्नि मुद्रा मे बैठे! अनामिका अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। मणिपुरचक्र मे तनाव डाले! मणिपुरचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखेमणिपुरचक्र मे दस पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार लंबा श्वास लेते हुवे मन ही मन बीजाक्षर ‘’रं‘’ का उच्चारण करे और छोडते हुवे भी मन ही मन बीजाक्षर ‘’रं‘’ का उच्चारण करे! श्वास को रोके नही! ऐसा दस बार ‘’रं‘’ बीजाक्षर का उच्चारण करे!     
अब अनाहतचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, वायु मुद्रा मे बैठे! तर्जनी अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। अनाहत चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! अनाहतचक्र मे बारह पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार लंबा श्वास लेते हुवे मन ही मन बीजाक्षर ‘’यं‘’ का उच्चारण करे और छोडते हुवे भी मन ही मन बीजाक्षर ‘’यं‘’ का उच्चारण करे! श्वास को रोके नही! ऐसा बारह बार ‘’यं‘’ बीजाक्षर का उच्चारण करे!
अब विशुद्धचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, शून्य यानि आकाश मुद्रा मे बैठे! मध्यमा अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। विशुद्धचक्र मे तनाव डाले! विशुद्धचक्र मे  मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे!   
विशुद्धचक्र मे सोलह पंखडियाँ होती हैअपनी शक्ति के अनुसार  लंबा श्वास लेते हुवे मन ही मन बीजाक्षर ‘’हं ‘’ का उच्चारण करे और छोडते हुवे भी मन ही मन बीजाक्षर हं‘’ का उच्चारण करेश्वास को रोके नहीऐसा सोलह  बार ‘’हं‘’ बीजाक्षर का उच्चारण करे!
अब आज्ञा नेगटिव चक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, ज्ञान मुद्रा मे बैठे! अंगुठें को तर्जनी अंगुली के सिरे से लगाए। शेष तीन अंगुलिया सीधी रखें। आज्ञा नेगटिव चक्र मे  मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! आज्ञा नेगटिव चक्र मे दो पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार लंबा श्वास लेते हुवे मन ही मन बीजाक्षर ‘’ओं ‘’ का उच्चारण करे और छोडते हुवे भी मन ही मन बीजाक्षर ‘’ओं‘’ का उच्चारण करे! ऐसा 18  बार ‘’ओं ‘’ बीजाक्षर का उच्चारण करे!
अब आज्ञा पाजिटिव चक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, ज्ञान मुद्रा मे बैठे! अंगुठें को तर्जनी अंगुली के सिरे से लगाए। शेष तीन अंगुलिया सीधी रखें। आज्ञा पाजिटिव चक्र मे  मन लगाना, कूटस्थ मे दृष्टि रखना! आज्ञा पोजिटिव चक्र मे दो पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार लंबा श्वास लेते हुवे मन ही मन बीजाक्षर ‘’ओं ‘’ का उच्चारण करे और छोडते हुवे भी मन ही मन बीजाक्षर ‘’ओं‘’ का उच्चारण करे! ऐसा 20  बार ‘’ओं ‘’ बीजाक्षर का उच्चारण करे!
अब सहस्रारचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, लिंग मुद्रा मे बैठे! मुट्ठी बाँधे और अंदर के अंगुठें को खडा रखे, अन्य अंगुलियों को बंधी हुई रखे। सहस्रारचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! 
अपनी शक्ति के अनुसार लंबा श्वास लेते हुवे मन ही मन बीजाक्षर ‘’रां ‘’ का उच्चारण 21 बार करे और छोडते हुवे भी मन ही मन बीजाक्षर ‘’रां‘’ का उच्चारण 21 बार करे! श्वास को रोके नही अब इसी चक्र मे मन लगा के ध्यान जितना अधिक कर सकते है उतना समय करते रहे! ध्यान का अर्थ साधक को केवल साक्षीभूत हो कर सहस्रार मे मन लगा के बैठना है!
नीचे दिया हुआ table में उन चक्रों में उच्चारण करनेवाले बीजाक्षर, कितानाबार उच्चारण करना, रंग, रूचि, शब्द इत्यादि दिया हुआ! 
