KRIYA

Monday, 5 January 2015

क्रियायोग - तीसरा आँख Part 1

                                                                                  
                  तीसरा आँख -  क्रियायोग
        
                 प्रेरणा: श्री श्री परमहंस योगानंद
          रचना: कौता मार्कंडेय शास्त्रि  
         





                                                    
                                                                    
             


  
      ॐ श्री योगानंद गुरु परब्रह्मणेनमः
शरीरसमस्थिति:
ह्रदय फेफडे रक्तप्रसरण और मॉसफेसी(Muscles)का स्पंदनो में गभराहट नहीं होने चाहिए! निश्शब्द निश्चलता, और स्थिरत्व होने और तनावरहित देह मानसिक प्रशान्तता देगा! अथात शक्ति वृधा नहीं होगा! साधक शरीर  को रिलाक्स(relax) करना चाहिए! एकाग्रता को वृद्धि करना है! शक्ति को शरीर  से उपसंहार कर के चेतानापूर्वक मेरुदंड और मस्तिष्क(cerebrum)का अन्दर दिशानिर्देश करा सकता है! शरीर को सभी स्पंदनो से दूर करना चाहिए! चंचल शरीर आध्यात्मिकता को दोहद नहीं करेगा!
कुछ लोग बाहर से देखने के लिए आरोग्य दिखाई देता है परंतु आंशिक रूप से तनाव स्थिति में रहते है! उन लोगों का पादं पाणी गुदास्थान शिशिनं और मुख इति कर्मेन्द्रिया शांत दिखाई देता है पर असली में आँख नाक कान जीब त्वचा इति ज्ञानेंद्रियों चंचल होता है! वैसा शरीर आंशिक रूप से तनाव स्थिति में होक क्रमशः थक जाते है!
दीर्घ अंतःकुंभक और बाह्य कुंभक करने साधक का फेफडे चंचलरहित स्पंदन निश्शब्द शांति सन्नाट स्थिति में होता है! ह्रदय का स्पंदनो कम कराने को  दोहद करेगा! वैसा देहा परिपूर्ण समस्थिति में है कहा सकते है! 
गहरा नीँद में मनुष्य का चेतन और प्राणशक्ति अप्रयत्नपूर्वक ही साधक का इन्द्रियों माँसपेशियों शिरा फेफडे डयाफ्रं ह्रदय इत्यादि से विमुक्त होके रहेगा! इसीको अचेतानापूर्वक शांत स्थिति कहते है!
क्रियायोग प्राणायाम पद्धतियों का माध्यम से चेतनापूर्वक मन और शक्ति को वष कर के इन्द्रियों माँसपेशियों शिरा फेफडे डयाफ्रं ह्रदय इत्यादि से उपसम्हारण करा सकता है!
डयनमो का बल्ब फट्ने से उस का अंदर का विद्युत् उस डयनमो का अन्दर पहुँच जाता है! वैसा ही मराहुआ शरीर का प्राणशक्ति और चेतना परमात्मा का(Cosmic Energy) शक्ति और चेतना(Cosmic Consciousness)नामका डयनमो का अंदर पहुंच जाता है! डयनमो का तार पूरा मत निकालिये! उस टूटी हवी बल्ब का स्थान में और एक बल्ब लगाने से उस डयनमो फिर चालू होजायेगा! उन तारे पूरा खराब होने से कुछ नहीं करसकता उपयोग नहीं है! उस का अन्दर का विद्युत् उस डयनमो का अन्दर जाएगा! मराहुआ शरीर एक बल्ब जैसा है! मानव प्राणशक्ति और चेतना एक डयनमो जैसा है! ए परमात्मा का डयनमो से ही आया है! अथात मनुष्य शरीर का प्राणशक्ति और चेतना अपना भूमि और भूम्याकर्षनों से विमुक्त होने तक इस बल्ब यानी शरीर जोड़ा जाता है! अथात मरणं इच्छाओँ यानी तारों का अंता नहीं है, वह केवल टूट होने बल्ब जैसा है!
मनुष्य चेतानापूर्वक शान्तस्थिति को क्रियायोगासाधाना द्वारा साध्य करना है! इन्द्रियों से, मन से, माम्स्फेसीयों से ह्रदय से फेफडों से गुर्दो से अपना इच्छा से विमुक्त होने का स्थिति लभ्य करना चाहिए!
दैडने समय शरीर नाम का बल्ब अधिक तेज से प्रकाशित होता है! शरीर को उपयोग करने रीति का मुताबिक़ वह जलता है! ध्यान बिल्कुल नहीं करने मनुष्य का शरीर ज्यादा कम कांती से जलेगा! यह ही मरण का उप्पर मनुष्य का विजय! मन और प्राणशक्ति का कारण मनुष्य को इस जड़शरीर का साथ संबंध होता है! जोभी काम कारता है उस काम  मन और प्राणशक्ति साथ मिलके करता है! प्रयत्न का साथ विचारें और प्राणशक्ति दोनों को उपसंहरण करना अत्यंत आवश्यक है! मनुष्य चेतना और प्राणशक्ति दोनों एक गाँठ जैसा है! इस गाँठ को निकालना चाहिए तब परमात्मा का अनुसंथान आसान होजायेगा!
अवयवों और माँसपेशों विश्रांत होने से भौतिकशरीर का अन्दर का कण नाशन कम होजायेगा! नाश हुआ कणों को इस विश्रांत पद्धति से पुनरुद्धन करा सकते है!
नेत्रों को बंद करके रेचकं करना है! इन्द्रियों से श्वास और ध्यास को उपसंहरण करना चाहिए! ह्रदय और रक्तप्रसरण को अपना इच्छा शक्ति से व्याकुलतारहित करसकते है!  शरीर का अंदर का जोभी अवयव शांत करने को उस अंग को प्रथम में तनाव(Tense) करना चाहिए! ॐ नमःशिवाय अथवा ॐ नमो भगवते वासुदेवाय इति तीन या चार बार मन में स्मरण करके रिलाक्स(Relax) करना चाहिए! तब पूरा शरीर तनावरहित होजायेगा! अगर शरीर रोगग्रस्थ होने से उस शरीर का अंगों में तनाव थोड़ा ही करना चाहिए! 
मानसिक प्रशान्तता के लिये साधक का एकाग्रता भंग करने और बाधा पहुंचाने विचारों से मन को दूर करना चाहिए! कूटस्थ में दृष्टि रखना चाहिए! कोई भी भगवान का नाम यानी उदाहरण के लिए ॐ नमःशिवाय अथवा ॐ नमो भगवते वासुदेवाय इति उच्चारित करते हुवे नीँद में गिरना चाहिए!  इस प्रकार क्रमशः वैसा अपना इच्छा का अनुसार सोना जागना विचारों से अलग होना अभ्यास करना चाहिए! कितना भी तकलीफ हो परमात्मा का उप्पर अचंचल भक्ति और विश्वास होना अत्यंत आवश्यक है! तब साधक मानसिक प्रशान्तता में है करके गिनादेगा! जितना भी चंचल जीवन बिताने से भी क्रियायोग ध्यान पद्धतियों का माध्यम से मन को नियंत्रण करसकते है!
सम+अधि= समाधि! परमात्मा का साथ अनुसंथान करना ही समाधि है! अपना इच्छा का अनुसार समाधि स्थिति पानेवाला साधक हर समय में चंचलरहित विश्रान्त शांति जीवन बिता सकता है! स्वल्प प्रमाण से भी अशांति नहीं होने साधक शरीर धन भार्या भर् स्थिर और चर संपत्तियों कुल जाती प्रदेश संस्कारों राग द्वेष काम क्रोध लोभ मद और मात्सर्य इति अरिषड्वर्गों मनो बुद्धि चित्त अहंकार इति अंतःकरण इत्यादि सर्वविशयों से विमुक्त होके परिपूर्ण निश्चलस्थिति लभ्य करेगा! मनुष्य अन्दर का नकारात्मक शक्तियों मनुष्य को भौतिक मानसिक और आध्यात्मिक रुग्मतायें भय दरिद्रता दुःख पराजित होना इत्यादियोँ का हेतु है! नकारात्मक शक्तियों को नियंत्रण करने पद्धतियां ऋषि लोगों ने आविष्कार किया!
 दो मार्ग:
मनुष्य का जीवन में दो मार्ग सामने आते है! चंचल मानसिक विचारें और रोगभूयिष्ट दुःखपूरित जीवन प्रथम है! निश्छल परिपूर्ण आनंदमय जीवन दूसरा है!
देश काल और उनका साथ आनेवाले कष्ट नष्ट बंधों और संबंधों को सुनिशित रूप से सावधान होना आवश्यक है! दुःख का कोई भी वजह नहीं होता है!
जो दुःख को अनुभव करता है उस मनुष्य का गुण का अनुसार दुःख का तीव्रता होता है! अंधेरा का बाद रोषनी अवश्य आएगा! जो साधक मन को अपना वश में रखेगा उस को ए कष्ट नष्ट बंधों और संबंधों का पीड़ा से विमुक्त होगा! मानसिक दुर्बलता ही इन दर्दों का हेतु है! कष्ट नष्टों से अतीत होना ही जीवन है! अनुभवज्ञों का सलहा सुनना ही युक्त है! ज्ञानी लोगों का सलहा पाकर सद्गुरु का पास शारीरक मानसिक और आध्यात्मिक शिक्षणा लभ्य करना चाहिए! वैसा साधक अपना अंतर्वाणी(Intuition) नामका नायक (Hero) को जाग उठायेगा! जीवन परमार्थ समझेगा! रोगरहित होकर परमानंद में डूब रहेगा!
अज्ञानि किसी का बात नहीं सूनेगा! अपना खरमा है करके अपने आप को और दूसरो को गालीदेते हुवे जीवन बिताएगा! आखरी में क्रोध से अत्यंत रोगभूयिष्ट और दयनीय स्थिति पायेगा! क्रोध एक बीमारी है! वह असूया द्वेष प्रतिशोध सामने आने वाले को नाश करने भावना का वृत्त में गिर पडेगा! भेजा का नाड़ी फट(Brain Paralysis) जाएगा! आखरी में पागलपन का मार्ग में गिरादेगा!
जब क्रोध आता है तब उच्चारण 54 अथवा 108 बार कूटस्थ में दृष्टी और मन रखा के करना चाहिए!
भय एक और माया रोग है! काम करने ढर, संकल्प किया कार्य होगा नहीं होगा करके ढर, इत्यादि! डरपोक अपने आप का शत्रु है! संकल्पित कार्य नहीं होने के लिए बीज भीज अपना संशय से ढरपुक खुद ही डालारहे! क्रियायोगध्यान करने से क्रोध भय इत्यादि अवरोधक शक्तियों को निकाल्सकते है! अपना अन्दर का धीरता विश्वास धैर्य और निश्चयात्माक शक्ती को वृद्धि अभिवृद्धि करा सकता है साधक!
कातरता भय अधैर्य और अपने आप में विश्वास नहीं हुआ लोगों से दूर रहना चाहिए! परमात्मा को विश्वास कीजीये! संतृप्ति और दुःखद लोगों को परमात्मा का अनुसंथान कभी भी लभ्य नहीं होगा! साधक का मन पूरा परमात्मा का विचारों से भरकर रहना चाहिए! तब परमात्मा का साथ अनुसंथान अवश्य लभ्य होगा!
एक शेर का बच्चा यादृच्छिक भेड़ों का ज्ञुंड बीच में मिल के उन समूह का साथ बड़ा होगया! वह उन का साथ बड़ा होते हुवे भेड़ों जैसा में मेंबोलना और कातर भी बनगया!
एक दिन एक बड़ा शेर भेड़ों का ज्ञुंड का पास आया! सभी भेड़ों जैसा में मेंबोलते हुवे  उस शेर को भागता हुवा देखकर अचंभा होकर उस को एक पकड़ कर पानी का ताल का पास लेकर उस का प्रतिबिंब दिखाया! तुम मेरा जैसा एक शेर हो करके उस का भीरुता दूर करदिया! वैसा ही मनुष्य वस्तुतः धीर है! परंतु अपना आस पास का लोगों से भीरुता सीखता है! इसीलिए सब से स्नेह नहीं करना, ज्यादा से ज्यादा से धैर्यवान लोगों का साथ  संबंध रखना चाहिए!
सोने के पहले शांती से कूटस्थ में मन और दृष्टी लगा के बैठना है! केवल परमात्मा का उप्पर ध्यान करना है! सोके उठने का बाद 30 मिनट शांती से कूटस्थ में मन और दृष्टी लगा के बैठना है! केवल परमात्मा का उप्पर ध्यान करना है! मनुष्य का जीवन सफलता का दिशा निर्देश का यह ध्यान अत्यंत आवश्यक है!
