KRIYA

Saturday, 7 March 2015

क्रियायोग –तीसरा आँख part 3

जाग्रतावस्था मे स्थूल मन जागृत होता है! अवचेतना और अधिचेतना (Super conscious) मन दोनों निद्राणस्थिति में होता है! परंतु तीव्र एकाग्रता का माध्यम से अवचेतना और अधिचेतना (Super conscious) मन दोनों दोनों को तीव्रतर/प्रबल(predominant)कर सकता है! व्यापारी लोगों में जाग्रता मन प्रबल(predominant)होता है! साधारण व्यक्तियों में स्थूल मन स्थूलाचेतना को परिमित होता है और मात्र केवल भौतिक विषय वांछों को परिमित रहता है! साधारण व्यक्ति का चेतना एक समय में एक ही चेतना को अनुसरण कर सकता है! जाग्रतावस्था में मन/चेतना व अहंकार मात्र मात्र केवल भौतिक विषय वांछों को परिमित रहता है! अवचेतनावस्था में मन/चेतना व अहंकार मात्र मात्र केवल निद्रा को परिमित रहता है और स्थूलशरीर को पूरीतरह से भूल जाता है! अथात जाग्रत और अधिचेतना मन दोनों निद्राणस्थिति में रहता है! तब भी स्मृति जगता ही रहता है! गेहरा निद्रावस्था में जाग्रता और अवचेतनावस्था मन दोनों निद्राणस्थिति में रहता है! इसी हेतु क्रियायोग साधना नहीं करनेवाला साधारणव्यक्ति अवचेतनावस्था और गेहरा निद्रावस्था दोनों का विषयों को शीघ्र ही भूल् जाएगा! प्राथमिक माध्यमिक और उन्नत विद्याएं सब विद्या का अंग ही है! वैसा ही जाग्रत अवचेतना और अधिचेतना सब श्रीकृष्णचैतन्य का अंगों ही है! क्रियायोग ध्यानसाधाना का माध्यम से उत्तम स्थितिवाला श्रीकृष्णचैतन्य को साध्य करना चाहिए! योगी लोग उत्तम अधिचेतना मन से कार्यकाम करते है!
योगी लोग विविधप्रकार का अवस्थाओं को सृष्टि करा सकते है! उदाहरण के लिए साधारण व्यक्तियों में भी क्रोध आने पर नेत्रों बड़ा होता है और चेहरा क्रोध का प्रदर्शन करेगा! इसी कारण हम चेहरा और नेत्रों को ऐसा रख केक्रोध का प्रदर्शन कर सकता है! निद्रा समय में आँखे नीचे ओर होता है! परिपूर्ण योगी अपना नेत्रों को नीचे ओर कर के शीघ्र ही निद्रावस्था में प्रवेश कर सकता है! जाग्रतावस्था में दोनों आँखें खुला रहता है! परिपूर्ण योगी अपना आँखें खुला रह के दीर्घ काल/समय जाग्रतावस्था में रह सकता है! स्थूलशरीर पतानानंतर और अधिचेतानावस्था में दोनों परिस्थियों में आँखें उपर की ओर खुला हुआ होता/रहता है! परिपूर्ण योगी अपना आँखें उपर की ओर रख के उन अवस्थाएं आसानी से पा सकता है! इसीलिये क्रियायोग साधना का माध्यम से अधिचेतनावस्था को प्राप्त कर के परमानंद को आस्वादन करना चाहिए!
अहंकार/आत्मा/परमात्म
परमात्मा नित्य नित्य नूतन नित्ययौवन नित्य चेतना स्वरूपी और नित्य आनंद स्वरूपी है! सर्वव्यापी सर्व शक्तिमान और सर्वज्ञ है परमात्मा! आत्मा परमात्मा का अंतर्भाग ही है! इसी कारण आत्मा नित्य नित्य नूतन नित्ययौवन नित्य चेतना स्वरूपी नित्य आनंद स्वरूपी और सर्वव्यापी सर्व शक्तिमान सर्वज्ञ है!
समुद्र समिष्टि और समुद्र का पानी का बूंदें व्यष्टि है! परमात्मा समिष्टि और आत्म व्यष्टि है! इन्द्रियों को प्रकाशित करने के लिए परमात्मा शक्ति(Cosmic energy) परमात्मा से व्यष्टि व व्यक्ति का अन्दर प्रवेश करेगा! परमात्म चेतना मानव चेतना में बदलेगा! मानव चेतनायुक्त इन्द्रियों हम को इस मिथ्या प्रपंच को दिखाएगा परंतु परमात्मा को नहीं दिखा सकता है! मानव चेतना को व्यक्ति से परमात्मा का दिशा में बदलने से परमात्मा को प्राप्त करेगा! अहंकार और आत्मा प्राथमिक रूप(Fundamentally) में एक ही है परंतु व्यवहार शैली में अलग अलग है! विद्वान् मनुष्य और मूर्ख मनुष्य दोनों प्राथमिक रूप में एक ही है परंतु व्यवहार शैली में अलग अलग है! दुर्जन भी मनुष्य है और सज्जन भी मनुष्य है परंतु उन का व्यक्तित्व में व्यत्यास है!
मै , मेरा, अपनापन, मेरा संतान, मै स्त्री हु, मै पुरुष हु, मै उत्तम जाती का हु इत्यादि स्वभाव से मुक्त हुआ अहंकार स्वयं प्रकाश से विराजमान होगा! अहंकार मनुष्य को शरीर में परिमित करता है! परमात्मा चेतना अपरिमित और आबद्ध है! परिमिति से शरीर से बांधा हुआ मानवचेतना को क्रियायोग साधना से परमात्मा चेतना में परिवर्तन(transformation) करना ही मानव लक्ष्य है!
आत्मसाक्षात्कार साध्य किया साधक का चेतना परमात्मचेतना स्थिति का चारों ओर घूमता है! उस स्थिति में चक्रों का गॉठ टूटेगा और साधक मुक्त हो जाएगा!
चक्रों का गॉठ आत्मा को शरीर में परिमित करेगा! इस परिमित चेतना को मेरुदंड से विमुक्ति करना है! उप श्रीकृष्णचैतन्य(Semi Sri krishna Consciousness)में सृष्टि में और सृष्टि का अतीत में भी साधक आनंद प्राप्ती का अनुभव करेगा! श्रीकृष्णचैतन्य(Sri krishna Consciousness)में स्वयं का अस्तित्व का अनुभव सृष्टि में और हर एक अणु में मैहु इति स्थिरभावना साधक प्राप्त करेगा! परमात्मचैतन्य(Cosmic Consciousness) में स्वयं ही सृष्टि में, सृष्टि का अतीत में और हर एक अणु में मैहु इति स्थिर भावना साधक प्राप्त करेगा! ऐसा भावना असमान्य है! हम कभी भी अचेतना में नहीं होते है! हम सो सकते है, विश्रांति कर सकते है, परंतु चेतना हमेशा जागृत में ही रहेगा! इस का कारण हम शरीर नहीं, चेतना स्वरूपी है! मै  खा रहा हु, लिख रहा हु, सो रहा हु, धौड रहा हु, इन सब मैका आधार जो मैहै उस मैही नित्य है और वह मैही आत्मा है! निद्रा में हम चेतना को खो बैठने से, जागने के पश्चात हम सोया हैइति वार्ता देनेवाला यह आत्मचेतना ही है!
स्थितियों
1)परमात्मचेतना(Cosmic Consciousness)यह सर्वोत्तमस्थिति है! इस सृष्टि में सृष्टि का अतीत में और हर एक अणु में मैउपस्थित हु इति स्थिरभावना स्थिति है यह! हमारा सर्वव्यापकस्थिति द्योतक होता है! इसी को सत् व पिता (Father)कहते है!       
2)श्रीकृष्णचैतन्य(Srikrishna Consciousness)व कूटस्थचैतन्ययह परमात्मचेतना का अवरोहणाक्रम में(Descending)नीचे कदम है! इस स्थिति में सृष्टि में और हर एक अणु में मैउपस्थित हु इति स्थिरभावना स्थिति है यह!  
