KRIYA

Tuesday, 5 May 2015

Kriyayoga Teesara Ankh edited Hindi complete book part 1

                                                                                  
तीसरा आँख
क्रियायोग





प्रेरण: श्री श्री परमहंस योगानंद
रचना: कौता मार्कंडेय शास्त्रि

ॐ श्री योगानंद गुरु परब्रह्मणेनमः
शरीरसमस्थिति:
ह्रदय, फेफडे, रक्तप्रसरण और मॉसपेशिओ (Muscles) के स्पंदनो में गभराहट नहीं होनी चाहिए! निश्शब्द निश्चलता, और स्थिरत्व होने और तनावरहित देह मानसिक प्रशान्तता देगा! अथात शक्ति वृधा नहीं होगा! साधक शरीर  को रिलाक्स (relax) करना चाहिए! एकाग्रता को वृद्धि करना है! शक्ति को शरीर  से उपसंहार कर के चेतानापूर्वक मेरुदंड और मस्तिष्क (cerebrum) के अन्दर दिशानिर्देश करा सकता है! शरीर को सभी स्पंदनो से दूर करना चाहिए! चंचल शरीर आध्यात्मिकता को दोहद नहीं करेगा!
कुछ लोग बाहर से देखने के लिए आरोग्य दिखाई देते है परंतु आंशिक रूप से तनाव स्थिति में रहते है! उन लोगों का पादं पाणी गुदास्थान शिशिनं और मुख इति कर्मेन्द्रिया शांत दिखाई देता है पर असली में आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा इति ज्ञानेंद्रियों चंचल होता है! वैसा शरीर आंशिक रूप से तनाव स्थिति में होकर क्रमशः थक जाते है!
दीर्घ अंतःकुंभक और बाह्य कुंभक करने साधक का फेफडे चंचलरहित स्पंदन, निश्शब्द शांति सन्नाट स्थिति में होता है! ह्रदय का स्पंदनो को कम कराने को  दोहद करेगा! वैसा देहा परिपूर्ण समस्थिति में है कहा सकते है! 
गहरी नीँद में मनुष्य का चेतन और प्राणशक्ति अप्रयत्नपूर्वक ही साधक का इन्द्रियों, माँसपेशियों, शिरा, फेफडे, डयाफ्रं, ह्रदय इत्यादि से विमुक्त होके रहेगा! इसी को अचेतानापूर्वक शांत स्थिति कहते है!
क्रियायोग प्राणायाम पद्धतियों का माध्यम से चेतनापूर्वक मन और शक्ति को वष कर के इन्द्रियों, माँसपेशियों, शिरा, फेफडे, डयाफ्रं, ह्रदय इत्यादि से उपसम्हारण करा सकता है!
डयनमो का बल्ब फट्ने से उस का अंदर का विद्युत् उस डयनमो का अन्दर पहुँच जाता है! वैसा ही मराहुआ शरीर का प्राणशक्ति और चेतना परमात्मा की (Cosmic Energy) शक्ति और चेतना (Cosmic Consciousness) नामका डयनमो का अंदर पहुंच जाता है! डयनमो का तार पूरा मत निकालिये! उस टूटी हवी बल्ब का स्थान में और एक बल्ब लगाने से वह डयनमो फिर चालू होजायेगा! उन तारे पूरा खराब होने से कुछ नहीं करसकता उपयोग नहीं है! उस का अन्दर का विद्युत् उस डयनमो का अन्दर जाएगा! मराहुआ शरीर एक बल्ब जैसा है! मानव प्राणशक्ति और चेतना एक डयनमो जैसा है! ए परमात्मा का डयनमो से ही आया है! अथात मनुष्य शरीर का प्राणशक्ति और चेतना अपना भूमि और भूम्याकर्षनों से विमुक्त होने तक इस बल्ब यानी शरीर जोड़ा जाता है! अथात मरणं इच्छाओँ यानी तारों का अंता नहीं है, वह केवल टूट होने बल्ब जैसा है!
मनुष्य चेतानापूर्वक शान्तस्थिति को क्रियायोगासाधना द्वारा साध्य करना है! इन्द्रियों से, मन से, माम्स्फेसीयों से, ह्रदय से, फेफडों से, गुर्दो से अपना इच्छा से विमुक्त होने का स्थिति लभ्य करना चाहिए!
दैडने समय शरीर नाम का बल्ब अधिक तेज से प्रकाशित होता है! शरीर को उपयोग करने रीति का मुताबिक़ वह जलता है! ध्यान बिल्कुल नहीं करने मनुष्य का शरीर ज्यादा कम कांती से जलेगा! यह ही मरण का उपर मनुष्य का विजय! मन और प्राणशक्ति का कारण मनुष्य को इस जड़शरीर का साथ संबंध होता है! जो भी काम करता है उस काम को मन और प्राणशक्ति साथ मिलके करता है! प्रयत्न का साथ विचारें और प्राणशक्ति दोनों को उपसंहरण करना अत्यंत आवश्यक है! मनुष्य चेतना और प्राणशक्ति दोनों एक गाँठ जैसा है! इस गाँठ को निकालना चाहिए! तब परमात्मा का अनुसंथान आसान होजायेगा!
अवयवों और माँसपेशों विश्रांत होने से भौतिकशरीर का अन्दर का कण नाशन कम होजायेगा! नाश हुआ कणों को इस विश्रांत पद्धति से पुनरुद्धन करा सकते है!
नेत्रों को बंद करके रेचकं करना है! इन्द्रियों से श्वास और ध्यास को उपसंहरण करना चाहिए! ह्रदय और रक्तप्रसरण को अपना इच्छा शक्ति से व्याकुलतारहित कर सकते है!  शरीर का अंदर का जो भी अवयव शांत करने को उस अंग को प्रथम में तनाव (Tense) करना चाहिए! ॐ नमः शिवाय अथवा ॐ नमो भगवते वासुदेवाय इति तीन या चार बार मन में स्मरण करके रिलाक्स (Relax) करना चाहिए! तब पूरा शरीर तनावरहित हो जायेगा! अगर शरीर रोगग्रस्थ होने से उस शरीर का अंगों में तनाव थोड़ा ही करना चाहिए! 
मानसिक प्रशान्तता के लिये साधक का एकाग्रता भंग करने और बाधा पहुंचाने वाले विचारों से मन को दूर करना चाहिए! कूटस्थ में दृष्टि रखना चाहिए! कोई भी भगवान का नाम यानी उदाहरण के लिए ॐ नमःशिवाय अथवा ॐ नमो भगवते वासुदेवाय इति उच्चारित करते हुवे नीँद में गिरना चाहिए!  इस प्रकार क्रमशः वैसा अपना इच्छा का अनुसार सोना जागना विचारों से अलग होना अभ्यास करना चाहिए! कितना भी तकलीफ हो परमात्मा का उपर अचंचल भक्ति और विश्वास होना अत्यंत आवश्यक है! तब साधक मानसिक प्रशान्तता में है करके गिनादेगा! जितना भी चंचल जीवन बिताने से भी क्रियायोग ध्यान पद्धतियों का माध्यम से मन को नियंत्रण करसकते है!
सम+अधि= समाधि! परमात्मा का साथ अनुसंथान करना ही समाधि है! अपना इच्छा का अनुसार समाधि स्थिति पानेवाला साधक हर समय में चंचलरहित विश्रान्त शांति जीवन बिता सकता है! स्वल्प प्रमाण से भी अशांति नहीं होने साधक शरीर धन भार्या भर् स्थिर और चर संपत्तियों कुल जाती प्रदेश संस्कारों राग द्वेष काम क्रोध लोभ मद और मात्सर्य इति अरिषड्वर्गों मनो बुद्धि चित्त अहंकार इति अंतःकरण इत्यादि सर्वविशयों से विमुक्त होके परिपूर्ण निश्चलस्थिति लभ्य करेगा! मनुष्य अन्दर का नकारात्मक शक्तियों मनुष्य को भौतिक मानसिक और आध्यात्मिक रुग्मतायें भय दरिद्रता दुःख पराजित होना इत्यादियोँ का हेतु है! नकारात्मक शक्तियों को नियंत्रण करने पद्धतियां ऋषि लोगों ने आविष्कार किया!
दो मार्ग:
मनुष्य का जीवन में दो मार्ग सामने आते है! चंचल मानसिक विचारें और रोगभूयिष्ट दुःखपूरित जीवन प्रथम है! निश्छल परिपूर्ण आनंदमय जीवन दूसरा है!
देश काल और उनका साथ आनेवाले कष्ट नष्ट बंधों और संबंधों को सुनिशित रूप से सावधान होना आवश्यक है! दुःख का कोई भी वजह नहीं होता है!
जो दुःख को अनुभव करता है उस मनुष्य का गुण का अनुसार दुःख का तीव्रता होता है! अंधेरा का बाद रोषनी अवश्य आएगा! जो साधक मन को अपना वश में रखेगा उस को ए कष्ट नष्ट बंधों और संबंधों का पीड़ा से विमुक्त होगा! मानसिक दुर्बलता ही इन दर्दों का हेतु है! कष्ट नष्टों से अतीत होना ही जीवन है! अनुभवज्ञों का सलाह सुनना ही युक्त है! ज्ञानी लोगों का सलाह पाकर सद्गुरु का पास शारीरक मानसिक और आध्यात्मिक शिक्षणा लभ्य करना चाहिए! वैसा साधक अपना अंतर्वाणी (Intuition) नामका नायक (Hero) को जाग उठायेगा! जीवन परमार्थ समझेगा! रोगरहित होकर परमानंद में डूब रहेगा!
अज्ञानि किसी का बात नहीं सूनेगा! अपना खरमा हैकरके अपने आप को और दूसरो को गालीदेते हुवे जीवन बिताएगा! आखरी में क्रोध से अत्यंत रोगभूयिष्ट और दयनीय स्थिति पायेगा! क्रोध एक बीमारी है! वह असूया द्वेष प्रतिशोध सामने आने वाले को नाश करने भावना का वृत्त में गिर पडेगा! भेजा का नाड़ी फट (Brain Paralysis) जाएगा! आखरी में पागलपन का मार्ग में गिरादेगा!
जब क्रोध आता है तब उच्चारण 54 अथवा 108 बार कूटस्थ में दृष्टी और मन रख के करना चाहिए!
भय एक और माया रोग है! काम करने ढर, संकल्प किया कार्य होगा नहीं होगा करके ढर, इत्यादि! डरपोक अपने आप का शत्रु है! संकल्पित कार्य नहीं होने के लिए बीज भीज अपना संशय से ढरपुक खुद ही डालारहे! क्रियायोगध्यान करने से क्रोध, भय इत्यादि अवरोधक शक्तियों को निकाल्सकते है! अपना अन्दर का धीरता, विश्वास, धैर्य और निश्चयात्माक शक्ती को वृद्धि अभिवृद्धि करा सकता है साधक!
कातरता, भय, अधैर्य और अपने आप में विश्वास नहीं हुआ लोगों से दूर रहना चाहिए! परमात्मा को विश्वास कीजीये! संतृप्ति और दुःखद लोगों को परमात्मा का अनुसंथान कभी भी लभ्य नहीं होगा! साधक का मन पूरा परमात्मा का विचारों से भरकर रहना चाहिए! तब परमात्मा का साथ अनुसंथान अवश्य लभ्य होगा!
एक शेर का बच्चा यादृच्छिक भेड़ों का ज्ञुंड बीच में मिल के उन समूह का साथ बड़ा हो गया! वह उन का साथ बड़ा होते हुवे भेड़ों जैसा में मेंबोलना और कातर भी बन गया!
एक दिन एक बड़ा शेर भेड़ों का ज्ञुंड का पास आया! सभी भेड़ों जैसा में मेंबोलते हुवे  उस शेर को भागता हुवा देखकर अचंभा होकर उस को पकड़ कर पानी का ताल का पास लेकर उस का प्रतिबिंब दिखाया! तुम मेरा जैसा एक शेर हो करके उस का भीरुता दूर कर दिया! वैसा ही मनुष्य वस्तुतः धीर है! परंतु अपना आस पास का लोगों से भीरुता सीखता है! इसीलिए सब से स्नेह नहीं करना, ज्यादा से ज्यादा से धैर्यवान लोगों का साथ  संबंध रखना चाहिए!
सोने के पहले शांती से कूटस्थ में मन और दृष्टी लगा के बैठना है! केवल परमात्मा का उपर ध्यान करना है! सोके उठने का बाद 30 मिनट शांती से कूटस्थ में मन और दृष्टी लगा के बैठना है! केवल परमात्मा का उपर ध्यान करना है! मनुष्य का जीवन सफलता का दिशा निर्देश का यह ध्यान अत्यंत आवश्यक है!
संस्कारों का अर्थ आदते! वे अच्छा और बुरा करके दो प्रकार का है! वे मनुष्य का जीवन में मुख्यपात्र पोषण करेगा! मनुष्य कभी कभी अच्छा काम करना चाहता है! परंतु बुरा संस्कारों का पात्रता का हेतु मनुष्य का अन्दर अधिक होने से जानते हुवे भी बुरा करेगा! वैसा ही अच्छा संस्कारों का पात्रता मनुष्य का अन्दर अधिक होने से गलत परिस्थितियों में भी अच्छा काम ही करवाएगा! मनुष्य नश्वर आत्मस्वरूपी है! संस्कारों, अच्छा और बुरा, दोनों शुद्धात्मा का लक्षण नहीं है! उन का वश में नहीं होना चाहिए! आत्मा का दिशा निर्देशन में ही काम करना चाहिए!
सु संस्कारों और दुष्ट संस्कारों का युद्ध फलितों का उपर आधारित है आरोग्य, सफलता और ज्ञान! मनुष्य बचपन से ही अच्छा सांगत में रहने चाहिए! धन, कार, स्त्री इत्यादि भौतिक वस्तुवों में व्यामोह रखने वाले लोग वैसा ही व्यक्तियों का स्नेह स्वीकार करेंगे! बुरा संस्कार लोग अपना वाग्दान नहीं निभाएंगे! प्रयत्न भी नही करेंगे! आध्यात्मिकता को पसंद करने वाले लोग बचपन से ही पवित्रमंदिरों में जाना और पवित्र साधू सद्गुरुवों का सलहा लेना करते है!
संस्कारों:
बुरा संस्कारों तात्कालिक सुख दे सकते है! मगर ऐ विषपूरित संस्कारों का आदते आखरी में घोर परिस्थितियों का मार्ग में लेजाएगा! उन में ही वेदानापूर्वक भौतिक मानसिक और आध्यात्मिक रुग्मतों से व्याकुलत होजायेगा! मनुष्य जान्बूच के गलतियाँ नहीं करते है! गतजन्मों से जोड़ा हुआ बुरा संस्कारों जादा तरह हेतू है! परमात्मा मनुष्य का प्रसादित किया इच्छाशक्ति का माध्यम से क्रियायोगाध्यानातत्पर हो के बिना गलती करते हुवे मनुष्य अपना जीवन बिता सकता है!
अच्छा हो या बुरा हो वे संस्कारों मनुष्य ने ही सृष्टि किया है! इसीलिए मनुष्य का मनोक्षेत्र को क्रमशिक्षणा से हल चलाना है! सुसंस्कारित बीजों बोना चाहिए! दुष्ट संस्कारित बेकार पौधों को सहिष्णुता से उखाड़ के फेकना चाहिए! इन्द्रियों का क्षणिक सुखों को आत्मा का शास्वतानंद से तुलना कर के युक्तायुक विचक्षना ज्ञान से पहिचान से समझना चाहिए!
आध्यात्मिकता बाज़ार में मिलने वाली वास्तु नहीं है! निरंतर क्रियायोगसाधना से ही परमात्मा का साथ अनुसंथान लभ्य करेगा! वह गुफों में शीतल पर्वतों, आग के बीच में बैठक करने से कठोर उपावासों इत्यादि से साध्य नहीं है! कितना वर्षों ध्यान किया इति परिगण में नहीं आयेगा, कितना तीव्रता और आर्द्रता से ध्यान किया इति परिगण में आयेगा! पहले दैवसाम्राज्य में कदम रखो, तब हर एक धर्मबद्ध चीज साधक को लभ्य हो जायेगा! सब मनुष्य परमात्मा का बच्चे है! प्रति एक मनुष्य परमात्मा का अंश और अवतार है! अव यानी नीचे तारा यानी आना!
परमात्मा को केवल निश्शब्द में ही लभ्य कर सकते है! विचारों को बँद करके केवल निश्शब्द में ही परमात्मा का साथ अनुसंथान कर सकते है!
बहुत ही अंतर्गत स्पंदनों का साथ जोड़ा हुआ है इस भौतिक शरीर! बहुत ही अंतर्गत कणों (Cell) का स्पंदनों का साथ जोड़ा हुआ है अंतर्गत गति! बहुत ही अंतर्गत मालीक्यूल (Molecule) का स्पंदनों का साथ जोड़ा हुआ है अंतर्गत कणों (Cell) का गति! बहुत ही अंतर्गत अणुओं (Atoms) का स्पंदनों का साथ जोड़ा हुआ है अंतर्गत मालीक्यूल (Molecule) का गति! बहुत ही अंतर्गत परमाणुओं (Atoms) का स्पंदनों यानी एलक्ट्रांस (Electrons) प्रोटोंस (Protons) न्यूट्रांस (Neutrons)  पाजिट्रान्स् (positrons) और मेसांन्स् (Mesons) का साथ जोड़ा हुआ है अंतर्गत अणुओं (Atoms) का गति! इन सारे स्पंदनों अपना अपना कक्ष्यों (orbit) में होते रहते है! इन सारे चाल का पीछे परमात्मा का अद्भुत रचना और जोड़ना का मेधावीपन् है! इन गतियों को व्यक्त करते हुवे स्फुरण (sensation), विचारों (Thoughts), भावनाए (Feelings) और इच्छाशक्ति (will power) है! इन सब का अपना कुक्षी का अन्दर रखने अहंकार (Ego) है! आत्मा केवल शुद्ध है! इस शुद्ध आत्मा का आवरण है इस अहंकार (Ego)! शुद्ध आत्मा नहीं होने पर इस अहंकार स्वयं प्रकाशित नहीं हो सकता है! इस अहंकार का हेतु मनुष्य शरीर ही आत्मा सोचकर भ्रम में पड़ रहा है!
मनुष्य शरीर उपर से  ज्यादा से ज्यादा 6’X1½’ परिमाण में परिमित लगता है!   इस शारीर अंतर्गत  कणों (Cells) का स्पंदनों का समुद्र है, इन अंतर्गत कणों (Cells) का स्पंदनों से गरिष्ट है मालेक्युल (Molecule) का स्पंदनों का समुद्र, इन मालेक्युल (Molecule) का स्पंदनों से गरिष्ट है अणुओं (Atoms) का स्पंदनों का समुद्र, इन अणुओं (Atoms) का स्पंदनों से गरिष्ट है परमाणुओं यानी एलक्ट्रांस (Electrons), प्रोटोंस (Protons), न्यूट्रांस (Neutrons), पाजिट्रान्स् (positrons) और मेसांन्स् (Mesons) का स्पंदनों का समुद्र, इन परमाणुओं का स्पंदनों से गरिष्ट है इन सब को चलानेवाला प्राणशक्ति (Vital force or life force)! अवचेतना (Sub-consciousness), अधिचेतना (Super-consciousness), चेतना (Consciousness), श्री कृष्ण चेतना (Krishna-consciousness) और परमात्मचेतना (Cosmic consciousness) का व्यक्तीकरण है इस प्राणशक्ति  (Vital force or life force)!
उपर से यह भौतिक शरीर साधारण दिखता है! अंतर्गत रसायन स्पंदनो के साथ प्रकाशित होने इन कणों वास्तव में घनीभव हुआ परमात्मचेतना (Cosmic consciousness) का व्याक्तीकरण ही है! इसी कारण इस शरीर अध्बुत शक्तियुक्त और सर्वव्यापी है! अंतर्गत रसायन स्पंदनो के साथ कणों को चालू रखने के लिए अल्ट्रा वायोलेट किरणों (ultraviolet rays), प्राणवायु, अच्छा आहार, पानी और फलरसों आवश्यक है! शरीर में जीवकणों नित्यरूप में उत्पत्ति होता रहता है! वे विचारों और शारीरक शक्तियों से परिमित हो बैठता है! अवचेतन, चेतन, अधिचेतन, कूटस्थचेतना और परमात्मचेतना इत्यादि अत्यंत सूक्ष्म स्पंदनों का साथ शारीरक अंतर्गत रसायन स्पंदनों मालेक्युल (Molecule) का स्पंदनों, अणुओं (Atoms) का स्पंदनों इत्यादि जोड़ा हुआ होता है! मनुष्य का स्पंदनों परमात्म शक्ति का घनीभव हुआ स्पंदनों ही है! शरीर का अन्दर का कणों को चालू रखने सूर्यका अल्ट्रा वयलेट किरणों (Ultra violet rays), प्राणशक्ति, आरोग्यवान् आहार, फलरसों और पीने का पानी आवश्यक है! विचारें और जीवशाक्तिया (Biological forces) मिलके जीवकणों उत्पत्ति और उन शक्तियों का हेतु होता है! विविध प्रकार की कणों का रसायन चर्यों का अतिसूक्ष्म सूक्ष्मातिसूक्ष्मवाला अवचेतन, चेतन, अधिचेतन, कूटस्थचेतना और परमात्मचेतना इत्यादि हेतु है! वे  जरूरत्वाला शक्तिपूरक् स्पंदनों लभ्य कर देता है! इन मेधावी स्पंदनों युक्त जीवन का   घनीभव हुआ परमात्मा का शक्ति ही हेतु है! भौतिक आहार कारण नहीं और वह केवल निमित्तमात्र है! इस भौतिक आहार का परमात्मा का शक्ति मिलने से ही शरीर स्थितिवंत् होता है! परमात्मा का शक्ति को मुख्यप्राण कहते है! इस मुख्यप्राण मनुष्य शरीर का  बाहर भी है और अन्दर भी है! दोनों का स्थितिवंत् का हेतु मुख्यप्राण ही है!
मुख्यप्राण पाँच प्रकार का अपने आप को इस मनुष्य का शरीर में विभाजन किया है:
1)प्राणवायु=स्फटिकीकरण (Crystallization)
2)अपानवायु=विसर्जन (Elimination)
3)व्यानवायु=प्रसरण (Circulation)
4)समानवायु=स्पांजीकरण (Assimilation)
5)उडानवायु=जीवानुपाक (Metabolism)
आहार, वायु, पानी, सूर्यरष्मी इत्यादी का उपर अपना जीवन आधरित करके समझता है साधारण मनुष्य! रोगग्रस्थ होकर औषधियों से ठीक नहीं होने शरीर का दुर्भर स्थिति देखकर आशा खो बैठता है! तब केवल परमात्मा ही इस शरीर को साधारण स्थिति को ला सकता करके समझता है! हम इस शरीर को देने आहार इत्यादि परमात्मा का शक्ति का सामने अत्यंत अल्प करके परिपूर्णरूप में समझेगा! मरा हुआ शरीर को आहार, वायु, पानी, सूर्यरष्मी इत्यादि देने से पुनः जीवित होगा क्या? 