संस्कारों का अर्थ आदते! वे अच्छा और बुरा करके दो प्रकार का है! वे मनुष्य का जीवन में मुख्यपात्र पोषण करेगा! मनुष्य कभी कभी अच्छा काम करना चाहता है! परंतु बुरा संस्कारों का पात्रता का हेतु मनुष्य का अन्दर अधिक होने से जानते हुवे भी बुरा करेगा! वैसा ही अच्छा संस्कारों का पात्रता मनुष्य का अन्दर अधिक होने से गलत परिस्थितियों में भी अच्छा काम ही करवाएगा! मनुष्य नश्वर आत्मस्वरूपी है! संस्कारों, अच्छा और बुरा, दोनों शुद्धात्मा का लक्षण नहीं है! उन का वश में नहीं होना चाहिए! आत्मा का दिशा निर्देशन में ही काम करना चाहिए!
सु संस्कारों और दुष्ट संस्कारों का युद्ध फलितों का उप्पर आधारित है आरोग्य, सफलता और ज्ञान! मनुष्य बचपन से ही अच्छा सांगत में रहने चाहिए! धन कार स्त्री इत्यादि भौतिक वस्तुवों में व्यामोह रखनेवाले लोग वैसा ही व्यक्तियों का स्नेह स्वीकार करेंगे! बुरा संस्कार लोग अपना वाग्दान नहीं निभाएंगे!प्रयत्न भी नही करेंगे! आध्यात्मिकता को पसंद करने लोग बचपन से ही पवित्रमंदिरों में जाना और पवित्र साधू सद्गुरुवों का सलहा लेना करते है!
संस्कारों:
बुरा संस्कारों तात्कालिक सुख दे सकते है! मगर ऐ विषपूरित संस्कारों का आदते आखरी
में घोर परिस्थितियों का मार्ग में लेजाएगा! उन में ही वेदानापूर्वक भौतिक मानसिक और आध्यात्मिक रुग्मतों से व्याकुलत होजायेगा! मनुष्य जान्बूच के गलतियाँ नहीं करते है! गतजन्मों से जोड़ा हुआ बुरा संस्कारों जादा तरह हेतू है! परमात्मा मनुष्य का प्रसादित किया इच्छाशक्ति का माध्यम से क्रियायोगाध्यानातत्पर होक बिना गलती करते हुवे मनुष्य अपना जीवन बिता सकता है!
अच्छा हो या बुरा हो वे संस्कारों मनुष्य ने ही सृष्टि किया है! इसीलिए मनुष्य का मनोक्षेत्र को क्रमशिक्षणा से हल चलाना है! सुसंस्कारित बीजों बोना चाहिए! दुष्ट संस्कारित बेकार पौधों को सहिष्णुता से उखाड़ के फेकना चाहिए! इन्द्रियों का क्षणिक सुखों को आत्मा का शास्वतानंद से तुलना कर के युक्तायुक विचक्षना ज्ञान से पहिचान से समझना चाहिए!
आध्यात्मिकता बाज़ार में मिलने वास्तु नहीं है! निरंतर क्रियायोगसाधना से ही परमात्मा का साथ अनुसंथान लभ्य करेगा! वह गुफों में शीतल पर्वतों आग का बीच में बैठक करने से कठोर उपावासों इत्यादि से साध्य नहीं है! कितना वर्षों ध्यान किया इति परिगण में नहीं आयेगा, कितना तीव्रता और आर्द्रता से ध्यान किया इति परिगण में आयेगा! पहले दैवसाम्राज्य में कदम रखो, तब हर एक धर्मबद्ध चीज साधक को लभ्य होजायेगा! सब मनुष्य परमात्मा का बच्चे है! प्रति एक मनुष्य परमात्मा का अंश और अवतार है! अव यानी नीचे तारा यानी आना!
परमात्मा को केवल निश्शब्द में ही लभ्य करसकते है! विचारों को बँद करके केवल निश्शब्द में ही परमात्मा का साथ अनुसंथान करसकते है!
बहुत ही अंतर्गत स्पंदनों का साथ जोड़ा हुआ है इस भौतिक शरीर! बहुत ही अंतर्गत कणों (Cell) का स्पंदनों का साथ जोड़ा हुआ है अंतर्गत गति! बहुत ही अंतर्गत मालीक्यूल (Molecule) का स्पंदनों का साथ जोड़ा हुआ है अंतर्गत कणों (Cell)का गति! बहुत ही अंतर्गत अणुओं(Atom)का स्पंदनों का साथ जोड़ा हुआ है अंतर्गत मालीक्यूल(Molecule) का गति! बहुत ही अंतर्गत परमाणुओं(Atom)का स्पंदनों यानी एलक्ट्रांस(Electron) प्रोटोंस(Proton) न्यूट्रांस(Neutron)  पाजिट्रान्स्(positron) और मेसांन्स्(Meson) का साथ जोड़ा हुआ है अंतर्गत अणुओं(Atom) का गति! इन सारे स्पंदनों अपना अपना कक्ष्यों(orbit) में होते रहते है! इन सारे चाल का पीछे परमात्मा का अद्भुत रचना और जोड़ना का मेधावीपन् है! इन गतियों को व्यक्त करते हुवे स्फुरण(sensation), विचारों(Thoughts), भावनाए(Feeling) और इच्छाशक्ति(will power) है! इन सब का अपना कुक्षी का अन्दर रखने अहंकार(Ego) है! आत्मा केवल शुद्ध है! इस शुद्ध आत्मा का आवरण है इस अहंकार(Ego)! शुद्ध आत्मा नहीं होने पर इस अहंकार स्वयं प्रकाशित नहीं होसकता है! इस अहंकार का हेतु मनुष्य शरीर ही आत्मा सोचकर भ्रम में पड़ रहां है!
मनुष्य शरीर उप्पर से  ज्यादा से ज्यादा 6’X1½’ परिमाण में परिमित लगता है!   इस शारीर अंतर्गत  कणों(Cell) का स्पंदनों का समुद्र है, इन अंतर्गत कणों(Cell) का स्पंदनों से गरिष्ट है मालेक्युल(Molecule) का स्पंदनों का समुद्र, इन मालेक्युल(Molecule) का स्पंदनों से गरिष्ट है अणुओं(Atom) का स्पंदनों का समुद्र, इन अणुओं(Atom) का स्पंदनों से गरिष्ट है परमाणुओं यानी एलक्ट्रांस(Electron) प्रोटोंस (Proton) न्यूट्रांस(Neutron) पाजिट्रान्स् (positron) और मेसांन्स् (Meson) का स्पंदनों का समुद्र, इन परमाणुओं का स्पंदनों से गरिष्ट है इन सब को चलानेवाला प्राणशक्ति  (Vital force or life force)! अवचेतना(Sub-consciousness), अधिचेतना(Super-consciousness), चेतना(Consciousness), श्री कृष्ण चेतना (Krishna-consciousness), और परमात्मचेतना(Cosmic consciousness) का व्यक्तीकरण है इस प्राणशक्ति  (Vital force or life force)!
उप्पर से इस भौतिक शरीर साधारण दिखता है! अंतर्गत रसायन स्पंदनो के साथ प्रकाशित होने इन कणों वास्तव में घनीभव हुआ परमात्मचेतना(Cosmic consciousness)का व्याक्तीकरण ही है! इसी कारण इस शरीर अध्बुत शक्तियुक्त और सर्वव्यापी है! अंतर्गत रसायन स्पंदनो के साथ कणों को चालू रखने के लिए अल्ट्रा वायोलेट किरणों(ultraviolet rays), प्राणवायु अच्छा आहार पानी और फलरसों आवश्यक है! शरीर में जीवकणों नित्यरूप में उत्पत्ति होता रहता है! वे विचारों और शारीरक शक्तियों से परिमित हो बैठता है! अवचेतन चेतन अधिचेतन कूटस्थचेतना और परमात्मचेतना इत्यादि अत्यंत सूक्ष्म स्पंदनों का साथ शारीरक अंतर्गत रसायन स्पंदनों मालेक्युल(Molecule) का स्पंदनों अणुओं(Atom) का स्पंदनों इत्यादि जोड़ा हुआ होता है! मनुष्य का स्पंदनों परमात्म शक्ति का घनीभव हुआ स्पंदनों ही है! शरीर का अन्दर का कणों को चालू रखने सूर्यका अल्ट्रा वयलेट किरणों(Ultra violet rays) प्राणशक्ति आरोग्यवान् आहार फलरसों और पीने का पानी आवश्यक है! विचारें और जीवशाक्तिया(Biological forces) मिलके जीवकणों उत्पत्ति और उन शक्तियों का हेतु होता है! विविध प्रकार की कणों का रसायन चर्यों का अतिसूक्ष्म सूक्ष्मातिसूक्ष्मवाला अवचेतन चेतन अधिचेतन कूटस्थचेतना और परमात्मचेतना इत्यादि हेतु है! वे  जरूरत्वाला शक्तिपूरक् स्पंदनों लभ्य कर देता है! इन मेधावी स्पंदनों युक्त जीवन का   घनीभव हुआ परमात्मा का शक्ति ही हेतु है! भौतिक आहार कारण नहीं और वह केवल निमित्तमात्र है! इस भौतिक आहार का परमात्मा का शक्ति मिलने से ही शरीर स्थितिवंत् होता है! परमात्मा का शक्ति को मुख्यप्राण कहते है! इस मुख्यप्राण मनुष्य शरीर का  बाहर भी है और अन्दर भी है! दोनों का स्थितिवंत् का हेतु मुख्यप्राण ही है!
मुख्यप्राण पाँच प्रकार का अपने आप को इस मनुष्य का शरीर में विभाजन किया है!
1)प्राणवायु=स्फटिकीकरण(Crystallization), 2)अपानवायु=विसर्जन(Elimination), 3)व्यानवायु=प्रसरण(Circulation), 4)समानवायु=स्पांजीकरण(Assimilation),& 5)उडानवायु=जीवानुपाक(Metabolism).
आहार वायु पानी सूर्यरष्मी इत्यादी का उप्पर अपना जीवन आधरित करके समझता है साधारण मनुष्य! रोगग्रस्थ होकर औषधियों से ठीक नहीं होने शरीर का दुर्भर स्थिति देखकर आशा खो बैठता है! तब केवल परमात्मा ही इस शरीर को साधारण स्थिति को लासकता करके समझता है! हम इस शरीर को देने आहार इत्यादि परमात्मा का शक्ति का सामने अत्यंत अल्प करके परिपूर्णरूप में समझेगा! मरा हुआ शरीर को आहार वायु पानी सूर्यरष्मी इत्यादि देने से पुनः जीवित होगा क्या? 
आटोमोबाइल बाटेरी(Automobile battery)को फिर छार्ज (Charge) करने विद्युत् (Electricity) आवश्यक है! केवल डिस्टिल्ड् (Distilled water)से काम नहीं बनेगा!  परमात्मशक्ति मनुष्य का अंदर का प्राणशक्ति घनपदार्थ द्रवपदार्थ इत्यादियो को अवसर प्रमाण में युक्त मात्रा में बनाके मनुष्य को जीवित रखेगा!
परमात्मा का मुख
मेडुलाआबलम्बगेटा(Medulla Oblongata) को परमात्मा का मुख कहते है!परमात्मा का शक्ति मेडुलाआबलम्बगेटा का माध्यम से प्राणशक्ति रूप में मनुष्य में प्रवेश करते है! कोई भी वैद्य मेडुलाआबलम्बगेटा को शस्त्रचिकित्सा नहीं करसक्कते है! भेजा और मेरुदंडों दोनों प्राणशक्ति केन्द्रों है! इन दोनों का केन्द्र मेडुलाआबलम्बगेटा ही है! शरीर का अन्दर का हृदय भेजा विशुद्ध अनाहत मणिपुर स्वाधिष्ठान मूलाधार चक्रों प्राणशक्ति को मेडुलाआबलम्बगेटा से ग्रहण करके अपना अपना केन्द्रों से वितरण करते है!
सहस्रारचक्र इस प्राणशक्ति को मेडुल्ला से ग्रहण करके अपना पास रखनेवाले भांडागार है! शरीर का जो प्राणशक्ति अवसर है वह इदर से ही उस शरीर भाग को भेजा जाता है! इसी हेतु जब शिर को कुछ बड़ा चोट लगने से सहस्रारचक्र का अन्दर का इस प्राणशक्ति को छोटा छोटा बिन्दु अथवा बहुत बड़ा प्रकाश रूप में दिखाई देगा! निरंतर हम कुछ न कुछ काम करते रहते है! इन के लिए नाडीयों हड्डी रक्त विचारों भावों और शारीरक कार्यक्रम के लिए प्राणशक्ति का आवश्यकता है! इस शक्ति निरंतर हम को लभ्य होना चाहिए! इस के लिए साधक क्रियायोगासाधना का माध्यम से अनंत परमात्मशक्ति सागर से प्राप्त करसकता है, प्राप्त करता है!
इच्छाशक्ति को वृद्धि करने के लिए हठयोग का मुद्राये आसनों बंधों इत्यादियो से प्राचीन ऋषियों हम को लभ्य किया है! वे सब क्रियायोगसाधना का भाग है! इसीलिए क्रियायोगसाधना का माध्यम से शरीरक मानासिक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करसकते है!
