KRIYA

Sunday, 12 April 2015

क्रियायोग –तीसरा आँख part 5

तीसरा नेत्र:
इस प्रकृती सत्व रजो और तमो तीन गुणों से बाना है! आकाश वायु अग्नि वरुण और पृथ्वी इन पाँच महाभूतों से इन तीन गुणों विविध प्रकार में मिलके इस जगत बना है! इन पाँच महाभूतों का माध्यम से मनुष्य प्रकृती का सत्व रजो और तमो तीन गुणों को अनुभव करता है! इन का असली स्वाभाव और स्वरूप जानने से तब मुक्ति मार्ग का अन्वेषण कर सकेगा!
सत्व गुण निर्मल और शांत स्वरूपी है! तामस गुण आलसीपन निद्रा तंद्रा समन्वित है! काम नहीं होने से भी अच्छा हो या बुरी हो कुछ न कुछ काम में अपना हाथ डालनेवाला चंचल और क्रियाशीलक पात्र निभानेवाला है रजो गुण! क्रियायोग साधना द्वारा साधक अपना मन कूटस्थ में निश्चल करके पाँच महाभूतों का स्पंदनों को जानेगा और वे मानव प्रकृति अथवा स्वभाव का उपर कैसा प्रभाव करेगा जानसकेगा!
दर्पण केवल भौतिक विषयों को दिखादेगा! शरीर का अंदर का मन और अकल को प्रतिबिंब नहीं करसकेगा! मनुष्य का शरीर ही देवालय है! वह दुष्ट और शिष्ट शक्ति दोनों का निवास स्थान है! कृषि से साधना करनेवाला मनुष्य ही सर्वज्ञ ऐसा विज्ञ कहते है!
कूटस्थ तीसरा नेत्र उपस्थित है! इस नेत्र में ही स्थूल सूक्ष्म और आध्यात्मिक गुणों और तत्संबंधित स्पंदनों, भूत भविष्यत् वर्तमान जीवों का चरित्रा और ब्रह्माण्ड को सुस्पष्ट रीति में वीक्षण कर सकते हो! इसी को दिव्यदृष्टि या दिव्यनेत्रदृष्टि कहते है! जो साधक क्रियायोग साधना का माध्यम से इस तीसरा नेत्र को खोलेगा उस को ज्योतिष्य इत्यादी साधनों का अवसर नहीं है!
केवल ग्रंथों पढने से अहंकार प्रज्वारिल होगा, मगर परमात्मा तत्व ग्रहण नहीं करसकेगा! महर्षियों इस दिव्यनेत्रदृष्टि का माध्यम से ही परमात्मा से प्रत्यक्ष संबंध बनसका और बृहत् ग्रंथों लिख सका! केला फल का बारे में पढने से उस का रूचि पता नहीं लगेगा, उस को प्रत्यक्षरूप में खाकर स्वाद ग्रहण करना चाहिये! वैसा ही परमात्मा का बारे में पढ़ने से क्या लाभ है? क्रियायोगा साधना का माध्यम से उन को प्रत्यक्ष रूप में साक्षात्कार करना चाहिये! उन को प्रत्यक्ष रूप में साक्षात्कार करना अत्यंत अदभुत अनुभव है! मै पाया हु, आप भी पावो! प्रत्यक्ष रूप में परमात्मा को नहीं पानेवाला और साक्षात्कार अनुभव नहीं करनेवाला कवी ही उन का बारे में अधिक वर्णन करेगा!
पाँच महाभूतों
पाँच महाभूतों का व्यक्तीकरण का वजह से ही मनुष्य का शरीर में यानी स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर तीनों में परिवर्तन आयेगा! इस परिवर्तन को केवल क्रियायोगा साधक ही समझ सकेगा! साधना में साधक को अनुभव में आनेवाला रूचि, शब्द, रंग इत्यादियों से किस चक्र तक पहुँचा है वह समझ सकेगा!
मूलाधाराचक्र पृथ्वीतत्व का प्रतीक है! इस चक्र को स्पर्श किया साधक का श्वासक्रिया अंदाज से 30 इंच(Inch)लंबाई तकफेफड़ों से शरीर का बाहर जहा श्वास पूरा होगा वहा तकनासिका रंध्रों को स्पर्शन नहीं करता हुआ होता है! कूटस्थ में चार कोणों(Angles)वाली तस्वीर(Figure) पीला रंग में दिखाईदेगा! मीठा(Sweet juice taste)फल का रूचि जैसा भावना मिलेगा! इतना ही नहीं, इस(Sweet juice taste)फल का रूचि का उपर मोह  (Attachment) अधिक होजायेगा! सही साधना करनेवाला साधक को इस स्पंदनास्थिति 20 मिनट रहेगा!
स्वाधिष्ठानचक्र वरुणतत्व का प्रतीक है! इस चक्र को स्पर्श किया साधक का श्वासक्रिया अंदाज से 10 इंच(Inch)लंबाई तक नासिका रंध्रों का प्रारंभ से होगा! कूटस्थ में अर्धा सफेद चाँद और अर्धा काली चाँद(White Half-moon) दिखाईदेगा! थोड़ा कड़वा रूचि( little bitter taste) जैसा भावना मिलेगा! इतना ही नहीं, इस अर्धा सफेद चाँद और अर्धा काली चाँद(White Half-moon) और थोड़ा कड़वा रूचि का उपर मोह  (Attachment) अधिक होजायेगा! सही साधना करनेवाला साधक को इस स्पंदनास्थिति 16 मिनट रहेगा!
मणिपुरचक्र अग्नितत्व का प्रतीक है! इस चक्र को स्पर्श किया साधक का श्वासक्रिया अंदाज से 10 इंच(Inch)लंबाई तक नासिका रंध्रों का उपर से होगा! कूटस्थ में लाल रंग का त्रिभुज(Triangular)तस्वीर(Figure)   दिखाईदेगा! कड़वा रूचि(bitter taste) जैसा भावना मिलेगा! इतना ही नहीं, इस लाल रंग और कड़वा रूचि का उपर मोह  (Attachment) अधिक होजायेगा! सही साधना करनेवाला साधक को इस स्पंदनास्थिति 20 मिनट रहेगा!  
अनाहतचक्र वायुतत्व का प्रतीक है! इस चक्र को स्पर्श किया साधक का श्वासक्रिया अंदाज से 20 इंच(Inch)लंबाई तक नासिका रंध्रों का भुजा (sides) से होगा! कूटस्थ में आगे और पीछे जाता हुआ(Palpitating) नीला गेंद(ball) का तस्वीर(Figure) दिखाईदेगा! खट्टा रूचि(sour taste) जैसा भावना मिलेगा! इतना ही नहीं, इस नीला रंग और खट्टा रूचि का उपर मोह  (Attachment) अधिक होजायेगा! सही साधना करनेवाला साधक को इस स्पंदनास्थिति 8 मिनट रहेगा!
विशुद्धचक्र आकाशतत्व का प्रतीक है! इस चक्र को स्पर्श किया साधक का श्वासक्रिया  नासिका रंध्रों से आसानी से होता रहेगा! कूटस्थ में सफ़ेद धुंआ रंग जैसा मेघ का उपर कांति बिंदु चमकता हुआ(Smoke color checkered with Luminous specks of light) दिखाईदेगा! अधिक कड़वा रूचि(bitter taste) जैसा भावना मिलेगा! इतना ही नहीं, इस सफ़ेद धुंआ  जैसा मेघ रंग और अधिक कड़वा रूचि(very very bitter taste) का उपर मोह  (Attachment) अधिक होजायेगा! सही साधना करनेवाला साधक को इस स्पंदनास्थिति 4 मिनट रहेगा!