आटोमोबाइल बाटेरी (Automobile battery),को फिर छार्ज (Charge) करने विद्युत् (Electricity) आवश्यक है! केवल डिस्टिल्ड् (Distilled water) से काम नहीं बनेगा!  परमात्मशक्ति मनुष्य का अंदर का प्राणशक्ति, घनपदार्थ, द्रवपदार्थ इत्यादियो को अवसर प्रमाण में युक्त मात्रा में बनाके मनुष्य को जीवित रखेगा!
परमात्मा का मुख:
मेडुलाआबलम्बगेटा (Medulla Oblongata) को परमात्मा का मुख कहते है! परमात्मा का शक्ति मेडुलाआबलम्बगेटा का माध्यम से प्राणशक्ति रूप में मनुष्य में प्रवेश करते है! कोई भी वैद्य मेडुलाआबलम्बगेटा को शस्त्रचिकित्सा नहीं करसक्कते है! भेजा और मेरुदंडों दोनों प्राणशक्ति केन्द्र है! इन दोनों का केन्द्र मेडुलाआबलम्बगेटा ही है! शरीर का अन्दर का हृदय, भेजा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मूलाधार चक्रों प्राणशक्ति को मेडुलाआबलम्बगेटा से ग्रहण करके अपना अपना केन्द्रों से वितरण करते है!
सहस्रारचक्र इस प्राणशक्ति को मेडुल्ला से ग्रहण करके अपना पास रखनेवाले भांडागार है! शरीर का जो प्राणशक्ति अवसर है वह इदर से ही उस शरीर भाग को भेजा जाता है! इसी हेतु जब शिर को कुछ बड़ा चोट लगने से सहस्रारचक्र का अन्दर का इस प्राणशक्ति को छोटा छोटा बिन्दु अथवा बहुत बड़ा प्रकाश रूप में दिखाई देगा! निरंतर हम कुछ न कुछ काम करते रहते है! इन के लिए नाडीयों, हड्डी, रक्त, विचारों, भावों और शारीरक कार्यक्रम के लिए प्राणशक्ति का आवश्यकता है! इस शक्ति निरंतर हम को लभ्य होना चाहिए! इस के लिए साधक क्रियायोगासाधना का माध्यम से अनंत परमात्मशक्ति सागर से प्राप्त कर सकता है, प्राप्त करता है!
इच्छाशक्ति को वृद्धि करने के लिए हठयोग का मुद्राये, आसनों, बंधों इत्यादियो से प्राचीन ऋषियों हम को लभ्य किया है! वे सब क्रियायोगसाधना का भाग है! इसीलिए क्रियायोगसाधना का माध्यम से शरीरक मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकते है!
कोई भी रंग में सफलता के लिए एकाग्रता ही मुख्य हेतु है! बाकी विषयों से मन को अलग कर के जो साध्य करना हैं उसी विषय का उपर ध्यान लगाना चाहिए! परमात्मा का उपर एकाग्रता को ध्यान कहते है!
परमात्मा का अनुसंधान करने के लिए श्वास को नियंत्रण करना चाहिए अथवा मनस् को नियंत्रण करना चाहिए! श्वास को नियंत्रण करने से मनस् नियंत्रण होजाएगा, मनस् को नियंत्रण करने से श्वास नियंत्रण होजाएगा! मनस् को नियंत्रण करना जटिल मार्ग है, श्वास को नियंत्रण करना सरल मार्ग है!
प्रातः 5––6, मध्याह्न 11––12, सायंकाल 5––6 और रात में 11––12 का बीच में ध्यान करने से साधक को शीघ्र फल लभ्य होगा! वैसा करने से शरीर, मन और आत्मा समस्थिति में रहेगा!
मनुष्य विविधाप्रकारा का स्वप्न स्वप्नाता है! कभी कभी उन स्वप्नों भयंकर रूप में आता है! उन स्वप्नों में हम को विवाह होगया, तीन बच्चों हो,गया, हम शिकार के लिए अरण्य में गया, तीन शेर को मारदियाइत्यादि स्वप्नों स्वप्नाते है! उस स्वप्न का समय स्वल्प समय के लिए होने से भी हम को बहुत सालों बितगया जैसा लगेगा! इन स्वप्नों को मनुष्य ही स्वप्नाता है! इन स्वप्नों को मनुष्य क्यों स्वप्नाते है पूछने से कोई भी समाधान नहीं मिलेगा! इन स्वप्नों में दिखाई देनेवाले वस्तुवों को सामान व पदार्थ (matter) तो मनुष्य ही स्वयं देता है! 
इन भयंकर स्वप्नों से मुक्त पाने के लिए हम अपना भौतिक नेत्र खोलना चाहिए! वैसा ही इस दृश्यमान जगत भी परमात्मा का स्वप्न है! जगत मिथ्या ब्रह्म सत्यं’! परमात्मा का स्वप्न का वस्तुओं है हम! परमात्मा का स्वप्न समझने के लिए परमात्मा का ही नेत्र खोलना चाहिए! इसी नेत्र को तीसरा नेत्र कहते है! इस तीसरा नेत्र को खोलने के लिए कही और जाने को अवसर नहीं है! वह नेत्र हर एक मनुष्य का भ्रूमध्य में कूटस्थ में उपलब्ध है! क्रियायोगसाधना का माध्यम से परमात्मा का उस तीसरा नेत्र को खोल्वासकते व खोलसकते है! तत् माध्यम से परमात्म का लीला नाटक समझ्सकते है! परमानंद को प्राप्त करसकते है! तब तक मनुष्य को संतृप्ति नहीं मिलेगा!
मनुष्य केवल भौतिक आहार का उपर आधार करके जीवन बिता नहीं सकता है! Medulla oblongata को मनुष्य का मुख कहते है! इस मेडुलाआबलम्बगेटा का माध्यम से ही परमात्मशक्ति मनुष्य का लभ्य होता है! इस शक्ति का साथ भौतिक आहार को जोड़ने से ही मनुष्य जीवित होसकता है!
हर एक जीवी कुछ न कुछ उपाधि में बांधाहुआ शक्ति का रूप ही है! हमारा विचारों भी शक्ति का रूप ही है! बाधाओं, शारीरक रुग्मता, सड़क, रैल और विमान प्रमादों इत्यादी विषयों से सदा भायाभ्रांत होने मनुष्य को तुम अल्प नहीं है, सचेतनापूर्वक इन चीज से तुम अधिगमन करो, तुम केवल परमात्मस्वरूप होसमझाने का साधन है क्रियायोगसाधना! साधक का शरीर स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्म से कारण शरीर, कारण शरीर से परमात्म से अनुसंधान के लिए सचेतनात्मक अधिगमन करने को उपयोगी है क्रियायोगसाधना!
आनंद साधारण रूप में बाह्य परिस्थितियों का उपर आधार होना कुछ परिमित तक  वास्तव होता है! परन्तु हमारा अंतः परिस्थितियों का उपर ही अधिकांश आधार होता है! असली सुख क्या है? अच्छी आरोग्य, अच्छा तार्किक मानस्, विलास जीवन्, मनपसंद काम, सर्व प्रकार का सफलीकृत जीवन् ही असली सुख है! हम को जो जीवन् अंतर्गत सुख नहीं देता है वह बाह्य सुख नहीं देगा! असली सुख हमारा अंतर्गत मनोस्थिति का उपर ही ज्यादातर आधारित है! यह यदार्ध है! आनंद जीवन् हमारा जन्मतः हक़ है! आनंद जीवन् हमारा अन्दर का आत्मा का खजाना है! उस आत्मानंद पानेसे हम राजाओं का राजा होंगें, चक्रवर्तियों का चक्रवर्ती होंगें!
मद्यपान, धूम्रपान, मांसभक्षण इत्यादियो को आदत हुआ अज्ञानियों और मूरख लोग जितना भी कठिनाइयों बाधायों दुःख कष्टप्रद समस्याओं सामने आने से भी मेरा खर्मइति कहते हुए पशुजीवन बितायेंगे! उन् दुःखदायक आदतों व अभ्यासों को तयागके आनंददायक व सुखदायक आदतों व अभ्यासों को मार्गों को अवलम्बन नहीं करते है! कोई भी अभ्यास अच्छा हो, बुरा हो आदत होने के लिए थोड़ा समय लेता है! जो मनुष्य खराब होगया उसको ठीक करना भी मुश्किल है! जो मनुष्य अच्छा है उसको खराब करना भी मुश्किल है! परन्तु प्रयत्न से बुरा आदतों को मिटा सकते हो! बुरा आदतवाला मनुष्य को परिहास नहीं करके मानवता तत्व से समझके सबूरी व सहिष्णुता से उस में परिवर्तन लाने के लिए कोशिश करना चाहिए!
आनंद व सुख एक मानसिक परिस्थिति है! भोजन में एक आधा कंकड़ आने से उस कंकड़ को निकालके फेंकना चाहिए और खाना चाहिए! उस केवल एक कंकड़ के लिए पूरा भोजन को त्याग नहीं करना चाहिए! वैसा ही बहुत वर्षो सुखमय जीवन बिता हुआ मनुष्य कुछ अनारोग्य से सफ़र करने से परमात्मा को निंदा नहीं करना चाहिए!
हे परमपिता इतना वर्षो आपने मुझे सुखमय जीवन दिया है, इस विपत्करस्थिति को सहन करनेका शक्ति देदो!इति प्रार्थना करना चाहिए! ऐश्वर्य नष्ट होने से वास्तव में कुछ भी नष्ट हुआ करके परिगण में लेना चाहिए! आरोग्य में भंग होने से ही वास्तव में बहुत कुछ खोगया है! पवित्र प्रेम, पवित्र आनंद, शुद्ध ज्ञान, शांति ए सब क्रियायोगी प्रथम में अपना हृदय में प्राप्त करता है! तत् पश्चात् वे सब नस नस में जाके हमको आनंद प्राप्ति कराता है! इस आनंद साधक को और उस का पास रहनेवाला दूसरा लोगों को भी आनंदसागर में डुबादेगा! समजीवन का अर्थ ध्यान, शास्त्रपठन, आरोग्य, आनंद और काम ही है!
क्रियायोगासाधना आवश्यकता:
ब्रह्माण्ड में हर एक पदार्ध आकर्षण और विकर्षण का चक्कर परिधि में ही काम करता है! इस परिधि में मनुष्य अलग नहीं है! हम कभी कभी कुछ मनुष्य को मिलना चाहेंगे! हमारा अन्दर का आकर्षण का हेतु उसी आदमी को मिलते है! आयास्कांत साधारण रूप में केवल लोहों को ही आकर्षित करता है! वैसा ही कुछ लोगों को भौतिक विषयों में ध्यान होता है, कुछ लोगों को मानसिक विषयों से, कुछ लोगों को आध्यात्मिक विषयों से  आकर्षित होता है! जो कामी नहीं है वह मोक्षकामी नहीं होसकता है! मै सारे शारीरक सौकर्य त्यग के योगी बनूंगा करके आकस्मिक तोड़ में कहने से नहीं चलेगा! क्रमशः शिक्षणा पाके क्रमशिक्षणा का साथ जोड़ा हुआ साधक ही योगी बन सकता है! क्रियायोगासाधना का माध्यम से परमात्मा को लभ्य किया हुआ साधक सब चीज प्राप्त करा सकता है! इसीलिये जीसस ने पहले आप दैवसाम्राज्य में प्रवेश करो तब सब चीज तुम को उपलब्ध होजाएगा इति कहा’!
हम जैसा आहार लेगा वैसा ही हमारा आरोग्य और आकर्षण होगा! भौतिक विषयों यानी धन, दौलत, भवनों, मोटारगाड्या, स्त्री इत्यादि विषयों पाने में निमग्न हुआ मनुष्य इतरों को आकर्षित् नहीं कर,सकता है! केवल वैसा चीजों में आसक्ति हुआ कुछ लोग को ही वह भी कुछ समय के लिए आकर्षित् कर सकता है! वैसा ही कवि लोग कवि लोगों को, गायक लोग गायक लोगों को आकर्षित्  करेंगे! क्रियायोगासाधना का हेतु आरोग्य और आध्यात्मिकता साथ प्रकाशमान व्यक्ति बहुत आसानी से अधिक से अधिक लोगों को आकर्षित् करेंगे! और अत्याधिक शांति क्रियायोगासाधक् को लभ्य होता है! आत्मनिग्रह शक्ति साध्य किया असली क्रियायोगी अन्य लोगों को परुष पदजालों से निंदा नहीं करता है! उसको क्रोध नहीं आयेगा! सदा निग्रह में रहेगा! उसको वाक्शुद्धि होता है! पहले घर में जीतो पश्चात बाह्य में जीतो कहते है! प्रथम में घरवालों को शांति में रखो पश्चात अन्य लोगों को शांति में रखो! परिस्थितियों और पडौसी लोगों का साथ शांति से विषयों को संभालना चाहिए! अथवा जीवन दुर्भर होता है! अनावसर प्रदेशों से निकलना चाहिए! नहीं तो कलहप्रिय मूर्ख लोगों से मनःशांति दूर हो जाता है! इस का अर्थ जो शारीरक, मानसिक और आध्यात्मिक तोड़ में ताकत,वाला और उन परिस्थितियों को सामना कर,सकने,वाला साधक उस प्रदेश से निकलने को आवश्यकता नहीं है! हम को प्रेम करने,वाले व्यक्ती अगर हम को डांटने से उस प्रदेश से निकलना चाहिए! शांती से कुछ योगासन करके थोड़ा समय क्रियायोगध्यान करना चाहिए! परमात्मा का अयस्कांत् का साथ हमारा इतना ही बलवान नकारात्मक दूसरा अयस्कांत् हमारा अन्दर इंद्रियों का माध्यम से काम करते रहता है! वह हमको आत्मसाम्राज्य से छुडवाकर दुष्टसाम्राज्य का तरफ लजानी के लिए निरंतर प्रयत्न करते रहता है! हम ॐकार शब्द ध्यान निरंतर यानी जब भी हमारा मन विछलित् होता है तब करते रहना चाहिए! तब परमात्मा का आकर्षण निरंतर रहेगा, टूटेगा नहीं! निरंतर परमात्मा का उपर आकर्षण अभिवृद्धि करने से वह तत्व साधक को लाभदायक है ही मगर अन्य लोगों को भी प्रोत्साहकारी होगा! इस आकर्षण का माध्यम से साधक अपना केवल मात्र संकल्प से दूर दूर में रहा मित्रों से दिव्यात्मों ऋषि मुनियों योगियों इत्यादियों को अपना कूटस्थ में दर्शन कर सकता है और संभाषण भी कर सकता है!
तुम अपना नौकरी करते रहो, संसार को संभालते रहो, सब स्वाभाविक धर्मबद्ध चीज करो, कोई पाबंधी नहीं है! परंतु जब जब समय मिलता है उस समय व्यर्थ प्रसंगों संभाषणों व बातचीत से नष्ट मत् करो! परमात्मा का उपर एकाग्रता लगाकर क्रियायोगध्यान करो! तुम्हारा क्रियायोगध्यान परसों से कल, कल से आज ज्यादा समय और तीव्रता से करना चाहिए!
एक टन् (Ton) सिद्धांतों से एक औंस (Ounce) अभ्यास अधिक लाभदायक और उपयोगकारी है! शुष्क वेदान्तों, उपन्यासों से समय, धन और आरोग्य वृधा मत कीजीये! निरर्थक पूजाओं से क्या लाभ है! प्रधम् में हम इंद्रियों का आकर्षण से बाहर आना चाहिए! उस इंद्रियाकर्षण को परमात्मा का तरफ बदलना चाहिए! क्रियायोग ध्यान करना चाहिए! इस ध्यान प्रतिदिन कुछ नियमानुसार प्रातः और सायं संध्या में करना उत्तम है! इस के लिए हम अपना इच्छा शक्ति को कूटस्थ में रख के प्रधम में शक्तिप्रदान अभ्यासों करके शरीर को तैयार रखना चाहिए! इन शक्तिपूरक अभ्यासों का माध्यम से सिद्ध किया हुआ शक्ति को रोगग्रस्त अवयव में व बाधा देनेवाला अवयव का उपर भेज के आरोग्य को पुनः प्राप्ति करना चाहिए! सोऽहं व हाँ सा जैसा सशास्त्रीय लय ध्यान पद्धति का माध्यम से श्वास का उपर ध्यान रखना चाहिए! क्रमशः श्वास का माध्यम से ध्यान को तीव्रतर करना चाहिए! परमात्मा को प्राप्त करना चाहिए! मनस् एक वस्त्र जैसा है! विचारधारा मैलॉ जैसा है! अधिक समय से साफ़ नहीं किया हुआ धवळ वस्त्र भी काला पड्जाएगा! एक दो बार सफाई करने से भी मैलॉ निकलते हुआ दिखाई देने से भी सूखने का पश्चात भी पहले से भी और मैलॉ दिखाई देगा! निरंतर विचारों का हेतु हमारा पूर्वजन्म वासनाओं ही है! उस विचारधारा को सोऽहं व हां सा प्राणायाम पद्धति नाम का साबुन द्वारा सफाई करना चाहिए! श्रद्धा सबूरी  का साथ करना चाहिए! निराश नहीं होना चाहिए! तब शनैः शनैः व  आसते आसते विचारों दग्ध हो जाएगा! पश्चात एक और लाययोगा प्रक्रिया यानी ॐकार को सुनने का पद्धति का माध्यम से समां (बराबर) अधि (परमात्मा)=समाधि स्थिति प्राप्त करना चाहिए! परमानंद को पाना चाहिए! साधक का और परमात्मा का बीच में प्राणशक्ति ही लिंक (link) व जोडाहुआ सुता (thread) है! उस बांधाहुआ सुता (thread) को इन दोनों लययोग प्रक्रियाओं यानी सोऽहं और ॐकार का सुनना पद्धतियां का माध्यम से तात्कालिक रूप में तोड के परमात्मा से अनुसंधान करा सकता है! परमात्मा चेतना साधक को कूटस्थ में तीसरा नेत्र का रूप में अथवा पवित्र ॐकार शब्द रूप में अथवा रूपराहिता शुद्ध ज्ञान जैसा अथवा दिव्यभक्ति जैसा अथवा दिव्या परिपूर्ण प्रेम जैसा व्यक्त हो सकता है! कोई कान में कुछ रहस्य कहता है जैसा कूटस्थ में सुवार्णाक्षर जैसा क्रियायोग साधक को व्यक्त हो सकता है! उस व्यक्त होने का रीति प्रस्फुटित हो सकता है! दृश्यमान व अदृश्यमान भी हो सकता है! परन्तु इन सारे अनुभवों परमात्मा अपने आपको व्यक्त करा रहे करा के समझ नहीं करना चाहिए, इन में कुछ चीत्कळों भी हो सकता है! इच्छाशक्ति एक डयनमो (Dynamo) जैसा है! यह शरीर को शक्ति देता है! यह इच्छाशक्ति हम को शारीरक, मानसिक और आध्यात्मिक अवसरों को आवश्यक वनरों को प्रदान करता है! हम चलने को बात करने को, काम करने को विचार करने को इत्यादियो को इच्छाशक्ति (Volition) ही बलवात्कारण है! इच्छा (Wish/desire) जो है निस्सहायत मनस् का है! प्रबल इच्छा (Desire/stronger wish) जब जब यह इच्छा पूरा हो जाएगा करके आतृता जो है वह शक्तिमान् मनस् का है! उद्देश्य (Intention/ Determination) का अर्थ प्रबल इच्छा (Desire/stronger wish) को कैसा भी हो सफल करने का प्रयत्न है! वह कभी कभी अपना इच्छा को सफल करा सकता है! परन्तु प्रप्रबल् इच्छाशक्ति (Volition/Will power) जिस को है वह व्यक्ती अपना अपना इच्छा परिपूर्णता से सफल होने तक निरंतर प्रयत्न करते रहेगा! प्रप्रबल् इच्छाशक्ति (Volition/Will power) ही इस जगत् को परिपालन करता है!
शिशु जन्म होने का बाद रोदन करता है! इस रोदन फेफड़ों खुलने का बाधा व्यक्त करने को प्रथम प्रयास और इस को प्रदर्शन करने  यांत्रिक भौतिक इच्छाशक्ति (Volition/Will power) का प्रतीक है! शिशु वृद्धि होने व बड़ा होने समय में मा का 100% आज्ञापालन करता रहता है! यह इच्छाशक्ति (Will power) का प्रतीक है! शिशु बड़ा होने समय में अपना इच्छा का प्रतिकूल छीजो को नहीं करना अंधा इच्छाशक्ति (Will power) का प्रतीक है! मोटारवाहनों को शीघ्र गति से चलाना, मद्यपान, धूम्रपान और नशीला पदार्थो को सेवन करना इत्यादि अंधा इच्छाशक्ति (Will power) का प्रतीक है! ऐकेंद्रिय जीवों व कीडे मकोड़े आकर्षण का हेतु आग में  गिरके मर जाता है!  इंद्रियों को नियंत्रण क्रियायोग साधना से करना चाहिए! नहीं तो वह व्यक्ती अंधा इच्छाशक्ति (Will power) का वश हो के भ्रष्ट हो जाएगा!                           
दो मेंडक (Frogs) बड़ा क्षीर पात्रा में गिरगया! उस पात्रा से बाहर आने को प्रयत्न किया! एक मेंडक थक के अपना प्रयत्न बीच में तयाग के मर गया था! परंतु दूसरा मेंडक निरंतर प्रयत्न करता रहा! तैरता रहा! तब वह दूध माखन का ढेर बन गया! उस माखन का ढेर से वह मेंडक कूद के बाहर निकलाया है! अपना प्राण बचाया! वैसा ही हर एक व्यक्ति क्रियायोग का माध्यम से अपना दिव्यशक्ति को अभिवृद्धि करा सकता है!
इधर उधर खाने से अजीर्ण हो जाएगा! वैसा ही जैसा मर्ज़ी ग्रंथों पड़ने से अहंकार में बढावा आयेगा! एक ही सद्गुरु का अनुसरण करना चाहिए! गुरुओं को बदलते रहने से आध्यात्मिक अजीर्ण मिल जाएगा! अच्छा सद्गुरु लभ्य होने का पश्चात् गुरु के लिए खोजना बंद करना चाहिए! मधु सेवन करने का बाद उस का मिठापन् विशदीकरण कर सकता है! अधिचेतनावस्थ प्राप्ति करके परमात्मा का साथ अनुसंधान किया हुआ साधक का चेहरा दिव्यचेतना से प्रकाशित होगा, और उस मधुरानंद को सब को दिखाई देगा!