कोईभी रंग में सफलता के लिए एकाग्रता ही मुख्य हेतु है! बाकी विषयों से मन को अलग कर के जो साध्य करना हैं उसी विषय का उप्पर ध्यान लगाना चाहिए! परमात्मा का उप्पर एकाग्रता को ध्यान कहते है!
परमात्मा का अनुसंधान करने के लिए श्वास को नियंत्रण करना चाहिए अथवा मनस् को नियंत्रण करना चाहिए! श्वास को नियंत्रण करने से मनस् नियंत्रण होजाएगा, मनस् को नियंत्रण करने से श्वास नियंत्रण होजाएगा! मनस् को नियंत्रण करना जटिल मार्ग है, श्वास को नियंत्रण करना सरल मार्ग है!
प्रातः 5––6, मध्याह्न 11––12, सायंकाल 5––6 और रात में 11––12 का बीच में ध्यान करने से साधक को शीघ्र फल लभ्य होगा! वैसा करने से शरीर मन और आत्मा समस्थिति में रहेगा!
मनुष्य विविधाप्रकारा का स्वप्न स्वप्नाता है! कभी कभी उन स्वप्नों भयंकर रूप में आता है! उन स्वप्नों में हम को विवाह होगया, तीन बच्चों होगया, हम शिकार के लिए अरण्य में गया, तीन शेर को मारदियाइत्यादि स्वप्नों स्वप्नाते है! उस स्वप्न का समय स्वल्प समय के लिए होने से भी हम को बहुत सालों बितगया जैसा लगेगा! इन स्वप्नों को मनुष्य ही स्वप्नाता है! इन स्वप्नों को मनुष्य क्यों स्वप्नाते है पूछने से कोई भी समाधान नहीं मिलेगा! इन स्वप्नों में दिखाई देनेवाले वस्तुवों को सामान व पदार्थ(matter) तो मनुष्य ही स्वयं देता है! 

इन भयंकर स्वप्नों से मुक्त पाने के लिए हम अपना भौतिक नेत्र खोलना चाहिए! वैसा ही इस दृश्यमान जगत भी परमात्मा का स्वप्न है! जगत मिथ्या ब्रह्म सत्यं’! परमात्मा का स्वप्न का वस्तुओं है हम! परमात्मा का स्वप्न समझने के लिए परमात्मा का ही नेत्र खोलना चाहिए! इसी नेत्र को तीसरा नेत्र कहते है! इस तीसरा नेत्र को खोलने के लिए कही और जाने को अवसर नहीं है! वह नेत्र हर एक मनुष्य का भ्रूमध्य में कूटस्थ में उपलब्ध है! क्रियायोगसाधना का माध्यम से परमात्मा का उस तीसरा नेत्र को खोल्वासकते व खोलसकते है! तत् माध्यम से परमात्म का लीला नाटक समझ्सकते है! परमानंद को प्राप्त करसकते है! तब तक मनुष्य को संतृप्ति नहीं मिलेगा!
मनुष्य केवल भौतिक आहार का उप्पर आधार करके जीवन बिता नहीं सकता है! Medulla oblongata ko मनुष्य का मुख कहते है! इस मेडुलाआबलम्बगेटा का माध्यम से ही परमात्मशक्ति मनुष्य का लभ्य होता है! इस शक्ति का साथ भौतिक आहार को जोड़ने से ही मनुष्य जीवित होसकता है!
हर एक जीवी कुछ न कुछ उपाधि में बांधाहुआ शक्ति का रूप ही है! हमारा विचारों भी शक्ति का रूप ही है! बाधाओं, शारीरक रुग्मता, सड़क, रैल और विमान प्रमादों इत्यादी विषयों से सदा भायाभ्रांत होने मनुष्य को तुम अल्प नहीं है, सचेतनापूर्वक इन छीज से तुम अधिगमन करो, तुम केवल परमात्मस्वरूप होसमझाने का साधन है क्रियायोगसाधाना! साधक का शरीर स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्म से कारण शरीर, कारण शरीर से परमात्म से अनुसंधान के लिए सचेतनात्मक अधिगमन करने को उपयोगी है क्रियायोगसाधना!
आनंद साधारण रूप में बाह्य परिस्थितियों का उप्पर आधार होना कुछ परिमित तक  वास्तव होता है! परन्तु हमारा अंतः परिस्थितियों का उप्पर ही अधिकांश आधार होता है! असली सुख क्या है? अच्छी आरोग्य, अच्छा तार्किक मानस्, विलास जीवन्, मनपसंद काम, सर्व प्रकार का सफलीकृत जीवन् ही असली सुख है! हम को जो जीवन् अंतर्गत सुख नहीं देता है वह बाह्य सुख नहीं देगा! असली सुख हमारा अंतर्गत मनोस्थिति का उप्पर ही ज्यादा तरफ आधारित है! यह यदार्ध है! आनंद जीवन् हमारा जन्मतः हक़ है! आनंद जीवन् हमारा अन्दर का आत्मा का खजाना है! उस आत्मानंद पानेसे हम राजाओं का राजा होंगें, चक्रवर्तियों का चक्रवर्ती होंगें!
मद्यपान, धूम्रपान, मांसभक्षण इत्यादियो को आदत हुआ अज्ञानियों और मूरख लोग 

जितना भी कठिनाइयों बाधायों दुःख कष्टप्रद समस्याओं सामने आने से भी मेरा खर्मइति कहते हुए पशुजीवन बितायेंगे! उन् दुःखदायक आदतों व अभ्यासों को त्यग के आनंददायक व सुखदायक आदतों व अभ्यासों को मार्गों को अवलम्बन नहीं करते है! कोई भी अभ्यास अच्छा हो बुरा हो आदत होने के लिए थोड़ा समय लेता है! जो मनुष्य खराब होगया उसको ठीक करना भी मुश्किल है! जो मनुष्य अच्छा है उसको खराब करना भी मुश्किल है! परन्तु प्रयत्न से बुरा आदतों को मिटा सकते हो! बुरा आदतवाला मनुष्य को परिहास नहीं करके मानवता तत्व से समझके सबूरी व सहिष्णुता से उस में परिवर्तन लाने के लिए कोशिश करना चाहिए!
आनंद व सुख एक मानसिक परिस्थिति है! भोजन में एक आधा कंकड़ आने से उस कंकड़ को निकालके फेंकना चाहिए और खाना चाहिए! उस केवल एक कंकड़ के लिए पूरा भोजन को त्याग नहीं करना चाहिए! वैसा ही बहुत वर्षो सुखमय जीवन बिता हुआ मनुष्य कुछ अनारोग्य से सफ़र करने से परमात्मा को निंदा नहीं करना चाहिए!
हे परमपिता इतना वर्षो आपने मुझे सुखमय जीवन दिया है, इस विपत्करस्थिति को सहन करनेका शक्ति देदो!इति प्रार्थना करना चाहिए! ऐश्वर्य नष्ट होने से वास्तव में कुछ भी नष्ट हुआ करके परिगण में लेना चाहिए! आरोग्य में भंग होने से ही वास्तव में बहुत कुछ खोगया है! पवित्र प्रेम, पवित्र आनंद, शुद्ध ज्ञान, शांति ए सब क्रियायोगी प्रथम में अपना हृदय में प्राप्त करता है! तत् पश्चात् वे सब नस नस में जाके हमको आनंद प्राप्ति कराता है! इस आनंद साधक को और उस का पास रहनेवाला दूसरा लोगों कोभी आनंदसागर में डुबादेगा! समजीवन का अर्थ ध्यान, शास्त्रपठन, आरोग्य, आनंद और काम ही है!
क्रियायोगासाधना आवश्यकता
ब्रह्माण्ड में हर एक पदार्ध आकर्षण और विकर्षण का चक्कर परिधि में ही काम करता है! इस परिधि में मनुष्य अलग नहीं है! हम कभी कभी कुछ मनुष्य को मिलना चाहेंगे! हमारा अन्दर का आकर्षण का हेतु उसी आदमी को मिलते है! आयास्कांत साधारण रूप में केवल लोहों को ही आकर्षित करता है! वैसा ही कुछ लोगों को भौतिक विषयों में ध्यान होता है, कुछ लोगों को मानसिक विषयों से, कुछ लोगों को आध्यात्मिक विषयों से  आकर्षित होता है! जो कामी नहीं है वह मोक्षकामी नहीं होसकता है! मै सारे शारीरक सौकर्य त्यग के योगी बनूंगा करके आकस्मिक तोड़ में कहने से नहीं चलेगा! क्रमशः शिक्षणा पाके क्रमशिक्षणा का साथ जोड़ा हुआ साधक ही योगी बनसकता है! क्रियायोगासाधाना का माध्यम से परमात्मा को लभ्य किया हुआ साधक सब छीज प्राप्त करा सकता है! इसीलिये जीसस ने पहले आप दैवसाम्राज्य में प्रवेश करो तब सब छीज तुम को उपलब्ध होजाएगा इति कहा’!
हम जैसा आहार लेगा वैसा ही हमारा आरोग्य और आकर्षण होगा! भौतिक विषयों यानी धन दौलत भवनों मोटारगाड्या स्त्री इत्यादि विषयों पाने में निमग्न हुआ मनुष्य इतरों को आकर्षित् नहीं करसकता है! केवल वैसा छीजों में आसक्ति हुआ कुछ लोग को ही वह भी कुछ समय के लिए आकर्षित् करसकता है! वैसा ही कवि लोग कवि लोगों को, गायक लोग गायक लोगों को आकर्षित्  करेंगे! क्रियायोगासाधना का हेतु आरोग्य और आध्यात्मिकता साथ प्रकाशमान व्यक्ति बहुत आसानी से अधिक से अधिक लोगों को आकर्षित् करेंगे! और अत्याधिक शांति क्रियायोगासाधक् को लभ्य होता है! आत्मनिग्रह शक्ति साध्य किया असली क्रियायोगी अन्य लोगों को परुष पदजालों से निंदा नहीं करता है! उसको क्रोध नहीं आयेगा! सदा निग्रह में रहेगा! उसको वाक्शुद्धि होता है! पहले घर में जीतो पश्चात बाह्य में जीतो कहते है! प्रथम में घरवालों को शांति में रखो पश्चात अन्य लोगों को शांति में रखो! परिस्थितियों और पडौसी लोगों का साथ शांति से विषयों को संभालना चाहिए! अथवा जीवन दुर्भर होता है! अनावसर प्रदेशों से निकलना चाहिए! नहीं तो कलहप्रिय मूर्ख लोगों से मनःशांति दूर होजाता है! इस का अर्थ जो शारीरक मानसिक और आध्यात्मिक तोड़ में ताकतवाला और उन परिस्थितियों को सामना करसकनेवाला साधक उस प्रदेश से निकलने को आवश्यकता नहीं है! हम को प्रेम करनेवाले व्यक्ती अगर हम को डांटने से उस प्रदेश से निकलना चाहिए! शांती से कुछ योगासन करके थोड़ा समय क्रियायोगध्यान करना चाहिए! परमात्मा का अयस्कांत् का साथ हमारा इतना ही बलवान नकारात्मक दूसरा अयस्कांत् हमारा अन्दर इंद्रियों का माध्यम से काम करते रहता है! वह हमको आत्मसाम्राज्य से छुडवाकर दुष्टसाम्राज्य का तरफ लजानी के लिए निरंतर प्रयत्न करते रहता है! हम ॐकार शब्द ध्यान निरंतर यानी जब भी हमारा मन विछलित् होता है तब करते रहना चाहिए! तब परमात्मा का आकर्षण निरंतर रहेगा, टूटेगा नहीं! निरंतर परमात्मा का उप्पर आकर्षण अभिवृद्धि करने से वह तत्व साधक को लाभदायक है ही मगर अन्य लोगों को भी प्रोत्साहकारी होगा! इस आकर्षण का माध्यम से साधक अपना केवल मात्र संकल्प से दूर दूर में रहा मित्रों से दिव्यात्मों ऋषि मुनियों योगियों इत्यादियों को अपना कूटस्थ में दर्शन करसकता है और संभाषण भी कर सकता है!
तुम अपना नौकरी करते रहो, संसार को संभालते रहो, सब स्वाभाविक धर्मबद्ध छीज करो, कोई पाबंधी नहीं है! परंतु जब जब समय मिलता है उस समय व्यर्थ प्रसंगों संभाषणों व बातचीत से नष्ट मत् करो! परमात्मा का उप्पर एकाग्रता लगाकर क्रियायोगध्यान करो! तुम्हारा क्रियायोगध्यान परसों से कल, कल से आज ज्यादा समय और तीव्रता से करना चाहिए!