3)उपश्रीक्रुश्नाचैतन्य(Semi Sri krishna Consciousness) यह श्रीकृष्ण चैतन्य व कूटस्थचैतन्य का अवरोहणाक्रम में(Descending)नीचे कदम है! इस स्थिति में सृष्टि में और सृष्टि का अतीत में आनंद प्राप्ति अनुभव करेगा! परंतु श्रीकृष्णचैतन्य में जैसा सृष्टि में और हर एक अणु में मैउपस्थित हु इति स्थिरभावना नहीं होता है इस स्थिति में!    
4)आत्मचेतना(Soul Consciousness)— यह उप श्रीकृष्ण चैतन्य व कूटस्थ चैतन्य का अवरोहणाक्रम में(Descending)नीचे कदम है! परमात्मचेतना पहली बार व प्राथामिका दशा में शरीराचेतना को परिमित हुआ इन्द्रियों का अतीत हुआ चेतना को आत्मा(Soul)कहते है! यह इंद्रियातीत है! यह क्रमशः उप श्रीकृष्ण चैतन्य अधिचेतना (Super Consciousness) उप अधिचेतना(Semi Super Consciousness)का रूप में नीचे आता है!  
5)अहंकार(Body Consciousness)(Ego) यह उप अधिचेतना का अवरोहणाक्रम में(Descending)नीचे कदम है! परमात्मा चेतना(Cosmic Consciousness) पहली बार व प्राथमिक दशा में शरीर को परिमित हुआ चेतना को जीवात्मा कहते है! यह क्रमशः उप श्रीकृष्ण चैतन्य अधिचेतना (Super Consciousness) उप अधिचेतना(Semi Super Consciousness) शरीर को परिमित हुआ चेतना जीवात्मा का रूप में नीचे आता है! यहाँ अहंकार(Ego) का रूप में बदला जाता है! यहाँ से अवचेतना रूप(Sub consciousness) में बदला जाता है! अहंकार क्रमशः उप अवचेतना(Semi Sub consciousness), जाग्रता चेतना (conscious ness), और इन्द्रिय चेतना(Attachment to Senses) में बदला जाता है!
क्रियायोगासाधना
माया से हमारा इन्द्रियों आवृत हुआ है!इस माया से हम मुक्त होना है! झुका(Bent)/मुडा हुआ और सीदा नहीं हुआ मेरुदंड से साधना नहीं कर सकते है! हर एक मनुष्य क्रियायोग साधना करना चाहिए! आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करना चाहिए! हमारा बंद(Closed) आँखों का अंधेरा का पीछे परमात्मा का प्रकाश है! क्रियायोग साधना का माध्यम से साधक अपना चेतना को विस्तार करेगा! इस के लिए शरीर त्याग जरने का अवसर नहीं है! इस विस्तार हुआ चेतना में शरीर को भागस्वामी करना चाहिए! साधक आकाश अंतरिक्ष अन्यो का भावनावों का अनुभव करना चाहिए! एक पशु का जन्म हुआ, हमारा भी जन्म हुआ, ऐसा करके जीना नहीं चाहिए! क्रमशिक्षणा से नियमानुसार हर एक दिन प्रातः और संध्या दोनों समाया में क्रियायोग ध्यान करना चाहिए! मनस् इन्द्रियों का दास नहीं होना चाहिए! मनस् इन्द्रियों दोनों को नियंत्रण करना चाहिए! दृष्टि कूटस्थ में निश्चल करना चाहिए! हृदय को चेतनापूर्वक निश्चल करना चाहिए!
श्वास निश्चल करना चाहिए! ये सब साधक परमात्मा का नर्दिक जाने का सूचनाएं है! अंधा दूसरा अंधा को मार्ग दिखा नहीं सकता है! निष्णात हुआ क्रियायोगी का साहचर्य से ठीक साधना करना चाहिए!
अवचेतना मन चेतना मन को आँख बंद कर(blindly) के अनुसरण करेगा! हमारा चेतना मन सही नहीं होने पर अवचेतना मन भी सही नहीं होगा! सही नहीं हुआ अवचेतना मन चेतना मन को युक्तायुकता विचक्षणाज्ञान नष्ट करेगा! इसी कारण हम अपना चेतना मन को सुशिक्षित करना चाहिए! तत् द्वारा अवचेतना मन अपना विचक्षणाज्ञान खो नहीं बैठेगा! चेतना मन को सही रास्ता में चलाएगा! अवचेतना मन यांत्रिक (Automatic/default)है! वहचेतना मन का अनुभवों/अनुभूतों को बिलकुल नहीं भूलेगा और पूर्णरूप में पुनरावृत्ति करेगा! अवचेतना मन नहीं होने से हम हर एक दिन नया प्रारम्भ करनी होगी! मनुष्य कुछ भी प्रगति(Development)नहीं होगी! इसी हेतु अवचेतना मन में आलसीपन क्रमशिक्षणाराहित्यता अमर्यादा अतिभाषण आलस्य ध्यान नहीं करना इत्यादि बुरा आदतों का जगह नहीं देना चाहिए! उन बुरा आदतों पुनः हमकों हमारा चेतना मन द्वारा नाश करेगा!
चेतना स्थिति में मन चंचल रहता है! श्वास ह्रदय इन्द्रिय विषयों इत्यादि का उपर मन लग्न होता है! अवचेतना स्थिति में अपना प्रपंच को अपने आप ही सृष्टि कर सकते हो! अधिचेतना स्थिति में मन निश्चल स्थिति में रहता है! आँखों चंचल नहीं होगा, निश्चल रहेगा, श्वास स्थिर होगा! निद्रा में परमात्मा तुम को अनंत बनाएगा!
निद्रा में तुम्हारा शरीर का भार जाती कुल लिंग इत्यादि सब भूल जावोगे! निद्रा से जागने का पश्चात इस चेतना प्रपंच में पुनः कदम रखोगे! नेत्र तुम्हारा स्थिति स्पष्ट करेगा! तुम्हारा मन का मुताबिक़ तुम्हारा नेत्रों का चाल होगा! चेतना स्थिति में आँखें खुला रहेगा! चेतना स्थिति में आँखें खुला रहेगा! अवचेतना स्थिति में आँखें नीचे की ओर बंद रहेगा! अधिचेतना स्थिति में आँखें की उपर की ओर खुला रहेगा! इन तीनों स्थतियों तुम्हारा अधीन में होना अद्भुत है! तुम्हारा इच्छा का अनुसार नेत्रों खोल के चेतना स्थिति में रहो व नीचे की ओर बंद स्थिति में रख के निद्रावस्था/स्वप्नावस्था/अवचेतना स्थिति में रहो, तब इस प्रपंच को भूल सकते हो, व नेत्रों को उपर की ओर खुला रख के अधिचेतना स्थिति में रहो तब अवचेतना अधिचेतना स्थितियों दोनों को भूल सकते हो क्योंकि तब परमात्मा का रम्य कर सकते हो!  
माया
मा= नहीं या=यदार्ध, माया का अर्थ यदार्ध नहीं है! पदार्ध कभी भी यदार्ध नहीं है! परमात्मा सदा आनंदस्वरूप है! वह अपना आनंदतत्व द्वारा माया को सृष्टि किया! माया परमात्मा का अंतर्भाग है! समिष्टि में माया को ही व्यष्टि में कुंडलिनी कहते है! ‘मै कौन है पता करदो’ कहते थे भगवान रमण महर्षि! ‘तुम्हारा अन्दर उपस्थित कुंडलिनी को जागृति करो! तुम अपना अन्दर का व्यष्टि माया को ग्रहण कर सकोगे तब समिष्टि माया को ग्रहण कर सकेगा’ इति इस का अर्थ है!
एक पानी का बूँद में हैड्रोजन(Hydrogen) और आक्सीजन(Oxygen) है कर के जानने से पूरा समुद्र का पानी में भी वह ही हैड्रोजन(Hydrogen) और आक्सीजन(Oxygen) है कर के जानेगा! ‘हम परमात्मा का भाग है परमात्मा हमारे में है, हम और परमात्मा एक ही’ इति ग्रहण करने से इस माया हमको कुछ नहीं कर पायेगा!