परमात्मा नित्य है! उन से व्यक्तीकरण हुआ इन पाँच महाभूतों का स्पंदन भी नित्य है! ये प्रळय में समूलनाश नहीं होंगे! प्रळय का समय परमात्मा में ही निक्षिप्त होते है! पुनः सृष्टि का समय में व्यक्तीकरण होते है! व्यष्टि माया को कुण्डलिनी कहते है! व्यष्टि माया को ही सामिष्टि में माया कहते है! व्यष्टि का अंदर का परमात्मा ही व्यष्टात्म है! प्रकृति यानी माया का अंदर का परमात्मा निश्चल होने से भी माया तरंगों का हेतु चंचल दिखायीदेगा! वह व्यष्टात्म को जीव कहते है! इस माया प्रकृती को अपरा प्रकृती कहते है! इस माया प्रकृती का अंदर छिपा हुआ असली निश्चल परमात्मा को परा प्रकृती कहते है! पानी मी प्रतिबिंबित हुआ चाँद तरंगों का वजह से स्थान अथवा गति का परिवर्तन होता है करके भ्रम में डालेगा! वास्तव में चाँद निश्चल स्थिति में है! वैसा ही परमात्म शुद्ध है परंतु माया का हेतु ऐसा दिखता है! तीव्र साधक लौकिक विषयों से परिपूर्ण रूप से मुक्त होकर निवृत्ति होकर अपना नित्यास्थान यानी परमात्मा गृह में कदम रखना ही गत्यंतर है! 
पिंजरे का आदत हुआ पक्षी थोड़ा समय स्वेच्छा विहार करा के ‘अपना  निवास के लिए घोसला नहीं’ ऐसा समझ के फिर उसी पिंजरे में वापस आयेगा! वैसा ही कुछ समय साधना करने का पश्चात कोई कोई साधक पुनः शरीर नाम का पिंजरे का अन्दर कदम रखता है! महा साधक भी अंतिम क्षण में शरीर का मोह त्यागने का एक क्षण संदेह करेगा!
मरणं
मरणं जो है वह स्पंदनों व पदार्थों का अंत नहीं है! पूर्णरूप में प्रकाश देके ख़तम हुआ मोमबत्ति का अंदर का पदार्थों रूपांतर होता है! परंतु उस का पदार्थ पूरा अंतर्थान नहीं होगा! पदार्थ नाश नहीं होगा! प्राणशक्ति का चेतना और शक्ति दोनों है! सोया हुआ चेतना और शक्ति दोनों है पदार्थ! सूरज और किरणों अलग नहीं है! किरणों सूरज को व्यक्त करता है! पदार्थ प्राणशक्ति को व्यक्त करता है! पदार्थ और प्राणशक्ति दोनों को अलग अलग नहीं करा सकते है! समुद्र का तरंगों(waves) आखरी में समुद्र में ही ममैक होना है! कुछ तरंगों(waves) अन्य तरंगों से ममैक(merge) होने में अधिक समय लेगा यानी ममैक(merge) होने में तारतम्य हो सकता है! उन तरंगों सब उस समुद्र को व्यक्त करता है! सूरज, सौर्यमण्डल, नक्षत्रों, मिल्की वे आफ गालाक्सीस(Milky way of galaxies) ये सब अनंत परमात्मा को ही व्यक्त करता है!
स्वाभाविक मरण जो है परमात्मा को व्यक्त करने के लिए परिपूर्ण रीति में अपना पात्र निभानेवाला संघटन है! बाल्यमरण का अर्थ उस प्राणी अपना अयोग्य अशक्त शरीर नाम का उपाधि को त्याग कर और अन्य शरीर नाम का उपाधि में प्रवेश करने का सदवाकाश के लिए इंतज़ार करने का प्रयास ही है! सुंदर गुलाबी पुष्पों अपना सौरभ्य व्यक्त करने से भी, बुद्धिमान बच्चों आरोग्यवान होता हुआ भी हम से अलग होजाते है! हठात् अथवा आकस्मिक (Accidental death) मरण जो है वह उस जीवी का अनुभव करनेवाला कर्मा का मुताबिक़ बना हुआ स्थिति और परिस्थिति है! तरंग से तुलने से लहरों का फेनमय जल तात्कालिक है! समुद्र से तुलने से लहर तात्कालिक है!
जीवन जो है वह रूप और काल का परिमित नहीं है! भौतिक पदार्थ का उपर आधारित नहीं है पृथ्वी का उपर जीवन! आहार और प्राणशक्ति का उपर भीआधारित नहीं है!
शव मे भी प्राणशक्ति कुछ समय तक अन्य रूप में होगा! द्रावकों में भद्र यानी सुरक्षित किया मुर्गा का हृदय जो है जिया हुआ मुर्गा का हृदय से अधिक समय रहा सकता है! मकर यानी घडियाल 600 वर्ष जीएगा! मनुष्य 60+ वर्ष जीएगा! कुछ कीडेमकोडे 60 + घंटों जीवित रहेगा! जीवं एक बंजारा(nomad) जैसा है! एक समय में दिखाईदेके और अन्य क्षण में दिखाई नहीं देनेवाली नदीप्रवाह जैसा है! साधारण मनुष्य मरण से भयभीत होता है! साधकों मरणं एक वर जैसा है! एक निम्न स्थिति से उन्नत स्थिति में लेजानेवाला वाहन जैसा है! प्रस्तुत जीवन में क्रियायोगासाधन करके परमात्मा का साथ जीवन करना जानगया साधक, शरीर व्यामोह से विमुक्त हुआ साधक, मरणं का पश्चात ‘मै स्वयं ही परमात्मा हु’ ऐसा समझेगा! तब प्राणशक्ति आहार जल इत्यादि का उपर आधारित होना और शरीर का गुलामीपन से मुक्त होजायेगा! इसी हेतु पृथ्वी लोक वासियों अपना अपना अन्तःशक्ति का उपर अधिकाधिक आधारित होना सीखना चाहिये! शरीर का गुलामीपन से मुक्त होना सीखना चाहिये!
पदार्थ-परमात्मा  
चर(Organic-गतिसहित)अचर(Inorganic- गतिरहित)पदार्थ दोनों एक ही है! दोनों प्राणशक्ति का विविधप्रकार का व्यक्तीकरणों है! कोई भी पदार्थ नाश नहीं होरहा है! शव का अंदर का मांस का अणु भी तीव्रता से जीवं का साथ स्पंदन करेगा! पत्थर सोना चांदी तांबा इत्यादि लोहों का अणु भी जीवं का साथ स्पंदन करेगा! विविध जीवों प्राणशक्ति का विविध प्रकार का व्यक्तीकरणों ही है! बर्फ जल भाप सब एकी है! वैसा ही पदार्थ में स्थित परमात्मा और पदार्थ का बाहर स्थित परमात्मा दोनों एक ही है! इतना ही नहीं है आखरी में परमात्मा और पदार्थ दोनों एक ही है! क्यों की परमात्मा का व्यक्तीकरण हे पदार्थ है! प्राणशक्ति जड़ पृथ्वी में निद्राणस्थिति में होता है! पुष्पों में सुंदरता और सौरभ रूप में होता है! पशु में शक्ति रूप में होता है! मनुष्य में चेतना और अनंत भावों जैसा दर्शन देता है!
इस मानव शरीर में कारण सूक्ष्म और स्थूल शरीर तीन शरीर होता है! मरणं केवल इस स्थूला शरीर का ही संभावित है! कारण सूक्ष्म शरीरों दोनों दग्ध होके, देहावासनायें को समूल निर्मूलन होक, समस्त कर्मों दग्ध होके, परमात्मा में विलीन होने तक इस स्थूल शरीर धारण करना ही पडेगा! इस भूमि का उपर भौतिक नेत्र से बाहर अल्प पर्यंत प्रदेश ही देख सकते है! परंतु हमारा अंदर का शरीर धातुओं को, सूर्यकिरणों का अन्दर रंगों को देख नहीं पायेगा! क्रियायोग साधना करके भृकुटी का मध्य में कूटस्थ स्थित तीसरा आँख को खोल सकने से तब पत्थर और पत्थर का अन्दर का एलक्ट्रांस (Electrons)इत्यादि परमाणुओं को भी सुस्पष्ट रीति में देखा सकेगा! इस में कोई भी संदेह नहीं है! क्रियायोग साधक का मरणं एक वर है! दूसरा प्रगति पथ का सोपान है! साधारण मनुष्य अपने आप को उद्धारण करने को लभ्य हुआ और एक अवकाश है!