रि

सत्

तत्

सत का अर्थ सत्तावाला (Potential energy)! सत् का किरणों ही माया नाम का गोळ में गिरता है! उस गोळ का अन्दर गिरता हुआ किरणों को ही तत् कहते है! इसी माया व तत् को सृष्टि का अन्दर का परमात्मा व श्री कृष्ण चैतन्य कहते है! वे श्री कृष्ण चैतन्य का किरणों जब बाहर विकेन्द्रीकरण करता है तब नाश व हरी होने वाला सृष्टि बन जाता है! समस्त जीवकोटि उस नाश होने का सृष्टि अन्तर्भाग है! है एक ही है! वह ही सत है! वह सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापी और सर्वज्ञ है! सत् चित् आनंद् है! इस का नाम और रूप जोड़ने से हरी व नाश होनेवाला सृष्टि बनजाता है! सृष्टि का कारण अनेक प्रकार का दिखाई देनेवाला और वैसा भाव में डालने वाला माया ही है! मा= नहीं या= यदार्थ, यानी जो यदार्थ नहीं है वह ही माया है!
परमात्मा का स्वप्न ही माया है! इसी को परमात्मा का लीला कहते है! भयंकर स्वप्न स्वप्नाके भय से कांपने व भयभीत होनेवाला मनुष्य नेत्र खोलने से भय दूर भाग जाता है! वैसा ही माया से बाहर आने के लिए क्रियायोगासाधना अत्यंत आवश्यक है! वह क्रियायोगासाधना सर्व जन्मों में दुर्लभ जन्म मानावाजन्म में ही साध्य है! सर्व जन्मों में मनुष्य जन्म उत्तमोत्तम है! सत् का अर्थ परमात्मा! उस परमात्मा को पाने के लिए नाश होने हरी से शब्दब्रह्म ॐकार में शब्दब्रह्म ॐकार से तत् में तत् से सत् में जाना चाहिए!
पहला गोळ सत् एक प्रकाशवंत दिया समझो! दूसरा गोळ तत् समझो! यह तत् एक काँच का गोळ समझो! सत् नाम का दिया से कुछ किरणों ही तत्  का काँच गोळ में प्रवेश करेगा! इसी हेतु सत् तत् में भी होगा, तत् का अतीत यानी बाहर भी होगा! सत होने से ही तत होगा!
तीसरा गोळ ॐ! यह ॐकार ही सृष्टि का हेतु और परावर्तन है! कुछ भी उत्पन्न होने के पहले शब्द मिलता व आता है! शब्द उत्पन्न होने का बाद नेत्र को दिखाई देने वाला वास्तु उत्पन्न होता है! यह ही हरी व नाश होने वाली जगत् है! इसी हेतु कोई भी शुभकार्य हरी ॐ तत् सत् कहके प्रारंभ करना चाहिए! इस का अर्थ नाश होने वाली हरी से नाशरहित सत् में प्रवेश करना चाहिए! जगत में परमात्मा बिना कुछ भी नहीं है! आकाश सब चीज को अपने में जगह देता है! घन पदार्थ द्रव पदार्थ का रूप में, द्रव पदार्थ भाप का रूप में, भाप विद्युत् का रूप में, और आखरी में विद्युत् परमात्मा में ममैक होता है! परमात्मा का परावर्तन (reflection/refraction) ही पदार्थ है! हमको दिखाई देड्नेवाला घनपदार्थ वास्तव में भौतिक नेत्र को दिखाई नहीं देड्नेवाला अणुओं परमाणुओं का मिश्रित ही है!
हम नींद में कुछ दुर्घटना में बहुत घायल होगया, हम को शादी हुआ, राजा बनगया, तीन बेटे हुआ, कुछ अरण्य में शिकार करने गया उधर हमारा पीछे शेर धौड के आ रहा है इत्यादि स्वप्नाते है! भय से नेत्र खुलने से सामने कुछ भी नहीं हुआ देख के शांति से हॅसते है! इसीलिये परमात्मा में हर एक क्षण रहना, सोना, उठना यानी हर एक कार्य परमात्मा में रहकर करने से कोभी चिन्तना नहीं होगा! परमात्मा चेतना का साथ नित्यं विराजमान योगी इस जगत का नैतिक बाधाओं मानसिक बाधाओं इत्यादियो साधक नहीं पहचानेगा! ए सब मिथ्या समझेगा और उसी दृढ़ संकल्प का साथ रहेगा! प्रत्यक्षा और अनुमान प्रमाणों का माध्यम से परमात्मा को प्राप्ति नहीं कर सकता है! परमात्मा तर्क का अतीक है! मात्र आगम अथवा अंतरज्ञान (Intuition) माध्यम से ही परमात्मा उपलब्ध होगा! ॐकार स्पन्दनायें परमात्म का हेतु उत्पन्न होता है! ॐकार ही इस जगत का हेतु है! ॐकार ध्यान का माध्यम से ही परमात्मा उपलब्ध होगा करके पतंजलि महर्षि ने कहा है!
इस ॐकारनाद तैलधारामिवच्छिन्नं (Continuous smooth flowing oil), दीर्घघण्टानिनादवत् (long peal of gong Sound), अवाच्यवादांश्च (unutterable) यानी उच्चारण का अतीत, प्रणव (ever new, ever inspiring) यानी नित्य प्ररेणा करनेवाली, यस्तं वेद स वेदवित् (who he who knows that as such he knows veda or all Truth to be known) वह ही वास्तव में ज्ञानग्राही व जाननेवाला है! इस ॐकार समस्त अणुओं से उत्पन्न होता है! जहा कार्य (Activity) है वहा अवश्य शब्द उत्पन्न होगा! रेडियो शब्दों व स्पंदनों कान को सुनाई नहीं देगा! वे रेडियो का माध्यम से ही सुन सकताहै! वैसा ही इस ॐकार को क्रियायोगासधना का माध्यम से आसानी से सुन सकता है!
ॐकार उच्चारण दीर्घ व मध्यम व लघु पद्धतियां से ऊंची स्वर से अथवा मनस् में अथवा उपांसु रीती में कंठ में विशुद्धचक्र में ऐसा विविधाप्रकारों में  कर सकते है! इन सब से अधिक मुख्या है अंतर्मुखी होकर इंद्रियों को नियंत्रण कर के प्रत्याहार और प्राणायाम पद्धतियां में ॐकार को सुनता हुआ उस में ममैक होकर परमात्मा का अनुसंधान होना अति उत्तम है! सर्व भाषाओं का मूल है यह ॐकार! मानव चेतना का परमात्मा चेतनाका के बीच में वारधि है यह पवित्र ॐकार! ॐकार सर्वव्यापी है! मात्र एक आदा बार सुनने में तृप्ति नहीं होना चाहिए! आध्यात्मिक तोड़ में आगे  बढगई क्रियायोग साधक इस पवित्र ॐकार को भूमि, आकाश, आगे, पीछे, चारों ओर सारे दिशा में व्याप्ती हुआ अनुभव पायेगा! अदभुत ज्ञान, नित्यचेतना, नित्यनूतन, आनंदाभरित प्रणवनाद जैसा अनुभूति पायेगा और अवगाहन करेगा इस पवित्र ॐकार नादं को क्रियायोगसाधक!
क्रियायोगसाधना का ॐ प्रक्रिया का माध्यम से जो साधक ॐकार सुनने को साध्य किया है वह साधक सूक्ष्मलोक केन्द्रों और प्राणशक्ति का स्पन्दनों को अपना मेरुदंड में सुन सकता है! इस तरफ का साधक अपना भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक विषयवस्तुवों का उपर एकाग्रता ठीक पंथा में और सुनायास रीति में लगा सकेगा! 8x2=16  जितना सत्य है यह भी इतना ही सत्य है!
सोऽहं और ॐ प्रक्रियों को लययोग कहते है! क्रियायोगासाधना में इन प्रक्रियों अन्तर्भाग है! ॐकार हर एक चक्र में अलग प्रकार की आवाज सुनाई देगा! मूलाधारचर्क्र में झूमकरके कीड़ा का शब्द जैसा, स्वाधिष्ठानचर्क्र में बन्सिरी वादन जैसा, मणिपुरचर्क्र में वीणा नाद जैसा, अनाहतचक्र में घंटा नाद जैसा, विशुद्धचर्क्र में नदीजल प्रवाह शब्द जैसा, आज्ञाचक्र में सब मिलके ॐकार शब्द का रूप में सुनाई देगा! परन्तु प्रथम में ही ॐकार नाद सुनाई देने से बाकी शब्दों का उपर ध्यान रखने को अवसर नहीं है! इस प्रणव नाद में ममैक हुआ साधक अपना ही चेतना चारों ओर फेलाहुआ करके महसूस होता है! तब मई ही शिवोहंयानी परमात्मा आईटीआई ग्रहण करता है! जब जब अवकाश मिलता है तब तब निःशब्द में बैठ कर ॐकार सुनने को प्रयास करना चाहिए! ॐकारश्रवणं हम दिव्यात्मसंभूत करके ग्रहण करनेदेगा! भौतिक सुख ऐश्वर्य इत्यादि चीज इस आध्यात्मिक ऐश्वर्य का सामने कुछ भी नहीं है करके ग्रहण करने देगा! हम जैसा बीज डालेगा वैसा ही फल लभ्य होगा!  अच्छी क्रियायोगसाधना करने से जरा रुग्मता कष्टों इत्यादि हम से दूर होजाएगा!
आगम (Intuition or Soul perception) शास्त्र का अर्थ वेद वेदांगों इति नहीं बल्कि आत्मबोध इति है! आत्मबोध को अभिवृद्धि करना चाहिए! धुल से मैला हुआ गंदा काँच का दरवाजों को साबुन साफ करने से वे सूर्यकान्ति को अन्दर आने देगा! वैसा ही अनावश्यक वृत्तियों से इन्द्रियोंको निर्वीर्य नहीं करना चाहिए! क्रियायोगसाधना माध्यम से इन्द्रियोंको शक्तिवर्धक करना चाहिए! तत् माध्यम से आत्मबोध को अनुभवसहित अभिवृद्धि करना चाहिए!
जितना भी दिमागी व्यक्ती हो व्यापार में धन लगाने (Investment) में, अपना मनपसंद वृत्ति मिलने के लिए, व्यापार में ठीक भागस्वामी/साझीदार (Business partner) को लेने के लिए, विद्या इत्यादि विषयों में गलत कदम उठाना हम को दिखाई देता है! इसीलिये व आत्मबोध का माध्यम से ठीक निर्णय लेके अपना अपना वृत्ति व्यापारों में सफलीकृत होना चाहिए! परमात्मा को ज्ञानेंद्रिया कर्मेन्द्रिया इत्यादि नहीं होता है! इन का उपर आधारित नहीं होके परमात्मा मात्र केवल आत्मबोध का माध्यम से इस जगत को चलाता है! इसीलिये कुछ भी कार्य प्रारम्भ करने के पहले कुछ समय ध्यान करके उपक्रमण करना चाहिए! कस्तूरी मृग का नाभी में ही कस्तूरी होता है! परन्तु वह उस कस्तूरी मृग को पता नहीं है! इसीलिये उस कस्तूरी के लिए चारों ओर पागल जैसा निरंतर धौडता रहता है! वैसा ही आत्मबोध के लिए कही भी जाने को आवश्यकता नहीं है! निश्चल स्थिति में बैठ कर कुछ समय क्रियायोगध्यान करने से काफी है! वह आत्मबोध लभ्य होजाएगा! अनावाश्यक कार्यों से, गपशाप में, अधिक निद्रा में, अनावाश्यक दावतों में, इत्यादि व्यर्त्ध व्यापकों में समय खराब नहीं करना चाहिए! मादक द्रव्यों व नशीली पदार्थों का सेवन, धूम्रपान, मद्यपान, मांस भक्षण इत्यादि विषयों को दूर रहना चाहिए! पढाई व्यापार (Business) काम इत्यादि करते रहना है! वे हम को मुख्या है ही है! शारीरक व्यायाम, स्नान और क्रियायोगासाधना अत्यंत मुख्या है! ध्यान का समय में अन्य व्यापकों से मन को भरना नहीं चाहिए! प्रशान्तचित्त से ध्यान करना चाहिए!
अवसर से ज्यादा संज्ञाशील (Sensitive) होना भी नाडी संबंधित बलहीनता ही है! इसी हेतु मूडी (Moody) जैसा रहना, अन्यों का उपर अनावश्यक कोध डालना इत्यादि दुर्गुणों का रास्ता बनता है! इस को नियंत्रण करना अत्यंत आवश्यक है! इस को नियंत्रण करने के लिए इंद्रियों को निग्रहण करना अत्यंत आवश्यक है! अहंकार (Ego) को शरीर से निकाल के आत्म व परमात्मा का साथ जोड़ने से सुख दुःख, शीतल उष्ण, क्लेश आनंद, इत्यादि इंद्रियसंबंधित द्वंद्वों से आसानी से बाहर आसकता है!
तितीक्षा का अर्थ शरीर को धूप में, वायु में अथवा वर्ष में हिंसा केंद्र बनाओकर के नहीं है! इंद्रियों का अनुभव भावना का माध्यम से व्यक्त होता है! हम जितना विषयवस्तु का उपर आसक्ति दिखायेंगे इतना ही जोर से विषयवस्तु हमारा उपर प्राभावित करेगा!
इस जगत परमात्मा का अन्दर का माया स्पंदनों से उद्भव हुआ है! जगत् मिथ्या ब्रह्मा सत्यं! पदार्थ यदार्थ नहीं है! मनस् और पदार्थ दोनों है करके चेतना होना ही चाहिए!
थोड़ा गहराई में जाइए! हम जो घनपदार्थों जो देखरहे है वे वास्तव में अलग अलग रहा अणुओं परस्पर आकर्षित होकर एक जगह में लाया हुआ समग्र अणुओं का समूहों ही है! पदार्थ कम मायास्पन्दाना है, मनस अधिक मायास्पन्दाना है! इसी कारण लकड़ी का लट्ठा, पत्थर, लोहा इत्यादि चीजें भी माया स्पंदना का अंतर्भाग है! उन चीजों का अंतर्गत स्पंदनों में व्यत्यास परमात्मा का अंतर्गत माया का निर्देशन ही है! मनस् एक तरफ का स्पंदना होने से पदार्थ दूसरा तरफ का स्पंदन है!
मनस् ही देखता है, सुनता है, सूंघता है, चखता है, स्पर्शन करता है! हर एक व्यक्ति व व्यष्टि (Micro) का गलतियाँ का हेतु है कुंडलिनी (Illusion)! समिष्ट (Macro) गलतियाँ का हेतु है माया (Delusion)! इसी को अविद्या (Ignorance) कहते है! हमारा इंद्रियाँ, मनस्, तर्क, इत्यादि पदार्थ का लक्षणों (Phenomena-appearance of substances) को पाक्षिक रूप में कह सकता व वर्णन कर सकता है! परंतु ज्यादा तरफ पदार्थ का असली स्वरुप (Noumenon-real substance) को बोल नहीं पायेगा! अगर वर्णन करने (describe) से भी तर्कातीत परमात्मा को देश कालों को परिमित करना अनुचित है!
व्यक्तियों को केवल उनका कुटुंब का साथ व देश का साथ ही परिमित करना, मनोकेंद्र से उत्पन्न हुआ बाधायों को शारीरक परिमिति करना, घन द्रव वायु प्राण विचारों और भावनाए का बीच का सम्बन्धों को हक्का बक्का (Confuse) कर देना, जनन मरणों का बारे में अवगाहन नहीं होने देना, अल्पभूइष्ट इस शरीर को गरिष्ठ है करके समझने देना, दुष्ट भावनों को अच्छा भावनों करके मन को हक्का बक्का (Confuse) कर देना, अच्छा भावनों का बदल में दुष्ट भावनों में ही मन को निमग्न करना, पदार्थ ही नित्य है, पदार्थ का अन्दर का परमात्मा ही यदार्थ नहीं है इति हम को हक्का बक्का (Confuse) कर देना, जो दीखता है वह ही सत्य है, बाकी सब असत्य है इति हम को हक्का बक्का (Confuse) कर देना, ए सब माया का नाटक का अंतर्भाग है! अहंकार का वजह से हम प्रकृति से अलग है इति समझना ही है! प्रकृति से हम अलग नहीं है! हम प्रकृति का अंतर्भाग है! वैसा जब हम ग्रहण करेंगे तब हम को कोई भी बाधाएँ नहीं होगा! श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी श्री विवेकानंदा, भगवान रमण महर्षि, इत्यादि महापुरुष शारीरक बाधाओं को मानसिक नियंत्रण से मानस से अलग कर देते थे! इसी कारण बाधाएँ  कभी भी उन महापुरुष लोगों को बाधा नहीं देते थे!
क्रियायोगसाधना द्वारा साधक परमात्मा से अनुसंधान करता है! यदार्थ ग्रहण करता है! जीवन को माया से अलग करता है! बाधावों से विमुक्त पाता है! आनंदप्राप्ति करता है!
आधुनिक वैज्ञानिक शास्त्र पदार्थ में विद्युत अयस्कांत तरंगों से भरा पडा है, इन तरंगों घनीभवन हुआ कांतिकिरणों ही है करके निरूपण किया है!
माया परमात्मा का अंतर्भाग है! इन कांतिकिरणों उस माया का स्पंदनों ही इति वेदांती लोग कहते है! परमात्मा को भूत, वर्त्तमान और भविष्यत काल नहीं है! परमात्मा नित्य है! परमात्मा देश और कालों की अतीत है! पत्थर, आकाश में बिजली (lightining), दिन, रात ए सब वास्तव में हमारा विविध प्रकारों का विचारों का घनीकरण ही है!मनुष्य साधारण तोड़ में अपना इंद्रियों का उपर आधारित होकर निर्णय लेता है! ए सब इतना भरोसेमंद नहीं है! आत्मबोध आधारित निर्णयों 100% भरोसेमंद है! अंडा का अन्दर का पक्षी जैसा परिस्थितियों का गुलाम नहीं होना चाहिए! बाहर एक पशु भी अपना जीवन बिता रहे है, हम भी बिता रहे है जैसा जीवन नहीं बिताना चाहिए! उपर का छिलके (Shell) तोड़ के बाहर आके उड जानेवाली विहंग जैसा क्रियायोगासाधना कर के परमात्मा से अनुसंधान होने जैसा साधक/मनुष्य रहना चाहिए!
प्रातः जागने के बाद  20-30 मिनट क्रियायोगध्यान करना चाहिए! तत् पश्चात् काम के लिए उपक्रमण करना चाहिए! समय मिलने पर क्रियायोगध्यान करना चाहिए! गपशप में समय वृधा व व्यर्ध नहीं करना चाहिए! मानव जन्म पाने के हेतु क्रियायोगध्यान करना चाहिए! मानव जन्म, मुमुक्षत्व और महापुरुष दर्शन ए सब अति दुर्लभ है! ग्रंथपठन से शुद्धज्ञान मिलना असंभव है! बल्कि अहंभाव आ जायेगा! एकी जन्म में शुद्धज्ञान पाना भी असंभव है! परमात्मा चेतन का अर्थ सर्वज्ञत्व है! परमात्मा का अनुसंधान करने से सर्व विषय ज्ञान इसी जन्म में ही सुसाध्य है!
श्वास को अस्त्र जैसा उपयोग करना ही श्वास्त्र है! वह क्रमशः शास्त्र हो गया है! श्वास को अस्त्र जैसा उपयोग करना जाननेवाला ही श्वास्त्री है! वह क्रमशः शास्त्री हो गया है! ऐसा श्वास को अस्त्र जैसा उपयोग करना जाननेवालों एक शास्त्री यह कौता मार्कंडेय शास्त्री है!
हम अपना आत्मप्रबोध को अभिवृद्धि करना चाहिए! वैसा अभिवृद्धि किया हुआ आत्मप्रबोध का माध्यम से काम करना अभ्यास करना चाहिए! मै अपना काम करने के लिए परमात्मा का प्रमेय का क्या आवश्यक है, कितने लोग इस आत्मप्रबोध से काम करता है, उस आत्मप्रबोध नहीं होते हुए भी कई लोग भाग्यशाली हुआ है करके बोलते है और पूछते है! परंतु आत्महत्या इत्यादि इन्ही लोग में ज्यादा होना हम देखते है! हम नहीं जानते हुआ मरण की ओर रोज रोज अचेतानापूर्वक प्रयाण करते है! क्रियायोगी सचेतानापूर्वक मरण की ओर प्रयाण करता है! हम अभी छोटे है, ध्यान करने के लिए भविष्यत में बहुत समय है करके स्थगित करते है! अशांति का वश होकर परमात्मा को खोजना शुरू करते है! वैसा अनाडी लोगों को मभ्य करके परमात्मा को दिखायेंगेकर के पैसे वसूल करते है! पेट में दर्द होने से दूसरा आदमी दवाई लेने से हमारा उदर का दर्द कैसा ठीक हो जायेगा? परमात्मा का अनुसंधान बाजार में नहीं मिलता है! वह केवल तीव्र क्रियायोगसाधना का माध्यम से ही लभ्य होता है! हर एक व्यक्ती को दो लक्ष्य होना चाहिए!   (1) भगवान को जानना  (2) उसका पुत्र का रूप में इस भूमि का उपर हमारा पात्रा को ठीक तरफ से निभाना चाहिए! परमात्मा ही यदार्थ है बाकी सब मिथ्या है!
भौतिक विषयों में ज्यादा आसक्ति हुआ मनुष्य को दूरदृष्टी और ठीक ढंग का विचारों नहीं होता है! परिमित चीज ही मांगेगा! क्रियायोग ध्यानपूर्वक साधक केवल परमात्मा का अनुसंधान करनेवाली नित्य ज्ञान और सुख को ही वांछित होता है!
सद्गुरु:
परमात्मा से दूर हुआ लोग ही असली में अनाडी लोग है! वैसा अनाडी लोगों को ठीक रास्ता में रख ने को केवल सद्गुरु का द्वारा ही परमात्मा का साथ अनुसंधान शीघ्र और सुगम होता है!
गुरु का अर्थ साधारण शिक्षा देनेवाला! उस शिक्षा पानेवालों को विद्यार्थी कहते है! परमात्मा का साथ अनुसंधान करने का तरीका सिखानेवाला गुरु को सद्गुरु कहते है! उन बच्चों को चेला व शिष्य कहते है! सद्गुरु का नेत्र  निश्चल, तीक्ष्ण और आर्द्रता से भरपूर होता है! नियंत्रित श्वास और नियंत्रित मनस् का साथ गंभीरतापूर्वक और हुंदापन् से विराजमान होता है सद्गुरु! सरळता सुन्नित हास्य महत्वपूर्ण भाषा ये सब उन का वादन में द्योतित होता है!
सद्गुरु को विश्वास कर के उन का दिशा निर्देशन का मार्ग में चलना चाहिए! भगवान का साधक का मध्य में सद्गुरु वारधि है! जन्मतः आनेवाले वासनों का साथ रहना और कर्मो करना स्वेच्छा नहीं है! हमारा अन्दर का दुर्गुणों और हमारा दुर्व्यसनाओं को ठीक करने वास्ते माता पिता कभी कभी कठिनाई प्रदर्शन करते है! इसका का अर्थ वे नियंत लोग नहीं है! माता पिता हम को जन्म दिया है! सद्गुरु हम को ज्ञान प्रदान करके परमात्मा का पास लेजाएगा! इसी कारण सद्गुरु दिशा निर्देशन देने समय कभी कभी कठिनाई प्रदर्शन करेगा! हमारा स्वतन्त्रता का भंग हो रहा है करके हमको लगेगा! परन्तु परमात्मा का अनुसंधान ही असली और नित्य स्वेच्छा है! भौतिक इंद्रिय विषयों को वश होने वाला बानिसत्वा (slavery) अशाश्वत है!
स्वार्थ का साथ वांछनीयता का साथ मै तुम को यह दिया हु, तुम मुझे वह देदो व तुम मुझे क्या डोज?’ वैसा तत्व सहित साधारण मानवप्रेम अशाश्वत है! दिव्यप्रेम अजरामर शाश्वत नित्य और परमानंदमय है!
मै इस आध्यात्मिक जीवन में आने के पश्चात् सद्गुरु का प्राधान्यत कितना महत्वपूर्ण है समझ्गया! हम खुद ही खुद को शत्रु है, वह बात हमको पता नहीं है! हम निश्चल बैठना नहीं सीखते है, भगवान के लिए समय नहीं काट्ते है! असहान से स्वर्ग तुरंत मिलना इति चाहते है! ग्रंथपठन से व धर्मकार्यो करने से व धर्मोपन्यासों सुनने से वह प्राप्त नहीं होता है! तीव्र क्रियायोगध्यान् का माध्यम से भगवान के लिए कुछ समय लगा के प्रातः और संध्या दोनों समय निश्चित रूप से गेहरा ध्यान करने से ही भगवान को प्राप्त कर  सकता है!
पुनर्जन्म:
जड़ (inert) से लेकर मनुष्य तक विविध रूपांतर होने वाला परमात्मा शिवा और कौन हो सकता है? विश्व में सारे चीजें परमात्मा की अंश है! पदार्ध (matter) यदार्धी परमात्मा को छिपाता है! पदार्ध से लेकर यदार्ध तक बहुत कुछ रूपांतरण जो भी हो रहा है वह सब परमात्मा की अंश का प्रदर्शन ही है! इन रूपांतरों को प्रदर्शन करनेवाली है पुनर्जन्म सिद्धांत! पदार्ध में खैद हुआ जैसा दिखाईदेनेवाली परमात्मा का अंश पदार्ध नहीं होने से भी (existing) है, पदार्ध को परिमित पदार्ध में खैद होने का समय में भी थी, और क्रियायोगसाधना का माध्यम से जब पदार्ध से मुक्त होकर बाहर निकलता समय में भी है! पुनर्जन्म सिद्धांत तार्कितका का बाहर है! मरण और निद्रा इन दोनों को सचेतनापूर्वक और सहेतुकता से समझने के लिए क्रियायोगसाधना ही केवल सहायभूत होगा! बाकी अन्य प्रक्रियॉ कोई भी काम में नहीं आयेगा!
क्रियायोगसाधक को आत्मा साक्षात् आकार रूप में दिखाई देगा! इसी को आत्मसाक्षात्कार कहते है! परमात्मा का अनुसंधान होने वाले इस स्थिति प्राप्ति होने के लिए न केवल मात्र एक जन्म काफी नहीं है! हमारा अन्दर का दोषों को जड़ से निकालके फेंकना यानी परिपूर्ण निर्मूलन करना चाहिए! ऐसा परिपूर्ण निवृत्ति करके पवित्र होना चाहिए! हम परमात्मा से ही आएं है! इसी हेतु इन विविध प्रकार का उपाधियों नाम का किराया घरों से हम अपना निज घर अथात् परमात्मा का पास आज नहीं तो कल यानी कभी न कभी जाना ही है! इस आत्मा नित्य और शुद्ध है! जब शरीर में परिमित होने समय अहंकार और अशुद्धि कपड़ा पहिना हुआ होता है! वैसा मभ्य करनेवाली मैला कपड़ा छोड़ने से ही आत्मा परमात्मा का मिलन लभ्य होगा! इस नाश होने शरीर का साथ नाटक करने के लिए परमात्मा अपना अविनाशी अंश को भेजता है! अपने में ही इस शुद्ध अविनाशी आत्मा उपस्थित करके ग्रहण करने हेतु ही इस मानव जन्म का अंतरार्थ है! वह भूल के शरीर इंद्रियाँ और वासनाओं इत्यादियों को वश होने का वजह से ही हम को ए सब बाधायें होता है! इस का अर्थ सभी लोग ऋषि मुनि जैसा बदलने के लिए नहीं कहते है! वैसा सब बदल भी नहीं सकते! परमात्मा का लीला को समझ कर हम अपना अपना पात्रों को ठीक ढंग से इस भुवी का नाटक में निभाना कर के अर्थ है! हम कुछ न कुछ दिन इस शरीर नाम का बन्दिखान को त्याग करना ही हैना? इस शरीर नाम का खैद से क्रियायोगसाधना का माध्यम से सचेतानापूर्वक बाहर निकलना और अपना इच्छानुसार पुनः इस शरीर में वापस आना सीखना चाहिए! परमात्मा अपना लीला जब संकल्प किया, प्रारंभ में अपना अंश को अचेतानापूर्वक जड़पदार्थ जैसा व्यक्तीकरण किया था! पश्चात् प्राणसहित विविध प्रकार का सुंदर रूपों में वृक्षों जैसा व्यक्त किया! तत् पश्चात् प्राण और गमनसहित पक्षियों और पशुओं जैसा व्यक्तीकरण किया था! तत् पश्चात् अपना भावों को समझनेवाले तार्किकशक्तिसहित मनुष्य जैसा व्यक्तीकरण किया था!
एक ही जन्म में परमात्मा का सर्वव्यापकत्व समझने को केवल क्रियायोगसाधना का माध्यम से ही साध्य है! केवल इस मनुष्य ही आगे बढ कर ऋषि हो कर परमात्मा खुद ही है कर के समझाने का स्थिति में पहुंचकरसका! इंद्रियों को नियंत्रित करके पदार्ध से यदार्ध यानी परमात्मा तक ले जाने वाला मार्ग इस क्रियायोगसाधना है! धर्मबद्ध काम्यकर्मो करता हुआ इस शारीरक बंधनों से बचकर किसी चीज में बंधन नहीं होता हुआ परमात्मा में ममैक होना चाहिए!
शारीरक, मानसिक, आध्यात्मिक संगत ही मनुष्य है! अच्छी तंदुरुस्ती का साथ साथ अच्छी तरह भूख होने से भी खाने को नहीं होना और खाना खरीदने को पइसा नहीं होना दुर्भर है! पइसा होने से भी अजीर्ण का वजह से खा नही सकना भी दुर्भर है! आरोग्यवान होता हुआ आस पड़ोस का साथ और घर का अन्दर शांति नहीं होना और नित्य कलहप्रिय लोगों का बीच में मानसिक अशांति का साथ जीवन बिताना भी दुर्भर है! आरोग्य, धन और  विचार करनेवाला मन होता हुआ सब से उत्तमोत्तम  और सत्य वस्तु परमात्मा को नहीं पाना भी सब से दुर्भर चीज है! हम जो भी काम कर रहे, बड़ा हो छोटा हो, सब काम परमात्मा का ही समझना चाहिए! ईश्वर ने हम को दिया हुआ काम श्रद्धापूर्वक उसका परिपूर्ण संतृप्ति के लिए करना चाहिए! तब सारे विश्व शक्तियों हमको अवश्य सहायता करेगा! यह निस्संदेह है!
भौतिक शरीर 16 मूलपदार्थो (elements) का मिलन है! 24 तत्वों का सम्मेलन है! मानव शरीर पतनानंतर उस भौतिक 16 मूलपदार्थो (elements) और 24 तत्वों का माध्यम से पुनः शरीर सृष्टि नहीं कर सकता है! इस स्थूल शरीर का अंदर 19 तत्वों का सूक्ष्म शरीर उपस्थित है! इस सूक्ष्म शरीर का अंदर 8 तत्वों (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, इति पंच भूतों और सत्व, रजो, तमो गुणों का साथ) का कारण शरीर उपस्थित है! सूक्ष्म  और स्थूल शरीरों का निर्माण भावना इस कारण शरीर का माध्यम से ही होता है!
मनुष्य और तीन शरीर:
मनुष्य के तीन शरीर है!  स्थूल शारीर,  अंदर सूक्ष्म शारीर, और उसका अंदर कारण शारीर उपस्थित है! इस कारण शारीर का अंदर इन तीनोँ शरीरों को स्थतिवंत करने के लिए व्यष्टात्मा रहता है!
भौतिक, आरोग्य और सांघिक धर्मों स्थूल शारीर को अनुवार्तित होता है! 
नीति नियमों मनस्तत्व विषयों  जन्मांतर संस्कारों  इच्छाएं विचारों सूक्ष्म शारीर को अनुवर्तित होता है!
आध्यात्मिकता दिव्यप्रकृती और परमात्मा का साथ अनुसंथान होना कारण शारीर को अनुवर्तित होता है!
कारण शारीर परमात्मा का समीप होने का नातिर बाकी सूक्ष्म और स्थूल शरीरों स्थितिवंत होने का शक्ति और सहजावाबोधना कारण शारीर से सूक्ष्म शरीर को,  सूक्ष्म  शरीर से स्थूलशरीर को लभ्य होता है! परमात्मा का साथ अनुसंथान होने के लिए प्रथम मे स्थूल, उसके बाद सूक्ष्म और कारण शरीरों को समायत्त करना चाहिए!  
परमात्मा मनुष्य को इच्छाशक्ति प्रसाद किया है! पीढा, आनंद, इन्द्रिय विषयानंद इन सारें चीजें आखिरी मे स्थूलशरीर ही अनुभव करती है! मनुष्य इस स्थूलशरीर से दोष नहीं करने तक  दंडनीय नहीं होता है! मनुष्य आखरी क्षण तक शोचके कदम उठाना  अत्यंत आवश्यक है!
स्थूल सृष्टि 24 तत्वों से समायुक्त है! पञ्चज्ञानेंद्रियाँ,  पञ्च कर्मेन्द्रियों, पञ्च प्राणों, पञ्च तन्मात्राओं और चार अंतःकरण कुल मिलाके 24 तत्वों है! 
पञ्च ज्ञानेंद्रियाँ
पञ्च कर्मेन्द्रियों
पञ्च
प्राणों
पञ्च तन्मात्राओं
चार अंतःकरण
कुल मिलाके
24 तत्वों

सूक्ष्म सृष्टि 19 तत्वों का समावेत है!  वे  5 ज्ञानेंद्रियों, 5 कर्मेन्द्रियाँ, 5 प्राण, 4 अंतःकरण! इस सूक्ष्म सृष्टि भौतिक नेत्र को दिखाई नहीं देगा!