भयंकर स्वप्ना स्वप्नाके भौतिक नेत्रों खोलने से उस स्वप्ना अदृश्य होता है! ‘कूटस्थ में रहता हु’(द्वामिवौ पुरुषौ लोके क्षराक्षरमेव च, क्षराःसर्वभूतानि अक्षरः कूटस्थमित्युच्यते’—गीतावाक्य)इति भगवान स्वयं ही कहा है! इसी कारण कूटस्थ स्थित परमात्मा का नेत्र(तीसरा आँख)खोलने से परमात्मा का इस स्वप्ना/लीला हम आसानी से ग्रहण करा सकते है!
‘बुरा कर के कोई भी चीज नही है’ इति कुछ लोग कहते है! वह सही नहीं है!
‘सब मन का विकल्प ही है, शरीर मिथ्या है’ इति कहने से नहीं चलेगा! हर एक सुन्दर और आनंदमयी अनुभव का पीछे दुःखपूरित अनुभव निश्चय होगा!
अच्छा बुरा हम ने सृष्टि नहीं किया! असूया द्वेष क्रोध लोभ इत्यादि सब हमारा सृष्टि नहीं है! हम ही अनुसरण कर के पीड़ा अनुभव करते है! इन चीजों को अनुभव करने का पश्चात विवेक पाकर बुरा और बुरा पद्धतियों को अनुसरण करना पूरीतरह त्यग के अच्छी मार्ग को अनुसरण करते है!
भौतिक विषयों विषयवांछों स्वच्छंदरूप में परिपूर्ण रूप में विसर्जन करना ही स्वच्छता परिपूर्णता और शुद्धता है! माया को परमात्मा एक पल में नाश/निर्मूलन कर सकता है! जिस न्याय सिद्धांतकर्ता(law maker)ने न्यायासूत्रों(Laws)को प्रवेश करवाया स्वयं ही उनसूत्रों(Laws)को अतिक्रमण नहीं कर सकते! उसी प्रकार जिस परमात्मा ने मात्र लीला व माया को स्वयं प्रवेश करवाया भगवान उसी लीला का नाश करेंगे! प्रेम कितना बलवत्तर है  परमात्मा को पता है! उस प्रेम से ही प्रेमी लोगों को अपना तरफ आकर्षित करता है! इतना ही नहीं, उन लोगों का अन्दर का माया को भी अपने मी विलीन करता है क्योंकि परमात्मा के प्रेम करनेवाला लोगों को माया से काम नहीं है! परमात्मा का उपर प्रेम बुरा को नाश करता है! असूया द्वेष क्रोध लोभ इत्यादि हम में उत्पन्न होने पर ये सब माया का जाल इति तुरंत  समझ के इन सब से मुक्त होने के लिए उपक्रमण करना चाहिए! क्रियायोग साधना तीव्रतर करना चाहिए!
मुझ को कुछ भी रोग आने से मेरा क्रियायोग साधना तीव्रतर करता हु! मुझे  शिर का पीछे(10/03/2014)(Medulla centre)एक क्रिकेट(Cricket ball)गेंद जितना एक फोड़ा हुआ था! उस का दोनों ओर और दो क्रिकेट(Cricket ball)गेंद जितना फोड़ें हुये थे! इन तीनों फोड़ें अंदर ही अंदर चर्म का नीचे हुए थे बाहर नहीं दिखाई दे रहे थे! इन्ही को कार्बंकुल(Carbuncle) कहता है कर के बाद में पता लग गया! वे सब मुझ को प्राणापाय स्थिती में ले आया था! शब्द इति आखरी इंद्रिय नाश होने तक साधक अपना इच्छाशक्ति को उपयोग करके संपूर्ण कृषि से पुनः आरोग्यवान हो सकता है! ऐसा मेरा प्रिय गुरुदेव श्री परमहंस योगानंद कहते थे और उद्बोधन कृते थे! धैर्य और पूर्ण विश्वास से मेदुल्लासेंटर(Medulla centre)में तनाव(Tense) डाल के मै साधना करता था! क्रमशः(17/04/2014)पूरा स्वस्थता मिलगया था! मुझे केवल वह प्रक्रिया का द्वारा मिलनेवाला प्राणशक्ति ही मेरा स्वास्थता का वापस लाया था!
प्राणशक्ति शिवा कोई भी चीज हम को बचा नहीं सकता है! एक अंगुली को हिलाने के लिए कारण प्राणशक्ती ही है! साधारण तौर पर हम को रोग आने से प्राणशक्ती का उपर विश्वास खो बैठना और उस का अद्भुत मूल्य को विस्मरण करना ही हमारा बड़ा गलती है! प्राणशक्ति को पक्षवात (Paralysis)करवाना ही दीर्घकाल रुग्मता(Chronic disease) का कारण ही! उस अविह्वास का हेतु प्राणशक्ति आनेवाला मार्ग बंद हो जाता है!
हवा बाहर होने से उस को वायु कहते है! उस हवा/वायु शरीर का अंदर होने से उसी को आयु कहते है! हमारा शरीर का बाहर अधिकाधिक वोल्ट (Volts) का प्राणशक्ति संचरण करता है! इस बाहरसंचरण करनेवाला प्राणशक्ति का साथ दो प्रकार का संबंध हम रख सकते है! एक ऊहा (Imagination)व यांत्रिक सूचना(Auto suggestion) दूसरा इच्छाशक्ति!
परमात्मा अपना शक्ति से हमारा शरीर और जगत का अंदर का अणुओं को जोडके रखता है! हम चेतना का माध्यम से हमारा इच्छाशक्ति को वृद्धि कर के परमात्मा अपना शक्ति से अनुसंधान करना चाहिए! एक पानी का जहाज (Ship)रेडियो(Radio)का माध्यम से जैसा चलाएंगे वैसा ही परमात्म मेडुलाआबलम्बगेटा द्वारा प्राणशक्ति को भेज के हमारा शरीरों को चलाता है! प्राणशक्ति और चेतना को शरीर का साथ जोड़नेवाला इच्छाशक्ती ही है! सैकड़ों वर्ष का जितना प्राणशक्ति अवसर है उतना हमारा शरीर में है! परंतु स्वल्प रुग्मता होने से भी हम इस महत्वपूर्ण प्राणशक्ति का उपर विश्वास नहीं रखते है! इसी कारण हमको समस्यों आता है! ‘मै थक गया हु’ इति कहने से चेतना व मन तुरंत बलहीन होता है! ‘हां इस रोग का साथ आया हुवा शारीरक पीड़ा मै सहन नहीं कर सकता, इस से मरण ही श्रेष्ट है’ इति भावना करता है! तब मनुष्य मरा हुआ का समान है, वह मनुष्य मरेगा भी है! इसी कारण इच्छाशक्ति से बढ़कर कुछ भी नहीं है! ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं है! इस सर्व जगत परमात्मा का इच्छाशक्ति से ही व्यक्तीकरण हुआ है!
बुद्ध प्रतिज्ञ
इस वटवृक्ष का नीचे पवित्र प्रदेश में बैठ के मै प्रतिज्ञा कर रहा हु—‘जीवन का लक्ष्य क्या है’ जानने तक, आत्मसाक्षात्कार प्राप्त होने तक, मेरा हड्डियां सुख के पिघलने से भी, इस स्थिरासन से नहीं उठूंगा! ऐसा इच्छाशक्ति से प्रतिज्ञ किया गौतम बुद्ध में बदल गया! ऐसा इच्छाशक्ति ही परमात्मशक्ति!