चक्र
बीजाक्षर और फल
रंग, रूचि, शब्द और दल
मूलाधार
4 बार लं
इच्छा शक्ति
पीला, मधुर फल, भ्रमर और चार
स्वाधिष्ठान
6 बार वं
क्रिया शक्ति
धवल, थोड़ा कडवी, बांसुरी और छे
मणिपुर
10 बार रं
ज्ञान शक्ति
लाल, कडवी,वीणा और दस
अनाहत
12 बार यं
बीज शक्ति
नील, कट्ठी, मंदिर का घंटा और बारह
विशुद्ध
16 बार हं
आदिशक्ति
सफ़ेद मेघ, बहुत कडवी, प्रवाह, और सोलह
आज्ञा (नेगटिव)
18 बार   ‘
पराशक्ति
सूर्यकांति जैसे अद्भुत प्रकाश और बीस
आज्ञा (कूटस्थ)
20 बार   ‘
पराशक्ति
सूर्यकांति जैसे अद्भुत प्रकाश और बीस
सहस्रार
21 बार रां  ‘

साक्षीभूत


7) समस्त रोग निवारिणी क्रिया
सीधा वज्रासन, पद्मासन अथवा सुखासन मे ज्ञानमुद्रा लगा के बैठिए! अनामिका अंगुलि के आग्रभाग को अंगुष्ठ के आग्रभाग से लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। कूटस्थ मे दृष्टि रखीए! मन को जिस चक्र मे ध्यान कर रहे है उस चक्र मे रखिए और उस चक्र मे तनाव डालिए! पूरब दिशा अथवा उत्तर दिशा की और मुँह करके बैठिए! शरीर को थोडा ढीला रखीए!
मूलाधारचक्र मे तनाव डालिये! अनामिका अंगुलि को अंगुष्ठ से लगायें और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। अब मूलाधारचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! मूलाधारचक्र मे चार पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार लंबा श्वास लेवे और अपनी शक्ति के अनुसार इस श्वास को रोक के रखे! इस रोकने को अंतःकुंभक कहते है! अब अपनी शक्ति के अनुसार श्वास को लंबा छोडे एवम रोक के रखे! इस रोकने को बाह्य कुंभक कहते है! ऐसा चार बार अंतःकुंभक-बाह्य कुंभक करे!
अब स्वाधिस्ठानचक्र मे जाए, तनाव डाले! वरुण मुद्रा लगाए! कनिष्ठा  अंगुलि को अंगुष्ठ से लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। स्वाधिस्ठानचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! स्वाधिस्ठानचक्र मे छः पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार लंबा श्वास लेवे एवम श्वास को रोक के रखे! अब अपनी शक्ति के अनुसार श्वास को लंबा छोडे और इस श्वास को रोक के रखेऐसा छः बार अंतःकुंभक - बाह्य कुंभक करे!
अब मणिपुरचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, अग्नि मुद्रा मे बैठे! अनामिका अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। मणिपुरचक्र मे तनाव डाले! मणिपुरचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! मणिपुरचक्र मे दस पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार लंबा श्वास लेवे और अपनी शक्ति के अनुसार इस श्वास को रोक के रखे! अब अपनी शक्ति के अनुसार श्वास को लंबा छोडे और इस श्वास को रोक के रखे! ऐसा दस बार अंतःकुंभक - बाह्य कुंभक करे!
अब अनाहतचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, वायु मुद्रा मे बैठे! तर्जनी अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। अनाहतचक्र मे  मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! अनाहतचक्र मे बारह पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार लंबा श्वास लेवे और अपनी शक्ति के अनुसार इस श्वास को रोक के रखे! अब अपनी शक्ति के अनुसार श्वास को लंबा छोडे और इस श्वास को रोक के रखे! ऐसा बारह बार अंतःकुंभक - बाह्य कुंभक करे!
अब विशुद्ध चक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, शून्य यानि आकाश मुद्रा मे बैठे! मध्यमा अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। विशुद्ध चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! विशुद्ध चक्र मे सोलह पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार लंबा श्वास लेवे और अपनी शक्ति के अनुसार इस श्वास को रोक के रखे! अब अपनी शक्ति के अनुसार श्वास को लंबा छोडे और इस श्वास को रोक के रखे! ऐसा सोलह बार अंतःकुंभक - बाह्य कुंभक करे!
अब आज्ञा नेगटिव चक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, ज्ञान मुद्रा मे बैठे! आज्ञा नेगटिव चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! आज्ञा नेगटिव चक्र मे दो पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार  लंबा श्वास लेवे और अपनी शक्ति के अनुसार इस श्वास को रोक के रखे! अब अपनी शक्ति के अनुसार  श्वास को लंबा छोडे और इस श्वास को रोक के रखे! ऐसा 18 बार अंतःकुंभक - बाह्य कुंभक करे!