 हिरण्यलोक
क्रियायोग साधन नहीं करने से इन्द्रियों अपना  वश में नहीं होगा! साधारण मनुष्य मरण का पश्चात गहरा अगाध और अंधकार निद्रा में जाएगा! जागने का पश्चात और अन्य भौतिक शरीरधारण करेगा! क्रियायोग साधक अपना साधना का सहायता से तीसरा आँख खोलेगा! वैसा क्रियायोग साधक शरीर त्यागने का पहले और शरीर त्यागने का पश्चात भी एक अदभुत आकर्षणीय गोळ का वीक्षण कर सकेगा! गहरा अगाध और अंधकार निद्रा का बदल में प्रकाशवंत दिया को देखेगा! अपना भौतिक परिमित व्यक्तीकरणों का पिंजरा त्यागेगा! अपना खोया हुआ अनंत में तेजी से धौडेगा! अंतरिक्ष का उस हिरण्यलोक इतना शीघ्र रूप में दृष्टिकोण से हटेगा नहीं है! उस हिरण्यलोक में हर एक चीज निश्शब्द रूप में संभाषण करेगा! वहा पुष्पों आत्मावों से सम्भाषण करेगा! वहा आत्मावों का सौरभ हर दिशा में फेलेगा! वहा आयु का साथ आनेवाला बुढापा नहीं होता है! आत्मावों में परिवर्तन(Transformation) उन का इष्ट का मुताबिक़ होता है! उन का उपर जबरदस्ती परिवर्तन नहीं होगा!
बाक्टीरिया(Bacteria), प्यास(Thirst), भूक(hunger), स्वार्थपूरित इच्छाओं, हृदयपीड़ा(Heart problems), कामवांछ, शारीरक क्लेश, दुर्घटना(Accidents), श्मशानघाट में इधर उधर दिखाई देनेवाला शवों हड्डियाँ, वियोग समय दिखाई देनेवाला बाधायें इत्यादि हिरण्यलोक में नहीं दिखाईदेगा!

हिरण्यलोक में हड्डियाँ  और मांस आत्माओं को नहीं घेरेगा! किसी का साथ ठकराने से उन आत्माओं को ठोकर नहीं लगेगा! उधर का आत्माओं, समुद्रों इत्यादि सब अत्यंत सामरस्य्पूर्ण वातावरण में रहेगा! आत्माओं कांति किरणों का उपर प्रयाण करेगा! आत्माओं इस हिरण्यलोक में परमानंद का साथ जीवन बिताता है परंतु प्राणशक्ति आधारित नहीं है! उन का इष्ट का मुताबिक़ जितना समय रहने का संकल्प करेगा उतना समय रह सकता है! इधर आत्माओं परस्पर प्रेम में जीवन बिताता है! प्राणवायु सूर्यकिरणों और साधारण आहार का उपर आधारित हुआ सामान्य लोग हिरण्यलोक का नाजुक वातावरण में नहीं रह सकते है! इधर सुख दुःख रात दिन इत्यादि द्वंद्वों नहीं होगा! इधर का लोग केवल आत्मा प्रकाश का सहायता से जीवित होता है! प्राणशक्ति नियंत्रण श्वासराहित्यास्थिति यानी क्रिया परावस्था इन को अभ्यास किया केवल क्रियायोगी लोग हीशरीर में रहने से भी वायुरहित हिरण्यलोक में रहा सकेगा!

मनुष्य विवेकयुक्त आध्यात्मिक पशु है! मनुष्य का पशुप्रवृत्ति उस का बाल्यावस्थ का ध्यान देने से पता लगेगा! मूत्र करेगा मलविसर्जन करेगा और पशु जैसा उन ही में खेलेगा! कुछ लोग बड़ा होनेसे भी पशुप्रवृत्ति में भी रहते है! अन्यलोगों को दूषण पदाजाल से कष्ट यानी दुखित करना जैसा होगा उन का प्रवर्तन! कुछ लोग स्नान पान नहीं करेगा, कोई भी काम नहीं करेगा, बिलकुल पशु जैसा ही होगा उन का प्रवर्तन! मनुष्य केवल अपना बुद्धिमता और स्वभावों का आधारित होक जीना नहीं चाहिये! मानव मेधा इन्द्रियाधारित और परिमित है! अपना अपरिमित, परमात्मा प्रसादित, और सत्य तार्कितका का अतीत सर्वज्ञत्व आत्मावबोधा(Intuition) को वृद्धि करना चाहिये! सद्गुरु का कृपा से क्रियायोग साधन सीखना चाहिये! बच्चों को बचपन से रटा मारके पाठ पढाने का पद्धति से उन का मस्तिष्क को खराब नहीं करना चाहिये! बचपन से ही क्रियायोग साधन ध्यान पद्धतियां सिखाना चाहिये! इस साधन का माध्यम से उन का एकाग्रता शक्ति और आत्मावबोधा को वृद्धि करना चाहिये! ऐसा अच्छा नागरिक बनाके देश को और जगत को उपयोगाकारी नागरिक बनना चाहिये!
आत्म के लिए अलग शिक्षण देने को अवसर नहीं है! आत्म सर्वज्ञानी है! आत्मज्ञानरहित मानवचेतना को क्रियायोगध्यान का माध्यम से आत्मचेतना का साथ अनुसंधान करना ही हमारा कर्त्तव्य है! नया नया विषयों को अन्वेषण करके सिद्धांतीकरण करते है ऐसा हम सोचते है, ये सब वास्तव नहीं है! सत्य में सब कुछ परमात्मा ही है, नया विषय कुछ भी नहीं है! ध्यान का माध्यम से अपना चेतना को परमात्म चेतना का साथ अनुसंधान करने से मनुष्य स्वयं ही परमात्म होजायेगा और स्वयं ही सर्वज्ञ बन जायेगा! सब कुछ ग्रहण करसकेगा!   

बच्चों को मेरुदंड सदा सीदा(Straight&erect)रखके बैठना और चलना सिखाना चाहिये! आध्यात्मिकत सिखाना चाहिये! क्रियायोग ध्यान में परमात्म कैसा आनंद प्रसादित करता है बच्चों को सिखाना चाहिये! हर एक दिन प्रातः 30मिनट और शाम को30मिनट क्रियायोग ध्यान करवाना चाहिये! योगासन और सूर्यनमस्कार करवाना चाहिये! अधिक तरफ से कबाड़ी वालीबाल दौड चाल में प्रतियोगिता इत्यादि शरीर अंगों को काम देनेवाला बाहर खेलनेवाला (Out door games) क्रीडायें बच्चोंसे खेलवाना चाहिये! चदरंग(Chess), और पदों का साथ खेलना(words building), कहानी बोलवाना, बच्चा को छिपाके फिर उस को बाहर लाना इत्यादि मेधा को काम देनेवाला क्रीडायें खिलाने चाहिये! अन्यो का साथ प्रेम और आप्यायता से संभाषण करना और बड़ों से गौरव मर्यादों से प्रवर्तित करना बच्चों को सिखाना चाहिये! 
विद्या आरंभ होनेका तुरंत विद्या भी नहीं आयेगा और नौकरी भी नहीं आयेगा! सहिष्णुता और श्रद्धा से 15 20 वर्षों पढने से ही एक अच्छा इंजिनियर(engineer)व डाक्टर(Doctor)इत्यादि बनसकेगा! छोटा मोटा काम करनेवाला उद्योगी(employee) बड़ा बड़ा पढ़ाई करनेवाला को देख कर ‘ये और भी पढरहा है, नौकरी नहीं है करके अवहेळन करेगा’! परंतु बाद में इन विद्यावेत्तों का नीचे ही प्यून(Peon) या चप्रासी का काम करेगा और वेतन भी उन ही लोगों से लेकर जीवन बिताएगा! क्रियायोग प्रारंभ करने का तुरंत परमात्मा का दर्शन लभ्य नहीं होगा! सहिष्णुता और श्रद्धा से 15 20 वर्षों नियमानुसार हर रोज प्रातः और सायंकाल में क्रियायोग साधना करने से परमात्मा का अनुसंधान अवश्य प्राप्त होगी! भौतिक विद्यायें केवल जन्मा का ही परिमित लाभ प्राप्त करेगा, परंतु आध्यात्मिक विद्या इस जन्मा का ही नहीं, जन्म जन्मों का लाभ प्राप्त करेगा, और धर्मंबद्ध सर्वसुखों का प्राप्ति करवाएगा!