एक टन्(Ton) सिद्धांतों से एक औंस(Ounce) अभ्यास अधिक लाभदायक और उपयोगकारी है! शुष्क वेदान्तों उपन्यासों से समय धन और आरोग्य वृधा मत कीजीये! निरर्थक पूजाओं से क्या लाभ है! प्रधम् में हम इंद्रियों का आकर्षण से बाहर आना चाहिए! उस इंद्रियाकर्षण को परमात्मा का तरफ बदलना चाहिए! क्रियायोग ध्यान करना चाहिए! इस ध्यान प्रतिदिन कुछ नियमानुसार प्रातः और सायं संध्या में करना उत्तम है! इस के लिए हम अपना इच्छा शक्ति को कूटस्थ में रख के प्रधम में शक्तिप्रदान अभ्यासों करके शरीर को तैयार रखना चाहिए! इन शक्तिपूरक अभ्यासों का माध्यम से सिद्ध किया हुआ शक्ति को रोगग्रस्त अवयव में व बाधा देनेवाला अवयव का उप्पर भेज के आरोग्य को पुनः प्राप्ति करना चाहिए! सोऽहं व हाँ सा जैसा सशास्त्रीय लय ध्यान पद्धति का माध्यम से श्वास का उप्पर ध्यान रखना चाहिए! क्रमशः श्वास का माध्यम से ध्यान को तीव्रतर करना चाहिए! परमात्मा को प्राप्त करना चाहिए! मनस् एक वस्त्र जैसा है! विचारधारा मैलॉ जैसा है! अधिक समय से साफ़ नहीं किया हुआ धवळ वस्त्र भी काला पड्जाएगा! एक दो बार सफाई करने से भी मैलॉ निकलते हुआ दिखाई देने से भी सूखने का पश्चात भी पहले से भी और मैलॉ दिखाई देगा! निरंतर विचारों का हेतु हमारा पूर्वजन्म वासनाओं ही है! उस विचारधारा को सोऽहं व हां सा प्राणायाम पद्धति नाम का साबुन द्वारा सफाई करना चाहिए! श्रद्धा सबूरी  का साथ करना चाहिए! निराश नहीं! होना चाहिए! तब शनैः शनैः व  आसते आसते विचारों दग्ध होजाएगा! पश्चात एक और लाययोगा प्रक्रिया यानी ॐकार को सुनने का पद्धति का माध्यम से समां(बराबर) अधि(परमात्मा)=समाधि स्थिति प्राप्त करना चाहिए! परमानंद को पाना चाहिए! साधक का और परमात्मा का बीच में प्राणशक्ति ही link(link)व जोडाहुआ सुता(thread) है! उस बांधाहुआ सुता(thread) को इन दोनों लययोग प्रक्रियाओं यानी सोऽहं और ॐकार का सुनना पद्धतियां का माध्यम से तात्कालिक रूप में तोड के परमात्मा से अनुसंधान करा सकता है! परमात्मा चेतना साधक को कूटस्थ में तीसरा नेत्र का रूप में अथवा पवित्र ॐकार शब्द रूप में अथवा रूपराहिता शुद्ध ज्ञान जैसा अथवा दिव्यभक्ति जैसा अथवा दिव्या परिपूर्ण प्रेम जैसा व्यक्त होसकता है! कोई कान में कुछ रहस्य कहता है जैसा कूटस्थ में सुवार्णाक्षर जैसा क्रियायोग साधक को व्यक्त होसकता है! उस व्यक्त होने का रीति प्रस्फुटित होसकता है! दृश्यमान व अदृश्यमान भी होसकता है! परन्तु इन सारे अनुभवों परमात्मा अपने आपको व्यक्त करा रहे करा के समझ नहीं करना चाहिए, इन में कुछ चीत्कळों भी हो सकता है! इच्छाशक्ति एक डयनमो(Dynamo) जैसा है! यह शरीर को शक्ति देता है! यह इच्छाशक्ति हम को शारीरक मानसिक और आध्यात्मिक अवसरों को आवश्यक वनरों को प्रदान करता है! हम चलने को बात करने को काम करने को विचार करने को इत्यादियो को इच्छाशक्ति(Volition) ही बलवात्कारण है! इच्छा(Wish/desire) जो है निस्सहायत मनस् का है! प्रबल इच्छा(Desire/stronger wish) जब जब यह इच्छा पूरा होजाएगा करके आतृता जो है वह शक्तिमान् मनस् का है! उद्देश्य (Intention/ Determination) का अर्थ प्रबल इच्छा(Desire/stronger wish) को कैसा भी हो सफल करने का प्रयत्न है! वह कभी कभी अपना इच्छा को सफल करा सकता है! परन्तु प्रप्रबल् इच्छाशक्ति(Volition/Will power) जिस को है वह व्यक्ती अपना अपना इच्छा परिपूर्णता से सफल होने तक निरंतर प्रयत्न करते रहेगा! प्रप्रबल् इच्छाशक्ति(Volition/Will power) ही इस जगत् को परिपालन करता है!
शिशु जन्म होने का बाद रोदन करता है! इस रोदन फेफड़ों खुलने का बाधा व्यक्त करने को प्रथम प्रयास और इस को प्रदर्शन करने  यांत्रिक भौतिक इच्छाशक्ति(Volition/Will power) का प्रतीक है! शिशु वृद्धि होने व बड़ा होने समय में मा का 100% आज्ञापालन करता रहता है! यह इच्छाशक्ति(Will power) का प्रतीक है! शिशु बड़ा होने समय में अपना   इच्छा का प्रतिकूल छीजो को नहीं करना अंधा इच्छाशक्ति(Will power) का प्रतीक है! मोटारवाहनों को शीघ्र गति से चलाना, मद्यपान धूम्रपान और नशीला पदार्थो को सेवन करना इत्यादि अंधा इच्छाशक्ति(Will power) का प्रतीक है! एकेंऐकेंद्रिय जीवों व कीडे मकोड़े आकर्षण का हेतु आग में  गिरके मर जाता है!  इंद्रियों को नियंत्रण क्रियायोग साधना से करना चाहिए! नहीं तो वह व्यक्ती अंधा इच्छाशक्ति(Will power) का वश हो के भ्रष्ट होजाएगा!                            
दो मेंडक(Frogs) बड़ा क्षीर पात्रा में गिरगया! उस पात्रा से बाहर आने को प्रयत्न किया! एक मेंडक थक के अपना प्रयत्न बीच में त्यग के मर गया था! परंतु दूसरा मेंडक निरंतर प्रयत्न करता रहा! तैरता रहा! तब वह दूध माखन का ढेर बनगया!उस माखन का ढेर से वह मेंडक कूद के बाहर निकलाया है! अपना प्राण बचाया! वैसा ही हर एक व्यक्ति क्रियायोगढ़याँ का माध्यम से अपना दिव्यशक्ति को अभिवृद्धि करा सकता है!
इधर उधर खाने से अजीर्ण होजाएगा! वैसा ही जैसा मर्ज़ी ग्रंथों पड़ने से अहंकार में बढावा आयेगा! एक ही सद्गुरु का अनुसरण करना चाहिए! गुरुओं को बदलते रहने से आध्यात्मिक अजीर्ण मिलजाएगा! अच्छा सद्गुरु लभ्य होने का पश्चात् गुरु के लिए खोजना बंद करना चाहिए! मधु सेवन करने का बाद उस का मिठापन् विशदीकरण करसकता है! अधिचेतनावस्थ प्राप्ति करके परमात्मा का साथ अनुसंधान किया हुआ साधक का चेहरा दिव्यचेतना से प्रकाशित होगा, और उस मधुरानंद को सब को दिखाईदेगा! 



सत का अर्थ सत्तावाला(Potential energy)!सत् का किरणों ही माया नाम का गोळ में गिरता है! उस गोळ का अन्दर गिरता हुआ किरणों को ही तत् कहते है! इसी माया व तत् को सृष्टि का अन्दर का परमात्मा व श्री कृष्ण चैतन्य कहते है! वे श्री कृष्ण चैतन्य का किरणों जब बाहर विकेन्द्रीकरण करता है तब नाश व हरी होनेवाला सृष्टि बनजाता है! समस्त जीवकोटि उस नाश होने का सृष्टि अन्तर्भाग है! है एक ही है! वह ही सत है! वह सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापी और सर्वज्ञ है! सत् चित् आनंद् है! इस का नाम और रूप जोड़ने से हरी व नाश होनेवाला सृष्टि बनजाता है! सृष्टि का कारण अनेक प्रकार का दिखाई देनेवाला और वैसा भाव में डालने वाला माया ही है! मा= नहीं या= यदार्थ, यानी जो यदार्थ नहीं है वह ही माया है!
परमात्मा का स्वप्ना ही माया है! इसी को परमात्मा का लीला कहते है! भयंकर स्वप्न स्वप्नाके भय से कांपने व भयभीत होनेवाला मनुष्य नेत्र खोलने से भय दूर भाग जाता है! वैसा ही माया से बाहर आने के लिए क्रियायोगासाधना अत्यंत आवश्यक है! वह क्रियायोगासाधना सर्व जन्मों में दुर्लभ जन्म मानावाजन्म में ही साध्य है! सर्व जन्मों में मनुष्य जन्म उत्तमोत्तम है! सत् का अर्थ परमात्मा! उस परमात्मा को पाने के लिए नाश होने हरी से शब्दब्रह्म ॐकार में शब्दब्रह्म ॐकार से तत् में तत् से सत् में जाना चाहिए!
पहला गोळ सत् एक प्रकाशवंत दिया समझो! दूसरा गोळ तत् समझो! यह तत् एक काँच का गोळ समझो! सत् नाम का दिया से कुछ किरणों ही तत्  का काँच गोळ में प्रवेश करेगा! इसी हेतु सत् तत् में भी होगा, तत् का अतीत यानी बाहर भी होगा! सत होने से ही तत होगा!
तीसरा गोळ ॐ! यह ॐकार ही सृष्टि का हेतु और परावर्तन है! कुछ भी उत्पन्न होने के पहले शब्द मिलता व आता है! शब्द उत्पन्न होने का बाद नेत्र को दिखाईदेनेवाला वास्तु उत्पन्न होता है! यह ही हरी व नाश होनेवाली जगत् है! इसी हेतु कोई भी शुभकार्य हरी ॐ तत् सत् कहके प्रारंभ करना चाहिए! इस का अर्थ नाश होनेवाली हरी से नाशरहित सत् में प्रवेश करना चाहिए! जगत में परमात्मा बिना कुछ भी नहीं है! आकाश सब छीज को अपने में जगह देता है! घन पदार्थ द्रव पदार्थ का रूप में, द्रव पदार्थ भाप का रूप में, भाप विद्युत् का रूप में, और आखरी में विद्युत् परमात्मा में ममैक होता है! परमात्मा का परावर्तन(reflection/refraction) ही पदार्थ है! हमको दिखाई देड्नेवाला घनपदार्थ वास्तव में भौतिक नेत्रको दिखाई नहीं देड्नेवाला अणुओं परमाणुओं का मिश्रित ही है!
हम नींद में कुछ दुर्घटना में बहुत घायल होगया, हम को शादी हुआ राजा बनगया तीन बेटे हुआ, कुछ अरण्य में शिकारी करने गया उधर हमारा पीछे शेर धौड के आरहा है इत्यादि स्वप्नाते है! भय से नेत्र खुलने से सामने कुछ भी नहीं हुआ देख के शांति से हॅसते है! इसीलिये परमात्मा में हर एक क्षण रहना सोना उठना यानी हर एक कार्य परमात्मा में रहकर करने से कोभी चिन्तना नहीं होगा! परमात्मा चेतना का साथ नित्यं विराजमान योगी इस जगत इस जगत का नैतिक बाधाओं मानसिक बाधाओं इत्यादियो साधक नहीं पहचानेगा! ए सब मिथ्या समझेगा और उसी दृढ़ संकल्प का साथ रहेगा! प्रत्यक्षा और अनुमान प्रमाणों का माध्यम से परमात्मा को प्राप्ति नहीं करसकता है! परमात्मा तर्क का अतीक है! मात्र आगम अथवा अंतरज्ञान (Intuition)माध्यम से ही परमात्मा उपलब्ध होगा! ॐकार स्पन्दनायें परमात्म का हेतु उत्पन्न होता है! ॐकार ही इस जगत का हेतु है! ॐकार ध्यान का माध्यम से ही परमात्मा उपलब्ध होगा करके पतंजलि महर्षि ने कहा है!
 इस ॐकारनाद तैलधारामिवच्छिन्नं (Continuous smooth flowing oil) दीर्घघण्टानिनादवत्(long peal of gong Sound), अवाच्यवादांश्च (unutterable) यानी उच्चारण का अतीत, प्रणव(ever new, ever inspiring)यानी नित्य प्ररेणा करनेवाली, यस्तं वेद स वेदवित्(who he who knows that as such he knows veda or all Truth to be known) वह ही वास्तव में ज्ञानग्राही व जाननेवाला है! इस ॐकार समस्त अणुओं से उत्पन्न होता है! जहा कार्य(Activity) है वहा अवश्य शब्द उत्पन्न होगा! रेडियो शब्दों व स्पंदनों कान को सुनाई नहीं देगा! वे रेडियो का माध्यम से ही सुन सकताहै! वैसा ही इस ॐकार को क्रियायोगासधाना का माध्यम से आसानी से सुनसकता है!