5 ज्ञानेंद्रियों
5 कर्मेन्द्रियाँ
5 प्राण
4 अंतःकरण
कुल 19  तत्वों

कारण सृष्टि 8 तत्वों का समावेत है! वे  आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी इति पंच भूतों और सत्व, रजो, तमो गुणों!
जीवात्म, कारण सूक्ष्म शरीरों, हम भूत में किया हुआ दुष्ट और शिष्ट कर्मो कुल मिलाके इस स्थूल शरीर पाने को कारण है!
एक काँच का बोतल (Glass bottle) में पीला रंग (कारण) पानी डाल के ढक्कन लगाइए! दूसरा बोतल में लाल रंग (सूक्ष्म) पानी डालिए! अब पीला रंग (कारण) बोतल को लाल रंग (सूक्ष्म) पानीवाला बोतल में डालिए! तीसरा बोतल में नीला रंग (स्थूल) पानी डालिए! इस बोतल में पीला और लाल रंग बोतल को डालिए! ढक्कन लगाइए! अब तीन बोतलोवाला बोतल को एक बड़ा काँच का सफ़ेद पानीवाली बाल्टी में डालिए! अब सबसे बड़ी नीला रंग (स्थूल) बोतल खोलिये! नीला रंग (स्थूल) बाल्टी का सफ़ेद पानी में मिलजाएगा! परन्तु लाल रंग (सूक्ष्म) और पीला रंग (कारण) पानी वैसा की वैसा ही रहेगा! बाल्टी का सफ़ेद पानी में मिल नहीं जाएगा! वैसा ही स्थूल शरीर पतन होने से भी सूक्ष्मौर कारण और उस का का अन्दर का मलिन नहीं जाएगा! और वे परमात्मा में नहीं ममैक होगा! शुद्धात्म तीन प्रकार का अविद्या शरीर में बंदी हुआ ही इस का कारण है!
कारण शरीर कुल मिलाके 8+19+24=51 तत्वों का आलवाल है!
उन में कारण शरीर संबंधित (1) आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी इति पंच भूतों और सत्व, रजो, तमो गुणों कुल मिलाके 8 तत्वों,
(2) सूक्ष्म सृष्टि 19 तत्वों का समावेत है!  वे  5 ज्ञानेंद्रियों, 5 कर्मेन्द्रियाँ, 5 प्राण, 4 अंतःकरण! इस सूक्ष्म सृष्टि भौतिक नेत्र को दिखाई नहीं देगा!
(3) स्थूल सृष्टि 24 तत्वों से समायुक्त है! पञ्चज्ञानेंद्रियाँ,  पञ्च कर्मेन्द्रियों, पञ्च प्राणों, पञ्च तन्मात्राओं और चार अंतःकरण कुल मिलाके 24 तत्वों है! यह 24 तत्वों और 16 (Elements) मूल पदार्थोँ स्थूलशरीर निर्माण का हेतु है
सूक्ष्म सृष्टि 19 तत्वों-- (1)मनस् (इंद्रियचेतना), (2)बुद्धि (निश्चयात्मक), (3)चित्त (भावना) और (4)अहंकार +  पाँच ज्ञानेंद्रियों (नेत्र, नाक, कान, त्वचा और जीब) + पाँच कर्मेन्द्रियों (गुदास्थान, मुख, लिंग, पाणी और पादम्) + पाँच प्राणों (प्राण, अपान, व्यान, समान, और उडान)!
1)प्राणवायु = स्फटिकीकरण (Crystallization) यानी सर्व कामो का व्यक्तीकरण के लिए सहायता करता है!, 2)अपानुवायु= व्यर्थपदार्थों का विसर्जन (Elimination) काम के लिए सहायता करता है!  3)व्यानवायु= प्रसारण (Circulation) काम के लिए सहायता करता है!, 4)समानवायु= स्पांजीकरण (Assimilation) काम के लिए सहायता करता है! हजम होने, उस का माध्यम से अंगों को आवश्यक पोषकपदार्थो का वितरण, और मरा हुआ कणों का स्थानों में नया कणों का उत्पादन करने में सहायता करता है! 5)उदानवायु= केशावृद्धि, त्वचा, मांस, इत्यादियों को विविध रूप का कणों चाहिए! उन् के लिए अनंत समीकरणों होते रहते है! इस पद्धति को जीवाणुपाक कहते है! उदानुवायु रूप में जीवाणुपाक (Metabolizing) के लिये सहायता करता है!
इन सूक्ष्म सृष्टि/शरीर का 19 तत्वों और स्थूल सृष्टि/शरीर का 24 तत्वों  दोनों का परस्पर सबंध होता है! शरीर अस्वस्थत होने से पांच ज्ञानेंद्रियों और कर्मेन्द्रिया दोनों प्राभावित होता और संबंधित अवयवों भी प्राभावित होता है! मनुष्य का स्थूल शरीर का पतनानंतर जीवात्मा सूक्ष्मलोक में रहता है! अपना कर्म फल का अनुभव करने के पश्चात् अपना शेष् इच्छाएं पूरा करने वास्ते पुनः दूसरा स्थूलशरीर में प्रवेश करता है! वांछा ही पुनर्जन्म का हेतु है! हमारा मानसिक स्थिति और परिस्थिति का अनुसार हमारा अगले जन्म निर्णय होता है! स्थूल शरीर का मूलाशाक्तियॉ सूक्ष्मशरीर में होता है! आँख, नाक, कान, जीब, और त्वचा ये सब सिर्फ वस्तु है! अगर वो वास्तु खराब होने से भी उनका शक्ती अंत नहीं होगा! कुछ लोगों को सूक्ष्मशरीर का अन्दर का देखने का शक्ति खराब होने से दूसरा मृति हुआ शरीर का आँख लगाने से भी लाभ नहीं होगा! स्वप्नों आना इंद्रियाँ का सूक्ष्मलोका प्रकृति का निदर्शन है!
हम लोग शुद्धात्मा का रूप में ही इस भूमि का उपर आगया है! परमात्मा हमको ऐसा ही भेजा है! क्रमशः अहम्कारापूरित होकर स्वार्थ विचारों से भावनावों से क्रियायोग ध्यान नहीं करके आलस होकर गपशाप में समय वृथा करता हुआ अपरिशुद्धात्मा बन कर परमात्मा से हम लोग दूर होता जारहा है! परमात्मा का प्रीतिपात्र होने के वास्ते करनेवाला जो भी धर्मबद्ध काम वृथा नहीं जाएगा! हम को जनन मरण वृत्त में नहीं गिराएगा! पिछले जन्म में एक ही मोहल्ला में रह कर सदा रात और दिन जगढा करने वाला लोग इस जन्म में एक ही घर में जन्म लेगा और सदा जगढा करते रहेगा! क्यों कि इन लोगों को जगढा करना पसंद करके मन में बीज दृढ़ हो गया है! हमको जो जाईदाद व धन पूर्वजों से लभ्य हुआ हमारा साथ एक नया पैसा भी नहीं ले जा सकता है! इस बात जानता हुआ भी गरीब लोगों को एक पैसा भी कुछ लोग सहायता नहीं करते है! इस का अर्थ सिक्कावों गल् गल्आवाज इष्ट कर के उस मनुष्य मजबूत से बीज अपना मन् में बोने का काम खुद किया है! इसी हेतु अगले जन्म में पैसा मांगने वाला बिखारी जैसा जन्म लेगा! इसीलिये इस प्रपंच से बंधन नहीं होता हुआ मात्र केवल परमात्मा के वास्ते काम्य कर्म करना चाहिए! वह ही असली आनंद है! विद्यार्थियों अच्छी तरह पढके क्रमशः उत्तम स्थिति को पहुंचता है! वैसा ही सहिष्णुता, आत्मनिग्रह, बन्धं नहीं होना, धर्मं और सत्य मार्ग में चलना, निश्शब्द में रहना, नियम प्रकार हर रोज क्रियायोगध्यान करना इत्यादि करना चाहिए! तब परमात्मा प्रेम और आप्यायता का साथ हमको अपनायेगा!
शाश्वत रूप में जन्मों समाप्ति हुआ करके मरण का अर्थ नहीं है! और जन्मों नहीं होगा करके अर्थ नहीं है! उस जन्म में शरीर नाम का बल्ब (Bulb) टूट (break) के उस का अंदर का प्राणशक्ति तात्कालिक रूप में बंद हुआ है! सूक्ष्म और कारण शरीरों दुष्कर्म का साथ जब समायुक्त होता है तब मनुष्य इस भौतिक शरीर त्यग करने को भयभीत होता है! मानसिक व्याकुलता अधिक रूप में अनुभव करेगा! इसी हेतु अचेतानापूर्वक इस शरीर को त्यागेगा! अपना अपना अर्हता का अनुसार स्थूल शरीर को त्यग किया जीवात्मों विविध स्पन्दनायुत प्राणशक्ति प्रांतों में निबिडीकृत होता है! इस शरीर का स्पंदनों विवेकयुक्त पद्धति से होता है! इंद्रियजनित ज्ञान (Sensations) का साथ हुआ इस स्थूलशरीर, शक्ति (Energy body) का साथ हुआ इस सूक्ष्मशरीर (Astral body), भावनावों (Ideas) का साथ हुआ इस कारणशरीर (Causal body), इन सब कुल मिलाके यह मनुष्य है! इस मनुष्य अहंकार यानी मै, मेराका चारों ओर घूमता फिरता है! इन तीन शरीरोम् से मुक्ति ही विमुक्ति है!
भूमि (Earth) का उपर जब अपना स्थूलशरीर का बल्ब (Bulb) टूट (break) ने से सूक्ष्म प्रपंच में चलता फिरता रहेगा मनुष्य!तब जीव को वह ही नित्य और सत्य, दूसरा प्रपंच और नहीं है इति द्योतक हो जायेगा! आखरी में सूक्ष्म प्रपंच अनुभूतियों भी उस जीव को तृप्ति नहीं दे सकेगा! सूक्ष्म प्रपंच का जीव अपना अनुभूतियों को भूमि का उपर अनुभव करने का भ्रांति में गिर जायेगा! सूक्ष्मलोक में  अपना पुण्य अनुभव होने का पश्चात् पुनः इस भूमि का उपर आने के बाद भूमि का उपर जीवन ही सत्य इति जीव को द्योतक हो जाएगा! इन स्थूल और सूक्ष्म प्रपंच अनुभवों दोनों को पूर्णरूप में वैराग्य से त्यागना चाहिए! तब नित्य सत्य परमानंद प्राप्ति मिलेगा!
सूक्ष्मलोकवासियों को हम अपना (passive) शक्ति का माध्यम से  बुला सकता और मिल सकता  है! एक वर्ग (type) का दुष्ट आध्यात्मिक और नकारात्मक समाधि (Trance) का माध्यम (Spiritualistic Medium) से  सूक्ष्मलोक वासियों को बुला सकता और मिल (Contact) सकता है! हम अपना (passive) शक्ति का माध्यम से सूक्ष्मलोक वासियों को बुलाना और मिलना खतरा भी और युक्त भी है! क्रियायोगध्यान करके तत पश्चात एकाग्रता का माध्यम से सूक्ष्मलोक वासियों को बुलाना और मिलना आमोदयोग्य और युक्त भी है! नकारात्मक समाधि (Trance) का माध्यम (Spiritualistic Medium) से  मात्र केवल आलसी और प्रयाण में आगे नहीं बड़ा और आत्महत्या कर के प्राण को त्यग किया आत्माए इत्यादि दुष्ट आत्मावों को ही मिल सकता है! ऐसा आत्मावों को आह्वान किया मनुष्य को आवाहन कर के वे कभी कभी शीघ्र गति से छोड़ेगा भी नहीं है! शिष्ट आत्मावों को केवल निष्णात क्रियायोगी ही बुलाना और मिलना कर सकता है! साधारण ध्यानपरों का बस का बात नहीं है यह चीज! वह साधक को वैसा आत्मावों को मिलने के लिए इच्छा सहिष्णुता और क्रियायोग ध्यान बल भी होना चाहिए!
तीसरा नेत्र:
तीसरा नेत्र हमारा ललाट में भ्रूमध्य में उपस्थित है! यह एक रेडियो है! इस का माध्यम से ही सूक्ष्म प्रपंच वासियों का साथ बात करने को और उन लोगों को आह्वान करने को साध्य है! हम कभी कभी स्वप्न में अत्यंत प्रिय लोगों के दर्शन करते है! वे स्वप्न हमारा विचारों ही है! वे हर समय में उस प्रकार का प्रतिबिंबित नहीं होगा! कुछ समयों में अत्यंत प्रियतम लोग हम को मिलने का प्रयत्न करते है! कभी कभी हमारा अत्यंत प्रियतम लोगों पुनर्जन्म पाके विदेशों में रहने से भी हम मिल सकते है, मिलेंगे भी ! उनको सन्देश भी भेज सकेंगे! वे लोग भी हम से सम्भाषण कर सकेंगे! हम अपना तीव्र क्रियायोग ध्यान में स्थूलशरीर तयाग किया लोग फिर किस प्रदेश में जन्म लिया जान सकते है! उन लोगों से संभाषाण भी कर सकते है! ह्रदय कुछ संदेशों को विद्युत अयस्कांत तरंगों का रूप में भेजा में भेजेगा! अपना आलोचनारहिता स्थिति में तीव्रध्यान में भौतिकशरीर तयाग किया लोग एक खिलोने जैसा दिखाई देगा! प्रेम को सन्देश का रूप में तीव्र क्रियायोग ध्यान में अपना प्रियतम आत्मीय सूक्ष्म प्रपंच वासियों को भेज दीजिये! अंतरिक्ष में प्रयाण किया उन संदेशों को उन सूक्ष्म प्रपंच वासियों पायेगा! पुनः समाधान् कुछ न कुछ रूप व उपाय में हमको लभ्य होने को उन सूक्ष्म प्रपंच वासियों प्रयत्न करेगा!
अनुषठान गायत्री, तनाव आराम (Tense & Relax) प्रक्रिया, सोऽहं, और ॐ प्रक्रियॉ कीजिये! माहामुद्रा डालिए! 108 क्रियॉ खेचरी का साथ कीजिये! ज्योति/षण्मुख मुद्रा डालिए! तीसरा नेत्र को ललाट में पाइए! उस नेत्र को देखता रहिए! तीसरा नेत्र से दृष्टि अलग मत कीजिये! तीसरा नेत्र का माध्यम से ही संदेश भेज सकता और पा सकता है! तीसरा नेत्र एक आकाशवाणी प्रसारकेंद्र है! दोनों हाथ सीदा उपर कीजिये! उंगलियों का कोनों का उपर ध्यान लगाइये! धीमी चाल से उंगलियों को पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण चारों ओर घुमाइए! जहा स्पंदनों अधिकतर है उस दिशा में रुखिए! उस जीवात्मा अभी भी सूक्ष्मलोक में है व जन्म लिया है कर के पूछताछ कीजिये! जन्म लेने से उस प्रदेश पता कीजिये! हे प्रियतम! मेरा नित्य प्रेम को लेलो, मुझे पुनः पुनः मिलोइति सन्देश भेजो! जन्म लेने से भी तीसरा नेत्र का माध्यम से उस (she/he) का सूक्ष्म शरीर साधक का साथ भेट करा सकेगा! इस भूमि का उपर अब उपस्थित माहान आत्माएं (Great Souls) अपना इच्छा का मुताबिक़ सूक्ष्मलोकों को जा भी सकता है और अपना इच्छानुसार संभाषण भी कर सकता है!
क्रियापरावास्थ यानी आलोचनाराहित स्थिति सूक्ष्मलोकों दर्शन करने को एक आधिकारिक पत्र (Passport) जैसा है! भ्रम भ्रांति और अवचेतानावस्था का सलाहों का (Hallucinations and Subconscious suggestions) व्यत्यास जान कर अधिचेतानावस्था (Super-consciousness) को अभिवृद्धि करना चाहिए!
कर्मसिद्धांत:       
इस स्थूलशरीर के लिए ज्यादा तरह हम ही बाध्य है! मनुष्य परमात्मा का प्रतिबिंब है! कुछ लोग परमात्मा का दिव्यलक्षण प्रदर्शन करते है! परमात्मा का दूर होनेवाली लोग दुष्टलक्षण प्रदर्शन करते है! अपना कष्ट नष्टों का  मनुष्य खुद ही बाध्य है! शिष्टाचार मनुष्य को कष्ट नष्टों नहीं आता है, अगर आने से भी उन को सहन करने का शक्ति परमात्मा देता ही है! दुष्ट और शिष्ट लक्षणों अपना किया हुआ कर्मो का आधारित है! प्रस्तुत जन्म में किया हुआ कर्मो हमारा अवचेतन (sub-consciousness) में इकट्ठा (accumulate) हो जाता है! पिछले जन्मों में किया हुआ कर्मो हमारा अधिचेतन (super-consciousness) में इकट्ठा (accumulate) हो जाता है! अवचेतन व अधिचेतन में इकट्ठा हुआ कर्मो बीजरूप में होता है! मनुष्य अपना भावनों व मोह को पूर्णरूप में नहीं तयाग्ने तक इन कर्मबीजों इस का पीछे जन्म जन्मों पड़ता रहेगा! इस का अर्थ कर्म करो परंतु फल का उपर आशा मत रखो!
इच्छाशक्ति का माध्यम से करनेवाला कर्मो को पुरुषाकार करते है! पुराणा कर्मबीजों का प्रभाव से करनेवाला कर्मो को संस्कार कहते है! हमारा अंतर्गत प्रकृति को प्रभावित करनेवाला इन् ही संस्कारों है! ग्रहों, जगत, जाती, कुटुंब, आस पड़ोस, ग्रंथों, इत्यादि मनुष्य का बहिर्गत प्रकृति को प्रभावित करता है! तुम्हारा मर्जी व मनमौजी से काम करना युक्त नहीं है! संस्कारों को प्रभावित नहीं होना चाहिए! इन को अधिगमन कर के धर्मबद्ध व धर्मयुक्त काम करना चाहिए! धूम्रपान् (smoking) करनेवाला धूम्रपान् करना बड़ा काम नहीं है! वह उस मनुष्य का स्वभाव है! ऐसा स्वाभाविक धूम्रपानी धूम्रपान् नहीं करना है इति निर्णय लेके त्याग करना महत्वपूर्ण है! इधर उस मनुष्य अपना निज इच्छाशक्ति को उपयोग किया आईटीआई अर्थ है! कर्मसिद्धांत को समझ के पचन किया मनुष्य क्रियायोग साधना का माध्यम से दुष्कर्मों से विमुक्त होजाएगा! तत् पश्चात् सर्वकर्मों को परमात्मा का प्रीतिपात्र होने को करता रहेगा! अपना पात्र को इस भुवि का उपर परिपूर्ण रूप में निभायेगा! अपना सगा घर परमात्मा का पास पहुँच जाएगा!
कर्म अनिवार्य है, हम इस से पलायन नहीं करा सकते है, इस को भुगतना ही पडेगा इति कह के व्याकुलन में रहते है! क्रियायोगसाधना का माध्यम से उस अनिवार्य कर्म को निवारण करा सकता है! कार्य कारण संबंधी है कर्म! न दृष्टं अदृष्टं यानी पिछले कर्म हमारा नेत्र को अगोचर है! उस कर्म का फल ही आज हम सुख व दुःख भुगत रहा है! हम को कुछ बड़ा रकम का लाटरी (lottery) मिलाने का हेतु हम पिछले किया हुआ कर्मा का ही फल है! एक बीज डालने से चार व पाँच दिन में इस का पौधा आयेगा! भार्या भर्ता का मिलन का हेतु संतान पैदाइश के लिए 9 10 मास लगता है! उंगली को चोट लगने से रक्त तुरंत आता है! वैसा फल मिलने के लिए हर एक चीज को अपना अपना निर्णीत समय होता है! इस जन्म में जितना भी अच्छे अच्छे काम करने से भी फल नहीं मिल रहे इति चिंताजनक नहीं होना चाहिए! वे भविष्यत में अवश्य फल देगा! कुछ लोग जितना दुष्ट काम करने से भी सुखमय जीवन बिताता है! इस का हेतु पिछले जन्मों का कार्यक्रमों का फल ही है! आज का दिन में हम को कुछ काम नहीं करने से भी पेन्षन् (Pension) आने का कारण हम पिछले 30 40 सालों का सरकारी ही कारण है! मछुआ को मछली का गंध इष्ट है! मछली का गंध नहीं मिलने पर नींद भी नहीं आयेगा!
एक पागल जैसा जन्म लेने का हेतु वह उस का पिछले जन्मों में बहुत लोगों को मनःशांती छीना हुआ दुष्ट कर्म ही कारण है! हम सोने का पहले स्त्री व पुरुष होने से सोने से उठने का पश्चात भी वह ही स्त्री व पुरुष रूप में ही होंगे! मरण एक दीर्घ निद्रा है! उस दीर्घ निद्रा का पहले जो थे वह ही दीर्घ निद्रा का पश्चात भी वह ही होंगे! जैसा बीज बोएगा वैसा ही फल मिलेगा! उस का फल ही यह जीवन है!
100 वर्ष जीवित किया मनुष्य को क्रियायोग ध्यान करने के लिए अधिक समय लभ्य होगा! उस को सद्विनियोग करना चाहिए! वोई  25 वर्ष जीवित किया मनुष्य को क्रियायोग ध्यान करने के लिए अधिक समय लभ्य नहीं होगा! पिछले जन्मों में यह मनुष्य किया हुआ कर्म ही इस अल्पायु का हेतु है! कुछ अच्छा और कुछ बुरी काम किया मनुष्य का अर्थ शरीर स्थूल प्रपंच में और अर्थ शरीर सूक्ष्म प्रपंच में नहीं होगा! परिपूर्णता रूप में शुद्ध नहीं हुआ जीवात्मा परमात्मा में ममैक नहीं होगा! परिपूर्णता रूप में शुद्धि होने तक स्थूल सूक्ष्म प्रपंच वलय में प्रयाण करता रहेगा! जीवात्म सूक्ष्म प्रपंच में पुण्यफल अनुभव करके शेष कर्मफल अनुभव करने के लिए पुनः स्थूल प्रपंच में आविर्भाव होगा! आखरी में अच्छी और बुरी कर्मो दोनों को त्यग कर स्वयं प्रकाशित रहेगा! परमात्मा में ममैक हो जाएगा! अच्छी कर्मो स्वर्ण हथकड़ी जैसा और बुरी कर्मो लोहा का हथकड़ी जैसा है! दोनों बंधन ही है! परंतु कर्म करता ही रहना है! फल नहीं मांगना है! विद्यार्थी विद्या अभ्यास करना परंतु अभ्यास का समय में नौकरी मिलेगा या नहीं इति मन में भावना होना उचित नहीं है! विद्या केवल विद्या के लिए अभ्यास करना चाहिए! नीम का बीज बोने से आम का पौधा नहीं आयेगा! वैसा ही हमारा कर्मो का मुताबिक़ फल होता है! रुग्मता आरोग्य  विद्या में सफलता असफलता सुंदरता असुंदरता इत्यादि वंशापाराम्परी (Hereditary) चीज नहीं है! जीव अपना करम् का अनुसार युक्त योनी को खोजता है!
सफलताज्ञान:
सफलत=गतजन्मों का सफलत + इस जन्म का धर्मबद्ध काम!