साधारण जीवन—परमात्मा का आवश्यकता  
परमात्मा का स्मरण सर्वदा करता हुआ जीवन साधारानारीती में बिताना चाहिये! आत्म शुद्ध, पवित्र और नित्यनूतन आनंददायक है! साधक जितानाभी विपत्कर परिस्थितियों में फ़सने से भी आत्मा का इस परमानंद स्थिति को भूलना चाहिये! सर्वदा इच्छारहित स्थिति में रहना चाहिये! इस का अर्थ आनंद को त्यागने का नहीं है! परमात्मा का प्राप्त ही सर्व वांछितों से उत्तम वांछ है! परमात्मा का प्राप्त सर्व वांछितों को लभ्य करेगा! सर्व आनंदों से आनंद यानी परमानंद परिपूर्णप्राप्ति और तृप्ति प्रसादित करेगा! 
ब्यांक(bank)में बहुत पैसा होसकता है! परंतु वो पैसा हमारा नहीं होनेसे उस पैसा से हम को क्या प्रयोजन है? परमात्मा सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है! परमात्मा का महत्य का बारे में बहुत शास्त्र ग्रंथों में हम पढा और कई लोगों से सूना भी है! परंतु प्रत्यक्ष संबंध नहीं होने से ऐसा परमात्मा से क्या प्रयोजन है? मन, इंद्रियों से परिवेष्टित और परिमित हुआ मानव मेधा से परमात्मा का साथ संबंध नहीं करसकते है! पदार्ध का बाहर का केवल पाक्षिक और प्रत्यक्षरहित(Indirect) विषयज्ञान ही जान सकते है! अपरिमित आत्मावाबोध(Intuition) पदार्ध का बाहर और अंदर का विषयज्ञान को परिपूर्ण और प्रत्यक्षरीति(direct)में जान सकते है! केवल प्रेम द्वारा ही परमात्मा को प्राप्त करा सकते है! उस प्रेम 100% सत्य और परिपूर्ण रीति में होना चाहिये!
1% भी कमी नहीं होना चाहिये!

परमात्मा कौन? परमात्मा का अर्थ
परमात्मा कौन है? परमात्मा का अर्थ क्या है? ‘परमात्मा को तुमने देखा है क्या?’ ऐसा बहुत लोग पूछते है! परमात्म मिथ्य नहीं वास्तव है! मै परमात्मा को निश्चितरूप में देखा है, आप भी देख सकते हो, सुन सकते हो और बात करसकते हो! वह केवल क्रियायोगा माध्यम से ही साध्य है! लोग परमात्मा का साथ प्रत्यक्षानुभव नहीं होके जोभी बोलते है वह सब ऊहा है और सत्य दूर है!
हैड्रोजन(Hydrogen)और आक्सिजन(oxygen)दोनों मिलाने से जल(H2O) होता है करके पक्का कह सकते है! इस जगत में दो वस्तु अत्यंत मुख्य है! शक्ति(Force) प्रथम और मेधा(Intelligence) द्वितीय है! शक्ति(Force)  और मेधा(Intelligence)दोनों में बहुत अंतर है! विद्युत् जो है वह शक्ति है! उस विद्युत् शक्ति को बल्ब(Bulb) में रखने से ही प्रकाशमान होता है! बल्ब(Bulb) में रखने को सहायता करनेवाली चीज ही मेधा(Intelligence) है! इस जगत में बिना मेधा(Intelligence)कोई भी चीज(Element) नही होगा!
लोहा तांबा स्वर्ण इत्यादि पदार्धों मिलके(Combination) ही इस मानवशरीर बना है! इन सब साधारण दूकान में लभ्य होने वाला पदार्धों(Elements) ही है! परंतु उन पदार्धों सब मानवशरीर को जैसा उपयोग होना उस प्रकार नहीं है! इसीलिये ऐसा पदार्धों सब जड़(inert) पदार्ध है! मानवशरीर भी जड़(inert) ही है! परंतु इस मेधा उस मानवशरीर को कहा से आता है? इन पशु पक्ष्यादी सब प्राणियों अपना अपना जीवन पद्धतियों में चलने के लिए एक मेधा नाम का कारखाना (Factory) होने से ही उस से उन को मेधा लभ्य होगा! परमात्मा केवल परमात्मा ही वैसा महत्वपूर्ण कारखाना (Factory) है! उस कारखाना ही सब लयबद्ध(Harmonious) वस्तुओं का अस्तित्व है! उस कारखाना ही ऋतुओं क्रमबद्धीकरण का हेतु है! उस कारखाना ही आहार का हेतु है! पारमत्मा ही सर्वं जाननेवाला असमान ज्ञान, सर्वव्यापि और सर्वशक्तिमान है! परमात्मा का असमान बुद्धिमता का हेतु इस जगत, जगत का समस्त वस्तु, ये सब अपना अपना कक्ष्या में क्रम पद्धति में घूमता है! इस भूमि और भूमि का प्राणियों सब का अस्तित्व का कारण केवल परमात्मा ही है! क्रियायोग ध्यान में हमको परमानानंद प्राप्ति होने का कारण परमात्मा का अस्तित्व का निदर्शन है!
भौतिक मानसिक और आध्यात्मिक प्राणी है मनुष्य! शारीरक आरोग्य को व्यायाम और और योगासनों द्वारा सुरक्षित करना चाहिये! मानसिक आरोग्य को एकाग्रता द्वारा वृद्धि करना है! मानसिक आरोग्य ठीक होने से शारीरक आरोग्य अपने आप ही ठीक होजाएगा! आध्यात्मिक आरोग्य को परमात्मा का उपर एकाग्रता द्वारा वृद्धि करना है! आध्यात्मिक आरोग्य सही होने से मानसिक आरोग्य और शारीरक आरोग्य दोनों अपने आप ही सही होजाएगा! हम परमात्मा का संतान है! उन से अनुसंधान करने से तब अपना संतान का धर्मबद्ध इच्छाओं को परमात्मा संपन्न करेगा!
एलेक्ट्रोंस(electrons) और अणुओं(Atoms) का तरंगों(Wave) ही जीवं(Life) है! जीवद्रव्य(Protoplasm) तरंगों, शक्ति(energy) तरंगों, दोनों परमात्मा नाम का समुद्र का उपर तैरनेवाले(Float) चेतना (Consciousness) तरंगों ही है! बुद्धियुक्त क्रमबद्धीकरण(Organized) से चलनेवाली गति(Motion) ही  जीवं(Life) है! मनुष्य पुष्प पत्थर मिट्टी ये सब उस गति(Motion) का विभिन्न प्रकार का रूपांतर  ही है! आत्मा का घेरा हुआ एलेक्ट्रोंस(electrons) प्राणशक्ति और बुद्धी ही मानव शरीर है!
पुनर्जन्म

पुनर्जन्म का अर्थ कुछ पदार्थ अथवा मनुष्य का प्रगति के लिए होनेवाला परिवर्तन है! शरीर अनित्य और आत्मा नित्य है! इस आत्मा  असली में नहीं मरता है, नहीं जन्म लेता है, केवल रूपांतर होता है! बदलना(Change) सहज और प्रकृतिसिद्ध है! कल का जल आज नहीं पीते है, पीने से बीमारी आजायेगा! स्थिर प्रवाहरहित(Stagnant) जल से बजबू(bad smell) आयेगा! इसीलिये निरंतर इस जगत में बदलना(change) और गति(motion)आवश्यक है! यह ही प्रगतिपथ है! मानवशरीर परमात्मा का व्यक्तीकरण ही है! इस जगत में ही और इस जगत का साथ ही हमारा अस्तित्व है! 