अब आज्ञा पाजिटिव चक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, ज्ञान मुद्रा मे बैठे! अंगुठें को तर्जनी अंगुली के सिरे से लगाए। शेष तीन अंगुलिया सीधी रखें। आज्ञा पाजिटिव चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! आज्ञा पाजिटिव चक्र मे दो पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार लंबा श्वास लेवे और अपनी शक्ति के अनुसार इस श्वास को रोक के रखे! अब अपनी शक्ति के अनुसार श्वास को लंबा छोडे और इस श्वास को रोक के रखे! ऐसा 20 बार अंतःकुंभक - बाह्य कुंभक करे!
अब  सहस्रारचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, लिंग मुद्रा मे बैठे! मुट्ठी बाँधे और अंदर के अंगुठें को खडा रखे, अन्य अंगुलियों को बंधी हुई रखे। 
सहस्रार चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे!
सहस्रारचक्र मे सहस्र यानि एक हज़ार पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार लंबा श्वास लेवे और अपनी शक्ति के अनुसार इस श्वास को रोक के रखे! अब अपनी शक्ति के अनुसार श्वास को लंबा छोडे और इस श्वास को रोक के रखे! ऐसा समाधि मे जाने तक अंतःकुंभक - बाह्य कुंभक करते रहे! अगर समाधि नही आती है तो अंतःकुंभक - बाह्य कुंभक जितना कर सकते है उतना करे अथवा अब इसी चक्र मे मन लगा के ध्यान जितना कर सकते है उतने समय तक करते रहे! ध्यान का अर्थ केवल साधक साक्षीभूत हो के सहस्रार मे मन को लगा के बैठना है!
इस प्राणायाम क्रिया के कारण दीर्घकालिक रोग यानि डायबिटिज, किड्नी व्याधिया, ह्रदय दुर्बलता और पार्किंसन व्याधि इत्यादि का निवारण होता है! 
8) शीघ्र समाधि क्रिया
सीधा वज्रासन, पद्मासन अथवा सुखासन मे ज्ञानमुद्रा लगाके बैठिए! अनामिका अंगुलि के आग्रभाग को अंगुष्ठ के आग्रभाग से लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। कूटस्थ मे दृष्टि रखे! मन को जिस चक्र मे ध्यान कर रहे है उसी चक्र मे रखिए और उस चक्र मे तनाव डालिए! पूरब दिशा अथवा उत्तर दिशा की और मुँह करके बैठिए! शरीर को थोडा ढीला रखीए!
मूलाधारचक्र मे तनाव डालिये! अनामिका अंगुलि को अंगुष्ठ से लगायें और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। मूलाधारचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! मूलाधारचक्र मे चार पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार श्वास को लंबा लेना और श्वास को लंबा छोडना! यहा श्वास को रोखना नही है! ऐसा चार बार करे!
अब स्वाधिस्ठानचक्र मे जाए! तनाव डाले! वरुण मुद्रा लगाए! कनिष्ठा अंगुलि को अंगुष्ठ से लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। स्वाधिस्ठानचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! स्वाधिस्ठानचक्र मे छः पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेना और श्वास को लंबा छोडना! श्वास को रोकना नही है! ऐसा छः बार करे!
अब मणिपुरचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, अग्नि मुद्रा मे बैठे! अनामिका अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। मणिपुरचक्र मे तनाव डाले! मणिपुरचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! मणिपुरचक्र मे दस पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा छोडे! श्वास को रोके नही! ऐसा दस बार करे!
अब अनाहतचक्र मे जाए इस चक्र मे तनाव डाले, वायुमुद्रा मे बैठे! तर्जनी अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। अनाहतचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! अनाहतचक्र मे बारह पंखडियाँ होती है!  अपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा छोडे! श्वास को रोके नही! ऐसा बारह बार करे!
अब विशुद्धचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, शून्य यानि आकाश मुद्रा मे बैठे! मध्यमा अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। विशुद्धचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! विशुद्धचक्र मे सोलह पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा छोडे! श्वास को रोके नही! ऐसा सोलह बार करे!
अब आज्ञा नेगटिव चक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, ज्ञान मुद्रा मे बैठे! अंगुठें को तर्जनी अंगुली के सिरे से लगा दे। शेष तीन अंगुलिया सीधी रखें। आज्ञा नेगटिव चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! आज्ञा नेगटिव मे दो पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा छोडे! श्वास को रोके नही! 18  बार करे!
अब आज्ञा पाजिटिव चक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, ज्ञान मुद्रा मे ही बैठेआज्ञा पाजिटिव चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! आज्ञा पाजिटिव चक्र मे दो पंखडियाँ होती हैअपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा छोडे! श्वास को रोके नही! ऐसा 20 बार करे
अब  सहस्रारचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, लिंग मुद्रा मे बैठे! मुट्ठी बाँधे और अंदर के अंगुठें को खडा रखे, अन्य अंगुलियों को बंधी हुई रखे। सहस्रारचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे!