आवेश(Temptation):
आवेश अच्छा भी हो सकता बुरा भी होसकता है! मनुष्य क्षणिकावेश का वश होकर जीवन नहीं बिताना चाहिए! शांति से शोचा कर कार्य करना चाहिए! आवेश आना दोष नहीं है, परंतु उस को हमारा वश में रखना चाहिए! आवेश को तुम दास नहीं बनना चाहिए! आवेश हमारा दास बनना चाहिए! अदृष्ट कर के कोई भी चीज नहीं है! इस जगत पूरा कार्य कारण संभूत है! हर एक कार्य का पीछे कारण अवश्य होगा! हम जो भी कार्य करा रहे है उस का कारण गतम् में हम कियाहुआ कार्य ही कारण है! अथात पुराणा कर्मा ही वर्त्तमान मनःस्थिति का कारण है! अब का मनःस्थिति हम को सुख दिलाने से भी दुःख दिलाने से भी उस का कारण गतम् में हम कियाहुआ कार्य/कर्मा ही कारण है! सुख व दुःख कुछ मिनट दिन महीने वर्षो तक हो सकता इन सब कर्मों का फल ही है और वे इस जन्म का हो सकता नहीं तो पिछले जन्मों का हो सकता है! मेरा जान पहचान की लड़की जिसने एं बि ए(M.B.A)पढा था उस को एक युवा वेद पंडित ने उस का माता पिता का सामने शादी का प्रस्ताव रखा था! इस संदर्भ में उस लड़की गर्व से ‘तुम कहा और मै कहा, ऐसी प्रस्ताव लाने के लिए तुम्हारा हिम्मत कैसा हुआ, मै ऐसा पुरोहित लड़का से विवाह नहीं करूंगी’ इति  दुर्भाष और परिहास करता हुआ कहा था! वह लड़की भी एक पुरोहित का ही लड़की थी! घायल हुआ मन से उस युवा वेदपंडित मेरा पास आने से उस को सांत्वना देके भेजदिया था! बाद में उस गर्वित M.B.A लड़की को एक साफ्टवेयर (soft wear)इंजीनियर से विवाह हुआ था! वह इंजीनियर (Engineer) दुरहंकार(Sadist) और गर्वित व्यक्ती है! अब दोनों अलग (Divorce)होगये! उस युवा वेदपंडित को उस लड़की से हुआ अपमान ही उस लड़की का इस प्रस्तुत दुरवस्था की कारण है!  
परमात्मा पक्षपाती नहीं है! वह एक को अच्छी जीवन दूसरी को बुरा जीवन प्रसादित नही करता है! पूर्वजन्म कृतं पापं व्याधिरूपेन पीडितं! As you sow so you reap. हम गत जन्मों में किया हुआ स्वयंकृत अपराध ही इस जन्म में रोग, दरिद्रता, मानसिक दुःख, शारीरक पीड़ा इत्यादि दुर्घटना/दुस्तिथियों का हेतु है! हम गत जन्मों में किया हुआ स्वयंकृत अच्छा कर्मा ही इस जन्म में हमारा प्रस्तुत अच्छी स्थिति का हेतु है!
क्रियायोग साधना का माध्यम से गत जन्मों का कर्मों को दग्ध करना चाहिए! पुराणा कर्मों हमारा जीवन को शासन नहीं करना चाहिए! ‘अहम् अमृतस्य पुत्रः’यह बुलाना नहीं चाहिए! ‘मै अच्छा कर्मा ही करूंगा’ ऐसा दृढ़ता से निर्णय करना चाहिए! बीच बीच में ठोकर खाने पर दिशा बदलने से भी अपना दृढ़ निर्णय से अतिरिक्त नहीं जाना चाहिए! ऐसा निर्णय लेके आगे बढ़ने से मनुष्य पापी नही बनेगा!
आश(Hope)विश्वास (Faith)और प्रेम:
परमात्मा का अनुसंधान करने के लिए बहुत सारे जन्मों अँधेरा रास्ता में प्रयाण करने आत्मा को रोशनी देनेवाला नित्य प्रकाश है आश! मनुष्य के  आत्मावबोध द्वारा जन्म लेनेवाला आशा है! वह आत्मावबोध हम को भूला हुआ परमात्मा को याद दिलाएगा! आशा को सही मार्ग में उपयोग कर के परमात्मान्वेषण के लिए क्रियायोग साधना करने से विश्वास अथात आत्मावाबोध वृद्धि होता है! विश्वास के लिए साक्षी और आधारों का आवश्यकता नहीं है! इस काम निश्चय होगा इति अपार विश्वास अपार विश्वास होना चाहिए! परमात्मा का शक्ति और अपना इच्छाशक्ति का उपर अपार विश्वास होना चाहिए! विश्वास का नीचे कदम है भरोसा(Belief)! यह सत्य हो सकता नहीं भी हो सकता है! अथात भरोसा(Belief) सत्य परिक्षा का सामने समर्थ हो सकता नहीं भी हो सकता है! परंतु अपना भरोसा(Belief) को सत्य परिक्षा का सामने खडा करवाके तोलना और उस विषय का यदार्ध रूप क्या है जानना आवश्यक है! तब वह निर्माणात्मक(Constructive) भरोसा होता है! साधक निरंतर क्रियायोग साधना द्वारा अपना अंदर का आत्मावाबोधा विश्वास को पुनः प्राप्त करेगा! तब और अधिक स्वार्थपर होगा!
भागवत साम्राज्य को स्वयं ही अनुभव करना और अन्य लोगों को लभ्य नहीं होना चाहिए इति अभिलाषी होता है! दया का वजह से प्रेम उत्पन्न होता है! परमात्मा नित्य चेतनास्वरूपी और सर्वव्यापी है! इस का वजह से दया उत्पन्न होता है! उत्कृष्ट दशा प्राप्त किया साधक अपना चेतना को अन्यों को लिए व्याप्त/प्राप्त कर सकता है! उन अन्यों का परिमितों, पीड़ादायक चीजों को अनुभव और समझ कर सकता है! तब अन्यों का सहायता करने का तपन प्रारम्भ होता है! इसी कारण मै भागवत साम्राज्य का सब को अनुभवैकवेद्य होना इति संकल्प से क्रियायोग ध्यानमंदिर को निर्माण किया और योग पिपासियों सब को क्रियायोग शिक्षण दे रहा हु!
‘तुम्हारा हाथ का उपर तीन बार ॐ लिखो, उस को देखते हुए पानी का उपर चल सकते हो’ एक पंडित ने एक मछुआ को कदापि कहा था! ‘ आप का कृपा से पानी का उपर चल सकता हु, बड़ा बड़ा मछलियां भी पकड़ रहा हु’ इति उस मछुआ ने पंडित को कहा था! उस तरीका बोलनेवाला पंडित ऐसा अपना हाथ का उपर ॐ लिख कर पानी का उपर चला नही सका था! केवल अपना उपर विश्वास नहीं होना ही इस का हेतु है!
चेतना, स्पंदनों
परमात्मा अपने आप को नित्य स्पंदनारूप में शुद्ध ज्ञान रूप में शांति स्वरुप में आनंदस्वरूप में व्यक्तीकरण किया है! पशु, पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु, आकाश, अंतरिक्ष, मनुष्य, चेतना इत्यादि सब जगत में विविधप्रकार का स्पंदनों ही है! घन वायु द्रव सब जगत में विविधप्रकार का स्पंदनों ही है! हर एक स्पंदन में व्यत्यास हो सकता है! चेतना का अर्थ बुद्धिमान विविधप्रकार का स्पंदनों का तेज ही है!
विविधप्रकारों का तेज एलक्ट्रानों(Electrons) का स्पंदनों का सम्मेळन ही   पदार्थ है! विविधप्रकारों का चेतानापूर्वक परमात्मा शक्ति का प्रतिरूप ही एलक्ट्रानों है! परमात्मा का शक्ति ही स्पन्दनावृत परमात्मा का मेधा है! स्पन्दनावृत मेधा शक्ति ही पदार्थ का अन्दर का परमात्मा है! मनुष्य का मन का अंदर स्पन्दनावृत मेधा का रूप में परमात्मा अपने आप को व्यक्तीकरण करता है! निर्धारित दिशा में प्रगति करना ही स्पन्दना है! युक्त चेतना का माध्यम से उस स्पंदनाशक्ति अपने आप को इस जगत में जीवित करने के अनुकूल पद्धति समायोजन करता है! स्पंदनायें समझदार है! ऐसा नहीं होने से यह जगत विवेकहीन मिट्टी का गोला, वायु अथवा जल रूप में निवासयोग्य रहित  होगा! इतना सुंदर फूल, फल, पशु, पक्षी, नदियों, समुद्र, आखरी में इन मनुष्यों इत्यादियों का अस्तित्व नहीं होता है! परमात्मा का असमान अत्यद्भुत मेधायुत शक्ती ही इस जगत को चला रहा है! इसी कारण उस परमात्मा सत्यं(सत्य स्वरूपी) शिवम् (मंगळस्वरूप—प्राणशक्ति प्रदाता) सुंदरं(सुंदर) है! माया प्रभावित द्वंद्वों—भूक आहार, रोग आरोग्य, ज्ञान अज्ञान, दरिद्रता ऐश्वर्य, अंधेरा रोशनी, मरणं जननं, नकारात्मक सकारात्मक शक्तियों—इत्यादि द्वंद्वों सब परमात्मा का अंतर्भाग है! इन सब द्वंद्वों से  हम प्राभावित होके तंग होते है! परंतु उस परमात्मा का सृष्टि अनंत असमान्य और अत्यद्भुत है!