ॐकार उच्चारण दीर्घ व मध्यम व लघु पद्धतियां से ऊंची स्वर से अथवा मनस् में अथवा उपांसु रीती में कंठ में विशुद्धचक्र में ऐसा विविधाप्रकारों में  करसकते है! इन सब से अधिक मुख्या है अंतर्मुखी होकर इंद्रियों को नियंत्रण कर के प्रत्याहार और प्राणायाम पद्धतियां में ॐकार को सुनता हुआ उस में ममैक होकर परमात्मा का अनुसंधान होना अति उत्तम है! सर्व भाषाओं का मूल है इस ॐकार! मानव चेतना का परमात्मा चेतनाका के बीच में वारधि है इस पवित्र ॐकार! इस ॐकार सर्वव्यापी है! मात्र एक आदा बार सुनने में तृप्ति नहीं होना चाहिए! आध्यात्मिक तोड़ में आगे  बढगई क्रियायोग साधक इस पवित्र ॐकार को भूमि आकाश आगे पीछे चारों ओर सारे दिशा में व्याप्ती हुआ अनुभव पायेगा! अदभुत ज्ञान, नित्यचेतना, नित्यनूतन, आनंदाभरित प्रणवनाद जैसा अनुभूति पायेगा और अवगाहन करेगा इस पवित्र ॐकार नादं को क्रियायोगसाधक!
क्रियायोगसाधना का ॐ प्रक्रिया का माध्यम से जो साधक ॐकार सुनने को साध्य किया है वह साधक सूक्ष्मलोक केन्द्रों और प्राणशक्ति का स्पन्दनों को अपना मेरुदंड में सुनसकता है! इस तरफ का साधक अपना भौतिक मानसिक और आध्यात्मिक विषयवस्तुवों का उप्पर एकाग्रता ठीक पंथा में और सुनायास रीति में लगा सकेगा! 8x2=16  जितना सत्य है यह भी इतना ही सत्य है!
सोऽहं और ॐ प्रक्रियों को लययोग कहते है! क्रियायोगासाधाना में इन प्रक्रियों अन्तर्भाग है! ॐकार हर एक चक्र में अलग प्रकार की आवाज सुनाई देगा! मूलाधारचर्क्र में झूमकरके कीड़ा का शब्द जैसा, स्वाधिष्ठानचर्क्र में बन्सिरी वादन जैसा, मणिपुरचर्क्र में वीणा नाद जैसा, अनाहतचक्र में घंटा नाद जैसा, विशुद्धचर्क्र में नदीजल प्रवाह शब्द जैसा, आज्ञाचक्र में सब मिलके ॐकार शब्द का रूप में सुनाई देगा! परन्तु प्रथम में ही ॐकार नाद सुनाई देने से बाकी शब्दों का उप्पर ध्यान रखने को अवसर नहीं है! इस प्रणव नाद में ममैक हुआ साधक अपना ही चेतना चारों ओर फेलाहुआ करके महसूस होता है! तब मई ही शिवोहंयानी परमात्मा आईटीआई ग्रहण करता है! जब जब अवकाश मिलता है तब तब निःशब्द में बैठ कर ॐकार सुनाने को प्रयास करना चाहिए! ॐकारश्रवणं हम दिव्यात्मसंभूत करके ग्रहण करनेदेगा! भौतिक सुख ऐश्वर्य इत्यादि छीज इस आध्यात्मिक ऐश्वर्य का सामने कुछ भी नहीं है करके ग्रहण करने देगा! हम जैसा बीज डालेगा वैसा ही फल लभ्य होगा!  अच्छी क्रियायोगसाधना करने से जरा रुग्मता कष्टों इत्यादि हम से दूर होजाएगा!
आगम(Intuition or Soul perception)शास्त्र का अर्थ वेद वेदांगों इति नहीं बल्कि आत्मबोध इति है! आत्मबोध को अभिवृद्धि करना चाहिए! धुल से मैला हुआ गंदा काँच का दरवाजों को साबुन साफ करने से वे सूर्यकान्ति को अन्दर आने देगा! वैसा ही अनावश्यक वृत्तियों से इन्द्रियोंको निर्वीर्य नहीं करना चाहिए! क्रियायोगसाधाना माध्यम से इन्द्रियोंको शक्तिवर्धक करना चाहिए! तत् माध्यम से आत्मबोध को अनुभवसहित अभिवृद्धि करना चाहिए!
जितना भी दिमागी व्यक्ती हो व्यापार में धन लगाने(Investment)में, अपना मनपसंद वृत्ति मिलने के लिए, व्यापार में ठीक भागस्वामी/साझीदार(Business partner) को लेने के लिए, विद्या इत्यादि विषयों में गलत कदम उठाना हम को दिखाई देता है! इसीलिये व आत्मबोध का माध्यम से ठीक निर्णय लेके अपना अपना वृत्ति व्यापारों में सफलीकृत होना चाहिए! परमात्मा को ज्ञानेंद्रिया कर्मेन्द्रिया इत्यादि नहीं होता है! इन का उप्पर आधारित नहीं होके परमात्मा मात्र केवल आत्मबोध का माध्यम से इस जगत को चलाता है! इसीलिये कुछ भी कार्य प्रारम्भ करने के पहले कुछ समय ध्यान करके उपक्रमण करना चाहिए! कस्तूरी मृग का नाभी में ही कस्तूरी होता है! परन्तु वह उस कस्तूरी मृग को पता नहीं है! इसीलिये उस कस्तूरी के लिए चारों ओर पागल जैसा निरंतर धौडता रहता है! वैसा ही आत्मबोध के लिए कही भी जाने को आवश्यकता नहीं है! निश्चल स्थिति में बैठ कर कुछ समय क्रियायोगध्यान करने से काफी है! वह आत्मबोध लभ्य होजाएगा! अनावाश्यक कार्यों से, गपशाप में, अधिक निद्रा में, अनावाश्यक दावतों में, इत्यादि व्यर्त्ध व्यापकों में समय खराब नहीं करना चाहिए! मादक द्रव्यों व नशीली पदार्थों का सेवन धूम्रपान मद्यपान मांस भक्षण इत्यादि विषयों को दूर रहना चाहिए! पढाई व्यापार(Business)काम इत्यादि करते रहना है! वे हम को मुख्या है ही है! शारीरक व्यायाम स्नान और क्रियायोगासाधाना अत्यंत मुख्या है! ध्यान का समय में अन्य व्यापकों से मन को भरना नहीं चाहिए! प्रशान्तचित्त से ध्यान करना चाहिए!
अवसर से ज्यादा संज्ञाशील(Sensitive) होना भी नाडी संबंधित बलहीनता ही है! इसी हेतु मूडी(Moody)जैसा रहना, अन्यों का उप्पर अनावश्यक कोध डालना इत्यादि दुर्गुणों का रास्ता बनता है! इस को नियंत्रण करना अत्यंत आवश्यक है! इस को नियंत्रण करने के लिए इंद्रियों को निग्रहण करना अत्यंत आवश्यक है! अहंकार(Ego) को शरीर से निकाल के आत्म व परमात्मा का साथ जोड़ने से सुख दुःख, शीतल उष्ण, क्लेश आनंद, इत्यादि इंद्रियसंबंधित द्वंद्वों से आसानी से बाहर आसकता है!
तितीक्षा का अर्थ शरीर को धूप में वायु में अथवा वर्ष में हिंसा केंद्र बनाओकर के नहीं है! इंद्रियों का अनुभव भावना का माध्यम से व्यक्त होता है! हम जितना विषयवस्तु का उप्पर आसक्ति दिखायेंगे इतना ही जोर से विषयवस्तु हमारा उप्पर प्राभावित करेगा!
इस जगत परमात्मा का अन्दर का माया स्पंदनों से उद्भव हुआ है! जगत् मिथ्या ब्रह्मा सत्यं! पदार्थ यदार्थ नहीं है! मनस् और पदार्थ दोनों है करके चेतना होना ही चाहिए!
थोड़ा गहराई में जाइए! हम जो घनपदार्थों जो देखरहे है वे वास्तव में अलग अलग रहा अणुओं परस्पर आकर्षित होकर एक जगह में लाया हुआ समग्र अणुओं का समूहों ही है! पदार्थ कम मायास्पन्दाना है, मनस अधिक मायास्पन्दाना है! इसी कारण लकड़ी का लट्ठा, पत्थर, लोहा इत्यादि छीजें भी माया स्पंदना का अंतर्भाग है! उन छीजों का अंतर्गत स्पंदनों में व्यत्यास परमात्मा का अंतर्गत माया का निर्देशन ही है! मनस् एक तरफ का स्पंदना होने से पदार्थ दूसरा तरफ का स्पंदन है!
मनस् ही देखता है, सुनता है, सूंघता है, चखता है, स्पर्शन करता है! हर एक व्यक्ति व व्यष्टि(Micro) का गलतियाँ का हेतु है कुंडलिनी (Illusion)! समिष्ट(Macro) गलतियाँ का हेतु है माया(Delusion)! इसी को अविद्या(Ignorance) कहते है! हमारा इंद्रियाँ, मनस्, तर्क, इत्यादि पदार्थ का लक्षणों (Phenomena-appearance of substances) को पाक्षिक रूप में कह सकता व वर्णन करसकता है! परंतु ज्यादा तरफ पदार्थ का असली स्वरुप(Noumenon-real substance) को बोल नहीं पायेगा! अगर वर्णन करने(describe)से भी तर्कातीत परमात्मा को देश कालों को परिमित करना अनुचित है!
व्यक्तियों को केवल उनका कुटुंब का साथ व देश का साथ ही परिमित करना, मनोकेंद्र से उत्पन्न हुआ बाधायों को शारीरक परिमिति करना, घन द्रव वायु प्राण विचारों और भावनाए का बीच का सम्बन्धों को हक्का बक्का(Confuse)कर देना, जनन मरणों का बारे में अवगाहन नहीं होने देना, अल्पभूइष्ट इस शरीर को गरिष्ठ है करके समझने देना, दुष्ट भावनों को अच्छा भावनों करके मन को हक्का बक्का(Confuse)कर देना, अच्छा भावनों का बदल में दुष्ट भावनों में ही मन को निमग्न करना, पदार्थ ही नित्य है, पदार्थ का अन्दर का परमात्मा ही यदार्थ नहीं है इति हम को हक्का बक्का(Confuse)कर देना, जो दीखता है वह ही सत्य है, बाकी सब असत्य है इति हम को हक्का बक्का(Confuse)कर देना, ए सब माया का नाटक का अंतर्भाग है! अहंकार का वजह से हम प्रकृति से अलग है इति समझना ही है! प्रकृति से हम अलग नहीं है! हम प्रकृति का अंतर्भाग है! वैसा जब हम ग्रहण करेंगे तब हम को कोई भी बाधाएँ नहीं होगा! श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी श्री विवेकानंदा, भगवान रमण महर्षि, इत्यादि महापुरुष शारीरक बाधाओं को मानसिक नियंत्रण से मानस से अलग करदेते थे! इसी कारण बाधाएँ  कभी भी उन महापुरुष लोगों को बाधा नहीं देते थे!
क्रियायोगसाधना द्वारा साधक परमात्मा से अनुसंधान करता है! यदार्थ ग्रहण करता है! जीवन को माया से अलग करता है! बाधावों से विमुक्त पाता है! आनंदप्राप्ति करता है!
आधुनिक वैज्ञानिक शास्त्र पदार्थ में विद्युत अयस्कांत तरंगों से भरा पडा है, इन तरंगों घनीभवन हुआ कांतिकिरणों ही है करके निरूपण किया है!
माया परमात्मा का अंतर्भाग है! इन कांतिकिरणों उस माया का स्पंदनों ही इति वेदांती लोग कहते है! परमात्मा को भूत वर्त्तमान और भविष्यत काल नहीं है! परमात्मा नित्य है! परमात्मा देश और कालों की अतीत है! पत्थर, आकाश में बिजली(lightining), दिन, रात ए सब वास्तव में हमारा विविध प्रकारों का विचारों का घनीकरण ही है!मनुष्य साधारण तोड़ में अपना इंद्रियों का उप्पर आधारित होकर निर्णय लेता है! ए सब इतना भरोसेमंद नहीं है! आत्मबोध आधारित निर्णयों 100% भरोसेमंद है! अंडा का अन्दर का पक्षी जैसा परिस्थितियों का गुलाम नहीं होना चाहिए! बाहर एक पशु भी अपना जीवन बिता रहे है, हम भी बिता रहे है जैसा जीवन नहीं बिताना चाहिए! उप्पर का छिलके(Shell) तोड़ के बाहर आके उड जानेवाली विहंग जैसा क्रियायोगासाधाना कर के परमात्मा से अनुसंधान होने जैसा साधक/मनुष्य रहना चाहिए!