सहस्रारचक्र मे सहस्र यानि एक हज़ार पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार 21 श्वास लंबा लेवे और 21 श्वास लंबा ही छोडे! श्वास को रोके नही! ऐसा समाधि मे जाने तक श्वास लंबा लेवे और श्वास लंबा ही छोडते रहे! जितना अधिक कर सकते है उतना करे अथवा अब इसी चक्र मे मन लगा के ध्यान जितना कर सकते है उतने समय तक करते रहे! ध्यान का अर्थ केवल साधक साक्षीभूत हो कर सहस्रारचक्र मे मन को लगा के बैठना है!
 9) संचित कर्म घटाने की क्रिया
सीधा वज्रासन, पद्मासन अथवा सुखासन मे ज्ञानमुद्रा लगाके बैठिए! अनामिका अंगुलि के आग्रभाग को अंगुष्ठ के आग्रभाग से लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। कूटस्थ मे दृष्टि रखीए! मन को जिस चक्र मे ध्यान कर रहे है उस चक्र मे रखिए और उस चक्र मे तनाव डालिए! पूरब दिशा अथवा उत्तर दिशा की और मुँह करके बैठिए! शरीर को थोडा ढीला रखीए!
मूलाधारचक्र मे तनाव डालिये! पृथ्वीमुद्रा लगाए!अनामिका अंगुलि को अंगुष्ठ से लगायें और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। मूलाधारचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! मूलाधारचक्र मे चार पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा छोडे! श्वास को रोके नही! एसा चार बार करे!
अब स्वाधिस्ठानचक्र मे जाए!  तनाव डाले! वरुण मुद्रा
लगाए! कनिष्ठा  अंगुलि को अंगुष्ठ से लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें।  स्वाधिस्ठानचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! स्वाधिस्ठानचक्र मे छः पंखडियाँ होती है! ! अपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा छोडे! श्वास को रोके नही!  ऐसा छः बार करे!
अब मणिपुरचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, अग्नि मुद्रा मे बैठे! अनामिका अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें।  मणिपुरचक्र मे  मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखेमणिपुरचक्र मे दस पंखडियाँ होती है!  अपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा छोडे! श्वास को रोके नही! ऐसा दस बार करे!
अब अनाहतचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, वायु मुद्रा मे बैठे!
तर्जनी अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। अनाहतचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! अनाहतचक्र मे बारह पंखडियाँ होती हैअपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा छोडे!  ऐसा बारह बार करे!
अब विशुद्धचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, शून्य यानि आकाश मुद्रा मे बैठे! मध्यमा अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। विशुद्ध चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! विशुद्धचक्र मे सोलह पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा छोडे! श्वास को रोके नही! ऐसा सोलह बार करे!
अब आज्ञा नेगटिव चक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, ज्ञान मुद्रा मे बैठे! आज्ञा नेगटिव चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! आज्ञा नेगटिव मे दो पंखडियाँ होती हैअपनी शक्ति के अनुसार  श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा  छोडे! श्वास को रोके नही! ऐसा 18 बार करे!
अब आज्ञा पाजिटिव चक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, ज्ञान मुद्रा मे ही बैठे! आज्ञा पाजिटिव चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! आज्ञा पाजिटिव चक्र मे दो पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा छोडे! श्वास को रोके नही! ऐसा 20 बार करे! 
अब सहस्रारचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, लिंग मुद्रा मे बैठे! मुट्ठी बाँधे और अंदर के अंगुठें को खडा रखे, अन्य अंगुलियों को बंधी हुई रखे। सहस्रारचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! सहस्रारचक्र मे सहस्र यानि एक हज़ार पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार 21 श्वास लंबा लेवे और 21 श्वास लंबा ही छोडे! श्वास को रोके नही! अब श्वास को ‘’ह.....हा कहके छोड देवे!
ऐसा समाधि मे जाने तक श्वास लंबा लेवे और श्वास लंबा ही छोडते रहे! जितना अधिक कर सकते है उतना करे अथवा अब इसी चक्र मे मन लगा के ध्यान जितना कर सकता है उतने समय तक करते रहे! ध्यान का अर्थ केवल साधक को साक्षीभूत होकर सहस्रारचक्र मे मन लगा के बैठना है!सहस्रारचक्र महाभारत मे लिखा हुवा धर्मक्षेत्र का अंत है!  