परमात्म को तुम्हारा अंदर प्रतिष्ठित करो! खानेवाला परमात्मा है और भोजन परमात्मा है! हर एक कार्य परमात्मा के लिए करो! आज का फलं परमात्मा  और कल का मलं भी परमात्मा है! सौ फीसदी परमात्मा के लिए मनसा वाचा कर्मणा त्रिकरणशुद्धि से कार्य करना अभ्यास करो! तब सर्वं उस परमात्मा का लीला इति सुस्पष्ट रीती में ग्रहण करोगे! शायद यादव नाम का मनुष्य आध्यात्मिक अत्युत्तम श्रीकृष्ण स्थिति को पहुँच गया होगा! चारित्रात्मक श्रीकृष्ण का आवश्यकता नहीं है! चरित्र मत पूछो, श्रीकृष्ण ने जो सत्य मार्ग का दिशा निर्देशन किया उस को अनुसरण करो और पालन करो!
मनस्
‘मै और मेरा ही पद्धतियॉ ही सही(Dogmatism)है’ यह सिद्धांत मनुष्य को आगे बढ़ने नहीं देता! गिद्ध(Vulture) भयंकर तरीके से चिल्लाता है! उसकी दृष्टि और मन सब खानेवाले मांस का उपर ही होता है! ‘मै ही बुद्धिमान हु और बुद्धिमत्तापूर्वक संभाषण कर रहा हु’ ऐसा सोचनेवाला का मन अपना भावों का उपर होने से भी उस का चेतना हमेशा अपना शरीर और शरीर संबंधित इंद्रिय विषयों का उपर ही घूमेगा! प्रापंचिक विषयों का मोह उस को भौतिक शारीरक व्यामोह का दिशा में आकर्षित करेगा! प्रापंचिक विषयों का मोह और इंद्रिय विषयों का आनंद अनुभव होने का पश्चात अपना मन को शांति का उपर केंद्रीकृत करना आवश्यक है! मन का भौतिक पर्दा निकलने का पश्चात स्थूल शरीर इंद्रिय संबंधित विषय आलोचनायें दूर होजायेगा! तब आत्मा का मूल्य साधक को विशद होजायेगा! शांति का अर्थ शारीरक और मानसिक आलसीपन नहीं है! अविद्य अंधकार जैसा है! दैव साम्राज्य प्रकाश जैसा है! अविद्य अंधकार से दैव साम्राज्य प्रकाश में प्रवेश करने के लिए हमारा शारीरक और मानसिक आलसीपन को समूल विनाश करना चाहिए! परमात्मा का एक क्षण का आलसीपन से इन ग्रहों सारे एक दूसरे को टकराके टूट के तितर-बितर होजायेगा! उस परमात्मा का सॉचे (Mould) में बनाया हुआ हम को आलसीपन बिलकुल नहीं होना चाहिए! हर पल हर समय परमात्मा का आलोचनायें का साथ ममैक होना, उस के लिए जीना सीखना चाहिए! उस के लिए मरना भी अभ्यास करना चाहिए! तुम सोजावो परंतु परमात्मा चेतना का साथ सोजावो! तब जीवन में एक क्षण भी वृथा नहीं जाएगा, हर पल हर क्षण कीमती होजायेगा!
इच्छाशक्ति का माध्यम से शारीरक स्पंदनों(Motions)को बंद करना चाहिए! स्थूल शारीरक स्पंदन आध्यात्मिक विचारों को बंद करता है! सृष्टि का अर्थ ही स्पंदन है! स्वप्नों का पीछे स्पंदनारहित मनुष्य है! वैसा ही इस स्पंदनासहित सृष्टि का पीछे स्पंदनारहित परमात्मा है!
तुम चुप चाप बैठने से भी तुम्हारे विचार तुम्हारे स्पंदनों को स्तब्ध नहीं कर सकता! जब अपने प्राणशक्ति को उपसंहरण करने से ही तुम्हारा आलोचनायें को बंद कर सकते हैं! स्थूलशारीर संपूर्ण शक्ति और चेतना दोनों को मेरुदंड में उपसंहरण करना हमारा प्रथम कर्त्तव्य है! इस के लिए शरीर में पूरा तनाव(tense) डाल के पुनः ढीला(relax) करना चाहिए! ऐसा 4 5 बार करना चाहिए! मानव शरीर चेतना और पदार्थ दोनों का गॉठ ही मानव शरीर है! शुद्धात्मा को शरीर से मुक्ति कराने के लिए प्रथम में झिल्लीयों का शक्ति गॉठ यानी शरीरचेतना को अलग करना चाहिए! हम जब कूदते है उस समय हम शरीर का भारीपन महसूस करने का कारण शक्ति और चेतना ही है! संपूर्ण आरोग्य स्थिति में लेटा हुआ ध्यान नहीं करना! आदत से मजबूर होकर शरीर निद्रावस्था में जाएगा! बैठ के ध्यान करना! झिल्लीयों से विमुक्ति हुआ प्राणशक्ति और चेतना मेरुदंड में उपसंहरण किया जाएगा और दिव्यशक्ति लभ्य होजायेगा! शरीर संतुलन में रहेगा! निश्चल रहेगा! इस पागल दुनिया में जब तक स्वस्थिती में नहीं रहेगा तब तक साफल्यता नहीं मिलेगा! समूह में होने से भी अकेलापन महसूस करना सीखो! तुम्हारा नैतिक धर्मो को शांति और चंचलारहित निर्द्वन्द्वता से निर्वर्त करना सीखो! आध्यात्मिकता अभिवृद्धि करो!
शिर को टेन्स(TENSE) करो, रिलाक्स(relax) करो! नेत्रों बंद करो! मुह (Face) टेन्स(TENSE) करो, रिलाक्स(relax) करो! जांघ टेन्स(TENSE) करो, रिलाक्स(relax) करो! टॉंग टेन्स(TENSE) करो, रिलाक्स(relax) करो!
नाभि का उपर का नाभि का नीचे का जगह टेन्स(TENSE) करो, रिलाक्स(relax) करो! अब श्वास को धीरे से दीर्घकाल अन्दर खींचो! धीरे से दीर्घकाल बाहर छोड़ देना! अब ध्यान करना!
दर्शन(Visions, स्वप्ना
इच्छाशक्ति से चेतना और प्राणशक्ति को स्थूल शरीर से उपसंहरण करने का तुरंत साधक अवचेतनावस्था में प्रवेश करेगा! तब स्वप्न (Dream) भ्रम(Hallucinations) निद्रा में चलना(Somnambulism) विविध प्रकार का मानसिक स्थतियों(mental stages) अधिचेतना स्थिति(super conscious) का स्वप्न जाग्रता चेतना का उत्प्रेरण से होने स्वप्न इत्यादि का अनुभव करेगा!

दर्शन(Visions) अलग चीज है! आत्म अपना आत्मज्ञान(Intuition)को अवचेतानावस्था में शारीरक कार्यो(Activities) के लिए विनियोग करनेवाला प्राणशक्ति का साथ मिल के सत्य दार्शानों को अवचेतना पर्दा का उपर दिखादेगा!
आत्मा अपना आत्मज्ञान से भविष्यत् में होनेवाला संघटनों को दर्शनों द्वारा सूचना करा सकता है! इस के लिए आवश्यक शक्ति को साधक अपना ह्रदय से और जाग्रतावस्था से छोड़ना चाहिए! निद्रा झिल्लीयों को विश्रांति देगा! अहंकार और कुछ गत अनुभवों का वजह से अवचेतनावस्था मन स्वप्न सृष्टि कर सकता है!