प्रातः जागने के बाद  20-30 मिनट क्रियायोगध्यान करना चाहिए! तत् पश्चात् काम के लिए उपक्रमण करना चाहिए! समय मिलाने पर क्रियायोगध्यान करना चाहिए! गपशप में समय वृधा व व्यर्ध नहीं करना चाहिए! मानव जन्म पाने के हेतु क्रियायोगध्यान करना चाहिए! मानव जन्म, मुमुक्षत्व और महापुरुष दर्शन ए सब अति दुर्लभ है! ग्रंथपठन से शुद्धज्ञान मिलना असंभव है! बल्कि अहंभाव आजायेगा! एकी जन्म में शुद्धज्ञान पाना भी असंभव है! परमात्मा चेतन का अर्थ सर्वज्ञत्व है! परमात्मा का अनुसंधान करने से सर्व विषय ज्ञान इसी जन्म में ही सुसाध्य है!


श्वास को अस्त्र जैसा उपयोग करना ही श्वास्त्र है! वह क्रमशः शास्त्र होगया है! श्वास को अस्त्र जैसा उपयोग करना जाननेवाला ही श्वास्त्री है! वह क्रमशः शास्त्री होगया है! ऐसा श्वास को अस्त्र जैसा उपयोग करना जाननेवालों एक शास्त्री इस कौता मार्कंडेय शास्त्री है!
हम अपना आत्मप्रबोध को अभिवृद्धि करना चाहिए! वैसा अभिवृद्धि किया हुआ आत्मप्रबोध का माध्यम से काम करना अभ्यास करना चाहिए! मै अपना काम करने के लिए परमात्मा का प्रमेय का क्या आवश्यक है, कितने लोग इस आत्मप्रबोध से काम करता है, उस आत्मप्रबोध नहीं होते हुए भी कई लोग भाग्यशाली हुआ है करके बोलते है और पूछते है! परंतु आत्महत्या इत्यादि इन्ही लोग में ज्यादा होना हम देखते है! हम नहीं जानते हुआ मरण की ओर रोज रोज अचेतानापूर्वक प्रयाण करते है! क्रियायोगी सचेतानापूर्वक मरण की ओर प्रयाण करता है! हम अभी छोटे है, ध्यान करने के लिए भविष्यत में बहुत समय है करके स्थगित करते है! अशांति का वश होकर परमात्मा को खोजना शुरू करते है! वैसा अनाडी लोगों को मभ्य करके परमात्मा को दिखायेंगेकर के पैसे वसूल करते है! पेट में दर्द होने से दूसरा आदमी दवाई लेने से हमारा उदर का दर्द कैसा ठीक होजायेगा? परमात्मा का अनुसंधान बाजार में नहीं मिलता है! वह केवल तीव्र क्रियायोगसाधाना का माध्यम से ही लभ्य होता है! हर एक व्यक्ती को दो लक्ष्य होना चाहिए!   (1) भगवान कोम जानना  (2) उसका पुत्र का रूप में इस भूमि का उप्पर हमारा पात्रा को ठीक तरफ से निभाना चाहिए! परमात्मा ही यदार्थ है बाकी सब मिथ्या है!
भौतिक विषयों में ज्यादा आसक्ति हुआ मनुष्य को दूरदृष्टी और ठीक ढंग का विचारों नहीं होता है! परिमित छीज ही मांगेगा! क्रियायोगा ध्यानपूर्वक साधक केवल परमात्मा का अनुसंधान करनेवाली नित्य ज्ञान और सुख को ही वांछित होता है! परमात्मा से दूर हुआ लोग ही असली में अनाडी लोग है! वैसा अनाडी लोगों को ठीक रास्ता में रख के
सद्गुरु:
केवल सद्गुरु का द्वारा ही परमात्मा का साथ अनुसंधान शीघ्र और सुगम होता है! गुरु का अर्थ साधारण शिक्षा देनेवाला! उस शिक्षा पानेवालों को विद्यार्थी कहते है! परमात्मा का साथ अनुसंधान करने का तरीका शिखानेवाला गुरु को सद्गुरु कहते है! उन बच्चों को चेला व शिष्य कहते है! सद्गुरु का नेत्र  निश्चल तीक्ष्ण और आर्द्रता से भरपूर होता है! नियंत्रित श्वास और नियंत्रित मनस् का साथ गंभीरतापूर्वक और हुंदापन् से विराजमान होता है सद्गुरु! सरळता सुन्नित हास्य महत्वपूर्ण भाषा ये सब उन का वादन में द्योतित होता है!
सद्गुरु को विश्वास कर के उन का दिशा निर्देशन का मार्ग में चलना चाहिए! भगवान का साधक का मध्य में सद्गुरु वारधि है! जन्मतः आनेवाले वासनों का साथ रहना और कर्मो करना स्वेच्छा नहीं है! हमारा अन्दर का दुर्गुणों और हमारा दुर्व्यसनाओं को ठीक करने वास्ते माता पिता कभी कभी कठिनाई प्रदर्शन करते है! इसका का अर्थ वे नियंत लोग नहीं है! माता पिता हम को जन्म दिया है! सद्गुरु हम को ज्ञान प्रदान करके परमात्मा का पास लेजाएगा! इसी कारण सद्गुरु दिशा निर्देशन देने समय कभी कभीकठिनाई प्रदर्शन करेगा! हमारा स्वतन्त्रता का भंग होरहा है करके हमको लगेगा! परन्तु परमात्मा का अनुसंधान ही असली और नित्य स्वेच्छा है! भौतिक इंद्रिय विषयों को वश होनेवाला बानिसत्वा(slavery) अशाश्वत है!
स्वार्थ का साथ वांछनीयता का साथ मै तुम को यह दिया हु, तुम मुझे वह देदो व तुम मुझे क्या डोज?’ वैसा तत्व सहित साधारण मानवप्रेम अशाश्वत है! दिव्यप्रेम अजरामर शाश्वत नित्य और परमानंदमय है!
मै इस आध्यात्मिक जीवन में आने के पश्चात् सद्गुरु का प्राधान्यत कितना महत्वपूर्ण है समझ्गया! हम खुद ही खुद को शत्रु है, वह बात हमको पता नहीं है! हम निश्चल बैठना नहीं सीखते है, भगवान के लिए समय नहीं काट्ते है! असहान से स्वर्ग तुरंत मिलना इति चाहते है! ग्रंथपठन से व धर्मकार्यो करने से व धर्मोपन्यासों सुनने से वह प्राप्त नहीं होता है! तीव्र क्रियायोगध्यान् का माध्यम से भगवान के लिए कुछ समय लगा के प्रातः और संध्या दोनों समाया निश्चित रूप से गेहरा ध्यान करने से ही भगवान को प्राप्त करसकता है!
पुनर्जन्म:
जड़(inert)से लेकर मनुष्य तक विविध रूपांतर होनेवाला परमात्मा शिवा और कौन होसकता? विश्व में सारे छीजें परमात्मा की अंश है! पदार्ध(matter) यदार्धी परमात्मा को छिपाता है! पदार्ध से लेकर यदार्ध तक बहुत कुछ रूपांतरण जो भी हो रहा है वह सब परमात्मा की अंश का प्रदर्शन ही है! इन रूपांतरों को प्रदर्शन करनेवाली है पुनर्जन्म सिद्धांत! पदार्ध में खैद हुआ जैसा दिखाईदेनेवाली परमात्मा का अंश पदार्ध नहीं होने से भी (existing)है, पदार्ध को परिमित पदार्ध में खैद होने का समय में भी थी, और क्रियायोगसाधना का माध्यम से जब पदार्ध से मुक्त होकर बाहर निकलाता समय में भी है! पुनर्जन्म सिद्धांत तार्कितका का बाहर है! मरण और निद्रा इन दोनों को सचेतानापूर्वक और सहेतुकता से समझने के लिए क्रियायोगसाधाना ही केवल सहायभूत होगा बाकी अन्य प्रक्रियॉ कोई भी काम में नहीं आयेगा!
क्रियायोगसाधक को आत्मा साक्षात् आकार रूप में दिखाईदेगा! इसी को आत्मसाक्षात्कार कहते है! परमात्मा का अनुसंधान होनेवाले इस स्थिति प्राप्ति होने के लिए न केवल मात्र एक जन्म काफी नहीं है! हमारा अन्दर का दोषों को जड़ से निकालके फेंकना यानी परिपूर्ण निर्मूलन करना चाहिए! ऐसा परिपूर्ण निवृत्ति करके पवित्र होना चाहिए! हम परमात्मा से ही आएं है! इसी हेतु इन विविध प्रकार का उपाधियों नाम का किराया घरों से हम अपना निज घर अथात् परमात्मा का पास आज नहीं तो कल यानी कभी न कभी जाना ही है! इस आत्मा नित्य और शुद्ध है! जब शरीर में परिमित होने समय अहंकार और अशुद्धि कपड़ा पहिना हुआ होता है! वैसा मभ्य करनेवाली मैला कपड़ा छोड़ने से ही आत्मा परमात्मा का मिलन लभ्य होगा! इस नाश होने शरीर का साथ नाटक करने के लिए परमात्मा अपना अविनाशी अंश को भेजता है! अपने में ही इस शुद्ध अविनाशी आत्मा उपस्थित करके ग्रहण करने हेतु ही इस मानवजन्म का अंतरार्थ है! वह भूल के शरीर इंद्रियाँ और वासनाओं इत्यादियों को वश होने का वजह से ही हम को ए सब बाधायें होता है! इस का अर्थ सभी लोग ऋषि मुनि जैसा बदलने के लिए नहीं कहते है! वैसा सब बदल भी नहीं सकते! परमात्मा का लीला को समझ कर हम अपना अपना पात्रों को ठीक ढंग से इस भुवी का नाटक में निभाना कर के अर्थ है! हम कुछ न कुछ दिन इस शरीर नाम का बन्दिखान को त्याग करना ही हैना? इस शरीर नाम का खैद से क्रियायोगसाधना का माध्यम से सचेतानापूर्वक बाहर निकलना और अपना इच्छानुसार पुनः इस शरीर में वापस आना सीखना चाहिए! परमात्मा अपना लीला जब संकल्प किया, प्रारंभ में अपना अंश को अचेतानापूर्वक जड़पदार्थ जैसा व्यक्तीकरण किया था! पश्चात् प्राणसहित विविध प्रकार का सुंदर रूपों में वृक्षों जैसा व्यक्त किया! तत् पश्चात् प्राण और गमनसहित पक्षियों और पशुओं जैसा व्यक्तीकरण किया था! तत् पश्चात् अपना भावों को समझनेवाले तार्किकशक्तिसहित मनुष्य जैसा व्यक्तीकरण किया था!
एक ही जन्म में परमात्मा का सर्वव्यापकत्व समझने को केवल क्रियायोगासाधना का माध्यम से ही साध्य है! केवल इस मनुष्य ही आगे बढ कर ऋषि हो कर परमात्मा खुद ही है कर के समझाने का स्थिति में पहुंचकरसका! इंद्रियों को नियंत्रित करके पदार्ध से यदार्ध यानी परमात्मा तक लेजानेवाला मार्ग इस क्रियायोगसाधना है! धर्मबद्ध काम्यकर्मो करता हुआ इस शारीरक बंधनों से बचकर किसी छीज में बंधन नहीं होता हुआ परमात्मा में ममैक होना चाहिए!
शारीरक मानसिक आध्यात्मिक संगत ही मनुष्य है! अच्छी तंदुरुस्ती का साथ साथ अच्छी तरह भूख होने से भी खाने को नहीं होना और खाना खरीदने को पइसा नहीं होना दुर्भर है! पइसा होने से भी अजीर्ण का वजह से खा नही सकना भी दुर्भर है! आरोग्यवान होता हुआ आस पड़ोस का साथ और घर का अन्दर शांति नहीं होना और नित्य कलहप्रिय लोगों का बीच में मानसिक अशांति का साथ जीवन बिताना भी दुर्भर है! आरोग्य,धन,और  विचार करनेवाला मन होता हुआ सब से उत्तमोत्तम  और सत्य वास्तु परमात्मा को नहीं पाना भी सब से दुर्भर छीज है! हम जो भी काम कर रहे, बड़ा हो छोटा हो, सब काम परमात्मा का ही समझना चाहिए! ईश्वर ने हम को दिया हुआ काम श्रद्धापूर्वक उसका परिपूर्ण संतृप्ति के लिए करना चाहिए! तब सारे विश्व शक्तियों हमको अवश्य सहायता करेगा! यह निस्संदेह है!
भौतिक शरीर 16 मूलपदार्थो (elements) का मिलन है! 24 तत्वों का सम्मेलन है! मानव शरीर पतनानंतर उस भौतिक 16 मूलपदार्थो (elements) और 24 तत्वों का माध्यम से पुनः शरीर सृष्टि नहीं करसकता है! इस स्थूल शरीर का अंदर 19 तत्वों का सूक्ष्म शरीर उपस्थित है! इस सूक्ष्म शरीर का अंदर 8 तत्वों(आकाश वायु अग्नि जल पृथ्वी इति पंच भूतों और सत्व रजो तमो गुणों का साथ) का कारण शरीर उपस्थित है! सूक्ष्म  और स्थूल शरीरों का निर्माण भावना इस कारण शरीर का माध्यम से ही होता है!