गतजन्मों में सफलत के लिए प्रयत्न किया मनुष्य इस जन में धर्मबद्ध काम का प्रयत्न नहीं करने से प्रत्यक्ष रूप में सफलत नहीं आसकता परंतु परोक्ष रूप में आसकता है! किसी भाग्यवान का घर में जन्म लेना, अथवा किसी का जायदाद अगस्मात आजाना, ऐसा सफलता मिल जासकेगा! अडोस पड़ोस लोगों को देखके उन का प्रभाव से धर्मबद्ध काम्यकर्मों नहीं भी कर सकता और अच्छा अडोस पड़ोस लोगों का हेतु धर्मबद्ध काम्यकर्मों कर भी सकता है! इसी का हेतु हर एक जन्म मे सफलता हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता है! अथात सफलता निश्चित रूप में नहीं होता है! इसी कारण साफल्यता के लिए क्रियायोगसाधना का माध्यम से अदभुत एकाग्रता अभिवृद्धि करा के अपना असाफल्यता को निर्मूलन करना चाहिए! क्रियायोगी अधर्मबद्ध काम्यकर्मों नहीं करेगा कर भी नहीं सकेगा! जितना असफल मनुष्य होने से भी अपना इच्छाशक्ति का माध्यम से क्रियायोग साधना करेगा! अचिरकाल में अपना कर्मों को दग्ध कर सकेगा! पुनः सफलता मार्ग में प्रयाण करेगा!
परमात्मा को अन्वेषण करने वाला साधक सब से विवेकवान है! परमात्मा को साध्य किया साधक सब से साफल्यवान है! बाहर से अन्दर जबरदस्त गुसानेवाला नहीं है विवेक! अंतःग्रहण शक्ति जितना पुष्कल पुष्टि और अधिक होगा उतना ज्ञान हम लभ्य कर सकता है! और उतना शीघ्र भी पा सकता है! परिपूर्ण ज्ञान के लिए सारे प्रकार का अनुभूतियॉ पाने को अवसर नहीं है! इतरों को जीवन देख के सीख कर सकते है! इस प्रपंच में परमात्मा का अनुसंधान शिवा कोई भी अन्य चीज हम को आकर्षणदायक और आनंदभरित नहीं होगा! इस को ग्रहण करने के लिए अनंत संघटनों का पारम्पर में पसने को अवसर नहीं है! इस जीवित इति ग्रंथ को परमात्मा ही रचयिता है! तर्क का माध्यम् से उस को जानना असंभव है! ज्यादा ज्यादा क्रियायोग ध्यान इसी का हेतु करना चाहिए! सहजावबोध (Intuition) इति अदभुत पानपात्र को विशाल रखना चाहिए! तब साधक अनंत ज्ञानसागर को अपना अन्दर रख सकते है! यह जगत एक स्वप्न है! इस ज्ञानार्जन साधन ही साधक करनेवाला महत्कार्य है! वह ही असली विवेकाभिवृद्धि है!
साधना में नकारात्मक प्रतिकूल परिस्थितियां सामने आता है! तब उस अपजय को एक स्वपन इति भावना करना चाहिए! निर्माणात्मक रूप में प्रतिकूल परिस्थितियों को साधक प्रतिघटन करना चाहिए! यह सृष्टि बाहर से अदभुत और सत्य जैसा दिखाईदेगा! परमात्मा का मन का भावनों घनीकरण होकर भौतिक रूप में बन गया इति समझना चाहिए! तीव्र क्रियायोग ध्यान का माध्यम से साधक मै भौतिक रूप का धारण किया हुआ मनुष्य नहीं, असली में परमात्मा का स्वरुपइति ग्रहण करेगा! अपन शाश्वत जीवन चैतन्य प्रवाह इति स्वयं अनुभूति प्राप्ति करेगा! तब अपना निज व्यक्तित्व विकास हो जाएगा! दुःख, रोग, वैफल्य इत्यादि दैवशासनधिक्कार का सहज फल है! वैसा अतिक्रमणों से बाहर निकल आना चाहिए! हम अपना अंतरात्मा का अनुगुण भावों व कर्मों का माध्यम से शांति और सौख्य लाभ्याहोना ही विवेक है! सकारात्मक अंशों को याद करके मन को विवेक द्वारा शाशन करना चाहिए! भू वनरों से लभ्य हुआ अल्प ज्ञान से तृप्ति करना नहीं चाहिए! परमात्मा से अपार ज्ञान को क्रियायोग साधना का माध्यम से प्राप्त करना चाहिए!
आरोग्य:
आरोग्य, अच्छा व बुरा व अच्छा-बुरा मिश्रित यह सब मात्र इस एक जन्म का फल नहीं, बल्कि गत जन्मों का फल + इस जन्म में हम किया व आगे करनेवाला हठयोग और क्रियायोग ध्यान अभ्यासों का आधार्हेतु है! एक को एक जोड़ने से ही दो बनता है! उस दो को दो जोड़ने से ही चार बनेगीं, है कि नहीँ? (1)कुछ लोगों को शीत व उष्ण काल अथात कोई भी काल में रोग बाधा नहीं होता है! गत जन्मों में किया हुआ हठयोग और क्रियायोगसाधना ही इस का हेतू है! आरोग्यहेतु पद्धतियाँ शाखाहार भोजन सेवन इत्यादि आदतें, हठयोग और क्रियायोगसाधना इस जन्म में भी करते (Continue) रहना इस का हेतू है! (2) कुछ लोग जन्मतः अरोग्यवान होते है! कभी कभी रोगग्रस्थ होते है! वे गत जन्मों में किया हुआ आरोग्यहेतु पद्धतियाँ शाखाहार भोजन सेवन इत्यादि आदतें, हठयोग और क्रियायोगसाधना इस का हेतू है! इस जन्म में जारी नहीं रखना ही इस का कारण है! (3) कुछ लोग जन्मतः मध्यस्थ आरोग्य से फैदायश होते है, बलहीन होते है, रोगग्रस्थ होजाते है! वे  गत जन्मों में आरोग्यहेतु पद्धतियाँ शाखाहार भोजन सेवन इत्यादि आदतें, हठयोग और क्रियायोगसाधना नहीं करना ही इस का हेतू है! इच्छाशक्ति से आरोग्यहेतु पद्धतियाँ, शाखाहार भोजन सेवन इत्यादि आदतें हठयोग और क्रियायोगसाधना अभ्यासें करना अत्यंत आवश्यक है! (4) कुछ लोग जन्मतः अनारोग्य और आरोग्य सामान प्रतिपत्ति से फैदा होते है! वे कुछ दिन आरोग्य से रहेगा, कुछ दिन अनारोग्य से रहेगा! आरोग्यहेतु पद्धतियाँ शाखाहार भोजन सेवन इत्यादि आदतें हठयोग और क्रियायोगसाधना अभ्यासें करना अत्यंत आवश्यक है! (5) कुछ लोग जन्मतः अनारोग्य से फैदा होते है! मात्र केवल व्यामोह ही इन लोगों को ज्यादा समय जीवित रखेगा! आरोग्यहेतु पद्धतियाँ, शाखाहार भोजन सेवन इत्यादि आदतें हठयोग और क्रियायोगसाधना अभ्यासें करना अत्यंत आवश्यक है!
क्रियायोगसाधना माध्यम से एकाग्रता को वृद्धि करना चाहिए! ऐसा वृद्धि हुआ एकाग्रता का वजह से मिला भगवत् भक्ति और शक्ति द्वारा अपना स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों को पवित्र करना चाहिए! अपना शांति आरोग्य और सफलतापूर्वक जीवन को अभिवृद्धि करके भवसागर पार कर के मुक्ति प्राप्त करना चाहिए!
परमात्मा:
परमात्मा नित्य है, नित्यचेतनामई और नित्यनूतन संतोषी है! भूत, वर्त्तमान और भविष्यत कालों का अतीत है! परमात्मा को सारा वर्त्तमान काल ही है! जाग्रत और स्वप्नावस्था उन को वर्तितव्यं नहीं है! वह अपने आप को ज्ञात ज्ञेयं और ज्ञानं करा के विभाजन करदिया है! उस के लिए तारतम्य सिद्धांत (law of relativity) व माया को बनाया! सर्वसम्रुद्ध और सर्व वास्तुवो/पदार्थो/चीजों का कारणभूत और अविभक्त है! परंतु अपना ही माया का माध्यम से अपने आप को विभक्त बनाया, इस जगत को एक लीला व स्वप्न जैसा व्यक्तीकरण किया है! मनुष्य को  अपना प्रतिबिंब दर्पण में दिखाई देता है! वैसा ही मनुष्य परमात्मा का प्रतिबिंब है! दर्पण में दिखाई देनेवाला प्रतिबिंब को स्वयं प्रतिपत्ति नहीं होती है! परंतु परमात्मा का प्रतिबिंब मनुष्य को स्वयं प्रतिपत्ति होती है! परमात्मा का दया से लभ्य हुआ इच्छाशक्ति ही इस स्वयं प्रतिपत्ति का हेतु है! मैं एक हु, अनेक बनेगायह परमात्मा का मात्र ऊहा है, वास्तव नहीं है! वह उन को अवसर भी नहीं है! अगर सृष्टि अवसर होने से परमात्मा पवित्र शुद्ध न्याय स्वरुप और सही नहीं हो सकता है! मनुष्य स्वप्न क्यों स्वप्नाता है? इस का सही समाधान नहीं मिलेगा! वैसा ही परमात्मा इस जगत नाम का स्वप्न क्यों स्वप्नाता है? इस का भी सही समाधान नहीं मिलेगा! मनुष्य का स्वप्न शिर (Head) में आता है! बाकी तीन भाग यानी छाती कमर और टाँगें वह शिरस् को आधार्हेतु है! मनुष्य का अर्थ मात्र केवल शिरस् ही नहीं हैना! वैसा ही परमात्मा को चार भाग में ऊहा करने से उन में एक भाग परमात्मा का मायापूरिता जगत नाम का स्वप्न ही है!
यह माया अपरिमित है! वह अपरिमित परमात्मा को परिमित् हुआ जैसा दिखाई देगा, इस के लिए निरंतर प्रयत्न करते रहेगा! इस माया का भ्रम में गिरा हुआ मनुष्य अपना अपना भ्रम का तीव्रता का वजह से अपना स्वगृह परमात्मा से दूर बढता जायेगा और बाधावों में गिरेगा! परमात्मा से दिया हुआ इच्छाशक्ति को उपयोग कर के क्रियायोगसाधना करनेवाला साधक अपना तीव्रता का हेतु परमात्मा का नर्दिक में आता रहेगा!
बीमारी, व्याधि इत्यादि भी परमात्मा का माया का प्रभाव ही है! यह भी भ्रम इति क्रियायोग साधक स्पष्टरूप में ग्रहण करेगा! दारेषण पुत्रेषण धनेषण को ईषणात्रयवर्जितः परिपूर्णरूप में होना चाहिए! अनित्य अशाश्वत मानवप्रेमा और व्यामोहों के लिए क्रियायोग साधक को तापत्रय नहीं होना चाहिए! शाश्वत परमात्मा प्रेम ही नित्य है! दिव्य परमात्मा प्रेम को मानवचेतना को जोड़ने से ही उस मानवप्रेम शुद्ध होता है!
इच्छाशक्ति: 
इच्छाशक्ति जो है वह परमात्मा का देन है! इस प्रत्येक वर परमात्मा ने केवल मनुष्यों को ही लभ्य किया है! पशुवों को इच्छाशक्ति नहीं है! इच्छा नहीं होने से मनुष्य कोई भी कार्य अच्छा हो बुरा हो नहीं करेगा व करी नहीं पायेगा! इसी कारण मनुष्य अपना कष्ट नष्टों को स्वयं ही कारण है! अच्छा बुरा सब शुद्धात्मा का आवरण व आक्रमण किया हुआ तात्कालिक  प्रतिबंधकों है! वे शाश्वत नहीं है! क्रियायोग साधना का माध्यम से इन प्रतिबंधकों को निवारण करके साधक शुद्धात्म स्वरुप बन सकता है! कृषितो नास्ति दुर्भिक्षं, कृषि करने से मनुष्य ऋषि बन सकता है! रोने से व व्याकुलता से गम्यस्थान समीप में नहीं गिरेगा! थोड़ा थोड़ा समय समय में विश्रांत लेता हुआ चलने से कुछ देर ज्यादा लगाने से भी अवश्य पहुँच जाएगा! हर एक को संतुष्ट रखना न मुम्किल है! क्रियायोग साधना का माध्यम से परमात्मा को संतुष्ट रखना ही सब से अधिक युक्त है! क्रियायोग साधक को परमात्मा जो रहस्य बोलता है वह ही आत्मावाबोधन है! उस रहस्य को सुनने से हम लोग बुरा का वश नहीं होगा, परमात्मा का साथ अनुसंधान अवश्य हो जाएगा! परमात्मा को केवल निश्शब्द में ही लभ्य कर सकता है! जब अवसर मिलता है तब क्रियायोग साधक उत्साह से कार्य करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए! कार्य सामाप्त पर्यंतर् तुरन्तु अपना क्रियायोग साधना जारी रखना चाहिए!
ज्ञापकशक्तिस्मृति:
हर एक क्रियायोग साधक अपना साधना का माध्यम से अपना स्मृति में बढ़ावा ला सकता है! शिरस् का चेतना मन बाहर दुनिया से मिलनेवाला भावनों और ग्रहणों का माध्यम से संबंध बनाता है! नेत्र, नाक, कान, जीब, और त्वचा ज्ञानेंद्रियों है! उन ज्ञानेंद्रियों से आने वाला सेंसरी (Sensor nerves) नाड़ियों का माध्यम से सिग्नल्स (Signals) पाके उन का मुताबिक् युक्त संदेशों/आज्ञाओं को मोटार नाड़ियों (Motor nerves) का माध्यम से भेजता है! अवचेतन मनस् (Sub-conscious mind) इन अनुभवों को प्रामुख्यता का अनुसार क्रमबद्धीकरण करके अपना पास रखती है! जो मनस् निद्रा स्थिति में होता है उस को सूक्ष्मचेतना मनस् (Semi-consciousness) कहते है! जो मनस् गेहरी निद्रा स्थिति में होता है उस को अधिचेतना मनस् (Super-consciousness) कहते है! सूक्ष्म और अधिचेतना मनस् दोनों को आत्मबोधना (Intuition) शक्ति होता है! 
जाग्रतावस्थ में इन तीनों मन यानी स्थूल, सूक्ष्म और कारण मन मिल के काम करता है! निद्रावस्थ में  सूक्ष्म और कारण चेतना मन मिल के काम करता है! जाग्रत चेतना निद्रावस्थ में होता है! गहरा निद्रावस्था व समाधि में अवस्था में मात्र केवल कारणचेतना ही काम करता है! जाग्रत और सूक्ष्म चेतना दोनों निद्रावस्थ में होता है! जाग्रतावस्थ का अनुभवों अवचेतनावस्थ में प्रवेश करेगा और उधर रखा जाएगा! इस अवचेतनावस्था को स्मृतिमनस (Memory mind) कहते है! जाग्रतामनस (Conscious mind) में ही स्मृतिमनस छिपा हुआ होता है! निद्रा में अवचेतनावस्था ही इस शरीर नाम का अग्नि-कुंड/भट्टी का आग नहीं भुजने देगा! शरीर का कार्यक्रम सक्रम रूप में होने देगा! अवचेतनावस्था व स्मृतिमनस सदा जागरूकता में होगा! हृदय, फेफड़ों, गुर्दा इत्यादि अपने आप काम करनेवाला अंगों/अवयवों है! इन सब निद्रावस्था में भी काम करने के लिए दोहद करता है! और चेतानापूर्वक अनुभवों को ज्ञापक रखने के लिए सहायता करेगा! अधिचेतनावस्था को अपना आत्मबोध का माध्यम से अवचेतनावस्था और जाग्रतावस्थों में होनेवाला समाचार सब जानेगा और जानते रहेगा! क्रियायोग साधक अधिचेतना मन को अपना भूत और वर्त्तमान जीवनों का अनुभवों को याद करने  और याद रखने के लिए अभ्यास कर सकता है! और करना भी चाहिए! नहीं सर्व जाननेवाली आत्मबोध (Intuition) को खो बैठेगा! वैसा ही अवचेतनावस्था (Subconscious mind) को भी प्रस्तुत जीवन काल का अनुभवों को याद करने  और याद रखने के लिए अभ्यास करा सकता है! और करना भी चाहिए! और सृजनात्मकशक्ति को बलोपेट करने के लिए अभ्यास करवा सकता है! और करवाना भी चाहिए! नहीं तो ज्ञापकशक्ति को खो बैठेगा! निर्वीर्य बनेगा, सृजनात्मकशक्ति नहीं रहेगा! जाग्रतावस्था में चेतनामन (Conscious mind) का सृजनात्मकशक्ति में बढ़ावा के लिए कसरत करवाना चाहिए! एक राजकुमार ने पूरा मदिरा पीया! उस नशा में खुद क्या है भूल गया! मै बहुती गरीब हू, खाने के लिए भी नहीं करके रोना शुरू कर दिया, जब नशा उतरने का पश्चात अपना औकात याद आ गया! असलियत जान के संतुष्ट हुआ! केवल अपना अव चेतनामन ही इस का कारण है!
अधिचेतना मन साक्षात परमात्मा ही है! उस मन को दर्द नहीं होगा! धर्मबद्धा विषयों को ही सदा याद करना चाहिए! बुरा नहीं देखना, बुरा नहीं सुनना, और बुरा नहीं बोलना चाहिए! जाग्रतावस्था व्यामोह का हेतु चंचलता में रहती है! भूक लगाने से अच्छा भोजन खाने के लिए दिल होता है, वह अच्छा भोजन लभ्य नहीं होने पर मन असंतुष्ट रहता है! जाग्रतावस्था कान, नेत्र, नाक, जीब, त्वचा इति पंच ज्ञानेंद्रियों का माध्यम से काम करता है! अवचेतनावस्था जब जागृती में रहता है तब स्मृति का माध्यम् से काम करेगा, रात में जब निद्रा में होती है तब स्वप्नों का माध्यम् से काम करेगा! जब जाग्रतामन जागता है तब स्मृतिभांडार में रखा हुआ सब सन्निवेश और अनुभवों का माध्यम से सहायता और सलाह देता रहता है! अधिचेतनावस्था में आत्मबोध जो है वह बंधनारहित होकर अवचेतना और चेतना मन दोनों को सहायता करेगा!
सिनेमा:
जीवन एक सिनेमा जैसा है! प्रोजेक्टर (Projector) से जो कांति किरणों आ रहे है वे ही नायक नायकी खलनायक घोड़े इत्यादि तस्वीरें! हम जब सिनेमा में खलनायक का दुर्मार्ग कार्यो को देखने के समय अथवा हृदय विदारक सन्निवेशों को देखने के समय में हम को आवेदन होता है! तब प्रोजेक्टर का दिशा में देखने से उसी से कांति किरणों आनेवाला इन तस्वीरें नहीं दिखाई देगा! तब हमारा हृदय में कोई भी स्पंदनों नहीं आयेगा! साधारण स्थिति में रहेंगे! वैसा ही हम को आवेदन नहीं होने के लिए हम परमात्मा नाम का प्रोजेक्टर का दिशा में सदा देखना चाहिए! हम् को इस भूमि का उपर परमात्मा ने दिया हुआ नाटकीय पात्रों को श्रद्धा भक्ति और गौरव से करना चाहिए! तब हमारा जीवन सफल होगा, कोई कष्ट नहीं होगा!
स्वप्नोंदर्शनों:
चेतन मन ज्ञानेंद्रियों का माध्यम से अपना कार्यक्रमों निर्वर्तन करता है! निद्रावस्था में चेतन मन निद्राणस्थिति/अक्रियात्मक स्थिति में होता है! निद्रावस्था में और जाग्रतावस्था में दोनों अवस्थाओं में अवचेतना मन काम करता है! जाग्रतावस्था/चेतना मन और अवचेतना मन दोनों मानवसहज अशुद्धि अहंकार चेतना धारित होता है! अधिचेतना मन शुद्ध आत्मबोधना चेतना धारित होता है! इस अधिचेतना मन रागरहित होकर प्रथम में अवचेतना मन बाद में चेतनामन का माध्यम से काम करता रहता है! चेतनामन ही स्वप्नों का हेतु है! मनुष्य का चेतनामन, अवचेतना मन व अधिचेतना मन कुछ भी हो एक स्वपन सृष्टि कर के निद्रावस्था में अवचेतना पर्दा (Screen) का उपर दिखा सकता है! पाक्षिकरूप में हृदय से और सेंसरी (Sensory Nerves) नाड़ियों द्वारा उपसंहरण किया हुआ प्राणशक्ति शिरस में संग्रह किया होता है! गत जीवन का संघटनों शिरस का नालियों में निक्षिप्त किया होता है! वे संघटनों सब निद्रावस्था में कामेरामन (Cameraman), दर्शक (Director), सिनेमा आपरेटर (Cinema Operator), प्रोजेक्टर आपरेटर (Projector Operator) इत्यादि अनेक पत्रों पोषण करनेवाला अवचेतनामन नाम का पर्दा (Screen) द्वारा निकलाता है! चेतना और अधिचेतना विचारें नामका सिनेमा कामेरामन अवचेतना मन में निक्षिप्त करता होता है! भविष्य में आनेवाले संघटनों, व्यक्तिजीवित में व इस जगत में  अन्य प्रदेशों में होनेवाले संघटनों को भी अवचेतनामन नाम का प्रोजेक्टर आपरेटर का माध्यम से कभी कभी जानकारी संकेतों देता है! मानव अहंकार का गलतियाँ और मानव मेधा का परिमती भी पथभ्रष्टक संकेतियाँ देगा! तीसरा नेत्र से लभ्य होनेवाली स्वप्नों ही सत्य है! बाकी सब सत्य नहीं है!
साधक को एक ही आलोचना होना चाहिए, वह है परमात्मा! केवल परमात्मा का उपर एकाग्रता रख के उन्नत स्थिति लभ्य किया हुआ साधक अपना भौतिक शरीर को निद्रामे जैसा तनाव रहित (Relax) कर सकता है! सचेतानापूर्वक स्वप्न व दर्शनों को सृष्टि कर सकता है!
सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञात अधिचेतना मन जाग्रतावस्था में दर्शनों को सृष्टि कर सकता है! शिरस का शक्ति (मेधा) को उपयोग करके भविष्य संघटनों का निजस्वरूप तीव्र क्रियायोग साधना करनेवाला साधक को दिखाने/ग्रहण करने का शक्ति/सत्ता केवल अधिचेतनावस्था को ही है!
निद्रावस्था में अवचेतना पर्दा (Screen) पर निरंतर स्वप्न आनेसे हम को गहरी नींद नहीं आयेगा! शीघ्र ही थक जाएगा! तीव्र क्रियायोगढ़याँ करने से यह अवस्था टूट जाएगा! इसी हेतु नियमानुसार प्रातः और संध्या दोनों समय में क्रम पद्धति में क्रमशः क्रियायोगध्यान करने से इस निद्रा में गहरी नींद नहीं आने का अवस्था दूर हो जाएगा! हम क्रियायोगसाधना प्रातः और संध्या दोनों समय में नियम प्रकार से अवश्य करना चाहिए! इच्छानुसार जो दिशा निर्देश आवश्यक है वह हम अधिचेतन मन व कूटस्थ चैतन्य का माध्यम से स्वप्नों व सूचनों का रूप में पायेगा, पाना भी चाहिए! मानव अहंकार चेतना दिशा निर्देशन का अधिगमन करना यह गलत दिशा निर्देशन देगा! साधक उत्तीर्ण स्थिति लभ्य करना चाहिए!