अब पांच सूक्ष्म शरीरों को व्यक्तीकरण करो! यद्भावं तत्भवति का तात्पर्य तुम जैसा सोचोगे वैसा बनोगे! पांच शरीरों से ज्यादा व्यक्तीकरण नही करे! अब धृढ निश्चय से सोचे कि अपना संचित कर्म इस व्यक्तीकरण किए हुए पांच सूक्ष्म शरीरों मे मै अनुभव कर रहा हू! अब ये शपथ मन ही मन करे --- 
‘’ओ कर्म सिद्धांत मै अपनी दिव्य दृष्टी मे तीव्र एकाग्रता और दिव्य चेतनों से पांच सूक्ष्म शरीरों का व्यक्तीकरण किया है, अब मैने अपने संचित कर्मों को इन व्यक्तीकरण किए हुए सूक्ष्म शरीरों मे अनुभव किया है, अब मै मुक्त हू! ऐसी शपथ पांच सूक्ष्म शरीरों के लिये पांच बार लेवे!
अब मन में कहिये, ॐ आदिभौतिक शांति, ॐ आदिदैविक शांति, ॐ आध्यात्मिक शांति, ॐ प्रुथिविः शांति, ॐ आपः   शांति, ॐ तेजो शांति, ॐ आकाशो शांति, ॐ अंतरिक्षो शांति, ॐ वनस्पतयः शांति, ॐ औषधयः शांति, ॐ शांति, ॐ  शांति, ॐ शांति, ॐ शांतिरेव शांति!
अब कूटस्थ में मन और दृष्टि लगाना, लिंगामुद्र अथवा ज्ञानमुद्रा लगाके खेचरी में ध्यान करना!    

10) चक्र स्पंदन समाधि क्रिया
सीधा वज्रासन, पद्मासन अथवा सुखासन मे ज्ञान मुद्रा लगा के बैठिए! अनामिका अंगुलि के आग्रभाग को अंगुष्ठ के आग्रभाग से लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। कूटस्थ मे दृष्टि रखे! मन को जिस चक्र मे ध्यान कर रहे है उस चक्र मे रखे और उसी चक्र मे तनाव डाले! पूरब दिशा अथवा उत्तर दिशा की और मुँह करके बैठिए! शरीर को थोडा ढीला रखीए!
पृथ्वी मुद्रा लगाए! मूलाधारचक्र मे तनाव डाले! अनामिका अंगुलि को अंगुष्ठ से लगायें और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। मूलाधारचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! मूलाधारचक्र मे चार पंखडियाँ होती है! इस मूलाधारचक्र पर तनाव रखते हुवे लंबवत (vertically) स्थिति मे चार बार घडी की सुइयों के दिशा(Clockwise)मे और चार बार घडी की सुइयों के दिशा के विपरीत दिशा(AntiClockwise)मे, ऐसे ही क्षैतिज्ञ स्थिति (horizontally)मे चार बार घडी की सुइयों के दिशा(Clockwise)मे और चार बार घडी की सुइयों के विपरीत दिशा(AntiClockwise)मे चलाते हुए घुमाना चाहिये! ततपश्चात चार बार लंबा श्वास लेवे और छोडे, श्वास को रोके नही!
अब स्वाधिस्ठान चक्र मे जाए! तनाव डाले! वरुण मुद्रा लगाए! कनिष्ठा  अंगुलि को अंगुष्ठ से लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। स्वाधिस्ठान चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! स्वाधिस्ठानचक्र मे छः पंखडियाँ होती है! इस स्वाधिस्ठानचक्र पर तनाव रखते हुवे (vertically) छः बार(clockwise) मे, और छः बार (anticlockwise) मे, ऐसे ही (horizontally) छः बार (clockwise) मे और छः बार (anticlockwise)मे घुमाना चाहिये! ततपश्चात छः बार लंबा श्वास लेवे और छोडे, श्वास को रोके नही!     
अब मणिपुरचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, अग्नि मुद्रा मे बैठे! अनामिका अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। मणिपुरचक्र मे तनाव डाले! मणिपुरचक्र मे  मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे!मणिपुरचक्र मे दस पंखडियाँ होती है! इस मणिपुरचक्र मे तनाव रखते हुवे (vertically) दस बार (clockwise) मे, और दस बार (anticlockwise) मे, ऐसे ही (horizontally) दस बार (clockwise)  मे और दस बार (anticlockwise) मे घुमाना चाहिये! ततपश्चात दस बार लंबी श्वास लेवे और छोडे, श्वास को रोके नही! अब अनाहतचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, वायु मुद्रा मे बैठे! इसी चक्र मे  मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! अनाहतचक्र मे बारह पंखडियाँ होती है!  