मनुष्य और तीन शरीरों
मनुष्य को तीन शरीर है!  स्थूल शारीर,  अंदर सूक्ष्म शारीर, और उसका अंदर कारण शारीर,उपस्थित है! इस कारण शारीर का अंदर इन तीनोँ शरीरों को स्थतिवंत करने के लिए व्यष्टात्मा रहता है!
भौतिक, आरोग्य और सांघिक धर्मों स्थूल शारीर को अनुवार्तित होता है! 
नीति नियमों मनस्तत्व विषयों  जन्मांतर संस्कारों  इच्छाएं विचारों सूक्ष्म शारीर को अनुवर्तित होता है!
आध्यात्मिकता दिव्यप्रकृती और परमात्मा का साथ अनुसंथान होना कारण शारीर को अनुवर्तित होता है!
कारण शारीर परमात्मा का समीप होने का नातिर बाकी सूक्ष्म और स्थूल शरीरों स्थितिवंत होने का शक्ति और सहजावाबोधना कारण शारीर से सूक्ष्म शरीर को,  सूक्ष्म  शरीर से स्थूलशरीर को लभ्य होता है! परमात्मा का साथ अनुसंथान होने के लिए प्रथम मे स्थूल, उसके बाद सूक्ष्म और कारण शरीरों को समायत्त करना चाहिए!  
परमात्मा मनुष्य को इच्छाशक्ति प्रसाद किया है! पीढा आनंद इन्द्रिय विषयानंद इन सारें छीजें आखिरी मे स्थूलशरीर ही अनुभव करती है! मनुष्य इस स्थूलशरीर से दोष नहीं करने तक  दंडनीय नहीं होता है! मनुष्य आखरी क्षण तक शोचके कदम उठाना  अत्यंत आवश्यक है!
स्थूल सृष्टि 24 तत्वों से समायुक्त है! पञ्चज्ञानेंद्रियाँ,  पञ्च कर्मेन्द्रियों, पञ्च प्राणों, पञ्च तन्मात्राओं और चार अंतःकरण कुल मिलाके 24 तत्वों है! 
पञ्च ज्ञानेंद्रियाँ
पञ्च कर्मेन्द्रियों
पञ्च प्राणों
पञ्च तन्मात्राओं
चार अंतःकरण
कुल मिलाके 24 तत्वों

सूक्ष्म सृष्टि 19तत्वों का समावेत है!  वे  5 ज्ञानेंद्रियों, 5 कर्मेन्द्रियाँ, 5 प्राण, 4 अंतःकरण! इस सूक्ष्म सृष्टि भौतिक नेत्र को दिखाई नहीं देगा!

5 ज्ञानेंद्रियों
5 कर्मेन्द्रियाँ
5 प्राण
4 अंतःकरण
कुल 19  तत्वों
कारण सृष्टि 8 तत्वों का समावेत है! वे  आकाश वायु अग्नि जल पृथ्वी इति पंच भूतों और सत्व रजो तमो गुणों!
जीवात्म, कारण सूक्ष्म शरीरों, हम भूत में किया हुआ दुष्ट और शिष्ट कर्मो कुल मिलाके इस स्थूल शरीर पाने को कारण है!
एक काँच का बोतल(Glass bottle)में पीला रंग(कारण) पानी डाल के ढक्कन लगाइए! दूसरा बोतल में लाल रंग(सूक्ष्म) पानी डालिए!अब पीला रंग(कारण) बोतल को लाल रंग(सूक्ष्म) पानीवाला बोतल में डालिए! तीसरा बोतल में नीला रंग(स्थूल) पानी डालिए! इस बोतल में पीला और लाल रंग बोतल को डालिए! ढक्कन लगाइए! अब तीन बोतालोवाला बोतल को एक बड़ा काँच का सफ़ेद पानीवाली बाल्टी में डालिए! अब सबसे बड़ी नीला रंग(स्थूल) (स्थूल)बोतल खोलिये! नीला रंग(स्थूल) बाल्टी का सफ़ेद पानी में मिलजाएगा! परन्तु लाल रंग(सूक्ष्म) और पीला रंग(कारण) पानी वैसा की वैसा ही रहेगा! बाल्टी का सफ़ेद पानी में मिल नहीं जाएगा! वैसा ही स्थूल शरीर पतन होने से भी सूक्ष्मौर कारण और उस का का अन्दर का मलिन नहीं जाएगा! और वे परमात्मा में नहीं ममैक होगा! शुद्धात्म तीन प्रकार का अविद्या शरीर में बंदी हुआ ही इस का कारण है!
कारण शरीर कुल मिलाके 8+19+24=53 तत्वों का आलवाल है!
उन में कारण शरीर संबंधित (1) आकाश वायु अग्नि जल पृथ्वी इति पंच भूतों और सत्व रजो तमो गुणों कुल मिलाके 8 तत्वों,
(2) सूक्ष्म सृष्टि 19तत्वों का समावेत है!  वे  5 ज्ञानेंद्रियों, 5 कर्मेन्द्रियाँ, 5 प्राण, 4 अंतःकरण! इस सूक्ष्म सृष्टि भौतिक नेत्र को दिखाई नहीं देगा!
(3) स्थूल सृष्टि 24 तत्वों से समायुक्त है! पञ्चज्ञानेंद्रियाँ,  पञ्च कर्मेन्द्रियों, पञ्च प्राणों, पञ्च तन्मात्राओं और चार अंतःकरण कुल मिलाके 24 तत्वों है! यह 24 तत्वों और 16(Elements)मूल पदार्थोँ स्थूलशरीर निर्माण का हेतु है
सूक्ष्म सृष्टि 19तत्वों-- (1)मनस्(इंद्रियचेतना), (2)बुद्धि(निश्चयात्मक), (3)चित्त(भावना), और (4)अहंकार +  पाँच ज्ञानेंद्रियों(नेत्र, नाक, कान, त्वचा, और जीब) + पाँच कर्मेन्द्रियों(गुदास्थान, मुख,लिंग, पाणी और पादम्) + पाँच प्राणों(प्राण, अपान, व्यान, समान, और उडान)!
1)प्राणवायु = स्फटिकीकरण(Crystallization) यानी सर्व कामो का व्यक्तीकरण के लिए सहायता करता है!, 2)अपानुवायु= व्यर्थपदार्थों का विसर्जन(Elimination) काम के लिए सहायता करता है!  3)व्यानवायु= प्रसारण(Circulation) काम के लिए सहायता करता है!, 4)समानवायु= स्पांजीकरण(Assimilation) काम के लिए सहायता करता है! हजम होने, उस का माध्यम से अंगों को आवश्यक पोषकपदार्थो का वितरण, और मरा हुआ कणों का स्थानों में नया कणों का उत्पादन करने में सहायता करता है! &5)उदानवायु= केशावृद्धि, त्वचा, मांस, इत्यादियों को विविध रूप का कणों चाहिए! उन् के लिए अनंत समीकरणों होते रहते है! इस पद्धति को जीवाणुपाक कहते है! उदानुवायु रूप में जीवाणुपाक (Metabolizing) के लिये सहायता करता है!
इन सूक्ष्म सृष्टि/शरीर का 19 तत्वों और स्थूल सृष्टि/शरीर का 24 तत्वों  दोनों का परस्पर सबंध होता है! शरीर अस्वस्थत होनेसे पांच ज्ञानेंद्रियों और कर्मेन्द्रिया दोनों प्राभावित होता और संबंधित अवयवों भी प्राभावित होता है! मनुष्य का स्थूल शरीर का पतनानंतर जीवात्मा सूक्ष्मलोक में रहता है! अपना कर्म फल का अनुभव करने के पश्चात् अपना शेष् इच्छाएं पूरा करने वास्ते पुनः दूसरा स्थूलशरीर में प्रवेश करता है! वांछा ही पुनर्जन्म का हेतु है! हमारा मानसिक स्थिति और परिस्थिति का अनुसार हमारा अगले जन्म निर्णय होता है! स्थूला शरीर का मूलाशाक्तियॉ सूक्ष्मशरीर में होता है! आँख, नाक, कान, जीब, और त्वचा ये सब सिर्फ वस्तु है! अगर वो वास्तु खराब होने से भी उनका शक्ती अंत नहीं होगा! कुछ लोगों को सूक्ष्मशरीर का अन्दर का देखने का शक्ति खराब होने से दूसरा मृति हुआ शरीर का आँख लगाने से भी लाभ नहीं होगा! स्वप्नों आना इंद्रियाँ का सूक्ष्मलोका प्रकृति का निदर्शन है!
हम लोग शुद्धात्मा का रूप में ही इस भूमि का उप्पर आगया है! परमात्मा हमको ऐसा ही भेजा है! क्रमशः अहम्कारापूरित होकर स्वार्थ विचारों से भावनावों से क्रियायोग ध्यान नहीं करके आलस होकर गपशाप में समय वृथा करता हुआ अपरिशुद्धात्मा बन कर परमात्मा से हम लोग दूर होता जारहा है! परमात्मा का प्रीतिपात्र होने के वास्ते करनेवाला जो भी धर्मबद्ध काम वृथा नहीं जाएगा! हम को जनन मरण वृत्त में नहीं गिराएगा! पिछले जन्म में एक ही मोहल्ला में रहा कर सदा रात और दिन जगढा करनेवाला लोग इस जन्म में एक ही घर में जन्म लेगा और सदा जगढा करते रहेगा! क्यों कि इन लोगों को जगढा करना पसंद करके मन में बीज दृढ़ होगया है! हमको जो जाईदाद व धन पूर्वजों से लभ्य हुआ हमारा साथ एक नया पैसा भी नहीं ले जासकता है! इस बात जानता हुआ भी गरीब लोगों को एक पैसा भी कुछ लोग सहायता नहीं करते है! इस का अर्थ सिक्कावों गल् गल्आवाज इष्ट कर के उस मनुष्य मजबूत से बीज अपना मन् में बोने का का काम खुद किया है! इसी हेतु अगले जन्म में पैसा मांगनेवाला बिखारी जैसा जन्म लेगा! इसीलिये इस प्रपंच से बंधन नहीं होता हुआ मात्र केवल परमात्मा के वास्ते काम्य कर्म करना चाहिए! वह ही असली आनंद है! विद्यार्थियों अच्छी तरह पढके क्रमशः उत्तम स्थिति को पहुंचता है! वैसा ही सहिष्णुता, आत्मनिग्रह, बन्धं नहीं होना, धर्मं और सत्य मार्ग में चलना, निश्शब्द में रहना, नियम प्रकार हर रोज क्रियायोगध्यान करना इत्यादि करना चाहिए! तब परमात्मा प्रेम और आप्यायता का साथ हमको अपनायेगा!
शाश्वत रूप में जन्मों समाप्ति हुआ करके मरण का अर्थ नहीं है! और जन्मों नहीं होगा करके अर्थ नहीं है! उस जन्म में शरीर नाम का बल्ब(Bulb) टूट(break) के उस का अंदर का प्राणशक्ति तात्कालिक रूप में बंद हुआ है! सूक्ष्म और कारण शरीरों दुष्कर्म का साथ जब समायुक्त होता है तब मनुष्य इस भौतिक शरीर त्यग करने को भयभीत होता है! मानसिक व्याकुलता अधिक रूप में अनुभव करेगा! इसी हेतु अचेतानापूर्वक इस शरीर को त्यागेगा! अपना अपना अर्हता का अनुसार स्थूला शरीर को त्यग किया जीवात्मों विविध स्पन्दनायुत प्राणशक्ति प्रांतों में निबिडीकृत होता है! इस शरीर का स्पंदनों विवेकयुक्त पद्धति से होता है! इंद्रियजनित ज्ञान (Sensations)का साथ हुआ इस स्थूलशरीर, शक्ति(Energy body) का साथ हुआ इस सूक्ष्मशरीर(Astral body), भावनावों(Ideas)का साथ हुआ इस कारणशरीर(Causal body), इन सब कुल मिलाके यह मनुष्य है! इस मनुष्य अहंकार यानी मै, मेराका चारों ओर घूमता फिरता है! इन तीन शरीरोम् से मुक्ति ही विमुक्ति है!
भूमि(Earth) का उप्पर जब अपना स्थूलशरीर का बल्ब(Bulb) टूट(break)ने से सूक्ष्म प्रपंच में चलता फिरता रहेगा मनुष्य!तब जीव को वह ही नित्य और सत्य, दूसरा प्रपंच और नहीं है इति द्योतक होजायेगा! आखरी में सूक्ष्म प्रपंच अनुभूतियों भी उस जीव को तृप्ति नहीं देसकेगा! सूक्ष्म प्रपंच का जीव अपना अनुभूतियों को भूमि का उप्पर अनुभव करने का भ्रांति में गिर जायेगा! सूक्ष्मलोक में  अपना पुण्य अनुभव होने का पश्चात् पुनः इस भूमि का उप्पर आने के बाद भूमि का उप्पर जीवन ही सत्य इति जीव को द्योतक होजाएगा! इन स्थूला और सूक्ष्म प्रपंच अनुभवों दोनों को पूर्णरूप में वैराग्य से त्यागना चाहिए! तब नित्य सत्य परमानंद प्राप्ति मिलेगा!