जमाहुआ(Materialized) स्थूलाशक्ति ही स्थूलशरीर है! शक्ति व्याधिग्रस्थ नहीं होगा! रोग एक भ्रम अथवा स्वप्न है! सिर्फ भ्रम अथवा स्वप्न बोलने से काफी नहीं है! शिर दीवार का साथ ठक्कर लग के और बाधा से कष्ट भुगतानेवाली स्वप्ना स्वप्नाया है! परंतु उस स्वप्ना से जागने का तुरंत ही उस बाधा समाप्त होगा! ऐसा ही जीवन और जीवन बाधाये भी वास्तव नहीं ग्रहण करना चाहिये!  क्रियायोग साधना करना और परमात्मा का साथ अनुसंधान साध्य करना चाहिये! तब जमाहुआ(Materialized) स्थूलाशक्ति ही स्थूलशरीर ऐसा साधक समझेगा! चेतना द्वारा ही इस शरीर को तत् पश्चात परमात्मो को ग्रहण करेगा! मरणं आखरी मजिली(destination) नहीं है! मरणं प्रगति का सोपान पथ है! व्याधि और संसार बाधाओम से थका हुआ इस शरीर को सांत्वना देनेवाली मरणं ही है! मरणं रूप में इस शरीर को विश्रांत मिलता है! तत् पश्चात उस मलिन जीवात्मा में वांछनीयता और विजृंभण होगा! तब जन्म रूप में उस मलिन जीवात्मा दूसरा उपाधि लेगा! जब तक वांछनीयता समाप्त होके जीवात्मा परिशुद्धात्मा नहीं बनेगा यानी वांछारहित नहीं बनेगा तब तक अन्य उपाधि यानी अन्य स्थूल शरीर का आश्रय लेता रहेगा!  
हर एक विचार नित्य है! हर एक शब्द नित्य है! नित्यचेतानायुक्त विचार या शब्द परमात्मा का व्यक्तीकरण ही है! विचारे गोप्य होता है! हर एक व्यक्ति   स्त्री अथवा पुरुष विचारे आता है! वे विचारे इतना करके नहीं गिन सकता है!

अंदाजा से 16,000 विचारे करके कहा है! गोप्य रूप में होनेवाली हर एक विचार को गोपिका कहते है! हर एक गोपिका परमात्मा का व्यक्तीकरण है! श्री कृष्णपरमात्मा को 16,000 गोपिकायें बोलने का अंतरार्थ ये ही है! प्रथम में आत्मा इस शरीर का साथ खेलता हुआ क्रमशः इस शरीर का खैदी बनता है! इसीलिये इस स्थूला प्रकृति का अतीत होना क्रियायोग साधना का माध्यम से अभ्यास  करना चाहिये! मानसिक प्रगति स्थूल प्रगति से उत्तम है! आत्म शुद्ध है! इसी हेतु वह स्थूल सूक्ष्म और आध्यात्मिक प्रकृतियों का सहज ही  अतीत होकर आखरी में अपना स्वस्थान यानी परमात्मा में ऐक्य होजायेगा! इसी को विकास(Evolution) कहते है!
 एक रेशमी(silk worm)कीड़ा बडा होक तितली(butterfly)होता है! परंतु कपड़ा बनाईं करनेवाला कीड़ा को तितली होने नहीं देगा, उस कीडावों को पकड़के मार केउन से रेशमी निकालेगा! वैसा ही हमारा क्रियायोग साधना का फल मिलने का पहले ही हम उस को भंग करते है! इस का नतीज़ा रोग भय अज्ञान इत्यादि सब है! हम विचार बाद में करते है परंतु कार्य पहले कर रहे है! परमात्मा हम को बहुत शक्ति दिया है! इसीलिये फल मिलने तक साधक अन्य आलोचनाओं का जगह नहीं देना और साधना नहीं छोड़ना और साधना जारी रखना चाहिये! मन शरीर को पालन करना चाहिये! शरीर मन का नौकर जैसा पहिचानना चाहिये! रोगचेतना से आरोग्यचेतना का तरफ मन को बदलना चाहिये! हमारा शरीर को हानि करनेवाली राजस आहार आदतों को त्यागना चाहिये! ‘मै रोगी और मुझको रोग आया’ जैसा नकारात्मक विचारों को त्यागना चाहिये! ‘मुझको इस रोग से मुक्त नहीं मिलेगा’ ऐसी सोचन अवचेतन में प्रबल बीजरूप में डालनेवाला लोगों अपने आपी रोग का वश होते है! ‘मै परमात्मा का संतान हु, मै आरोग्यवान हु’ ऐसी सकारात्मक सोचना बीज प्रबलरूप में डालना चाहिये! 
परकायाप्रवेश
पुनर्जन्म का अर्थ केवल इन सूक्ष्म कारण शरीरों और जीवात्मा एक भौतिक शरीर से उपाधि और कर्म भुगतने के लिए अन्य भौतिक शरीर बदली (Transfer)होना ही है! शरीर अणुवों भी मन का साथ भौतिकता से आध्यात्मिकता(Spiritualize) दिशा मार्ग में बदली (Transfer)होगा! पुनर्जन्म का अर्थ शरीर बानिसत्व(slavery) को त्यागना है! क्रियायोग साधना में साधक का प्राणशक्ति स्थूलशरीर बानिसत्व(slavery) अथवा वश से मुक्त होजायेगा! वैसा ही मरण समय में स्थूलशरीर बानिसत्व(slavery) अथवा वश से प्राणशक्ति को मुक्त करवाना है! तब आत्म कितना पवित्र है जानेगा! स्थूलशरीर में होने से भी उस का उपर आधारित नहीं है कर के हम ग्रहण कर सकेगा!
साधारणरीती में पुनर्जन्म केवल स्थूलशरीर पतनानंतर ही होता है! हम इस जन्म में ही इस शरीर में ही पुनर्जन्म होना है! इसी को परकायाप्रवेश कहते है! हम निद्रा में स्वप्न में अचेतनास्थिति(Unconscious) में होगा! बहुत जन्मों हम लेते रहते है! क्रियायोग साधना में साधक चेतनास्थिति(conscious) में अन्य उन्नत स्थिति में जाएगा इस स्थूलशरीरस्थिति को त्याग करेगा और परकायाप्रवेश करेगा! वह भी पुनर्जन्म जैसा ही है! इस पवित्र भारत भूमि में बहुत महानुभावों भूत काल में और वर्तमानकाल में भी भूमि का अंदर बहुत समय रह के ध्यान करके पुनः सजीव होकर बाहर भूमि का उपर आना हम देखते है! भारतवासियों ऐसा महानुभावों को देखना साधारण है! यह आश्चर्यजनक नहीं है! कुछ लोग बिना आहार भी वर्षों तक रहते है! यह भी भारतवासियों के लिए साधारण है! इन सब चीज पुनर्जन्म ही है! आदिशंकराचार्य  जैसा कारणजन्म पुरुष अपना शरीर को त्याग कर कुछ दिन दूसरा शरीर में रह कर पुनः अपना शरीर में प्रवेश करना हम सब जानते है! यह ही पुनर्जन्म अथवा परकायाप्रवेश कहते है! बहुत समय पिंजरा में रहनेका आदत हुआ विहंग पिंजरे से मुक्त करने से भी पुनः उसी पिंजरे में वापस आयेगा! स्वेच्छा से जीवन बिताने को उस पक्षी को भय लगेगा! वैसा ही ध्यान में साधक ‘मै अनंत में गिररहा हु, पुनः इस शरीर में नहीं आसकेगा’ ऐसी भावना आके भयभीत होजायेगा! मनुष्य असली में परमात्मा का प्रतिरूपी है! इसीलिये साधना से वह भी सर्वव्यापी सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ बनाजायेगा!
ढरो मत, परमात्मा से अनुसंधान होजाना, तब जीवन कितना आनंदमय है जान सकोगे! तब तक जीवन निस्संदेह दुर्भर ही लगेगा! शरीर मानवचेतना को आलवाल है! कूटस्थ श्रीकृष्णचेतना को आलवाल है! माता के लिए जिद करनेवाली शिशु का पास माता अवश्य आयेगा और उस को गोद में लेगा और आलिंगन करेगा! वैसा ही कूटस्थ में तीव्रध्यान करने से परमात्मा हमको भी अपनासाथ में अवश्य ऐक्य करेगा! जो भी अनुभव साधक को ध्यान में अवश्य सिद्धि होजायेगा! मरणानुभव महापुरुषों का प्राप्त हुआ अनुभवों ऐसा एक नही सर्व अनुभवों को सिद्ध करनेवाला एकैक साधन प्रक्रिया क्रियायोग साधना ही है!  