अब इसी अनाहतचक्र मे तनाव रखते हुवे (vertically) बारह बार् (clockwise) मे और बारह बार (anticlockwise) मे, ऐसे ही (horizontally) बारह बार (clockwise)  मे और बारह बार (anticlockwise) मे घुमाए! ततपश्चात बारह बार लंबा श्वास लेवे और छोडे, श्वास को रोके नही! 
अब विशुद्ध चक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, शून्य यानि आकाश मुद्रा मे बैठे! मध्यमा अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। विशुद्धचक्र मे तनाव डाले! विशुद्धचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे!
विशुद्धचक्र मे सोलह पंखडियाँ होती है! अब इसी विशुद्ध चक्र मे तनाव रखते हुवे (vertically) सोलह बार् (clockwise) मे, और सोलह बार (anticlockwise) मे ऐसे ही (horizontally) सोलह बार (clockwise) मे और सोलह बार (anticlockwise) मे घुमाए ! ततपश्चात सोलह बार लंबी श्वास लेवे और छोडे!
अब आज्ञा नेगटिव चक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, ज्ञान मुद्रा मे बैठे! अंगुठें को तर्जनी अंगुली के सिरे से लगा दे। शेष तीन अंगुलिया सीधी रखें। आज्ञा नेगटिव चक्र मे तनाव डाले! आज्ञा नेगटिव चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! आज्ञा नेगटिव चक्र मे दो पंखडियाँ होती है!  
अब इसी आज्ञा नेगटिव चक्र पर तनाव रखते हुवे (vertically) 18 बार् (clockwise) मे और 18 बार (anticlockwise) मे ऐसे ही (horizontally) 18 बार (clockwise) मे और 18 बार (anticlockwise) मे घुमाए! ततपश्चात 18 बार लंबी श्वास लेवे और छोडे, श्वास को रोके नही! 
अब आज्ञा पाजिटिव चक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, ज्ञान मुद्रा मे ही बैठे! इसी चक्र मे  मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! आज्ञा पाजिटिव चक्र मे दो पंखडियाँ होती है!  
अब इसी आज्ञा पाजिटिव चक्र मे तनाव रखते हुवे (vertically) 20 बार् (clockwise) मे और 20 बार (anticlockwise) मे ऐसा ही (horizontally) 20 बार (clockwise)  मे, और 20 बार (anticlockwise) मे घुमाए! ततपश्चात 20 बार लंबी श्वास लेवे और छोडे, श्वास को रोके नही! 
अब सहस्रारचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, लिंग मुद्रा मे बैठे! मुट्ठी बाँधे और अंदर के अंगुठें को खडा रखे, अन्य अंगुलियों को बंधी हुई रखे। सहस्रारचक्र पर तनाव डाले! सहस्रारचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे!
अब इसी सहस्रारचक्र मे तनाव रखते हुवे (vertically) 21 बार् (clockwise) मे, और 21 बार (anticlockwise) मे, ऐसे ही (horizontally) 21 बार (clockwise)  मे, और 21 बार (anticlockwise) मे घुमाए ! ततपश्चात 21 बार लंबा श्वास लेवे और छोडे, श्वास को रोके नही! 
सहस्रारचक्र मे सहस्र यानि एक हज़ार पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा ही छोडे! श्वास को रोके नही! 
ऐसा समाधि मे जाने तक श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा ही छोडते रहे! जितना अधिक कर सकते है उतना करे! अथवा अब इसी चक्र मे मन लगा के ध्यान जितना कर सकते है उतने समय तक करते रहे! ध्यान का अर्थ साधक केवल साक्षीभूत हो कर सहस्रारचक्र मे मन को लगाकर बैठना है!
11) समाधि और विस्तारण क्रिया
सीधा वज्रासन, पद्मासन अथवा सुखासन मे ज्ञानमुद्रा लगा के बैठे! अनामिका अंगुलि के आग्रभाग को अंगुष्ठ के आग्रभाग से लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। कूटस्थ मे दृष्टि रखे! मन को जिस चक्र मे ध्यान कर रहे है उसी चक्र मे रखे और उस चक्र मे तनाव डालिए! पूरब दिशा अथवा उत्तर दिशा की और मुँह करके बैठिए! शरीर को थोडा ढीला रखीए!