अग्नी की ज्वाला, समुद्र, नदियाँ, नाव, देवताओं (Angels), शास्त्रों, ऋषियों, मुनियों, मंदिरों, गर्भगुडि (Sanctum sanctorum), पुष्प, निर्मलाकाश, सूर्यकान्ति, संध्या व उषः (Auroras) कान्ति, चाँद, आकाश में स्वयं व्याप्ति होने जैसा दिखाई देना इत्यादि स्वप्नों अच्छे है! अपना गत जन्मों और वर्तमान जन्म का कर्मो दग्ध हो रहा इति इस का अर्थ है!  साधना में पुरोगति हो रहा इति इस का अर्थ है!
परमात्मा का साथ अनुसंधान व साधना में पुरोगति हो रहा है व अनुकूल पति/पत्नी मिलने का इति गर्भगुडि (Sanctum sanctorum) स्वप्न में दिखाई देने का संकेत है! परमात्मा का साथ अनुसंधान व साधना में पुरोगति हो रहा है व विस्तार आध्यात्मिक ग्रहणशक्ति, इति स्वप्न में निर्मलाकाश दिखाई देने का संकेत है! शुद्ध ज्ञान और शुद्ध विचारें इति स्वप्न में पुष्प दिखाई देने का संकेत है! केवल अपना इच्छाशक्ति का अनुसार शुभ विचारों ठीक समय में क्रियायोगसाधना साधक को आता है! सूर्यकान्ति सूक्ष्मलोक दर्शनों का प्रतीक है! तीव्र क्रियायोग साधना का समय में विस्तार कांति दिखाई देना ही इस को निदर्शन है! संध्या व उषः (Auroras) कान्ति, सूक्ष्म कान्ति (Cosmic light) का प्रतीक है! छोटा व बड़ा ग्रहों चमक चमक नील कांति प्रदर्शन करना और साधक ब्रह्मांड चेतना (Cosmic Consciousness) में डूब जाना अत्यंत सहज है! चाँद दिखाई देना क्रियायोग साधक अपना भक्ति श्राद्धों को साधना में दिखाई देने वाला सूक्ष्म दर्शनों का साथ अनुसंधान कर के और प्रयत्न कर के आगे बढ़ना चाहिए का प्रतीक है! अग्नि ज्वाला दिखाई देना साधक का संचितकर्मों दग्ध होने का प्रतीक है! रोशनी/कांति और समुद्र दिखाई देना साधक का आध्यात्मिक बढ़ावा और आत्मसाक्षात्कार संकेतो का प्रतीक है! जल दिखाई देना दिव्य आध्यात्मिक ग्रहणशक्ति को साधक अपना क्रियायोगसाधना में लभ्य करेगा इति अर्थ है! नाव दिखाई देना आत्मसाक्षात्कार वांछित साधक सत्वरम् सद्गुरु का शरणागति पाना चाहिए इति अर्थ है! परमात्मा और साधक का अनुसंधान कर्ता सद्गुरु है! देवताओं (Angels), ऋषि मुनि दिखाई देना गतजन्मो में किया हुआ अच्छी क्रियायोग साधना का हेतु है!
इन स्वप्नों और दिव्यदर्शानों साधक का क्रियायोग साधना का आध्यात्मिक प्रगति का प्रतीक है! 
प्राणशक्ति:
कणविभाजन (Cell division) और कणवृद्धि (Cell Multiplication) का माध्यम से जीवराशी का सृष्टि होता है! उस के लिए जीवद्रव्यम् (Protoplasm) अभिकर्ता (agent) व माध्यमं है! इस जीवद्रव्यम् मिट्टी समझो! उस का अंतर्गत में छिपा हुआ प्राणशक्ति (Life force) ही कुम्हार है!
विविध प्रकार का मिट्टी का पात्र बनाने के लिए विविध प्रकार का रंगों का अवसर होता है! वैसा ही विविध प्रकार का प्राणियों का सृष्टि के लिए जीवद्रव्यम् भी विविध प्रकार का होना चाहिए! प्राणशक्ति अद्भुत सूक्ष्म ज्ञानशक्ति है! वह अद्भुत प्राणशक्ति ही पिपीलीकादी पर्यंतं मनुष्य तक सकलजीवजालोम् को आलवाल है! मनुष्य का वीर्यकण् (Human spermatozoa) और पशु का वीर्यकण् लीजीये! उन दोनों को एक मैक्रोस्कोप (Microscope) का माध्यम से परीक्षण करने से एक छोटा सा मेंडक (Tadpoles) जैसा इन वीर्यकणों जीवद्रव्यम् का उपर तैरता है! एक ही जैसा दिखाई देनेवाला मनुष्य और पशु का वीर्यकणों (Spermatozoa) से विविध प्रकारों का प्राणियों का सृष्टि करने का सामर्थ्य केवल प्राणशक्ति को ही साध्य है! प्राणवायु को केवल शक्ति ही होता है! परन्तु प्राणशक्ति को शक्ति और ज्ञान दोनों होता है!
मनुष्य और पशु दोनों कामेच्छा का हेतु सम्भोग करेगा और अपना अपना वीर्यकणों का बदली/स्थान परिवर्तन द्वारा प्राणशक्ति अपने आपको व्यक्त करती है! ऐसा सृष्टि किया हुआ संतान अपना अपना वांछों और स्वभावानुसार चलता है! परमात्मा का छाया में बना हुआ मनुष्य अपना कामसहित संभोगवांछित (Sex impulse) प्रेरेपरण से विमुक्त होने से ही इस जनन-मरण वृत्त से मुक्त होगा! तब ही परमात्मा में ऐक्य होगा! जितना पवित्र होने से भी जब तक कामसहित संभोगवांछ   मनुष्य को इस पृथ्वी का तरफ खींचते रहेगा! इसी कारण इस से पूर्णरूप में मुक्त होना अत्यंत आवश्यक है!
कामं को जागनेवाला सृजनात्मक शक्ति को अपना जैसा ही दूसरा प्राणी को जन्म देने का एक आलोचना स्वभाव व सरलीकृत होता है! उस परिस्थी को सहायता करने के लिए ज्ञान सहित प्राणशक्ति काम नाड़ियों को उत्प्रेरक करेगा! स्त्री अंडों (Ovum) को और पुरुष वीर्यकणों (Spermatozoa) को छोडता है! कामं व संभोगवांछ (Sex impulse) को वैराग्य द्वारा त्यागना  और ज्ञान से नियंत्रण करना चाहिए! दबाके रखने से कोई भी लाभ नहीं होगा क्योंकि वह द्विगुणीक्रुत वेग् से विजृंभणा करेगा! वैराग्य और ज्ञान से नियंत्रण किया हुआ कामं प्रथम में आध्यात्मिकता का दिशा में, तत पश्चात मोक्ष का मार्ग में चलेगा! कामं को आध्यात्मिकता का दिशा में बदिली करने के लिए श्वास को मंद गति से तीव्र और दीर्घ पद्धति से अन्दर व पूरक करके कूटस्थ में रखना व अंतःकुंभक करना चाहिए! वैसा ही श्वास को मंद गति से तीव्र और दीर्घ पद्धति से बाहर व रेचक करके कूटस्थ से नाक द्वारा छोडके बाहर रखना व बाह्यकुंभक करना चाहिए! तब इस कामचेतना प्राणवायु जैसा रूपांतर हो जाता है! इस को सहायता के लिए क्रियायोगध्यान करना चाहिए! इन पद्धतियों का वजह से हृदय और फेफड़ों में अद्भुतशक्ति केंद्रीकृत होता है! शरीर का इतर प्रांतों का शक्तियाँ सब वे भी महत्वपूर्वक कामप्रांतों का शक्तियाँ सब हृदय और फेफड़ों में केंद्रीकृत होता है! तब मन तीव्र परमात्म ध्यान में डूब जाएगा! महत्वपूर्ण आध्यात्मिकतायुक्त विचारें से साधक को दुबादेगा! भेजा आध्यात्मिक अयस्कांत जैसा रूपांतर हो जायेगा! छोटा भेजा (Cerebral Spiritual reservoir) एक आध्यात्मिक तटाक जैसा रूपांतर हो जायेगा! हृदय फेफड़ों और शरीर का अन्य भागों का शक्तियाँ सब आकर्षित होता है!
कामोत्तेजक जीवन का दिशा में मनुष्य जितना जाएगा इतना ही अधिक मेधा और प्राणशक्ति नीचे चक्रों (मणिपुर, स्वाधिष्ठान और मूलाधार) का तरफ कूदेगा! परिस्थितियों का बानीसत्व से निस्सहाय होकर  मनुष्य साररहित जीवन बिताएगा! यह मेरा कर्म, मै क्या करूइति अपने आप को निंदा करते हुए निर्लिप्त जीवन बिताने अधोगति स्थिति में पडेगा! इसका विरुद्ध है आध्यात्मिक ऊर्ध्वगति स्थिति! आध्यात्मिक जीवनगति का जितना आदत पडेगा इतना ही अधिक मेधा और प्राणशक्ति ऊर्ध्वचक्रों (अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार) का तरफ कूदेगा! निस्सहाय स्थिति में रहा मानवचेतना और मानवशक्ति परमात्मचेतना और परमात्मशक्ति में रूपांतर हो जायेगा! धैर्य से परिस्थितियों को अपना तरफ घुमाके कर्म दग्ध करके दिव्यजीवन बिताते हुए जीवन को आनंदमय करेगा! ऐसा लोगों को अनुकूल अर्धांगिनी मिलेगा! संतान भी सुंदरमई होगा! आध्यात्मिकपूर्वक शांति आनंद आरोग्य दया इत्यादि अद्भुत सुलक्षणों साथ चमकेगा!
भौतिक कामोत्तेजक में सृजनात्मकशक्ति वृथा/व्यर्थ होता है! यह बलहीनता रोग और शीग्रगति से वृद्धावस्था को मार्ग बनाएगा! सुसंतान के वास्ते भौतिक काम का सृजनात्मकशक्ति वृथा/व्यर्थ नहीं होने देना चाहिए! क्रियायोग साधना का माध्यम से ऊर्ध्वचक्रों (अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार) द्वारा इस सृजनात्मकशक्ति को उपर चक्रों का दिशा में भेज के भेजा में दिशानिर्देशन् देना चाहिए! अर्थात अद्भुत मेधा आध्यात्मिकता और धार्मिकतायुक्त संतान मिलेगा! कूटस्थ में मनस और दृष्टि निमग्न कर के अंतःकुंभक और बाह्यकुंभक कर के इन भौतिक काम वांछों को नियंत्रण कर सकता है!
भार्या भर्त:
भार्या और भर्ता दोनों सब का सामने परस्पर दूषण नहीं करना चाहिए! अभिप्रायों को दोनों परस्पर गौरव करना चाहिए! प्रेम सब से बलवान है! दिव्यप्रेम डे सहिष्णुता करुणा दृढनिश्चयता निश्शब्दता परमात्मा का अनुसंधान करने के लिए क्रियायोग साधना इत्यादि सूर्य का रोशनी जैसा है! शारीरक कामवांछ सूर्य रोशनी का सामने छोटा सा दिय्या रोशनी जैसा है! वैसा सुलाक्षणायुत साधक भौतिक और आध्यात्मिक जीवन दोनों में विप्लवात्मक विजय लभ्य करेगा! प्रेम अधिक होने से शारीरक कामवांछ कम होगा! शारीरक कामवांछ अधिक होने से प्रेम कम होगा! भार्या और भर्ता दोनों में कामवांछ (Physical instinct) से परस्पर प्रेम अधिक होना चाहिए! पवित्र विचारों से शारीरक मिलाप हुआ भार्या भर्ता उन का आलोचना सरळी का मुताबिक़ पवित्रात्मा (Highly elevated Souls) भार्या का गर्भ में प्रवेश करेगा! इस पवित्रात्मा का प्रवेशन के लिए कुछ मासों पहले ही भार्या भर्ता दोनों तयारी (Preparedness) में रहना चाहिए! शुद्ध आलोचनायें और नियम क्रम से क्रियायोग साधनाओं के साथ अपना अपना शरीरों को पवित्र देवालय जैसा रूपांतर करना चाहिए! केवल सृष्टि का निरंतरता के लिए बना है यह भौतिक कामं! मात्र इंद्रिय सुख के लिए नहीं है यह भौतिक कामं! हमारा पूर्वज ऋषियों परमात्मा से संक्रामक ज्ञान का माध्यम से इच्छाशक्ति द्वारा संतानसृष्टि करके प्रकृति नियम को जारी रखदिया! मनुष्य वास्तव में अपना इच्छाशक्ति द्वारा अपनाप्रकृति नियम को जारी रखना चाहिए! परंतु ऐसा भौतिक कामवांछ (Physical lust) को वश होने का हेतु प्रस्तुत भौतिक सृष्टि (Physical Creation) बन गया!
उत्तीर्णता:
हमारा शिशु अवस्था का जीवन अब का जीवन दोनों को तुलना करना, आत्मपरिशीलन करना, तब प्रस्तुत वृत्ति को चुनना चाहिए! तब ही भावि जीवन सुखमय होगा! चाबी (Key) देके छोड दिया हुआ, बिना दिशा निर्देशनारहित (Directionless) असंतृप्तिसहित आत्मसंतृप्तिरहित खिलोना जीवन को मनुष्य नहीं बिताना चाहिए! संगीत को पसंद करनेवाला मनुष्य एक मामूली क्लर्क का काम करना कितना चिंताजनक है? इस जीवन नाम का नाटकरंग में सब ही पात्रधार है, केवल परमात्मा ही सूत्रधार है! केवल पुराणा कर्मा का अनुसार जीवन चलाना निस्सार है! वह ही इच्छाशक्ति का अनुसार क्रियायोग साधना का माध्यम से कर्मों को दग्ध कर के उन्नत आशयों का तरफ जीवन का गति बदलना, सब बंधों से विमुक्ति पाकर अपना स्वगृह यानी परमात्मा का साथ अनुसंधान होना कितना अद्भुत है! सारे कष्ट नष्टों हमारा किया हुआ कर्मो का फल ही है! सर्वं जगन्नाथ, सर्वं खलु इदं ब्रह्मा! जब सब परमात्मा ही है तब हमारा क्या लगता है? हमारा क्या नष्ट है? मनुष्य अपना सृजनात्मकशक्ति को उपयोग करके ठीक निर्णय लेना चाहिए! धर्मबद्धसहित सब रंगों में उत्तीर्णत पाना चाहिए! असंतृप्ति क्रोध परेशान इत्यादि का हेतु असफलता ही है! असफलता को परवा नहीं करना चाहिए! वह हमको बाधा नहीं करने देने के लिए प्रयत्न से समस्थिति में रहने के लिए होशियारी होना चाहिए! क्रियायोग ध्यान का माध्यम से परमात्मा का समीप में जाना चाहिए! तब दिव्य का कृपा हमारा कृषि को सहायता करेगा!
मित्रत्व:
मित्रत्वा परमात्मा का दूसरा कोण है! हमारा प्रिय लोग का माध्यम से अपना स्वगृह व परमात्मा से मिलकर नित्यत्व नामका अमृत्व पीने के वास्ते बुलाव व आह्वान है! दो व्यक्तियों का बीच मित्रत्व स्वार्थपूरित नहीं होना चाहिए! दिव्यप्रेम से भरपूर होना चाहिए! व्यक्ति अपना मित्रप्रेमको क्रमशः कुटुंब, पडौस, अपन्जा जाती सर्व जातियों, आखरी में जगत में व्याप्ति करना चाहिए! मनुष्य अपना स्नेहहस्त को अपना दुष्मनों को भी देना सीखना चाहिए! हम सब परमात्मा का अंश ही है! तब यह वैषम्यों और व्यत्यासों काय के लिए? मित्रत्व सर्व्यव्यापक (Universal Spiritual attraction) चीज है! आध्यात्मिक आकर्षण है! इस आकर्षण ही दो आत्माओं को दिव्यप्रेम इति बंधन से जोड देता है! परमात्मा एक है! एकं सत् विप्राः बहुधा वदन्ति’! अपना ही माया का माध्यम से सकारात्मक (Positive) और नकारात्मक इति द्वंद्वों में बदल गया! अनंत इति सिद्धांत (Law of Infinity), तारतम्य सिद्धांत (Law of relativity) का जोड़ के उस एक अनेक हुआ! हमारा अन्दर हुआ उस एक ही हमारा भावनों मेधा आत्मबोध इति उपकरणों का माध्यम से मित्रत्वा इति भावनों द्वारा सब को एक करने के लिए प्रयत्न करा रहा है! अपना सोदर व्यक्तियों को स्नेहहस्त नहीं देनेवाला मनुष्य दिव्यप्रेमिक का साथ अनुबंध में बढ़ावा कैसा लाएगा? दिव्यप्रेम में कपटत्व और कुचलत्व नहीं होगा, होना भी नहीं चाहिए! तुम मित्र को कैसा वंचन करसकते हो? पडौसियों कैसा भी हो तुम दया और प्रेम से तुम्हारा ह्रदय भर के रखो!
पात्रायें (Personalities):
हम एक चीज याद रखना है! हर एक मनुष्य का लक्षण वह जिस देश प्रदेश में रहता है उस का उपर आधारित होता है! धर्मबद्ध अनुकूल लक्षणों को हम अपना इच्छाशक्ती का अनुसरण करके आदत करना युक्त है! दुष्ट मनुष्य दुष्ट लक्षणों को शिष्ट मनुष्य शिष्ट लक्षणों को प्रदर्शन करना गमनार्ह है! अध्ययन (Study), चर्चा (Discussion), साहचर्य (Association), स्नेह (Friendship), और गौरवान्वित ध्यान (Respectful attention) इत्यादियों का माध्यम से अच्छे लोगों का साथ स्नेह का वृद्धि करके उनका अच्छे लक्षणों ग्रहण करना चाहिए! आत्मा परमात्मा का ही भाग है! इसी हेतु परमात्मा का लक्षणों ही आत्मा में होता है! मानव शरीरों अभिवृद्धि पथ (Evolution Pattern) में व्यक्तीकरण किया हुआ है! इसी कारण मानव मेधा किसी न किसी का पशु का अनुसरण/अनुकरण का मुताबिक़ होता है! मनुष्य का शरीर शास्त्र (Anatomy) किसी न किसी का पशु का लक्षण को अनुसरण/अनुकरण करता है! धैर्य, भूख होने से ही दूसरा पशु को वह भी सामने से शिकार करके मार के खाना, वीर मनुष्य का सिंह (lion) का लक्षण है! भूख होने से भी नहीं होने से भी दूसरा पशु को शिकार करके मारना,  मनुष्य का बाघ (tiger) का लक्षण है! कुछ लोग अवसर होने से भी नहीं होने से भी सहचर लोगों को हिंसा करते है! दिखाई देने से काफी है, काटना मनुष्य का सांप का लक्षण है! कुछ लोग साथीयों का दोष् लेशमात्र नहीं होने से भी उनको कष्ट पहुँचा जाते है, शारीरक हानी कर देते है! बिल्ली 4 5 चूहों को खा के भी शांत रहता हुआ दीखता है, वैसा ही कुछ लोग बिल्ली जैसा बाहर से शांतरूप दिखा के नष्ट करदेते है! कुछ लोग बहत लोगों को ठग के अपना जीवन बिताता है! परंतु बाहर में अनाड़ीपन दिखाई देता है! बिल्ली बाहर से शुभ्र दिखाई देता है! वैसा ही कुछ लोग अन्दर मानसिक अपरिशुभ्रता से भरपूर होते है! कुछ लोग वानरों जैसा दूसरों को अनुसरण/अनुकरण करने में अपना चतुरता दिखाता है! बंदर बहुत चंचल जान्वर है! वैसा ही कुछ लोग बंदर जैसा एक मिनट भी चुप नहीं बैठ सकते है! शांती से नहीं बैठ सकते है! कुछ लोग कबूतर व गाय का बछड़ा जैसा अधिक भीरुता प्रदर्शन करते है! कुछ लोग गधा जैसा जो गलती किया उसी को बार बार करते है! अधिक संभोग से ह्रदय, भेजा, वीर्य, शारीर और मनस् इन सब को हानी, नष्ट और दुर्बल होगा करके जानते हुए भी गधा जैसा उसी गलती को बार बार करते है! परमात्मा क्षीणरहित ज्ञानभंडार है! क्रियायोग साधना का माध्यम से परमात्मा का अनुसंधान करना चाहिए, उस ज्ञानभंडार का अमृत पीना चाहिए!
विवाह:
हम कुछ लोगों को देखने से कही इन लोगों को कही और कभी देखा है कर के ख्याल आता है! भूत व गत जन्मों में उन लोगों का हमारा साथ जोड़ा हुआ अनुबंध ही इस का हेतु है! इच्छाशक्ति का उपयोग करके हम अब क्रियायोग साधना करनेवाला और दया दाक्षिण्यादि धर्मबद्ध विषयों का   अनुकूल व्यक्तियों का साथ स्नेह अभिवृद्धि कने को निरंतर प्रयत्न करना चाहिए! जिन लोगों का प्रवर्तन इस का विरुद्ध होने से ऐसा लोगों से स्नेह नहीं करना चाहिए और उन से दूर रहना चाहिए! भौतिकसौंदर्य से अधिक मूल्य मानसिक सौंदर्यता को देना चाहिए! नहीं तो उस दांपत्य मनःस्पर्थों का दिशा में जाएगा और नाराकप्राय होजायेगा! एक सौंदर्यवति व धनवान स्त्री अति साधारण निराडंबर व्यक्ति को भर्ता का रूप में स्वीकार करने को गत जन्मों का उन लोगों का बीच में जोड़ा हुआ अनुबंध ही कारण है! कुछ लोगों को गत जन्मों में धनव्यामोह अधिकरूप में होता है! इसी कारण दौलत लेके अइष्ट कन्या को विवाह करने को सिद्ध होते है!
नम्रत:
परमात्मा का आलवाल प्रदेश नम्रता है! अहंकार ज्ञान को परिमिति करनेवाला दीवार जैसा है! भूमी में जैसा बीज डालने से वैसा ही फल मिलता है! हम अपने आप को निष्पक्षता निर्मोह और निर्द्वंद्वता से स्वयं परिशीलन और आत्म विमर्शन  करना चाहिए! इतरों को निस्वार्थसेवा करना चाहिए! इच्छाशक्ति को उपयोग करके अज्ञानता को नाश करना चाहिए! न्यूनता और मै गरिष्ट हूँ जैसा भाव को समूलनाश करना चाहिए! मै आत्मस्वरूप हु इति भाव को अधिकाधिक वृद्धि करना चाहिए!
तीसरा नेत्र:
सीधा वज्रासन, पद्मासन अथवा सुखासन मे ज्ञानमुद्रा लगाके बैठिए! कूटस्थ मे दृष्टि रखिये! पूरब दिशा अथवा उत्तर दिशा की और मुँह करके बैठिए! शरीर को थोडा ढीला(Relax) रखीए! अपनी तर्जनी अंगुली को दोनों आँखों के मध्य मे रखिए! अब आहिस्ता-आहिस्ता इस अंगुली को उपर की और उठाते हुवे देखते रहिए जहाँ अंगुली का नख अदृश्य हो वही अपनी दृष्टी बैठाईए! अंगुली को आँखों के उपर से हटा लीजिए! इसी को कूटस्थ मे द्रष्टि बैठाना कहते है! अब खेचरी मुद्रा में बैठिए!