तीन मन
परमात्मा हमको प्रथम में जाग्रता(Conscious)मन दिया है! उस का पश्चात में अवचेतना(Subconscious)मन दिया है! यह परिमत है और एक स्मृति भंडार(memory) है! कोई भी विषय कुछ समय तक ही याद में रख सकेंगे! क्रमशः हम भूल जायेंगे! परंतु अधिक प्राधान्यत विषयों इस अवचेतना (Subconscious)मन अथात स्मृति भंडार(memory) में निक्षिप्त होता है! तीसरा  अधिचेतना(Super-conscious)मन है! छोटा मोटा समस्त विषयों प्राधान्यत हो न हो परंतु इस में निक्षिप्त होता है! स्थूलशरीर पतन होने का पहले समस्त विषयों उस मरण समय में याद आनेका हेतु इस अधिचेतना(Super-conscious)मन ही है! इन विषयों में मरण समय में मनुष्य जिस विषय को प्राधान्यत देके एकाग्रता करके स्थूलशरीर त्याग करेगा उस का आधारित होकर उस का आगामी जन्म का परिस्थतियों और संस्कारों होगा! स्थूलशरीर का वश होकर बननेवाले अहंकारपूरित विचारों का परिमित नहीं होता है! हर एक विचार में तुम उपस्थित होगे! क्रियायोग साधना करके तुम्हारा अधिचेतना(Super-conscious)मन को अभिवृद्धि करो! 60 वर्षो का पश्चात तुम अपना विचारों को ध्यान्रख सकतेहो! इस के लिए उमर(age) से निमित्त नहीं है! दिव्यचेतना को भूलचूक(forgetfulness) नहीं है! विचारे अच्छा हो बुरा हो नित्य है! वे अंतरिक्ष में शाश्वतरूप में निक्षिप्त होकर रहेगा!
अपना दैनंदिक जीवन में अवचेतना(Subconscious)मन हमारा समय वृधा (waste) नहीं होने देगा और समय का बचत(Save) करेगा! उदाहरण के लिए हम अपना नित्यावसर वस्तुवों को क्रमबद्धीकरण(particular order) में रखने से हर दिन उस के लिए खोजने का अवसर नहीं होगा! हमारा आचार व्यवहारों इसी हेतु बनगया है! परंतु वे कहा तक सत्य है जानके आचरण करना अथवा हमारा समय अनावसर आचार व्यवहारों में वृधा(waste) होजायेगा! कुछ लोग विष्णु सहस्रनाम व ललिता सहस्रनाम व हनुमान चालीसा इत्यादि जोर जोर से उन का अर्थ नहीं जानता हुआ थकता हुआ पडेंग़े! उस का बदल में क्रियायोग ध्यान करना शतथा सहस्रथा उपयोगकारी होगा!
भय
भय एक मानसिक दुर्बलता है! परंतु जो मनुष्य अपना इच्छानुसार प्रवर्तित करेगा उसके लिए भय एक औषध भी है! उदाहरण के लिए शीघ्रगती से बस (Bus)चलानेवाला को अपाय(accident) होजायेगा ऐसा उद्देश्य से समझाने के लिए भय एक साधन है! भय एक अयस्कांत जैसा है! लोहा का टुकड़े को अयस्कांत अपना तरफ आकर्षित करता है! वैसा ही हम व्यर्थं में भयभीत होने से भय नाम का अयस्कांत हम को और भी भयभ्रांत करेगा! कल्पनाशक्ति, मानसिक प्रगति, संकल्पशक्ति, धैर्य, इच्छाशक्ति, और प्रमादों से बाहर निकलने का विचारों को बलहीन करेगा! मानसिक प्रशांतत को हानि करके हृदय  नाडीमंडलस्थिति और मस्तिष्क को नाश करेगा! आत्मावाबोध(Intuition) का चारों ओर पर्दा डालेगा! 
सफलता और असफलता दोनों गहराई से हमारा अवचेतना चेतना और अधिचेतना मन में रहजायेगा यानी स्थिर निवास बनाएगा! इन को विज्ञता से समूल और संपूर्ण रूप में उखाडके फेंकना आवश्यक है अथवा वे संस्कारों का रूप में जन्म जन्मों तक हमारा पीछे पडेगा और हम को क्लेश करेगा! समय देखकर वे संस्कारों हम को काटेगा! इसी हेतु कुछ लोग जितना प्रयत्न करने से भी असफल होंगे!
शारीरकरुग्मता होने पर अथवा प्रमाद संभव होने पर भय से उस को अधिकाधिक नहीं करना चाहिये! परमात्म प्रसादित इच्छाशक्ति का हेतु मुझे कोई भय नहीं है, मै अच्छी होंगेऐसा मानसिक तीर्मान करके डर को भगाना चाहिये! क्रियायोग ध्यान का माध्यम से धैर्य को अभिवृद्धि करना चाहिये! बापरे, यह बहुत ही खतरनाक रोग है, मेरा मित्र ऐसा ही रोग से बहुत कठिनाई हुआ, कितना भी खर्च करके इलाज(treatment) करवाने से भी ठीक नहीं हुआ, आखरी में मरगयाऐसा भीरूपन डालनेवाला भीरुभिर्यो(timid people) का साथ साहवास या साहचर्य पूर्णरूप में बंद करना और आध्यात्मिकता से प्रकाशमान लोगों का सान्निध्य में सांगत्य में अधिक से अधिकतर रहना चाहिये!
इस मधुमेह(diabetes) व क्षय(Tuberculosis) व्याधि आप का कुटुंब (Family) में वंशपारंपर्य(Hereditary) में आनेवाला व्याधिऐसा करके हर एक वैद्यी(Doctor) बोलना साधारण है! व्याधि  जो है वह भौतिक रूप में अथवा यांत्रिकरूप में एक से दूसरे को संप्रदित यानी आनेवाले चीज नहीं है! स्थूलशरीररहित जीवात्मा जिस में ऐसा रोग लक्षण बीजरूप में है वह इस कुटुंब (Family)को आकर्षित हुआ ऐसा कहेगा आध्यात्मिक वैद्य!
हमारे में जन्म जन्मों से स्थान लिया हुआ क्रमशिक्षणाराहित्य, प्रमत्तता, आरोग्यसोत्रों को पालन नहीं करना, ध्यान नहीं करना, इत्यादि दुष्टलक्षण बीजों को समूल निर्मूलन करना अत्यंत आवश्यक है अथवा हम वर्तमान में जितना भी आरोग्यवान होने से भी शारीरक रुग्मतायें हमको आक्रमण करेगा! तस्मात् जाग्रत! कभी प्रमाद(accident) हुआ अथवा रोग आगया था, उस परिस्थिति पुनरावृत्ति होजायेगा करके डरना नहीं, गतम् गतः ऐसा शोचिये! डर को डराइये!
मरण के लिए भयभीत नहीं होना! शरीर जब रोगग्रस्त होता है तब मरण एक औषधि है! शारीरक मानसिक और आध्यात्मिक बाधावों से मरण एक उपशमन है! जब डर लगता है तब श्वास दीर्घरूप से आस्ते आस्ते अन्दर लीजीये, थोड़ा देर रोख के रखना, वैसा  15-20 बार करना!
निपुणता
हम अपना कार्यो को क्रमशिक्षण से सक्रमरीती में नहीं करना ही इस जन्म में निपुणताराहित्य का हेतु है! उन गलतियों को सही करके अपना निपुणता वृद्धि करने का एकैक मार्ग क्रियायोगध्यान है! 