अब दोनों हाथो को एक दूसरे के उपर रखकर एक मिनिट तक रगडे और मन ही मन बोले----
‘’ऐ मेरे स्थूल शरीर स्थित विश्व परमात्म चेतना नमस्कार, मुझे अरोग्य प्रदान करो ‘’
‘’ऐ ब्रह्मांडस्थित विराट स्थूल परमात्म चेतना नमस्कार, मेरे स्थूल शरीर स्थित विश्व परमात्म चेतना को तुम्हारी विराट स्थूल परमात्म चेतना मे लय होने दो‘’
दोनों हाथों पर तनाव डाले एवम ऐसे ही रखे अब मन ही मन बोले----
‘’ऐ मेरे सूक्ष्म शरीर स्थित तेजस परमात्म चेतना नमस्कार, मुझे बल और शक्ति प्रदान करो‘’
‘’ऐ ब्रह्मांडस्थित हिरण्यगर्भ सूक्ष्म परमात्म चेतना नमस्कार, मेरे सूक्ष्म शरीर स्थित तेजस परमात्म चेतना को तुम्हारी हिरण्यगर्भ सूक्ष्म परमात्म चेतना मे लय होने दो‘’
दोनों हाथों का तनाव छोड देवे.
अब फिर से दोनों हाथों पर तनाव डाले, ऐसे ही रखे, अब मन ही मन बोले----
‘’ऐ मेरे कारण शरीर स्थित प्राज्ञ परमात्म चेतना नमस्कार, मुझे इच्छा शक्ति, शुद्ध चेतना और ज्ञान प्रदान करो‘’
‘’ऐ ब्रह्मांडस्थित ईश्वर कारण परमात्म चेतना नमस्कार, 
मेरे प्राज्ञ शरीर स्थित कारण परमात्म चेतना को तुम्हारी ईश्वर कारण परमात्म चेतना मे लय होने दो ‘’
दोनों हाथों पर के तनाव को छोडो देवे.
मेरी विश्व स्थूल चेतना परमात्मा के विराट स्थूल चेतना के साथ मिल गई, तेजस सूक्ष्म चेतना परमात्मा के विराट सूक्ष्म चेतना के साथ मिल गई, प्राज्ञ कारण सूक्ष्म चेतना परमात्मा के ईश्वर कारण चेतना का साथ मिल गई,
तुम्हारी स्थूल चेतना को इंद्रिय चेतना के साथ लय करो, इंद्रिय चेतना को मन चेतना के साथ लय करो, मन चेतना को बुद्धि चेतना के साथ लय करो, बुद्धि चेतना को चित्त चेतना के साथ लय करो, चित्त चेतना को अहं के साथ लय करो, अहं चेतना को आत्म चेतना के साथ लय करो, आत्म चेतना को  परमात्म चेतना के साथ लय करो.  
अब मन ही मन बोले----
‘’मै शरीर नही हूँ, चेतना स्वरूप हूँ मेरी ही चेतना इस शरीर मे फैली हुई है! अब मेरी चेतना इस सारे कमरे मे फैल रही है! मेरी ही चेतना इस टाऊन मे, सिटी मे, इस राष्ट्र मे और इस सारे भारत मे फैल रही है! अब मेरी चेतना पूरे एशिया खंड मे फैल रही है! अब सारे खंडों मे यानि उत्तर और दक्षिण अमरिका, यूरप, आस्ट्रेलिया, आर्किटिका, अंटार्किटिका, समस्त भूमंडल मे फैली हुई है! अब मेरी चेतना सारे सौरकुटुंब यानि भूमि, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि समस्त मे फैली हुई है! अब मेरी चेतना सारे जगत मे फैली हुइ है! अब मेरी चेतना कृष्ण चेतना यानि सृष्टि के परमात्मा मे लीन हो गई है! अब मेरी चेतना परमात्म चेतना मे पूर्ण स्थिती मे लय हो गई है! अब सब का मन मेरा मन है, सारे नदियाँ, समुद्र मेरा रक्त है, सारे पहाड मेरी हड्डियाँ है, सारे नक्षत्र मंडल मेरे शरीर के अंदर के कण है! मै देशरहित हूँ, कालरहित हूँ, मै मंगलस्वरूप हूँ, आनंदस्वरूप हूँ, शिवोहं, शिवोहं, शिवोहं,
आनंदोहं,   आनंदोहं,   आनंदोहं,   सतचिदानंदोहं,
अहं ब्रह्मास्मि,    अहं ब्रह्मास्मि,    अहं ब्रह्मास्मि...!!!
12) शारीर का आरोग्यलाभ क्रिया
सीधा वज्रासन, पद्मासन अथवा सुखासन मे ज्ञानमुद्रा लगाके बैठिए! अनामिका अंगुलि के आग्रभाग को अंगुष्ठ के आग्रभाग से लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। कूटस्थ मे दृष्टि रखे! मन को जिस चक्र मे ध्यान कर रहे है उसी चक्र मे रखिए और उस चक्र मे तनाव डालिए! पूरब दिशा अथवा उत्तर दिशा की और मुँह करके बैठिए! शरीर को थोडा ढीला रखीए!