ॐ जेनरेटर पीला रंग


सृष्टि का अतीत् परमात्मा (सत्)
 5 भुजवाला रजत नक्षत्र

सृष्टि का अन्दर का परमात्मा (तत्) नील रंग
श्रीकृष्ण चेतना)
 





క్రియాయోగధ్యానములో  సాధకుడు ట్టు.






क्रियायोगासाधना ध्यान में साधक मानवाचेतना को पार करना प्रथम कदम है! कूटस्थ में तीसरा नेत्र दिखाई देना द्वितीय कदम है! भौतिक नेत्र कुछ दूर/प्रदेश तक ही देख सकते है! इस सूक्ष्म तीसरा नेत्र से सृष्टि का हेतु ॐकार (पीला रंग) में, पश्चात् सृष्टि का अन्दर का परमात्मा (तत् - नीलरंग श्रीकृष्ण चेतना), तत् पश्चात् कारण चेतना को भी पार करके सृष्टि का अतीत् परमात्मा (सत् - 5 भुजवाला रजत नक्षत्र) में साधक पहुँच सकता है! इस पृथ्वी, अनेकानेक सौरमंडलों, आकाशगंगा (Milky way of Galaxies) समस्त एक ही जगह इक्कट्ठे क्रियायोग साधक देख सकेगा!
ॐकार (पीला रंग) को बैबिल (Bible) में होलीघोष्ट (Holy Ghost) कहते है! सृष्टि का अन्दर का परमात्मा (तत् नीलरंग श्रीकृष्ण चेतना) को परमात्मा का बेटा (Son of the Father) कहते है! सृष्टि का अतीत् परमात्मा (सत् - 5 भुजवाला रजत नक्षत्र) को परमात्मा-पिता (Father the God) कहते है!
भौतिक नेत्र का बीच में उपस्थित हुआ प्यूपिल (Pupil) परमात्मा (सत् - 5 भुजवाला रजत नक्षत्र) का प्रतीक है!
भौतिक नेत्र में नीलरंग ऐरिस (Iris) श्रीकृष्ण चेतना का प्रतीक है! भौतिक नेत्र में नीलरंग ऐरिस (Iris) का चारों ओर सफ़ेद (White) ॐकार (पीला रंग) का प्रतीक है! यह परमात्मा का शक्ति किरणों है! प्रकृति को रोशनी देनेवाला यह ही है!
साधारण व्यक्ति प्राणशक्ति इन्द्रियों का माध्यम से बाहर जाते रहता है! क्रियायोग साधक सोऽहं ॐकार को सुनना इति लययोग प्रक्रियों का माध्यम से अपना प्राणशक्ति नियंत्रण करता है! ह्रदय का लब डब का नियंत्रण होता है! पाँच ज्ञानेंद्रियों का शक्तियाँ उपसंहरण किया जाएगा! इस शरीर पृथ्वी पत्थरों नक्षत्रों ब्रह्माण्ड का सर्वस्वा इस तीसरा नेत्र का द्वारा आनेवाले परमात्मशक्ति का माध्यम से ही नियंत्रण हो रहा है इति परिपूर्णरूप में ग्रहण में आ जायेगा!
इन्द्रियों का माध्यम से बाहर जानेवाला प्राणशक्ति अपना गति को बदल के पुनः तीसरा नेत्र की दिशा में जाने की दशाओं चार प्रकार का होता है!
1) प्रथम दशा मे झिल्ली (Membranes) में मेरुदंड में कुछ  रेगकर चलरहा है (crawling) करके भावनायें साधक को मिलता है! 2) द्वितीय दशा में कूटस्थ में यांत्रिकरूप में अधिचेतानावस्था में स्थिर होकर तीव्र आनंदकर भावनाए साधक को मिलता है! 3) तीसरा स्थिति में कूटस्थ में तीव्र आत्मीयतापूर्ण भावनाए साधक को मिलना और ॐकार शरीर का अन्दर और बाहर कान बंद करने से भी नहीं करने से भी मिलता है! 4) चौथा दशा में कूटस्थ में तीसरा नेत्र दिखाई देता है! एक सफ़ेद प्रकाश तीसरा नेत्र में नेत्र बंद करने भी खोलने से भी दिखाई देगा! और परिसंचरण (circling) करता हुआ दिखाई देगा! प्राणशक्ति श्वासरहित हो जाएगा! नाड़ियों नेत्रों कणकेंद्रों इत्यादियों से उपसंहरण किया जाते है! गहरी विद्युत् प्रकाश दिखाई देगा! अनंत में घूमते हुए दिखाई देगा! एक नीला रंग वलय व गोळ तीसरा नेत्र में दिखाई देगा! प्राणशक्ति (सफ़ेद प्रकाश) अंदर अनंत सुरंग (Tunnel) में जाता हुआ अनंत में व्याप्ति होता हुआ नीला रंग में दिखाई देगा! इस सुरंग द्वारा ही जीवात्मा प्रयाण करता है!
भौतिक नेत्र का माध्यम से देखने से समुद्र जैसा अनंत प्राणशक्ति से व्यक्ति का प्राणशक्ति एक तरंग जैसा विभाजन होके अकेलापन् होकर अलग दिखाई देगा! कूटस्थ में तीसरा नेत्र का माध्यम से देखने वाला साधक को समुद्र जैसा अनंत प्राणशक्ति व्यक्ति का प्राणशक्ति तरंग एक भाग जैसा दिखाईदेगा और ऐसा भावना देगा! आत्मा का आध्यात्मिक चेतना तीसरानेत्र का रजत नक्षत्र का अंदर प्रयाण करता है! का आध्यात्मिक चेतना तीसरा नेत्र का रजत नक्षत्र में छिपा हुआ होता है! तीसरा नेत्र का अंदर का अनंतत्व को देखता रहता है और भौतिक अहंकार का रूप में मै, मेरातत्व का साथ जोड़ा होता है! कूटस्थ का तीसरा नेत्र का बाहर प्रयाण करेगा! मेडुलाआबलम्बगेटा (Medulla Oblongata) में इस मै, मेरातत्व स्थिर होता है! इन्द्रियों का माध्यम से इस शरीर को और इस प्रपंच का पदार्थों को देखता रहता है!  इस प्रपंच का पदार्थों रूप देश, काल और परिणाम इत्यादि से परिमित रहता है! मन जब इस परिमित से उपसंहरण होने से तीसरा नेत्र का रजत नक्षत्र का अन्दर में तत् पश्चात् अपरिमित अनंतत्व में तेज से दौडते जाएगा! परिमित भौतिकमनस् इस जगत का अल्प भाग ही देख सकता है!
तीसरा नेत्र एक आकाशवाणी केंद्र (Radio Station) जैसा है! इस का माध्यम से स्थूल सूक्ष्म प्रपंचों में उपस्थित हुआ अपना इष्ट लोगों को आत्मबोध (Intuition) का माध्यम से संदेशों/संकेतों भेज सकता है और स्वीकार भी कर सकता है! आकाश का शब्दों को सुनाने को रेडियो अवसर है! हमारा आलोचना तरंगों भी ब्रह्मांडशक्ति (Cosmic-Consciousness) शक्ति नाम का आकाश का माध्यम से प्रयाण करता है! इस को स्वीकार (receive) करने को तीसरा नेत्र आवश्यक है! तीसरा नेत्र का माध्यम से हम नेत्र, नासिका, कान, चर्म और जीब का संकेतों को दूर से  स्वीकार कर पाते है! आनेवाले संघटनों सहित हम तीसरा नेत्र का माध्यम से कार्यकारण सिद्धांतों और आत्मबोध द्वारा जान सकते है! हर एक जीवी का इन्द्रियलक्षणों का संकेतों और उन का आलोचनायें विद्युत् अयस्कांत तरंगों का रूप में आकाश में संक्षिप्त रखा जाता है! आत्मबोध का हेतु ठीक भावनों उत्पन्न होता है और उन का प्रतिरूप तस्वीरों (configuration) को हम तीसरा नेत्र में दर्शन कर सकते है! तीसरा नेत्र एक शक्तिवंत केमरा (Camera) जैसा है! हम उन व्यक्तियों का बारे में शोचने का वजह से आकाश और अंतरिक्षों का माध्यम से आनेवाला स्पंदनों हमारा इन्द्रियों को उन स्पंदनों का मुताबिक़ समान प्रतिपत्ति में स्पंदन करायेगा! आत्मबोध नीलारंग का षट्टर् (Shutter) को और पाँच भुजोंवाला नक्षत्र को खोल देगा! दूरवाला स्थूल और सूक्ष्म स्पंदनों को एक तस्वीर जैसा चित्रीकरण करेगा!
जब निद्रा से उठने का बाद हम आँख जहा तक चारों ओर परिसर प्रांत देख सकता है इतना ही भौतिक प्रकृती को देख सकेगा! तब हमारा नेत्रों ¾ भाग ही खोलेगा! कुछ भी वास्तु को निशिता परिशीलन करने समय संपूर्णरूप में खोलता है! अर्थनिमीळित नेत्रों कूटस्थ में स्थिर होकर आध्यात्मिक दर्शनों को सहायभूत होते है! अवचेतनावस्था में नेत्रों पूरा बंद होता है! शिशुवों का नेत्रों निद्रा में उपर की ओर कूटस्थ में परमात्मा (कूटस्थ) को देखता रहता है! वे जब शिशु बढता है क्रमशः नेत्रों नीचे की ओर घूमता है! और निद्रा में पूरा बंद हो जाता है! पशु और साधारण मनुष्यों का भौतिक मरण में नेत्रों का अन्दर का गोलकों उपर की ओर देखता है! उन का प्राणशक्ति और आत्मा अचेतानात्मक होकर मेडुलाआबलम्बगेटा (Medulla Oblongata) का माध्यम से प्रयाण करता है!
दोनों स्थूल नेत्रों कूटस्थ में केन्द्रीकरण करने से तीसरा नेत्र बनता है! दृष्टि स्थिर होता है! अभ्यास का माध्यम से दृष्टि अधिकाधिक कूटस्थ में स्थिर करना है! वास्तव में मेडुलाआबलम्बगेटा (Medulla oblongata) का माध्यम् से प्रतिबिंबित हुआ प्रकाश ही तीसरा नेत्र है! वैसा नेत्र को परमात्मा का अनुसंधान करने इच्छा बलवत्तर रूप में होता है! मानव चेतना को परमात्म चेतना का तरफ जाने को मार्गदर्शन देता है! दोनों स्थूल नेत्रों का दृष्टि नीचे स्थूल प्रपंच का दिशा का तरफ एकाग्रत करने से मानवचेतन का मार्ग में जाएगा! तत पश्चात अवचेतनावस्था का मार्ग में जाएगा! मेडुलाआबलम्बगेटा एक स्विच (Switch) जैसा है! वह प्राणशक्ति विद्युत् को नेत्रों में प्रवाहित करेगा! भौतिकता को आदत हुआ इस विद्युत् क्रियायोग ध्यान अभ्यास का कारण अधिकाधिक कूटस्य्थ में स्थिर होता रहेगा! तब वह मेडुलाआबलम्बगेटा में बदिली (Transfer) होता रहेगा! वास्तव में आध्यात्मिकता को परिधि (Dimensions) नहीं है! हम कूटस्थ में जो प्रकाश को देखते है वह वास्तव में मेडुलाआबलम्बगेटा का अन्दर का ही है!
चेतना:
मनुष्य सर्वदा एक ही कमरे को परिमित होकर निवास करने से उस कमरे ही उस मनुष्य को प्रपंच जैसा दिखाई देगा और अनुभव/भावना भी करेगा! कदापि एक दिन उस कमरे का किटिकी खोलने से जब विस्तार आकाश दिखाई देने पर इस प्रपंच इतना विशाल इति आश्चर्यजनक हो जायेगा! अंडा में बांधित नन्ही चिड़िया को उस खोल ही प्रपंच है! उस भवन का ढांचा (Shell) फाड़ के जब बाहर आने पर इस प्रपंच का विस्तार देख कर आश्चर्यजनक हो जायेगा! हम भी मनुष्य रूप का नन्ही चिड़िया है! प्रपंच (Yolk of the world) नाम का द्रव में है! पृथ्वी अंगारका शनि इत्यादि ग्रहों का साथ हुआ सौरमंडल, नक्षत्रों इत्यादि का साथ हुआ जगत व आकाश का खोल  (shell) का अन्दर है हम! साधक अपना क्रियायोग ध्यान का माध्यम से इस आकाश नाम का खोल (shell) को छिद्र करके अनंत परमात्मा से जब संबंध बनाता है तब उस को इस प्रपंच का अत्यंत अल्प परिमाण अनुभव करेगा, अनुभव में आयेगा! अल्प और स्वल्प भौतिक चीजों से संतुष्ट और संतृप्ति नहीं होना चाहिए! हम बिक्षक् नहीं है परमात्मा का प्यारा दिव्य संतान है! अनंतत्व हमारा जन्म हक् है! भोजन भार्या/भर्ता संतान इत्यादि सब अत्यंत अल्प चीजें है! उन सब को देने वाला परमात्मा को लभ्य करना चाहिए!
चिह्नों:
अनंत में व्यक्तीकरण नहीं हुआ तीन भाग अव्यक्त है! यह परमात्मा का नहीं दिखनेवाला भाग ही सूक्ष्ममनस है! बाकी व्यक्तीकरण हुआ भाग व्यक्त है! यह परमात्मा का दिखनेवाला भाग ही स्थूलमनस है! परमात्मा का व्यक्त भाग परमात्मा का स्थूलशरीर समझ सकते है! व्यक्त स्वरुप का विग्रह नील और लाल है! हर एक नील छेद का माध्यम से परमात्मा जीवं यानि प्राणशक्ति देता है! अथवा व्य्क्ताकाश का हर एक कण जीवं का साथ उपस्थित है! सब से अत्यंत मुख्य विषय मतमौढ्यं से जाती विमुक्त होना चाहिए! मत का हर एक पूजा व नियमों का अंतरार्थ जानना चाहिए! अथवा वह केवल विग्रह पूजा व मूरख नियमों ही बनता है! क्रास मानवाचेतना और अनंतचेतनाओं इति द्वंद्वों का चिह्न है! क्षितिज्ञ के समानांतर डंडा (Horizontal Bar) मानवचेतना का चिह्न है! लम्बवत डंडा (Vertical Bar) अनंतचेतना का चिह्न है! अथात मानव परिमित चेतना को अनंतचेतना का साथ अनुसंधान करने का तात्पर्य है क्रास का उद्देश्य! त्रिभुज तीन चीजों का चिह्न है! परमात्मा (God the Father), तत् (सृष्टि का अन्दर का परमात्मा) (Son of the God) और ॐकार (Holy Ghost) का चिह्न है! सतव, तमो, रजो गुणों का चिह्न है! प्राणशक्ति इन तीन गुणों का माध्यम से स्थूलशरीर को व्यक्तीकरण करता है! तीसरा नेत्र विश्व जीवाधार शक्ति का चिह्न है! पाँच भूजवाला रजत नक्षत्र परमात्मा को (God the Father) उस चारों ओर घेरा हुआ नीलारंग तत् (सृष्टि का अन्दर का परमात्मा) (Son of the God) और स्वर्णरंग (Golden Halo) ॐकार (Holy Ghost) का चिह्न है! सूर्य तीसरा नक्षत्र का चिह्न है! सूर्य हमारा जीव है! सूर्य, सूर्यशक्ति और सूर्या प्रकाश का आधार परमात्मशाक्ती ही है! तीसरा नक्षत्र का अन्दर उपस्थित हुआ चीज भी परमात्मशक्ति ही है! परमात्मशक्ति (Cosmic Energy) सूर्यप्रकाश अनंताधिक है! तोल नहीं सकता है! सूर्यप्रकाश हमारा रेटीना (Retina) को जला के अंधा कर सकता है! कूटस्थ में कोटि सूर्यकांति प्रभा से दिखनेवाला तीसरा नक्षत्र हम को जला के अंधा नहीं बनाएगा! यह तीसरा नक्षत्र ही असली प्रकाश है! बाकी चीजें सब इस तीसरा नक्षत्र का सामने अंधेरा का समान है!
हम गोळा/वृत्त (Round) और सरळरेखायें (Straight lines) को पसंद करते है! हमारा नेत्रों, शिर, अंगुलियां, फेफड़ों इत्यादि शरीर भागो सब इन्ही नमूना में व्यक्तीकरण किया हुआ है! सरळरेखा को बढाने से वृत्त (Round) बन जाता है! सरळरेखा को अनंत को चिह्न है! गोळाकार वास्तु का केंद्रबिंदु से शक्ति चारों ओर समानाप्रतिपत्ति में व्याप्ति होता है! स्पटिक पूजा (Crystal worship) इसी कारण प्रारंभ हुआ! परमात्मा का प्रथम स्पंदन वृत्ताकार है! इसी हेतु मंदिरों का उपर वृत्ताकार (Round) वस्तु का प्रतिष्ठापन आरम्भ हुआ! परमात्मा का बाहर जानेवाला स्पंदनों परिमित वस्तुवों को व्यक्तीकरण करेगा! परमात्मा का आकर्षण शक्ति बाहर शक्तियों को अपना अंदर लेता है!
पृथ्वी, अंगारक, सूर्या, नक्षत्रों इत्यादि जगत का वास्तुवों सब परिमित वस्तु है! जगत का सब वस्तुवों परमात्मा का अन्दर पहुँचने का प्रयत्न करेगा, करता है और करते रहेगा! क्रियायोग साधक सब से शीघ्र ही परमात्मा का साथ अनुसंधान करेगा!
पुष्पों पुष्पसौरभ परमात्मा का अस्तित्व जानकारी देने का व परमात्मा अपने आप को व्यक्त (Express) करने को चिह्न है! इसी कारण तीव्र क्रियायोगासाधक अपना साधना में परमात्मा अस्तित्व चिह्न पुष्पसौरभ का आस्वादन करेगा! साधक मै हूकरके भरोसा को व्यक्त (Express) करने को प्रतीक साधक को ऐसी भावन उत्पादन परमात्मा करेगा! वृक्ष प्राणशक्ति का चिह्न है! परमात्माशक्ति ही जीवशक्ति जैसा व्यक्तीकरण हुआ है! पुनः उस जीवशक्ति ही परमात्माशक्ति जैसा बदलने का  नवरत्नों, पत्थरों, वृक्षों और वृक्षसंपदा जैसा रूपांतर होना चिह्न है! वृक्षों का जड़ें नाडियों का (nervous system) का प्रतीक है! इस वृक्षों का नाडियों (nervous system) मनुष्य का केश का प्रतीक है! वृक्षों का नाडियों घनीभव सौरशक्ती है! इस सौरशक्ती परमात्मा से ही उत्पन्न हुआ है! वृक्षों का शाखायें नाडियों का घनीभव सौरशक्ती बाहर जाने का चिह्न है! कंप्यूटर (Computer) का प्रोग्राम (programme) सब सर्वस्वतंत्र है! परन्तु हर एक प्रोग्राम सेंट्रल प्रासेस्सिंग यूनिट (Central Processing Unit) को स्पर्श करके जाना पडेगा! मनुष्य और पशुवों का नाड़िया (Sensor & Motor nervous system) परमात्मा से उद्भव हुआ सौरशक्ती ही है, सौरशक्ती  का रूपांतर ही है! कंप्यूटर का प्रोग्राम जैसा इन नाडियॉ और उन का काम सब सर्वस्वतंत्र है! मनुष्य का अंदर भेजा से बाहर वार्ता लेजानेवाला ना नाडियॉ (Motor nervous system) सब अपने आप को इन संसाराबंधनों से स्वतंत्र होने के लिए व्यक्तीकरण किया हुआ है! पदार्थ को परिमिति होकर संदेशों को मस्तिष्क से बाहर वार्ता लेजानेवाला ना नाडियॉ (Motor nervous system), इन नाडियों का वार्ता/ संदेशों को मस्तिष्क का अंदर लेजानेवाला नाडियों (Sensor nervous system), दोनों नाडियों का कार्य निर्वर्तन को क्रियायोगी मेरुदंड में उपसंहरण करेगा! उपसंहरण किया संदेशों को मेडुलाआबलम्बगेटा (Medulla Oblongata) का माध्यम से अनंत में भेज सकेगा! लोह और पत्थरों परमात्मा का सुन्दरता का चिह्न है! नवरत्नों सुन्दरता शक्ति और उपशामानाशक्ति (Healing Force) का चिह्न है!
अपरिमित परमात्मा को परिमिता पत्थर और लोह विग्रहों का पारमित करनेवाला लोगों को परमात्मा लभ्य होना असंभव है! सर्वं खलु इदं ब्रह्म! परमात्मा को सर्वत्र धर्षण करना युक्त और आचरणीय है! एक तरंग पूरा समुद्र नहीं है! दिखनेवाला सारे तरंगों और गंभीरता से भरपूर बाकी सब मिलके समुद्र बनता है! दिखनेवाला जगत और नहीं दिखनेवाला शुद्ध चेतना सब मिलके परमात्मा है! अनंत परमात्मा इति समुद्र में एक परिमत तरंग है हम! हमारा अंदर का दोषोंको समूल नाश करना चाहिए! माया परमात्मा का अंतर्भाग है! माया से परिवृत होकर अज्ञानता से भरा हुआ है हम! वास्तव में सत्य क्या है हम न्यास/अन्वेषण यानी सत्यान्वेषण करना चाहिए! माया का बंधन से निवृत्ति पाना चाहिए! क्रियायोग साधना का माध्यं से अनंत में विलीन होना ही ऐकैक मार्ग है! भौतिक मरण का पश्चात भी आत्म नाश नहीं होता है! आत्म परमात्मा का अंतर्भाग है! यह जानना के लिए क्रियायोगसाधना ही सक्षम है! इतना ही नहीं, एक ही धागा प्राणशक्ति, एक ही सिद्धांत कर्मसिद्धांत, एक ही पद्धति और एक ही ज्ञान हम सब यानी पूरा जगत को चला रहा है यानी दिशा निर्देशन दे रहा है कर के हम ग्रहण करेगा! यह समझने से ही सारे जगत एक गृह जैसा, हम सब एक ही माता का शीशु जैसा, आखरी में हम सब उस परमात्मा में ही ऐक्य होना है कर के परिपूर्णस्थिति में ग्रहण नहीं कर सकेगा!
शांति संतृप्ति रक्षण चेतनापूर्वाकज्ञान और अमरत्व लभ्यहोना इन सब के लिए क्रियायोगसाधना ही अत्यंत आवश्यक है! केवल इसी साधना का सहायता से ही सर्व हृदयों में उपस्थित होनेवाला वस्तु रूपरहित परमात्मा ही है करके स्थिर और अचंचल भावना परिपूर्ण रूप में प्राप्त होगा! 
जन्मतः सब एक ही है! हमारा देश, प्रदेश, प्रांत, भाषा, पड़ोस, मित्र, भार्या/भर्ता,   कुटुंब, जाती, सामाजिक स्थिति, परिस्थितियों, कालामान परिस्थितियों इत्यादियों का मुताबिक़ हमारा संचितकर्मों हमारा उपर अपना अपना प्रभाव दिखादेगा! आधुनिक वैज्ञानिकशास्त्र हमको अनेक भौतिक सदुपायों को प्रदान करता है! कठोर और क्रूर जन्तुबली नरबली सतीसहगमनं इत्यादि मूर्ख सिद्धांतो/आचारों को विश्लेषण करने को दोहद किया था, अभी भी करता है! हम सब एक हैएक नारा (Slogan) को परिमित नहीं होना चाहिए! वह एक अनुभवैकवेद्य होना चाहिए! हम निर्माणात्मक परस्पर विमर्शन करके हमारा अंदर का दोषों को समूलनिर्मूलन करना चाहिए! एक दूसरों से परस्पर चर्चों का माध्यम से अंजाने विषयों को सीखना चाहिए! परिशुद्धात्म होकर परमात्मा का साथ अनुसंधान करना चाहिए! पाश्चात्य देशों से बहुत कुछ विषयों को हम सीख सकते है! वैसा ही भारतदेश से आध्यात्मिक विषयों को पाश्चात्य देश भी सीख सकते है!
पानी को जमाके (Freeze) बरफ बनाके पानी का उपर छोड़ने से वह पानी के उपर तैरती है! यह आधुनिक वैज्ञानिक शास्त्र प्रयोग (Experiment) द्वारा हम सीखे है! वैसा करके आध्यात्मिकता में कुछ तीव्र क्रियायोगसधाकों करने अद्भुत विन्यासों को गलत नहीं बोलना चाहिए क्यों की इन विन्यासों प्रयोगों का और तर्क का अतीत है! जीसस क्रैस्त (Jesus Christ) पानी का उपर चलना आधुनिक वैज्ञानिक शास्त्रपरिधि का अतीत है! क्रैस्त अपने मानसिक नियंत्रण के माध्यम से शरीर कणों (Cell) का स्पंदनों (Vibration) को नियंत्रित कर पाए थे और पानी के उपर चल सके थे!
शास्त्रों:
श्वास को अस्त्र जैसा उपयोग करना ही श्वास्त्र है! कालक्रम में क्रमशः   श्वास्त्र शास्त्र हो गया है! गंगा नदी में जितना पानी बहने से भी हम जितना परिमाण का पात्र ले जायेंगे इतना ही परिमाण का पानी इस में आयेगा! वैसा ही अनंत ज्ञान समायुक्त शास्त्रों में हमारा मेधा का परिणिति/परिधि का मुताबिक़ ज्ञान लभ्य होगा! हम अपने आप को शास्त्र पंडित, घनापाठी, अष्टावधानी, शतावधानी इत्यादि पदवीयों से परिचय कराने वाले लोग वास्तवरूप में अल्पज्ञानग्राही गर्विष्ठ है बोलने से किंचित् भी अतिशयोक्ति नहीं है! लड़का इंजीनियर है परंतु एक मामूली फ्यूज भी डाल नही सकता है, उस से क्या उपयोग है? सर्वशास्त्र को विद होने से भी उन शास्त्रों का अर्थ नहीं जानने से क्या लाभ है? परमात्मा से अनुसंधान नहीं हुआ उन कुहना पंडितों अन्य जनों को क्या मार्गदर्शन दे सकता है? फल को नहीं भक्ष्य करते हुए वर्णन करने से उस फल का रूचि यदार्थ में कैसा पता चलेगा? एक अंध दूसरा अंध को मार्गदर्शन कैसा करेगा? अधिक प्यासा मनुष्य कितना प्रयत्न करने से भी बड़ा पात्र का जल पूरा नहीं पी सकता है! वैसा ही परिमित मेधायुकत मनुष्य शास्त्र पूरा सीखने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए, अगर करने से भी सफल नहीं होगा! आध्यात्मिक सत्यों को परिपूर्णरूप में समझानेवाले श्रीमद भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्रभाष्यों, उपनिषद, पातंजलि योगसूत्रों इत्यादि ग्रंथों आद्यंतम् एक ही हिस्सा में पढने से उन ग्रंथों का ज्ञान ग्रहण कर सकेगा? असलियत में कोई भी ग्रंथ थोड़ा थोड़ा समझते हुए पढ़ना चाहिए, जहा तक पढ़ा है उस का उपर ध्यान करना चाहिए, ग्रहण करना चाहिए, अनुभव प्राप्त करना चाहिए!
कदळी, आम, चीकू इत्यादि फल मधुर होता है! परंतु उनका मधुरता में व्यत्यास है! वह जो अनुभवी ही है वह ही जानेगा! कुछ लोग शास्त्रों को रट्टा मार के कुछ श्लोकों को बार बार उदाहरण देते हुए अनुभव रहित वादानों करते है और सिद्धान्तीकरण करते है! फल नहीं खाते हुए उनका मधुरता का वर्णन करना जैसा है यह! इस से हम को कोई लाभ उपलब्ध नहीं होता है!
सत्य ग्रहण करने के लिए दोई मार्ग है: (1) मानव मेधा (Intelligence), यह इन्द्रियों का आधारित जिस का हेतु यह परिमिता है! हम अन्धेरा में रस्सी को देख कर सांप करके भ्रमित होना, पहाड़ का उपर धूम्र को देख कर आग करके भ्रमित होना इत्यादि! बाहर दिखनेवाला (Appearance/Phenomenon) सब सत्य नहीं है! (2) असली सत्य (Noumenon) वह आत्मबोध (Intuition) का माध्यम से व्यक्त होगा! क्रियायोगध्यान द्वारा आत्मा को परमात्मा का साथ अनुसंधान करने से आत्मबोध अभिवृद्धि होगा! यह ज्ञान ही असली ज्ञान है, इस को पक्का भरोसा कर सकता है और सत्य है! शास्त्रवेत्ता का प्रयोग (Experiment) सब पदार्ध का बाहर का तरफ परिमित है! क्रियायोग साधक का प्रयोग सब पदार्ध का बाहर से अन्दर की ओर जाता है! वे सब अनंत का बारे में करते है! इसी हेतु वे सब अपरिमित है! ए सब किसी का तृप्ति के लिए करनेवाले अँध भावनाए नहीं है! तर्क (Calm reason), भावना (Calm feeling) और क्रियायोगाध्यान (Meditation) सब मिलने से ही आत्मबोधा है!
सृष्टि:
एक युग समाप्त होने पर सृष्टि का उपसंहरण होता है! तब केवल परमात्मा ही रहेगा! उस परमात्मा को आदि और अंत नहीं है! परमात्मा अपने आप को खुदी मेधासहित स्पन्दनारूप जैसा व्यक्तीकरण किया है! इसी को परमात्मा का शब्द(ॐकार) (Cosmic Intelligent Vibration) कहते है! शब्द (ॐकार) परमात्मा का शक्ति (Cosmic Energy) है! यह शक्ति ही ब्रह्मांड मेधा (Cosmic Intelligence) का माध्यम से घन द्रव, वायु, पदार्ध, इलेक्ट्रॉन्स (Electrons) और शक्ती (Energy) इत्यादि विविध रूपों में व्यक्त होता है! इन सब को आदि और अंत है! ब्रह्मांड मेधा ब्रह्मांड स्पंदनों (Cosmic Vibration) विविध रूपों में यानी पदार्ध जीव मानव चेतना इत्यादि रूपों में व्यक्त हुआ है!
परमात्मा मे देखनेवाला, दृश्यं, ध्येयं तीनों एक ही है! इसीलिये परमात्मा में कोई भी स्पंदना नहीं होता है! कारण, सूक्ष्म और स्थूल इति तीन प्रकार का स्पंदनों है! इन सब परमात्मा में नहीं होता है! विचार शक्ति और पदार्ध इत्यादि सब विविध प्रकार का स्पंदनों है! सृष्टि में सारे पदार्धों परमात्मा का अन्दर का स्पंदनों द्वारा ही उत्पन्न हुआ है! सृष्टि के लिए परमात्मा अपने आप को सृष्टिकर्ता, सृष्टिशक्ति और सृष्टि इति व्यक्तीकरण किया है! स्पंदना मेधा (Cosmic Intelligence) स्पंदनायुतशक्ति (Cosmic Intelligent Energy) का रूप में व्यक्तीकरण होता है! इस नीचे तस्वीर देखिये:  