शांति सौभाग्य
शांति सौभाग्य पाने के लिए क्रियायोगध्यान ही शरण्य है! बाल्यावस्था में ही साधन आरंभ करना आवश्यक है! आलसीपन को आदत हुआ शरीर बाद में ध्यान करने को अनुकूल भी नहीं होगा और सहकार भी नहीं करेगा! ध्यान समय में हमको मिलनेवाली शांति और आनंद परमात्मा हमारा प्रार्थाना को स्वीकार करने का तात्पर्य व उनका करुणा का संकेत है! हर एक मनुष्य सफलता ही चाहता है! कुछ लोग उस सफलता को साध्य के लिए श्रम करेगा, परंतु और कुछ लोग सफलता मिलने तक उस कार्य को छोड़ेगा नहीं है! कोई भी कार्य को बीच में अधूरा छोडना नहीं चाहिये! निरंतर अभ्यास से ही मनुष्य एक उत्तम इंजीनियर(engineer) व श्रेष्ट वैद्यी(Doctor) व उत्तम कळाकार  (Actor) आखरी में सबसे अधिकाधिक योग्य योगी बनेगा! न्यूनताभाव यानी मै अल्प हु, मै असमर्थ हुइत्यादि सब अहंकार ही है! मै स्त्री हु, मै पुरुष हु, मै उत्तम जाती का हुइत्यादि सब भी अहंकार ही है! हम सब परमात्मा का संतान था, है और होंगे! यह भावना नहीं असलियत है! क्रियायोग ध्यान करेंगे, आनंद प्राप्ति करेंगे, वह ही असली शांति और सौभाग्य है! 
पुस्तक पठनं
हर दिन ध्यान का बाद पुस्तक पठनं करना उत्तम होगा! अच्छी ग्रंथों यानी श्रीभगवद्गीता उपनिषदों शास्त्र ग्रंथों इत्यादि पठनं करना उत्तम होगा! विद्यार्थियों अपना अपना पाठ्य ग्रंथों को आस्ते आस्ते समझता हुआ पडना चाहिये, उपन्यास(novel) जैसा पडना नहीं चाहिये! नक्षत्रों ग्रहों को प्रभावित करता रहता है! ग्रहों और मानवशरीरों दोनों परस्पर आकर्षण विकर्षण का आधीन में रहता है! इसीलिये नक्षत्रों मानवशरीरों को प्रभावित करता रहता है!
जिस मनुष्य का दुष्ट प्रवृत्ति है उस का विचारों अंतरिक्ष में इस का पहले ही अस्तित्व हुआ दुष्टस्वभावी वातावरण का साथ आकर्षित होगा! समय मिलाने पर क्रिया निरंतर करना ही इस का परिष्कार मार्ग है! निष्णात लोगों से क्रियायोग ध्यान सीखना चाहिये!
भौतिक मानसिक कायकल्प चिकित्सा
मनुष्य अपना शरीर का अणुवों को अपना मेधा ही चलारहे जैसा भावना करना चाहियें और ऐसा समझना चाहियें! मानसिक संकुचिता को अपना अन्दर स्थान नहीं देना चाहिये! विषपूरित निराशा निस्पृह निरुत्साह असंतृप्ति इत्यादियों को स्थान नहीं देना चाहिये! आत्मविश्वास का साथ सही निर्णय आत्मविमर्शन करके लेना चाहिये! जब हमारा आध्यात्मिक रुग्मता प्रबल होने से सद्गुरु का शरण पाईये! सद्गुरु का सलहा लेतेराहना, अज्ञान और विवेकरहित कार्यों नहीं करना!
परिवर्तन
परिवर्तन सहज है! स्रष्टि में हर एक अणु नित्यं प्रतिक्षण बदलेगा, बदलना और बदलता ही रहता है! अपना अपना कर्मानुसार इस भूमि का उपर निवास करके बंधुओं मित्रों और माता पिताओं इत्यादियों का मनोरंजन करके समय आनेपर परिवर्तन के लिए अन्य शरीर धारण के लिए इस शरीर को त्यागना सहज है! मातृ गर्भ मे होने का समय में ही अहंकार का अस्तित्व शिशु में होगा! मातृ गर्भ से बाहर निकलने का पश्चात बाल्य यौवन कौमार और वार्धक्य अवस्थावों में भी अपना अस्तित्व दृढ करेगा! शरीर में होने और आनेवाली परिवर्तनों को ध्यान करेगा मन! शरीर में होने और आनेवाली परिवर्तनों का हेतु मन में होने और आनेवाली परिवर्तनों का उपर ध्यान करेगा अहंकार! इस अहंकार और मन दोनों का पीछे परिवर्तनारहित व रूपांतरारहित  शुद्धात्म होता है! मनुष्य दिव्यात्मस्वरूप है! नित्य नूतन यौवन चेतना ही मनुष्य का वांछ है!
मै खारहा हु, मै धौडरहा हु, मै बातकररहा हु, मै चलरहा हुइत्यादि सब में मैहै! सब मैका मैयानी सर्वोत्तम सर्वश्रेष्ठ मैजो है वह मैही नित्यचेतना नित्यस्थितिवंत और नित्यानंद स्वरूपी आत्मा है! मैऔर मेराजैसा भावना ही अहंकार है! इस अहंकार का हेतु सुख दुःख आरोग्य अनारोग्य ऐश्वर्य दरिद्रता इत्यादि भावनों होता है! भावना ही मोह का मार्ग है! इस का तात्पर्य सब विषयों को एक पत्थर जैसा भुगतने का नहीं है! इन को पार करने का निवारणोपाय ढूंढना चाहिये! उसी समय में क्रियायोग साधना का माध्यम से सहिष्णुता वृद्धि करके उन भावनों का प्रभावित नहीं होना चाहिये!
वार्धक्य शरीर को होता है मन का नहीं होता है! परंतु जगत में होताहुआ परिवर्तनावों का ध्यान करता हुआ मन हमेशा केलिए नित्य यौवन में हो नहीं सकता है! मन में भी परिवर्तन आरंभ होगा! बाल्य यौवन कौमार्य और वार्धक्य सभी अवस्थाए में मन में परिवर्तन तदानुगुण अवश्य होगा! आध्यात्मिक रूप में वृद्धि नहीं हुआ अथवा अज्ञानत़ा का हेतु परिवर्तन नहीं हुआ व्यक्ती आत्मा का अस्तित्व का नहीं पहचानेगा परंतु आत्मा का प्रतिबिंबित(Reflection) अहंकार को(Pseudo soul) अवश्य पहचानेगा! इस सापेक्षता(Relative) अहंकार भी शाश्वत है! यह जन्म जन्मों उस व्यक्ति का साथ छाया जैसा होगा! परंतु स्थूलशरीर पतनानंतर यह अहंकार उस शरीर व जीवित संबंधित स्मृति का अपना साथ लेकर नहीं जाएगा! यन्त्र(Machine)खराब होने पर यन्त्र को तयारीकरनेवाला मरेगा नहीं है! वैसा ही स्थूलशरीर पतनानंतर अहंकार नहीं मरेगा!
शक्ति पुनरुद्धरण(Rejuvenation):
थका हुआ स्थूल और सूक्ष्म(मनसिक) शरीरों में शक्ति पुनारुद्धरण के लिए विश्रांति आवश्यक है! शरीर का हर एक अंग को तनाव(tense) डाल के रिलाक्स(relax) करने से स्थूलशरीर को शक्ति पुनः वापस आयेगा! गहरा नींद में मोटार(Motor nerves)और सेंसार(Sensor nerves)नाड़िया से मन और शक्ति अचेतनात्मक(Unconscious) उपसंहरण(withdraw) होगा!
क्रियायोग ध्यान द्वारा हृदय फेफड़े और अन्य अंगों को पूरा विश्रांती मिलेगा!
उसका हेतु शरीर में शक्ति का पुनरुद्धरण होजायेगा! शरीर व्यामोह ही मरणभय का हेतु है! हम कर्म भुगतने के लिए स्थूला शरीरधारण करते है! कूटस्थ में दृष्टि लगाके अर्धनिमीळित नेत्रों से सोना अभ्यास करना चाहिये क्योंकि वह हमको समाधिस्थिति में लेजाएगा!
मरण-विविधस्थितियाँ            
कणों(Cells) जन्म लेना और मरना निरंतर शरीर में होता रहता है!