मूलाधारचक्र मे तनाव डालिये! अनामिका अंगुलि को अंगुष्ठ से लगायें और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। मूलाधारचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! मूलाधारचक्र मे चार पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार श्वास को लंबा लेना और श्वास को लंबा छोडना! यहा श्वास को रोखना नही है! ऐसा चार बार करे!
अब स्वाधिस्ठानचक्र मे जाए! तनाव डाले! वरुण मुद्रा लगाए! कनिष्ठा अंगुलि को अंगुष्ठ से लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। स्वाधिस्ठानचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! स्वाधिस्ठानचक्र मे छः पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेना और श्वास को लंबा छोडना! श्वास को रोकना नही है! ऐसा छः बार करे!
अब मणिपुरचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, अग्नि मुद्रा मे बैठे! अनामिका अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। मणिपुरचक्र मे तनाव डाले! मणिपुरचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! मणिपुरचक्र मे दस पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा छोडे! श्वास को रोके नही! ऐसा दस बार करे!
अब अनाहतचक्र मे जाए इस चक्र मे तनाव डाले, वायुमुद्रा मे बैठे! तर्जनी अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। अनाहतचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! अनाहतचक्र मे बारह पंखडियाँ होती है!  अपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा छोडे! श्वास को रोके नही! ऐसा बारह बार करे!
अब विशुद्धचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, शून्य यानि आकाश मुद्रा मे बैठे! मध्यमा अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। विशुद्धचक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! विशुद्धचक्र मे सोलह पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा छोडे! श्वास को रोके नही! ऐसा सोलह बार करे!
अब आज्ञा नेगटिव चक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, ज्ञान मुद्रा मे बैठे! अंगुठें को तर्जनी अंगुली के सिरे से लगा दे। शेष तीन अंगुलिया सीधी रखें। आज्ञा नेगटिव चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! आज्ञा नेगटिव मे दो पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा छोडे! श्वास को रोके नही! 18  बार करे!
अब आज्ञा पाजिटिव चक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, ज्ञान मुद्रा मे ही बैठेआज्ञा पाजिटिव चक्र मे मन लगाए, कूटस्थ मे दृष्टि रखे! आज्ञा पाजिटिव चक्र मे दो पंखडियाँ होती हैअपनी शक्ति के अनुसार श्वास लंबा लेवे और श्वास को लंबा छोडे! श्वास को रोके नही! ऐसा 20 बार करे
अब  सहस्रारचक्र मे जाए, इस चक्र मे तनाव डाले, लिंग मुद्रा मे बैठे! मुट्ठी बाँधे और अंदर के अंगुठें को खडा रखे, अन्य अंगुलियों को बंधी हुई रखे। सहस्रारचक्र मे मन लगाए,कूटस्थ मे दृष्टि रखे!
सहस्रारचक्र मे सहस्र यानि एक हज़ार पंखडियाँ होती है! अपनी शक्ति के अनुसार 21 श्वास लंबा लेवे और 21 श्वास लंबा ही छोडे!
अब ह ह करके मुह से रेचकम यानी श्वास छोड़ें!
मन में ऐसा कहिये:  
मै अपना शारीर को छोटे छोटे अणुवों में विभाजित किया हु, उन में से जो व्याधीग्रस्त, अनारोगी और जड़ अणुवों को परामात्मा का अनुमति से ब्रह्माण्ड में छोड़ दिया हु, परामात्मा का अनुमति से ब्रह्माण्ड से आरोग्यलाभ और उत्साहपूर्ण अणुवों को लेलिया हूँ, इन अणुवों को पीछे छोड़ा हुवा अणुवों के साथ मिलाके ध्यान का अनुकूलित शारीर को पुनर्निर्माण किया हु! 
शिवोहं, शिवोहं, शिवोहं,
आनंदोहं,   आनंदोहं,   आनंदोहं,   सतचिदानंदोहं,
अहं ब्रह्मास्मि,    अहं ब्रह्मास्मि,    अहं ब्रह्मास्मि...!!!
समाधि मे जाने तक श्वास लंबा लेवे और श्वास लंबा ही छोडते रहे! कूटस्थ में अथवा सहस्रार  चक्र मे मन लगा के ध्यान खेचरी मुद्रा में जितना कर सकते है उतने समय तक करते रहे! ध्यान का अर्थ केवल साधक साक्षीभूत हो कर सहस्रारचक्र मे मन को लगा के बैठना है!

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