सूक्ष्मलोकवासियों को हम अपना (passive) शक्ति का माध्यम से  बुलासकता और मिल सकता  है! एक वर्ग (type) का दुष्ट आध्यात्मिक और नकारात्मक समाधि(Trance) का माध्यम(Spiritualistic Medium)से  सूक्ष्मलोक वासियों को बुलासकता और मिल(Contact) सकता है! हम अपना (passive) शक्ति का माध्यम से सूक्ष्मलोक वासियों को बुलाना और मिलना खतरा भी और युक्त भी है! क्रियायोगध्यान करके तत पश्चात एकाग्रता का माध्यम से सूक्ष्मलोक वासियों को बुलाना और मिलना आमोदयोग्य और युक्त भी है! नकारात्मक समाधि(Trance) का माध्यम(Spiritualistic Medium)से  मात्र केवल आलसी और प्रयाण में आगे नहीं बड़ा और आत्महत्या कर के प्राण को त्यग किया आत्माए इत्यादि दुष्ट आत्मावों को ही मिल सकता है! ऐसा आत्मावों को आह्वान किया मनुष्य को आवाहन कर के वे कभी कभी शीघ्र गति से छोड़ेगा भी नहीं है! शिष्ट आत्मावों को केवल निष्णात क्रियायोगी ही बुलाना और मिलना करसकता है! साधारण ध्यानपरों का बस का बात नहीं है यह छीज! वह साधक को वैसा आत्मावों को मिलने के लिए इच्छा सहिष्णुता और क्रियायोग ध्यान बल भी होना चाहिए!
तीसरा नेत्र:
तीसरा नेत्र हमारा ललाट में भ्रूमध्य में उपस्थित है! यह एक रेडियो है! इस का माध्यम से ही सूक्ष्म प्रपंच वासियों का साथ बात करने को और उन लोगों को आह्वान करने को साध्य है! हम कभी कभी स्वप्न में अत्यंत प्रिय लोगों को दर्शन करते है! वे स्वप्नों हमारा विचारों ही है! वे हर समय में उस प्रकार का प्रतिबिंबित नहीं होगा! कुछ समयों में अत्यंत प्रियतम लोगों हम को मिलने प्रयत्न करते है! कभी कभी हमारा अत्यंत प्रियतम लोगों पुनर्जन्म पाके विदेशों में रहने से भी हम मिल सकते है, मिलेंगे भी है! उनको सन्देश भी भेज सकेंगे! वे लोग भी हम से सम्भाषण करा सकेंगे! हम अपना तीव्र क्रियायोग ध्यान में स्थूलशरीर त्यग किया लोग फिर किस प्रदेश में जन्म लिया जान सकते है! उन लोगों से संभाषाण भी कर सकते है! ह्रदय कुछ संदेशों को विद्युत अयस्कांत तरंगों का रूप में भेजा में भेजेगा! अपना आलोचनारहिता स्थिति में तीव्रध्यान में भौतिकशरीर त्यग किया लोग एक खिलोने जैसा दिखाई देगा! प्रेम को सन्देश का रूप में तीव्र क्रियायोग ध्यान में अपना प्रियतम आत्मीय सूक्ष्म प्रपंच वासियों को भेज दीजिये! अंतरिक्ष में प्रयाण किया उन संदेशों को उन सूक्ष्म प्रपंच वासियों पायेगा! पुनः समाधान् कुछ न कुछ रूप व उपाय में हमको लभ्य होने को उन सूक्ष्म प्रपंच वासियों प्रयत्न करेगा!
अनुषठान गायत्री, तनाव आराम (Tense & Relax) प्रक्रिया, सोऽहं, और ॐ प्रक्रियॉ कीजिये! माहामुद्र डालिए! 108 क्रियॉ खेचरी का साथ कीजिये! ज्योति/षण्मुख मुद्रा डालिए! तीसरा नेत्र को ललाट में पाइए! उस नेत्र को देखता रहिए! तीसरा नेत्र से दृष्टि अलग मत कीजिये! तीसरा नेत्र का माध्यम से ही संदेशों भेज सकता और पा सकता है! तीसरा नेत्र एक आकाशवाणी प्रसारकेंद्र है! दोनों हाथ सीदा उप्पर कीजिये! उंगलियों का कोनों का उप्पर ध्यान लगाइये! धीमी चाल से उंगलियों को पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण चारों ओर घुमाइए! जहा स्पंदनों अधिकतर है उस दिशा में रुखिए! उस जीवात्मा अभी भी सूक्ष्मलोक में है व जन्म लिया है कर के पूछताछ कीजिये! जन्म लेने से उस प्रदेश पता कीजिये! हे प्रियतम! मेरा नित्य प्रेम को लेलो, मुझे पुनः पुनः मिलोइति सन्देश भेजो! जन्म लेने से भी तीसरा नेत्र का माध्यम से उस(she/he)का सूक्ष्म शरीर साधक का साथ भेटी करा सकेगा! इस भूमि का उप्पर अब उपस्थित माहान आत्माएं(Great Souls) अपना इच्छा का मुताबिक़ सूक्ष्मलोकों को जा भी सकता है और अपना इच्छानुसार संभाषण भी कर सकता है!
क्रियापरावास्थ यानी आलोचनाराहिता स्थिति सूक्ष्मलोकों दर्शन करने को एक आधिकारिक पत्र(Passport) जैसा है! भ्रम भ्रांति और अवचेतानावस्था का सलाहों का(Hallucinations and Subconscious suggestions) व्यत्यास जान कर अधिचेतानावस्था(Super-consciousness)को अभिवृद्धि करना चाहिए!
कर्मसिद्धांत:       
इस स्थूलशरीर के लिए ज्यादा तरह हमही बाध्य है! मनुष्य परमात्मा का प्रतिबिंब है! कुछ लोग परमात्मा का दिव्यलक्षण प्रदर्शन करते है! परमात्मा का दूर होनेवाली लोग दुष्टलक्षण प्रदर्शन करते है! अपना कष्ट नष्टों का  मनुष्य खुद ही बाध्य है! शिष्टाचार मनुष्य को कष्ट नष्टों नहीं आता है, अगर आने से भी उन को सहन करने का शक्ति परमात्मा देता ही है! दुष्ट और शिष्ट लक्षणों अपना किया हुआ कर्मो का आधारित है! प्रस्तुत जन्म में किया हुआ कर्मो हमारा अवचेतन(sub-consciousness) में इकट्ठा (accumulate) होजाता है! पिछले जन्मों में किया हुआ कर्मो हमारा अधिचेतन(super-consciousness)में इकट्ठा(accumulate) होजाता है! अवचेतन व अधिचेतन में इकट्ठा हुआ कर्मो बीजरूप में होता है! मनुष्य अपना भावनों व मोह को पूर्णरूप में नहीं त्यगने तक इन कर्मबीजों इस का पीछे जन्म जन्मों पड़ता रहेगा! इस का अर्थ कर्म करो परंतु फल का उप्पर आशा मत रखो!
इच्छाशक्ति का माध्यम से करनेवाला कर्मो को पुरुषाकार करते है! पुराणा कर्मबीजों का प्रभाव से करनेवाला कर्मो को संस्कारों कहते है! हमारा अंतर्गत प्रकृति को प्रभावित करनेवाला इन् ही संस्कारों है! ग्रहों, जगत, जाती, कुटुंब, आस पड़ोस, ग्रंथों, इत्यादि मनुष्य का बहिर्गत प्रकृति को प्रभावित करता है! तुम्हारा मर्जी व मनमौजी से काम करना युक्त नहीं है! संस्कारों को प्रभावित नहीं होना चाहिए! इन को अधिगमन कर के धर्मबद्ध व धर्मयुक्त काम करना चाहिए! धूम्रपान्(smoking) करनेवाला धूम्रपान् करना बड़ा काम नहीं है! वह उस मनुष्य का स्वभाव है! ऐसा स्वाभाविक धूम्रपानी धूम्रपान् नहीं करना है इति निर्णय लेके त्याग करना महत्वपूर्ण है! इधर उस मनुष्य अपना निज इच्छाशक्ति को उपयोग किया आईटीआई अर्थ है! कर्मसिद्धांत को समझ के पचन किया मनुष्य क्रियायोग साधना का माध्यम से दुष्कर्मों से विमुक्त होजाएगा! तत् पश्चात् सर्वकर्मों को परमात्मा का प्रीतिपात्र होने को करता रहेगा! अपना पात्र को इस भुवि का उप्पर परिपूर्ण रूप में निभायेगा! अपना सगा घर परमात्मा का पास पहुँच जाएगा!
कर्म अनिवार्य है, हम इस से पलायन नहीं करा सकते है, इस को भुगतना ही पडेगा इति कह के व्याकुलन में रहते है! क्रियायोगासाधाना का माध्यम से उस अनिवार्य कर्म को निवारण करा सकता है! कार्य कारण संबंधी है कर्म! न दृष्टं अदृष्टं यानी पिछले कर्म हमारा नेत्र को अगोचर है! उस कर्म का फल ही आज हम सुख व दुःख भुगत रहा है! हम को कुछ बड़ा रकम का लाटरी (lottery) मिलाने का हेतु हम पिछले किया हुआ कर्मा का ही फल है! एक बीज डालने से चार व पाँच दिन में इस का पौधा आयेगा! भार्या भर्ता का मिलन का हेतु संतान पैदाइश के लिए 9 10 मासों लगता है! उंगली को चोट लगाने से रक्त तुरंत आता है! वैसा फल मिलने के लिए हर एक छीज को अपना अपना निर्णीत समय होता है! इस जन्म में जितना भी अच्छे अच्छे काम करने से भी फल नहीं मिल रहे इति चिंताजनक नहीं होना चाहिए! वे भविष्यत में अवश्य फल देगा! कुछ लोग जितना दुष्ट काम करने से भी सुखमय जीवन बिताता है! इस का हेतु पिछले जन्मों का कार्यक्रमों का फल ही हेतु है! आज का दिन में हम को कुछ काम नहीं करने से भी पेन्षन् (Pension) आने का कारण हम पिछले30 40 सालों का सरकारी ही कारण है! मछुआ को मछली का गंध इष्ट है! मछली का गंध नहीं मिलने पर नींद भी नहीं आयेगा!
एक पागल जैसा जन्म लेने का हेतु वह उस का पिछले जन्मों में बहुत लोगों को मनःशांती छीना हुआ दुष्ट कर्म ही कारण है! हम सोने का पहले स्त्री व पुरुष होने से सोने से उठने का पश्चात भी वह ही स्त्री व पुरुष रूप में ही होंगे! मरण एक दीर्घ निद्रा है! उस दीर्घ निद्रा का पहले जो थे वह ही दीर्घ निद्रा का पश्चात भी वह ही होंगे! जैसा बीज बोएगा वैसा ही फल मिलेगा! उस का फल ही इस जीवन है!
100 वर्ष जीवित किया मनुष्य को क्रियायोग ध्यान करने के लिए अधिक समय लभ्य होगा! उस को सद्विनियोग करना चाहिए! वोई  25 वर्ष जीवित किया मनुष्य को क्रियायोग ध्यान करने के लिए अधिक समय लभ्य नहीं होगा! पिछले जन्मों में यह मनुष्य किया हुआ कर्म ही इस अल्पायु का हेतु है! कुछ अच्छा और कुछ बुरी काम किया मनुष्य का अर्थ शरीर स्थूल प्रपंच में और अर्थ शरीर सूक्ष्म प्रपंच में नहीं होगा! परिपूर्णता रूप में शुद्धि नहीं हुआ जीवात्मा परमात्मा में ममैक नहीं होगा! परिपूर्णता रूप में शुद्धि होने तक स्थूल सूक्ष्म प्रपंच वलय में प्रयाण करता रहेगा! जीवात्म सूक्ष्म प्रपंच में पुण्यफल अनुभव करके शेष कर्मफल अनुभव करने के लिए पुनः स्थूल प्रपंच में आविर्भाव होगा! आखरी में अच्छी और बुरी कर्मो दोनों को त्यग कर स्वयं प्रकाशित रहेगा! परमात्मा में ममैक होजाएगा! अच्छी कर्मो स्वर्ण हथकड़ी जैसा और बुरी कर्मो लोहा का हथकड़ी जैसा है! दोनों बंधन ही है! परंतु कर्म करता ही रहना है! फल नहीं मांगना है! विद्यार्थी विद्या अभ्यास करना परंतु अभ्यास का समय में नौकरी मिलेगा या नहीं इति मन में भावना होना उचित नहीं है! विद्या केवल विद्या के लिए अभ्यास करना चाहिए! नीम का बीज बोने से आम का पौधे नहीं आयेगा! वैसा ही हमारा कर्मो का मुताबिक़ फल होता है! रुग्मता आरोग्य  विद्या में सफलता असफलता सुंदरता असुंदरता इत्यादि वंशापाराम्परी(Hereditary) छीज नहीं है! जीवी अपना करम् का अनुसार युक्त योनी को खोजता है!

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