प्राणशक्ति
प्राणशक्ति बहुत शक्तिवंत है! सर्व इन्द्रियों का शक्ति प्रदाता प्राणशक्ति ही है! विद्युत्शक्ति एक बल्ब का सृष्टि नहीं कर सकता है! परंतु पुरुष शुक्ल(Sperm)का प्राणशक्ति स्त्री शोणित का(Ovum) साथ मिलके मानव शरीर का सृष्टि कर सकता है! प्राणशक्ति सर्वेंद्रियों का स्पंदनों का मूल कारण है! हम एक पत्थर का आहार के लिए उपयोग नहीं कर सकता है! परंतु उस पत्थर का कुछ पदार्थों (Elements) हमारा खानेवाला पदार्थों मे दिखाईदेगा! परंतु उस पत्थर का पदार्थों और शरीर पदार्थों का स्पंदनों में अंतर है और सहवर्तनीयता(Compatibility) नहीं है! सब्जी पानी वायु इन का स्पंदनों में और शरीर का स्पंदनों में सहवर्तनीयता(Compatibility) होगा! परंतु उन का किरणे(Rays) को मानव शरीर शीघ्ररीती में अपने में तल्लीन(Absorb) करेगा!

प्राणशक्ति का प्रप्रथम व्यक्तीकरण(manifestations)किरणे वायु रसायनिक पदार्थ(Chemicals) लवण(Salts) और खनिज(Minerals)पदार्थ इत्यादि   है! परमात्मा हम को घन वायु द्रव और शक्ति(Energy)पदार्थ इन चार विविध प्रकार का स्पंदनों दिया है! इन सब में शक्ति सूक्ष्म है! परमात्मा का मेधाशक्ति अनंत और असमान है! जगत का व्यक्तीकरण को उस परमात्मा मेधा(Intelligent Cosmic Vibration) का स्पंदन ही कारण है! इलेक्ट्रॉन्स(Electrons)प्रोटांस(Protons)उन्ही स्पंदनों का वैविध्य से व्यक्तीकरण हुआ है! ये सब वास्तव में किरणों ही है! एक्स रेस(X Rays), विद्युत्, अल्ट्रा वयलेट(Ultra Violet) और इन्फ्रा रेड(Infra Red) ये सब ऐसा किरणों ही है! घन का अर्थ घनीभव हुआ द्रव ही है! घनीभव हुआ वायु ही द्रव है! घनीभव हुआ किरणों ही वायु है! किरणों ही घनीभव हुआ विद्युत् है! घनीभव हुआ विद्युत् ही शक्ति है! घनं का अर्थ स्थूल स्पंदन व शक्ति है! द्रव का अर्थ द्रव शक्ति है! वायु का अर्थ वायु शक्ति है! सब शक्ती का विविध प्रकार का स्पंदन ही है! 
दूराश्रवण(Clairaudience) का अर्थ दूर से शब्दों सुनने का सामर्थ्य है! यह मन को तीव्रतर से शब्देंद्रिय का उपर एकाग्रता कर के  आत्मज्ञान(Intuition) शक्ति का साथ जोड़ने से मिलता है!
दूरादृष्टि(Clairvoyance) का अर्थ दूर से दृश्यों देखने का सामर्थ्य है! यह मन को तीव्रतर से नेत्रेंद्रिय का उपर एकाग्रता कर के आत्मज्ञान(Intuition) शक्ति का साथ जोड़ने से मिलता है! मनस् का शक्ति एकाग्रता से तीव्रतर कर के आत्मज्ञान(Intuition) शक्ति का साथ जोड़ के मनुष्य अपना ज्ञानेंद्रियों को शक्तिवंत कर सकता है!
क्रियायोग साधक अपना साधना का माध्यम से महानुभावों योगियों तपोधनों इत्यादियों को अपना मनोफलकम् का उपर दर्शन कर सकता है!

दूरादृष्टि(Clairvoyance) आध्यात्मिक प्रगति का हानिकर नहीं है! इस में साधक का चेतना स्थूल जगत से दैवसाम्राज्य में कदं रखेगा! परंतु अवचेतनायुत साधक को नहीं अभिलषनीय दृश्य और दर्शनों भी दिखाईदेके चिंताक्रांत करेगा! प्रथम  में इन्द्रियों और स्थूल जगत से साधक अपना चेतना और प्राणशक्ति को बदलना चाहिए! पश्चात अवचेतनावस्था से अपना चेतना और प्राणशक्ति को उपसंहरण करना  चाहिए! तत्द्वारा अवचेतनावस्था में दिखनेवाला दृश्य और दर्शनों(Astral scenes & figures)दिखना बंद होगा! स्थूल(Physical)जगत और सूक्ष्म (Astral world) जगत तक ही प्राणशक्ति का अवसर है! कारण(Causal world)जगत का प्राणशक्ति का अवसर नहीं है! तब असली आध्यात्मिक जगत में साधक कदम रखेगा!
मेरा प्रियगुरु श्री परमहंस योगानंद स्वामीजी कतिपय समय का पीछे ही स्वामी दीक्षा लिए हुए थे! वह 1915 संवत्सर था! पहला प्रपंच युद्ध समय था! मेरा प्रियगुरु गर्पार रोड में अपना पिताश्री का गृह में छोटा सा कमरा में ध्यान कर रहा था! गुरुदेव का चेतना एक युद्ध पानी जहाज(War Ship) चलानेवाला कप्तान् (Captain) का अंदर बदल गया! हठात् उस नौका(War Ship) को एक फिरंगी का तूटा(Bullet) ध्वंस किया था! कप्तान् (Captain) का अंदर का स्वामीजी समेत कुछ नाविकों(Sailors) भी समुद्र में गिरा पड़ा था! अति कष्ट से किनारा (bank) को तैरते आया था! कप्तान् (Captain) का अंदर का स्वामीजी में एक तूटा(Bullet) प्रवेश किया था! स्वामीजी जमीन का उपर गिरा था! पूरा शरीर सुन्न(Dead) हो गया था! इतनी में उस स्वप्न बिखर गया था! ‘परमात्मा मै जीवित हु या मृत हु’ स्वामीजी कहा था! ‘यह सब परमात्मा का स्वप्न है, जीवन और मरण दोनों कांति किरणों का विन्यास ही है, पुत्र उठो, स्वप्नरहित तुम्हारा पिता को देखो’ ऐसा सुनाईदिया था!
मनस् विश्लेषण  
जाग्रतावस्था में चेतना मन काम करने का समय में अहंकार इन्द्रियों और झिल्लीयों को कामों के लिए आदेश करता है! उस समय में स्मृति का   भांडार जैसा अवचेतना मन काम करेगा! हम निद्रावस्था में होने पर भी अवचेतना मन काम करता रहेगा! दिन में जाग्रतावस्था में स्मृति का   भांडार जैसा अवचेतना मन काम करेगा! और रात में निद्रावस्था में स्वप्न अथवा शांति देनेवाला गहरा निद्रा जैसा अवचेतना मन काम करेगा! स्वप्नरहित शांतियुत निद्रा को उप अधिचेतना(Semi super-consciousness) कहता है! मनुष्य सचेतनापूर्वक अपना स्वप्नरहित अवचेतना को निद्रा से उठने पर भी रख सकने से उस स्थिति को अधिचेतना कहते है! शुद्धात्म अपना अधिचेतना स्थिति को आत्मज्ञान(Intuitive) द्वारा व्यक्त करेगा! जाग्रता मन का पीछे अवचेतना और अधिचेतना मन दोनों है!  अहंकार जो है वह आत्मा को छिपाके या ढकके इन्द्रियों का भौतिक आनंद के लिए ‘मै, मेरा, मेरा कुटुंब, मेरा कुल, मेरा जाती इत्यादि’ विषयों में अत्यंत आसक्तियुत परिमतीसहित गलत चेतना ही है!
दर्शन(Visions):
अधिचेतना और आत्मावबोधा(Intuition)दोनों एक ही है! आत्मावबोध सीदा(Straight) आत्मा से आयेगा! कल्पित और कलुषित नहीं है! यह तर्क(Logic) का अतीत है! तर्क इन्द्रिय परिमित है! इन्द्रिय विषय, उपसंहरण किया हुआ इन्द्रियों और झिल्लीयों(Membranes)द्वारा विमुक्त हुआ शक्ति शिर में प्रवेश करेगा! यह विमुक्त हुआ शक्ति और आत्मावबोध दोनों का मिलाके उपयोग करके कई सत्य अनुभवों का दर्शान जैसा चित्रीकरण कर सकता है! जाग्रता चेतन अवचेतन और अधिचेतन तीनों को मिलाके उपदर्शानों(Semi visions) को आत्म  सृष्टि कर सकेगा! एक दर्शन हमको पाक्षिक रूप में जाग्रता चेतना या अवचेतना स्थितियों को लेजाएगा! इसी हेतु दर्शन पाक्षिक रूप में सत्य भी हो सकता नहीं भी हो सकता है! मात्र केवल अधिचेतना में दिखाईदेनेवाला दर्शन ही परम सत्य है! भ्रम सब साधारण तोड़ में अवचेतना अनुभव ही है! वे सब हमको हमारा आध्यात्मिक प्रगति और सत्य दर्शन का प्रतिबंधक है! दर्शन सचेतानापूर्वक सृष्टि है, वे निद्रा में होनेवाला नहीं है!