हरि
              
प्रारंभ व प्रथम गोळ सत् एक प्रकाशमान दिया समझलो! सत् का अर्थ सत्तावाली है! उन का किरणों ही माया (तत्) नाम का गोळ में गिरता है! द्वितीय गोळ तत् समझलो! यह एक पारदर्शी शीशा समझलो! सत् नाम का प्रकाशमान दिये की मात्र कुछ किरणें ही इस पारदर्शी शीशा माया (तत्) में प्रवेश करता है! तो सत तत में भी होता है, तत के अतीत भी होता है! तत के अंदर किरणें को ही तत् कहते है! तीसरा गोळ ॐकार है! यह सृष्टि का हेतु है! यह तत् का परावर्तन है!
कुछ भी वस्तु उत्पत्ति होने के प्रथम में शब्द निकलता है! पश्चात आँखों को दिखनेवाला वस्तु उत्पत्ति होगा! यह ही नाश/हरी होनेवाला प्रपंच है! तत के अंदर किरणें बाहर विकेंद्रीकरण होने समय इति शब्द का साथ हरी/नाश होनेवाला सृष्टि उत्पन्न होता है! समस्त जीवकोटी इस सृष्टि का अंतर्भागा है! एकं सत विप्रा बहुदा वदंति! है एक ही है, वह ही सत है! वह सर्वशक्तिमान सर्वव्यापी और सर्वज्ञ है! सत चित आनंदस्वरूपी है! इस का नाम और रूप जोड़ने से नाश/हरी होनेवाली सृष्टि उत्पन्न होता है! सृष्टि का कारण अनेक है करके भावना उत्पन्न करनेवाला माया है! मा=नहीं, या=यदार्ध, यानी यदार्ध नहीं इति अर्थ है! इसी कारण जो यदार्थ नहीं है वह ही माया है! पदार्ध कभी यदार्थ नहीं है! परमात्मा का स्वप्न ही माया है!
भयंकर स्वप्न स्वप्नाके भयभीत हुआ मनुष्य आँख खोलने से भय समाप्त होता है! वैसा ही माया से विमुक्त होने के लिए क्रियायोगसाधना अत्यंत आवश्यक है! वह और कोई जन्म में नहीं साध्य है, दुस्साध्य है!! मात्र केवल मानव जन्म में ही सुसाध्य है! सारे जन्मों में मानव जन्म अत्युत्तम है! सत का अर्थ परमात्मा है! परमात्मा को पाने के लिए हरी से शब्दब्रह्म ॐकार में, ॐकार से तत् में, तत् से सत् में जाना चाहिए! इसी कारण कोई भी शुभकार्य हरी ॐ तत् सत्इति कहके प्रारंभ/ आरंभ करना चाहिए! अथात नाश होनेवाला हरी से नाशरहित सत् में जाना चाहिए!
परमात्मा का अंतर्गत माया से व्यक्त/उत्पन्न होनेवाला जगत तीन प्रकार का होता है! प्रथम में कारण (Ideational or Causal Universe) जगत/शरीर, पदार्थ व स्पंदनाशक्ति (vibratory force) को स्पर्श करनेवाला परमात्मा का केवल भावनाएं (Ideas) व ऊहायें! द्वितीय में सूक्ष्म जगत/शरीर (Finer forces of Subtle or Astral Universe) है! विद्युत् आकर्षण् विकर्षण् अयस्कांत इलेक्ट्रॉन्स प्राण शक्तियों का संघात है! ये सब इन्द्रियातीत है! तीसरा स्थूल जगत/शरीर (Material Universe) और स्थूल (Grosser forces) स्पंदना शक्तियॉ है! आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, घनपदार्थों, द्रवपदार्थों, वायुपदार्थों, इलेक्ट्रॉन्स (Electrons) और शक्ति (Energy) है!
कारण (Ideational or Causal Universe) जगत/शरीर में सूक्ष्म जगत/शरीर (Finer forces of Subtle or Astral Universe) का ब्लूप्रिंट (Blue Print) होता है! हम स्थूल जगत/शरीर (Material Universe) को नेत्रों से देख सकते है! कारण और सूक्ष्म जगत/शरीर दोनों को इन भौतिक नेत्रों से देख नहीं सकते है!
अणिमा, गरिमा, लघुमा इत्यादि अष्ट शक्तियों को प्राप्त करना परमात्मा का प्राप्ति का नाप-तौल (Measurement) की प्रक्रिया नहीं है! जगत को नियंत्रण करने को शक्ति लभ्य होने से भी वह परमात्मा प्राप्ति का निदर्शन नहीं है! परमात्मा प्राप्ति किया क्रियायोग साधकों परमात्मा प्राप्ति का सामने इन शक्तियों को तृणप्राय और अल्प  समझते है! साधना में लभ्य होने हर एक नित्यनूतन आनंद और अपना कष्ट नष्टों का निवृत्ति के लिए शीघ्र मार्गदर्शन स्फुरण करना परमात्मा का अस्तित्व का महत्वपूर्ण निदर्शन है!
स्पंदनों:
स्पंदन का अर्थ गतिविधि (Movement) है! जगत व्यक्तीकरण को इन स्पंदनों ही कारण है! जगत का हर एक अणु कुछ न कुछ स्पंदनासहित होता है! परंतु उन स्पंदनों का गतिविधि (Rate of vibration) में व्यत्यास होता व हो सकता है! कुछ वास्तु/पदार्ध एक सेकेंड (Second) व मिनट (Minute) में दो व उस से अधिक व कम बार स्पंदनों करा सकता है! इन स्पंदनों का गतिविधि (Rate of vibration) में व्यत्यास हीई इस अदभुत जगत!
सूर्य अपना अयस्कांत व आकर्षण शक्ति का हेतु शेष ग्रहों को अपना चारों ओर घुमाता है! मनुष्य का अन्दर का अहंकार हम को इस प्रपंच का दिशा में आकर्षण करा के घुमाता है! यह ही अपना स्वगृह और पिता   परमात्मा से दूर व अलग रखता है!
जब हम कुछ लोगों से मिलते है और उन से सन्निहित रहते है, तब नकारात्मक स्पंदनों यह मनुष्य दुष्ट है’, सकारात्मक स्पंदनों यह मनुष्य शिष्ट है’, इति हमको उत्पन्न होता है! जब मनुष्य दूसरे मनुष्य को मिलता है तब उन दोनों का मध्य में परस्पर प्रेम उद्भव होना चाहिए, द्वेष उद्भव नहीं होना चाहिए! प्रोक्षइति उद्धरीण (चमच) व तुलसी पत्र से शिर का उपर पानी छिड़कने से शुद्धि (baptise) नहीं होता है! क्रियायोग ध्यान का माध्यम से हम अपना शरीर और मन दोनों को शुद्धि (baptise) करना चाहिए! वैसा शुद्धि किया हुआ मन प्रेम से भरा होता है! वैसा प्रेम भरा मन का प्रेम बाहर बहने दूसरों को आकर्षित करता है!
रोगग्रस्त मनुष्य से नकारात्मक अशांतिपूरक स्पंदन निकलता है! वैसा लोगों का उपर दया दिखाना गलत नहीं है! परंतु काम होने से भी नहीं होने से भी उनका साथ स्पर्शन करते हुए घूमना नहीं करना चाहिए! वैसा करने से हमारा मन भी रोगग्रस्त नकारात्मक अशांतिपूरक स्पंदनों से भरपूर हो जाएगा! थोड़ा कुछ अस्वस्थ होने से भी हमारा मनोधैर्य ढीला पड के आवेदनापूर्वक हो जाएगा! कुछ लोगों से निरुत्साह निराश निस्पृह भय आंदोळन व्याकुलता का स्पंदनों निकलेगा, आश्वस्त खो बैठेगा! कुछ लोगों से अहंभाव, अहंकार, घमंडीपन, चिडचिडापन इत्यादि स्पंदनों निकलेगा! कुछ लोगों से कार्पण्यं, क्रूरत्व, असूया इत्यादि स्पंदनों निकलेगा! वैसा लोगों को मिलने पर हम से भी निरुत्साह और नकारात्मक स्पंदनों निकलना प्रारंभ हो,जाएगा! ऐसे लोगों से दूर रहना चाहिए! कुछ लोगों से दया, दाक्षिण्य, करुणा, प्रेम, अनुराग इत्यादि सकारात्मक स्पंदनों निकलेगा! वैसा लोगों को मिलने पर हम को उन का उपर गौरव भक्ति प्रेम इत्यादि स्पंदनों उत्पन्न होगा! वैसा लोगों का सन्निहित में रहना चाहिए!
रंगों से भी स्पंदनों निकलता है! उन में कुछ हम को आह्लाद कर देता है और कुछ नहीं कर देता है! इसी कारण हम अवसर से अधिक उबल/तल/भून के रंग बदला हुआ आहारापदार्थों हम को आकर्षित नहीं करेगा!
एक ही अपार्टमेन्ट (Apartment) में विविध व्यक्तियों से भिन्न प्रकार का स्पंदनों निकलता है! वे नकारात्मक व सकारात्मक हो सकता है! वे हम को प्रभावित करता है! केवल क्रियायोग साधक ही उन से बच सकता है! मनुष्य अपना अपना विचारों और भावनावों को उनका तार्किकता को क्रियायोग साधना से अभिवृद्धि करना चाहिए! नहीं तो अन्यों का बेसीमानी कार्य या कथन से मार खाना, विवाह व्यवस्था में ठीक भागीदार नहीं मिलना, विद्या व्यवस्था में ठीक पढाई (Faculty) नहीं मिलना, इत्यादि बहुत कुछ समस्यों का सामना करना पड़ता है! इस माया प्रपंच में हर एक जगह में ठगने का अवकाश है! बाक्टीरिया (bacteria) कुछ क्षण ही जीवित रहता है! परंतु सब चीज अनुभव करता है! मनुष्य 100 वर्षों का जीवित काल परमात्मा का एक पल का बराबर नहीं है! हम भी बाक्टीरिया (bacteria) जैसा है! समय व्यर्थ नहीं करके क्रियायोग साधना कर के दिव्यात्मस्वरूप होना चाहिए!
आहार:
आहार सात्विक, राजसिक, तामसिक इति तीन प्रकार का है! फल, शाकाहारी सब्जी, हरा  सब्जी, हर प्रकार का दाल, काजू, बादाम इत्यादि सब सात्विकाहार है! ए सब हमको आह्लाद प्रदान करता है! मांस, तीखा पदार्थों इत्यादि सब राजसिकाहार है! पकाने पश्चात तीन घंटो बाद खानेवाली बासी और नींद उत्पन्न करनेवाला पदार्थों इत्यादि सब तामसिकाहार है! भौतिक आहार सब स्थूल शरीर को बलोपेत करता है! एकाग्रत सूक्ष्म शरीर का आहार है! मानसिक (Astral) शरीर बलोपेत करता है! क्रियायोग साधना आध्यात्मिक (Divine wisdom-the soul battery) शरीर को बलोपेत करता है! मन एक अयस्कांत जैसा है! चुंबक जंग लगा हुआ लोहा को भी आकर्षित करेगा और  जंग नहीं लगा हुआ लोहा को भी आकर्षित करेगा! मन को विचारें आहार जैसा है! वे विचारें अपना लोगों से आनेवाला भी व लोगों को भेजनेवाला भी हो सकता है! वे विचारें सन्निहितों से आने से हम को शांति और आनंद करादेता अथवा चिडचिडापन और असंतृप्ति इत्यादि करादेता है! शरीर पूरा मालिश करके स्नान करने से शरीर में प्राणशक्ति उत्पन्न होता है! पानी को थोड़ा समय धुप में रख के स्नान करने से शरीर को आरोग्यकर है! दुराशा, असूया, द्वेषभाव इत्यादि दुर्गुणों नहीं होना चाहिए! आत्मनिग्रहशक्ती को अभिवृद्धि करना चाहिए! मित में आहार लेना चाहिए! अच्छी मित्रत्वा बढ़ाना चाहिए! आहार में अधिकतर फल खाना चाहिए! सुव्यवस्थित शरीर व्यायाम करना चाहिए! हर एक मनुष्य को कुछ न कुछ चीज का उपर व्यामोह व राग होता ही है! जिस को राग है उस को रागी कहते है! मात्र केवल परमात्मा का उपर केंद्रीकृत विशिष्ट राग जिस को है उस को विरागी कहते है!   
व्यापार:
अपना मन का इच्छा का मुताबिक़ शास्त्रीयदृक्पथ से एक प्रामाणिकता में अपने आप कुछ लोगों का सहायता द्वारा एक कार्य करने का संकल्प करने को व्यापार कहते है! एक उपन्यास देने को, एक आध्यात्मिक संस्था चलाने को, धनार्जन करने को, कुछ क्रय विक्रय करने को, व्यापारासूत्रो को अवलंभ करना चाहिए! प्रारम्भ में व्यापार एक से आरंभ करने से भी क्रमशः व्यापार वृद्धी होने पर अन्यों का सहायता अत्यंत आवश्यक है! व्यापार में सहायकों (Business associates) का सहायता अत्यंत आवश्यक होने पर भी, सहायकों जितना अछे होने से भी, कार्यनिपुण होने पर भी, संस्था का याजमान्यता/बाध्यता उन को देना नहीं चाहिए! सहायकों कार्यसामर्थ्य नहीं होने पर उन को शिक्षा दिला देना चाहिए और उस संस्था चलाने का आवश्यक सक्षम उन को लभ्य कराना चाहिए! कार्यसामर्थ्य नहीं होने पर भी कुछ लोग अनुभवी जैसा मिठास बात करते है! वैसे लोगों को गंभीरता से अवलोकन (Observe) करना और थोड़ा अधिकवेतन मांगने से भी ईमानदार सच्चा और निष्कपटी लोगों को ही रखना चाहिए! शारीरक और मानसिक आलसी और कामचोर लोगों को संस्था में जगह देना चाहिए! समीप बंधू हो या अच्छा मित्र हो ऋण नहीं देना चाहिए! आहारे व्यवहारे च त्यक्ता लज्जः सुखी भवेत्! आहार व्यवहारों में लज्जा नहीं होना चाहिए, वह ही सुखी होता है! निर्द्वन्द्व होना चाहिए! सहायकों को अपना सीमा पार नहीं करने देना चाहिए! संस्था का सहायकों और सहचरों का उपर कड़ी निघा रखना चाहिए! यह उनको पता नहीं करना चाहिए! उन लोगों का छोटा छोटा दोषों को कुछ सीमा तक क्षमा कर सकता है! परंतु उन लोगों का दोषों संस्था को हानी नहीं करना नहीं चाहिए! वैसा होने से एक दो चेतावनी (Warning) दे के, समीप बंधू हो या अच्छा मित्र हो, हटाना चाहिए! आत्मबोध का अनुसार सहायकों और सहचरों का संस्था में नौकरी देना चाहिए!
सत्यं:
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् प्रियं च नानृतं ब्रूयात्
न ब्रूयात् सत्यमप्रियं ब्रूयात् एतत् धर्मः सनातनः 
सत्य ही बोलना है, प्रिय बोलना चाहिए, प्रिय बोलने पर भी असत्य नहीं बोलना चाहिए, सत्य वाक्य को अप्रिय नहीं बोलना चाहिए, यह ही हमारा सनातन धर्म है!
एक ऋषि एक वृक्ष का नीचे तपस् कर रहे है! उसी समय में एक व्यापारी का पीछे डाकू पदागया! भयभीत हुआ व्यापारी उस वृक्ष का उपर छिप गया! डाकू को नहीं बताने के लिए व्यापारी ने ऋषि से प्रार्थना किया! डाकू पूछने पर व्यापारी जहा छिपा हुआ जगह दिखादिया! डाकू उस व्यापारी को ह्त्या करा के उन से धन छीनलिया! उस तपस्वी ऋषि शरीर छोड़ने पर नरक में गया! यह क्या न्याय है सत्य बोलने पर नरक मिल गयाइति पूछने पर किसी का प्राण की रक्षा के लिए असत्य बोलने से गलत नहींइति यमधर्मराज ने उस ऋषि को कहा!  
इच्छाशक्ति:
बदलने का प्रयत्न करने से भी कुछ लोग नहीं बदलते है क्यों? गत जन्मों का संस्कारों ही इस का मुख्य कारण है! कुछ लोगों को जन्मतः भय, क्रोध, रोग, मूडी (Moody) रहते है, कुछ लोगों को अन्यों   को हानी सोपाने में आनंद होता है, कुछ लोगों को सब चीज गंभीरता (Serious),से लेता है, कुछ लोगों को सब चीज हल्का (light) से लेने का स्वभाव होता है, कुछ लोगों को अनुमान दृष्टिकोण से देखने का स्वभाव होता है, कुछ लोगों को सृष्टि का सब चीज आह्लादन करने  का स्वभाव होता है, कुछ लोगों को जन्मतः दैवभक्ति और सर्वभूतों में दया का स्वभाव इत्यादि पूर्वजन्म संस्कारों का हेतु होता है!
किसी को ह्त्या करने का इरादा को आखरी क्षण में अपना निर्णय बदल के ह्त्या नहीं करने से उस व्यक्ती दंडित नहीं होता है! वैसा ही परमात्मा प्रासादित इच्छाशक्ति से और क्रियायोग साधना का माध्यम से हम अपना कर्म को अधिक से अधिक बदल सकते है!
भागवत प्रासादित इच्छाशक्ति को उपयोग नहीं करने से गत जन्म पराभाव का अनुसार संक्रमण हुआ पूर्वजन्म संस्कारों हम को अधिकाधिक प्राभावित करेगा! मानसिक और शारीरक आलसीपन पहले हमारा स्मृति को नाश करके पश्चात हम को सर्वनाश करेगा! इसी कारण अल्प/स्वल्प विषयों भी ख़ास करके स्मृति (Memory power) शक्ति कमवाला लोगों का उपर अधिक प्रभाव दिखाई देगा! ऐसा लोग आलसीपन त्यग के सारे कार्यकाम तुरंत करते रहने से ज्यादातर अपायों को काट सकते है! मित्रत्व भी लोगों का उपर अधिकतर् प्रभाव दिखाएगा! इसी कारण दुष्ट लोगों का साथ सांगत्य करना ही नहीं चाहिए, अगर होने से तुरंत त्यगना चाहिए! शिष्ट लोगों का साथ सांगत्य करना अत्यंत आवश्यक है! भौतिक विषयों का उपर अधिक व्यामोह रखना ही मनुष्य का दुःख का कारण है! राग व मोह जिस को है उस को रागी कह्ते है! हर एक मनुष्य को किसी न किसी का उपर मोह होता है! परंतु परमात्मा का उपर राग ही विशिष्ट राग को विरागी कहते है! परमात्मा प्रसादित इच्छाशक्ति और क्रियायोग साधना का सहायता से विरागी बनना चाहिए!
भोजन सब स्वादिष्ट होने से भी छोटा सा कंकड़ आने से पूरा भोजन सब स्वादिष्ट नहीं है कहना उचित नहीं है! ऐसा स्वभाव मनुष्य का आनंद को भंग करेगा! ऐसी स्वभाव को त्यगना चाहिए!
अन्यो का पास है परंतु हमारा पास नहीं इति शोचना को असूया कहते है! वह साध्य करने के लिए कृषि करना चाहिए! असूया से क्या लाभ है? मित्र, भार्या, भर्ता, संतान, इन सब को निर्माणात्मक विमर्शन करना उन में जो कमी है उन को निकाल के उन को सही रास्ता में लाने को ही है! परंतु वे विमर्शना वाक्यों सत्य होने पर भी प्रिय होना चाहिए! कोई भी अप्रिय को सहन नहीं कर सकेगा! वैसा कर के वे हितवाक्य प्रशंसा भर (Eulogy) भाषण नहीं होना चाहिए! अधिक से अधिक लोग अन्यों को विमर्शन करने में संदेह नहीं करते है! परंतु खुद को विमर्शन करने से सहन नहीं करेगा! हम जब अन्यों का तरफ एक अंगुली दिखाने से तीन अंगुलियां हमारा तरफ और अंगुली (अंगुष्ठ) उपर (परमात्मा) का तरफ दिखाएगा! दांपत्य जीवन में सामंजस्य बिलकुल नहीं होने पर मित्रों जैसा अलग होना ही सही है! दांपत्य जीवन में आध्यात्मिकताराहित्यं नहीं होने से सामरस्य नहीं होगा!
अहंकार:
भोतिक विषयों का बंधन में डूब के यह मेरा, मै, मेरा लोगइति तत्व ही अहंकार है! शुद्धात्मा को घेर के उस का असली स्वरुप को छिपाके रखना ही अहंकार है! ज्वाला का अन्दर का अग्नि कण जैसा आत्मा परमात्मा का भाग ही है! परमात्मा जैसा आत्मा भी नित्य है! सर्वशक्तिमान सर्वव्यापी और सर्वज्ञ है! सत चित आनंद है! प्रत्यगात्मा का अर्थ प्रति एक आत्मा व व्यष्टात्मा है! व्यष्टात्मा स्वयं शुद्ध है! कारण सूक्ष्म स्थूल शरीरधारण करने पर उन शरीरों का व्यक्तित्वा/तत्व/स्वभाव व्यष्टात्मा का उपर सोपता (Superimpose) है! इसी को अहंकार कहते है! कारण, सूक्ष्म, स्थूल स्थितियों को उनका चेतनाए और प्रभावों का मुताबिक़ पहचानना चाहिए!
जाग्रतावस्था में मानव अहंकार स्थूल शरीर स्पृहा और स्थूलचेतना को परिमित रहता है! स्वप्नावस्था में मानव अहंकार जब स्वप्नावस्था व अवचेतानावस्था में प्रवेश करने पर थोड़ा प्रपंच और थोड़ा इन्द्रियचेतना का साथ होता और उसी समय में स्वप्न प्रपंच से संपूर्ण चेतना का साथ रहता है! स्थूल और स्वप्नावस्थावो का संपर्क (Link) निरंतर है! इसी कारण हम को फलानी स्वप्ना आया कर के कहते है! वास्तव में अचेतना निर्दिष्ट रूप में नहीं होता है! चेतन निद्रानास्थिति (Restive state) में हो सकता है! आत्मा को अचेतना नहीं होता है! अहंकार जब स्वप्नावस्था व अवचेतनावस्था में प्रवेश करने पर चेतना अपना स्थूल ज्ञानेंद्रियों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध) का शक्तियों इति वस्त्रों को त्यागता है! परंतु अवचेतनावस्था अपना आत्मावबोधना शक्ति को नहीं खो बैठेगा! इस आत्मावबोधा शक्ति का माध्यम से सूक्ष्म शक्तियों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध) द्वारा सूक्ष्मचेन द्वारा स्वप्नावस्था अपना काम करेगा! सूक्ष्म शक्तियों स्थूल शक्तियों का प्रतिरूप/प्रतिवस्तु है! स्थूल व जाग्रतावस्था में उपलब्ध हुए विषयों विचारों इत्यादि निद्रावस्था में स्वप्नों का रूप में निकलता है! स्वप्नावस्था में अयस्क्रीम (Ice Cream) खाना, सिनेमा (Cinema) देखना इत्यादि विषयों जाग्रतावस्था में जैसा ही चलता रहता है! अहंकार जब गहरा नींद का अवस्था (Semi super conscious state) में प्रवेश करेगा तब वह अद्भुत शांति अनुभव करेगा! यहाँ मानवचेतना अपना निजस्वरूप व निजस्वभावसिद्ध दिव्या निश्शब्द शांति और आनंद अनुभव करेगा!
मानव अहंकार का स्थूल इन्द्रिय शक्तियों का आकाँक्षा ही जाग्रतावस्था में मनुष्य अधिक अशांति/उपद्रव को वश होने कारण है! शांति और अशांति का मिश्रण है निद्रावस्था व अवचेतनावस्था! यहाँ मानव अहंकार निद्राणस्थिति में होता है! परंतु अधिचेतनावस्था केवल शांति का आलवाल है! यहाँ मानव अहंकार परिपूर्ण निद्राणस्थिति में होता है! गहरा नींद का अवस्था (Semi super conscious state) अधिचेतनावस्था का एक कदम नीचे है! गहरा नींद का अवस्था (Semi super conscious state) में जाने से शांति इसी कारण प्राप्त होता है! जाग्रतावस्था में उपस्थित मानव अहंकार अवचेतानावस्था में ज्ञापकशक्ति/ स्मृति का साथ, अधिचेतानावस्था में एक प्रकार का व्यक्तीकरण किया/अव्यक्तीकरण किया हुआ अंतर्गत शांति का साथ निरंतर संपर्क (Link) में रहता है!
जाग्रतावस्था मे स्थूल मन जागृत होता है! अवचेतना और अधिचेतना (Super conscious) मन दोनों निद्राणस्थिति में होता है! परंतु तीव्र एकाग्रता का माध्यम से अवचेतना और अधिचेतना (Super conscious) मन दोनों को तीव्रतर/प्रबल (predominant) कर सकता है! व्यापारी लोगों में जाग्रत मन प्रबल (predominant) होता है! साधारण व्यक्तियों में स्थूल मन स्थूलाचेतना को परिमित होता है और मात्र केवल भौतिक विषय वांछों को परिमित रहता है! साधारण व्यक्ति का चेतना एक समय में एक ही चेतना को अनुसरण कर सकता है! जाग्रतावस्था में मन/चेतना व अहंकार मात्र केवल भौतिक विषय वांछों को परिमित रहता है! अवचेतनावस्था में मन/चेतना व अहंकार मात्र केवल निद्रा को परिमित रहता है और स्थूल शरीर को पूरी तरह से भूल जाता है! अथात जाग्रत और अधिचेतना मन दोनों निद्राणस्थिति में रहता है! तब भी स्मृति जगता ही रहता है! गेहरा निद्रावस्था में जाग्रत और अवचेतनावस्था मन दोनों निद्राणस्थिति में रहता है! इसी हेतु क्रियायोग साधना नहीं करने वाला साधारण व्यक्ति अवचेतनावस्था और गेहरा निद्रावस्था दोनों का विषयों को शीघ्र ही भूल् जाएगा! प्राथमिक, माध्यमिक और उन्नत विद्याएं सब विद्या का अंग ही है! वैसा ही जाग्रत, अवचेतना और अधिचेतना सब श्रीकृष्णचैतन्य का अंगों ही है! क्रियायोग ध्यान,साधाना का माध्यम से उत्तम स्थितिवाला श्रीकृष्णचैतन्य को साध्य करना चाहिए! योगी लोग उत्तम अधिचेतना मन से कार्यकाम करते है!
योगी लोग विविध प्रकार का अवस्थाओं को सृष्टि करा सकते है! उदाहरण के लिए साधारण व्यक्तियों में भी क्रोध आने पर नेत्र बड़ा होता है और चेहरा क्रोध का प्रदर्शन करेगा! इसी कारण हम चेहरा और नेत्रों को ऐसा रख के क्रोध का प्रदर्शन कर सकता है! निद्रा समय में आँखे नीचे की ओर होता है! परिपूर्ण योगी अपना नेत्रों को नीचे की ओर कर के शीघ्र ही निद्रावस्था में प्रवेश कर सकता है! जाग्रतावस्था में दोनों आँखें खुला रहता है! परिपूर्ण योगी अपना आँखें खुला रख के दीर्घ काल/समय जाग्रतावस्था में रह सकता है! स्थूल शरीर पतानानंतर और अधिचेतानावस्था में दोनों परिस्थियों में आँखें उपर की ओर खुला हुआ होता/रहता है! परिपूर्ण योगी अपना आँखें उपर की ओर रख के उन अवस्थाएं आसानी से पा सकता है! इसीलिये क्रियायोग साधना का माध्यम से अधिचेतनावस्था को प्राप्त कर के परमानंद को आस्वादन करना चाहिए!

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