स्वपनों

जब जाग्रतावस्था का अहंकार अवचेतनावस्था में प्रवेश करेगा तब विश्रांतियुत इन्द्रयों से शक्ति विमुक्त होगा! सुख या दुःखानुभवी सिनेमा(cinema) भी अवचेतनावस्था यानी निद्रावस्था पायेगा! इस शक्ति और सिनेमा दोनों मिलके स्वप्न बन जाएगा! जाग्रता व चेतनावस्था में हम  कभी भयंकर सिनेमा देखते है! कुछ ऊहा भी करते है! वे और अवचेतनावस्था का अनुभवों दोनों मिश्रित नया स्वप्न हम देखेगा! अधिचेतनावस्था में आत्मचेतना अपना आत्मावाबोधा द्वारा भविष्यत अथवा गता जन्मों का कुछ होनेवाला विषयों को स्वप्नों का रूप में अवचेतनावस्था में डाल देगा! वे हम को नेत्र खोलने व बंद करने से भी, रात व दिन में भी, हम को दिख सकता है! तीव्र ध्यान   दीर्घकाल करने योगी सृष्टि को परमात्मा का स्वप्न समझेगा और ऐसा ही देखेगा भी है! ये सब दर्शन जैसा ही होगा! स्वप्न चेतनापूर्वक सृष्टि नहीं किया है! ये स्वप्न सब निद्रा में होगा! उप अधिचेतना व अधिचेतना में संभवित स्वप्नों निद्रा में हमने सृष्टि कियाहुआ है और वे सब साधारणतया सत्य होगा! अवचेतनावस्था में संभवित भ्रम(Hallucinations)के सारे स्वप्न  सत्य से बहुत दूर है! निद्रा में चलना(Somnambulism) भ्रम का एक भाग है!
अचेतानापूर्वक(Unconscious trance)समाधि में शरीर बाहर से जड़ दिखाईदेगा और भौतिक रूप में अचेतनास्थिति में होगा! अंतर्गत रूप में उप अवचेतनावस्था व उप अधिचेतनावस्था में रहेगा! शांति, उप अवचेतनावस्था व उप अधिचेतनावस्था का स्वप्नों का अनुभवों अंतर्गत रूप में होगा!
अचेतनापूर्वक(Unconscious State)स्थिति में शरीर बाहर से हिलेगा  डुलेगा नहीं! अंतर्गत में मेधा हो सकता अथवा नहीं भी हो सकता है! मरण का आखरी समय में स्थूलशरीर का बाहर और अंदर भी शरीर में चेतना नहीं होगा!   
स्वेच्छा(Liberty):
ज्ञानावतार स्वामि श्री युक्तेस्वर सचमुच स्वेच्छाजीवी है! वह किसी से भी ढरता नहीं थे! पूरी में ज्ञानावतार का आश्रम का अंदर एक दिन एक माजिस्ट्रेट(Magistrate)आया था! उस माजिस्ट्रेट बहुत खडूस (Strict) और उसे खूसट कहा जाता था! आश्रम का अंदर आया हुआ माजिस्ट्रेट को देख के स्वामि श्री युक्तेस्वर अपना आसन से उठा भी नहीं और उस को आसन भी दिया नहीं था! उस अगौरव को उस माजिस्ट्रेट ने अपमान समझा था! श्री युक्तेस्वरजी से आध्यात्मिक वादन किया और हर गया था! उस का हेतु वह माजिस्ट्रेट और क्रोधित होकर ऊंची स्वर में मै एं.ए.(M.A.) प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ, पता है कहा था! यह आश्रम तेरा कचेरीCourt Room)नहीं है, इस से पता लगता है तुम्हारा विद्यार्थी दशा इतना महत्वपूर्ण नहीं है, कुछ भी हो विश्वविद्यालय डिग्री(University Degree) कभी भी वेदविद्या का सामान नहीं हो सकता है, डिग्री विद्यार्थीयों जैसा 10, 100, 1000 संख्या में हर एक साल योगियों नहीं आयेगा! गभाराई बिना गंभीर स्वर में स्वामीजी ने कहा था! यह सुनाने के पश्चात उस माजिस्ट्रेट स्वामी श्री युक्तेस्वर इति संबोधित किया और कहा आप दिव्य माजिस्ट्रेट है, मुझ को शिष्य का रूप में अनुग्रह करो इति प्रार्थना किया था! और एक संदर्भ में एक ऑटो मोबैल इंजिनियर(Auto mobile engineer) से ऑटो मोबैल गाडियों का बारे में चर्चा कर के उस को चकित करदिया और संभ्रमाश्चर्य में दुबादिया स्वामीजी ने! श्री युक्तेस्वर को ऐसा विषय कुछ भी नहीं जो वह नहीं जानता हो!  
आत्मा(Soul),आत्मावाबोध(Intuition):

स्थूला इंद्रियों का उपर आधार होनेवाला अहंकार अपना परिमितशक्ति से दूर दूर का विषयों का सुन नहीं सकता और देख नहीं सकता है! केवल स्थूलजगत का परिमित हुआ स्थूल इंद्रियों द्वारा ग्रहण किया विषय ही मन या मनोफलक में चित्रीकरण कर सकता है! अहंकार नाम का पर्दा निकालने का पश्चात शुद्धात्मा का रूप में परिमळित होगा! आत्मावाबोध(Intuition) अथवा अधिचेतना तब होनेवाला विषय को दर्शन जैसा नेत्र खोलने से भी या बंद करने से भी दिखा सकता है! इंद्रियों से उपसंहरण किया हुआ प्राणशक्ति को उपयोग कर के विशेष सवप्न या प्रापंचिक विषय को मानव चेतना का पर्दा का उपर कही भी कभी भी सत्य दर्शन जैसा जाग्रतावस्था में और इस के अलावा स्वप्ना जैसा अधिचेतनावस्था में भी आत्मावाबोधा शक्ति दिखा सकता है! भ्रमपूरक प्रापंचिक विषय को परमात्मा अपना माया द्वारा मानव चेतन और जीवन का मिश्रं से चित्रीकरण करता है! परमात्म शक्ति(Cosmic energy) का साथ मिलके काम करनेवाला आत्मा का शुद्ध आत्मावाबोधा अथवा अधिचेतना, इंद्रियों से उपसंहरण हो कर शिरस् में एकाग्रता हुआ प्राणशक्ति, अहंकारराहित शुद्धात्मा ही असली सच्ची स्वप्ना का हेतु है! निद्रा में इंद्रियों से उपसंहरण हो कर शिरस् में एकाग्रता हुआ प्राणशक्ति, अंधा अहंकार, मानवचेतना, ये सब मिलके गलत संकेत सहित स्वप्न का सृष्टि करेगा! इसी कारण क्रियायोगसाधना का अभ्यास से अहंकाररहित शुद्धचेतन और इंद्रियों से उपसंहरण हो कर शिरस् में एकाग्रता हुआ प्राणशक्ति ही सत्य स्वप्न का व्यक्तीकरण कर सकता है!
चेतना अवचेतना और अधिचेतना इन सब अवस्थाओं में शक्ति का पात्र प्रधान है! परमात्मा का आलोचन और शक्ति(Cosmic Energy)का मिलन का वजह से इस जगत व्यक्तीकरण हुआ! शक्ति को चेतना(Consciousness) नियंत्रण कर सकने से मनुष्य परमात्मा जैसा जो भी व्यक्तीकरण करा सकता है! चेतना, इंद्रियों से मुक्त हुआ शक्ति और ऊहा(Idea) तीनों मिलके स्वप्न व्यक्तीकरण होगा! ऊहा(Idea) फिल्म (Film) जैसा है! इंद्रियों से मुक्त हुआ शक्ति विद्युत् है! अहंकार प्रोजेक्टर(Projector) जैसा है! अवचेतना सिनेमा(Cinema Screen)पर्दा जैसा है! मुक्त हुआ विद्युत् शक्ति(Electricity) शिर (Brain) में निक्षिप्त होगा! शिर का कणों का उपर अनुभव (Experience)नाम का फिल्म (Film)स्पर्श करेगा! अहंकार नाम का  प्रोजेक्टर(Projector) द्वारा अवचेतना नाम का सिनेमा(Cinema Screen)पर्दा का उपर उस को देखेगा! मेडुल्ला अब्लांगेटा(Medulla   oblongata) प्रोजेक्टर(Projector)बूत(Booth) जैसा है! इसी कारण मनुष्य जब स्वप्नाते है तब उस का इंद्रियों से मुक्त हुआ विद्युत् शक्ति(Electricity) शिर (Brain) में निक्षिप्त होगा! अहंकार नाम का  प्रोजेक्टर उस शक्ति और अहंकारचेतना को शिर का कणों का उपर से मनुष्य अपन से प्रवाहित करेगा! तब अनुभव नाम का फिल्म तैयार करेगा! अवचेतना नाम का सिनेमा पर्दा का उपर मनुष्य उस को देखेगा!

निद्रा में चलना (Somnambulism), हिप्नासिस(Hypnosis):

निद्रा में चलना (Somnambulism) का अर्थ अवचेतनावस्था में मनुष्य खुद को नहीं जानते हुए चलेगा! यह हानिकारक है! हिप्नासिस (Hypnosis)में अन्य मनुष्य आपका अवचेतना मन को आधीन कर के उस के द्वारा तुंहारा जाग्रता मन का नियंत्रण करेगा! यह कुछ समय मात्र ही रहेगा! परंतु तुम हिप्नाटिस्ट(hypnotist) आधीन में पूरा समय होनेसे हिप्नटैजर(Hypnotizer) तुंहारा अवचेतना मन को वश करेगा! उस के द्वारा जाग्रता मन का नियंत्रण करेगा! तब तुम तुंहारा मानसिक स्वेच्छा को खो बैठेगा! तुम को उस का आदेशानुसार चलने के लिए विबश करेगा और कर सकता है! इस प्रकार बार बार अवचेतना मन द्वारा तुंहारा जाग्रता मन को नियंत्रण करना सही नहीं कभी कभी हानिकर भी है! भारतदेश के योगियोंमानसिक स्वेच्छा को खो बैठना युक्त नहीं कहते है!
भूत (Tramp Souls)या दुष्टात्मा हमेशा आकाश(Ether) में घूमते है! वे आलसी मन व मनस्तत्व को खोजेगा! उसका माध्यम से खुद को व्यक्त(Express)करेगा! इसी कारण मन को खाली(Blank)रखना नहीं चाहिए! खाली(Blank)रखना हानिकर है! मन को खाली(Blank)रखना नहीं, सचेतानापूर्वक इच्छाशक्ति और एकाग्रता का उपयोग कर के चंचल और व्यर्थ अंतरहित विचार को नियंत्रित करने का प्रयत्न से परमात्मा का उपर एकाग्रता करना ही ध्यान का अर्थ है!

हम् सा और ॐ ध्यान पद्धति द्वारा अपना लक्ष्य को साधक सद्गुरु का सहायता से सुरक्षित रूप में पहुँच सकता है! सही ध्यान पद्धति साधक को अपना अंदर स्थित परमात्मा का साथ अनुसंधान करने के लिए दोहद करेगा इति हमारा ऋषि और मुनियों ने कहा है! उस को मानसिक खालीपन(Mental blankness) नहीं कहेगा! परमानंदमय अधिचेतनावस्था को मानसिक खालीपन(Mental blankness) से नहीं लभ्य करा सकेगा! इस उत्तम स्थिति लभ्य करने के लिए साधक अपना मनःशक्ति और प्राणशक्ति दोनों को मिलाके केवल परमात्मा का आलोचन का उपर ही मन और दृष्टी रखना है! हमारा ऋषि मुनि और योगी लोग साधारण दूरश्रवण(Clairvoyance) से अतीत पद्धतियां का उपयोग करेगा! 
तब श्री परमहंस योगानंद श्रीरांपूर आश्रम में थे! एक दिन श्रीयुक्तेस्वर स्वामी कोलकता रैल्वे स्टेषन(Railway Station) से श्रीरांपूर को 9 बजे का रैल् गाडी में आना था! परंतु स्टेषन(Station) को इस के पहले पत्र में जैसे लिखा था वैसा नहीं आरहा हु, 10 बजे का रैल् गाडी में आरहा हु! पहचानने के लिए मेरा आगे एक रजत(चांदी) जग पकड़ के एक लड़का चल रहा होगा, उस का पीछे मै जो वस्त्र अभी पहना हु उसी वस्त्र में होंगे! उस 10 बजे गाडी के लिए आना! ऐसा संदेश श्री योगानंदा को और उसका मित्र आश्रमवासी श्री दिजेन दोनों का सूक्ष्मरूप में श्रीयुक्तेस्वर स्वामी ने दर्शन देके दिया था! परंतु श्रीयुक्तेस्वर स्वामी का सूक्ष्मरूप(Astral figure) दिजेन देख नहीं सका, श्री परमहंस योगानंद देख सका था! श्री परमहंस योगानंद कहने से भी इस को दिजेन विश्वास नहीं किया था! परंतु बाद में सच हुआ था! मै दोनों को टेलि पतिक(Telipathic) संदेश भेजा था! श्री योगानंद संदेश लेसके, तुम नहीं लेसका श्रीयुक्तेस्वर स्वामी ऐसा कहा था!
दिव्य चिकित्सा(Divine Healing):

मनुष्य ही रोग को खरीद के लेकर लाया है! परमात्मा का सृष्टि में रोग का व्यक्तीकरण नहीं है! इस जन्म का हमारा मानसिक अथवा शारीरक विकलांगता का कारण मानसिक रूप में हम ने गत जन्मा में बोया हुआ बीज ही कारण है! 
‘पूर्वजन्म कृतं पापं व्याधिरूपेण पीडितः’! पिछले जन्मों का अथवा इस जन्म का प्रकृति नियमों का उल्लंघन करने से और मनुष्य का गलती से संक्रमित हुआ है! परमात्मा का संतान है हम! अपना संतान सुख और शांती से जीवन बिताना कर के परमात्मा चाहता है! उस का विरुद्ध में हम परमात्मा का आरोग्य सिद्धांतों काउल्लंघन करके रोग और दुःख को हम मांग के लारहै!
 50 वर्ष का आरोग्य जीवन बिताके प्रस्तुत में कोई भी चिकित्सा का वश नहीं होनेवाला रोग का आधीन होकर बाधा पीड़ित होने का कारण क्या है? शायद आरोग्यगर्व से परमात्मा को भूल के मुझे रोग नहीं आएगा ऐसा दृढविश्वास ही कारण होगा! अगर एक व्यक्ती 50 वर्ष आरोग्य जीवन बिताके अकस्मात ही तीन साल के लिए रोगग्रस्त होजाता है तो वह व्यक्ती अपने रोग को निवारणहीन मानकर निराश एवं निस्पृह होजाता है! ऐसा मन को धृवीकरण होने पर उस शरीर और मन दोनों उस भाव (Attitude)का अनुगुण प्रवर्तित करेगा! 
प्रकृति नियमों का उल्लंघन का वजह से कुछ शारीरक रुग्मताओं आएंगी! मानसिक नियमों का उल्लंघन का वजह से भय क्रोध व्याकुलता चिंता(Worry) लोभ मोह उत्तेजन आत्मनिग्रहशक्ति नहीं होना इत्यादि सब मानसिक रुग्मताओं आएंगी! परमात्मा को विस्मरण करना ही इन सारे रुग्मताओं का प्राथमिक हेतु है! क्रियायोग साधन कीजिये परमात्मा का समीप में आओ! तब यांत्रिक रूप में(automatically) शारीरक मानसिक और आध्यात्मिक रुग्मताओं का उपशमन लभ्य होगा!

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