1)मेरुदंड 2)मस्तिष्क और महत्वपूर्ण 3)मेडुलाआबलम्बगेटा(medulla oblongata) इन तीनों से जब प्राणशक्ति का उपसंहरण होने से तब उस को मरणं कहते है! श्वास और नाडी(Pulse) बंद होना, अवयवों अंगों और कणों(Cells) ठोस बनाना(solidify) ये सब मरण नहीं है!
मेरुदंड वृक्ष(Tree of life) जैसा है! मनुष्य का केश वृक्ष का जड़ जैसा है! सेंसर(Afferent-sensor) और मोटर(Efferent-motor nerves) नाड़िया वृक्ष का शाखाये(Branches) जैसा है! शरीर का सारे भागों(Parts) इन नाड़िया द्वारा ही जोड़ा(Connect) होता है! मनुष्य का प्राणशक्ति मेडुला आबलम्बगेटा(medulla oblongata) में केन्द्रीकृत होता है! मेडुलाआबलम्बगेटा में कुछ भी अपाय होने से मरणं तथ्य है! वृक्षों में प्राणशक्ति हर शाखा में होता है और मनुष्य जैसा मेडुलाआबलम्बगेटा में यानी एक ही जगह में केन्द्रीकृत नहीं होगा! इसी हेतु वृक्ष का शाखा को बोनेसे भी उसी जाती का वृक्ष आसकता है! परंतु मनुष्य का हाथ या टांग काटके भूमि का अन्दर बोके उस से दूसरा मनुष्य जीवी को पैदा नहीं करसकेगा!
गति प्रदान करनेवाली मोटर(Efferent-motor nerves) नाड़िया अपना शक्ति को पूर्णरूप में खोना  को(paralise), झिल्ली(membranes) अपना शक्ति को पूर्णरूप में खोना (Muscular Paralysis) ये दोनों मरण का मुख्य कारण है!  नासिका जीब नेत्र चर्म और कर्णों को ज्ञानेंद्रियों कहते है! सेंसर(Afferent-sensor nerves)नाड़िया गंध रस रूप स्पर्श और शब्दों संदेशों को मस्तिष्क में नहीं भेजने से भी मरण संभवित होगा! स्थूलशरीर त्यागने का समाया में क्रमशः गंध रस रूप स्पर्श और शब्द शक्तियों को जीवात्मा खोबैठेगा!
मरणानुभव
टांग अथवा हाथ सोजाना जो है साधारण तोड़ में हम सब को अनुभवी चीज है! उस समय में उस भाग मारा हुआ का सामान है! उस में कोई चलनं नहीं होगा! उस भाग(Part) हिला नहीं सकते है! नेत्र का नसों मरने यानी गतिरहित होने तक नासिका और जीब मरजाना गतिरहित होना व्यक्ती देख सकेगा! गहरा नींद जैसा बाधारहित चेतना को थोड़ा समाया मेरुदंड ने अनुभव करसकता है! पक्षवात(paralysis) होके मराहुआ भाग(part) को कुछ पत्थर जैसा ठोस (Hard) वस्तु से ठक्कर लगाने से भी दर्द(Pain) नहीं महसूस होगा! वैसा ही क्रमशः स्पर्शरहित होनेवाली टांगों, हाथ, नीचे का उदर(Abdomen), जिगर(Liver), उपर का उदर(Stomach), हृदय और मस्तिष्क ये सब मरणसमय में व्यक्ती को दर्द(Pain) नहीं महसूस होगा परंतु फेफड़ों में दर्द(Pain) महसूस होगा! श्वास नहीं मिलना अत्यंत बाधाकार है! यह असली में मानसिक बाधा है!
प्राणशक्ति क्रमशः मॉसपेशी(Muscles) हृदय और इन्द्रियों से उपसंहरण(withdraw) होजायेगा! उपसंहरण(withdraw) कियागया प्राणशक्ति मूलाधार स्वाधिष्ठान मणिपुर अनाहत विशुद्ध आज्ञा और सहस्रार चक्रों में निक्षिप्त कराजायेगा! आत्म केवल स्थूलशरीर को त्याग के सूक्ष्म प्रपंच में तात्कालिक कदम रखना ही मरण है! अंधेरा में भूत प्रेत पिशाचों होता है करके कल्पित कहानियों सुनके लोग भयभीत होते है! वैसा ही मरण का बारे में भी अनुभवसून्य लोगों का कल्पित कहानियों सुनके लोग भयभ्रांत होते है!
भगवान रमण महर्षि जीवित होता हुआ मरणानुभव प्राप्त किये है! मै स्वयं तीन से अधिक बार मरणानुभव प्राप्त किया और अपस्माराक्स्थिति(Coma-unconscious state) मेभी कदम रखा हु! मरण दीर्घनिद्रा जैसा है!
जननं वृद्धि होना कष्ट नष्ट मरण ये सब परमात्मा का स्वप्ना ही है! हम जो भयंकर स्वप्ना अथवा अन्य स्वप्नों  ये सब आत्मा का दिव्यत्व को भूलने को दोहद करेगा! साधारण व्यक्ति मरण को एक भयंकर भौतिक मानसिक विषय जैसा ऊहा करेगा! आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करके अपना अमरत्वा और दिव्यत्व जानागाया क्रियायोग साधकों के लिए मरण एक अत्यद्भुत भौतिक मानसिक अनुभव है!
भौतिक शरीर एलक्ट्रान और प्रोटान(Electron & proton) इत्यादि परमाणुओं का चेतनापूर्वक सम्मेळन है! मरण में नाश होनेवाली इस शरीर का मॉस द्रवों वायुओं शक्ति इत्यादि सब धूल(Dust) वायु और प्रकाश(Light) जैसा रूपांतर होते है! शक्ति और सृष्टि का हर चीज परमात्मा का चेतना अथवा विचार है! जननम् श्वास हृदय का लब-डाब रक्तप्रसरण पाचन(Didestion) सुख दुःख शीतल उष्ण इत्यादि सब आखरी में मरण ये सब मानसिक कार्यों है! इन सब को परमात्माने मानावाचेतन में व्यक्तीकरण किया!

परिवर्तन
कुछ लोग बदलना चाहता है परंतु अपना अपना बुरा आदतों को बदला नहीं सकते है! निरंतर सत्पुरुषों का सांगत्य में इच्छाशक्ति का उपयोग करके अपना बुरा आदतों को बदल सकते है! ऐसा बदलना अत्यंत आवश्यक है नहीं तो दुष्कर्मों इन कष्ट व्याधि ऋण इत्यादि रूप में पीछे पडेगा! परमात्मा प्रसादित इच्छाशक्ति को दृढ निश्चय से उपयोग नहीं करना ही जीवन में असफलता को मुख्यकारण है! इच्छाशक्ति को दृढ निश्चय से सही उपयोग  करके इस प्रपंच को कंपित करसकते हो! प्राणशक्ति और चेतना दोनों को जोड़नेवाली इस इच्छाशक्ति ही है! हमारा शरीर में कई सैकडों वर्षो तक मिलनेवाली प्राणशक्ति करेंट(current) है! कुछ अननुकूल परिस्थिति आनेसे तुरंत ‘मै थक गया हु’ करके इस इच्छाशक्ति को त्यागते है! इच्छाशक्ति को और लक्ष्य को त्यागने का व्यक्ति मरा हुआ व्यक्ति का सामान है! वैसा व्यक्ति एक जड़ पदार्ध है! मरण समय में होनेवाली बाधा को इच्छाशक्ति से पराजित करना चाहिये! पुनर्जीवित होकर क्रियायोग साधना जारी रखना चाहिये!
अपना अभिप्रायों को संतान का उपर जबरदस्ती नहीं डालना चाहिये! जबरदस्ती अपना बच्चों का इच्छाशक्ति को बदलने का प्रयत्न नहीं करना चाहिये! श्रद्धा भक्ति आर्द्रता नहीं हुआ पुराणा प्रार्थना पद्धातियां श्री परमहंस योगानंदा स्वामीजी को पसंद नहीं होते थे! स्वामीजी अपना आत्मा से हृदय से करनेवाले प्रार्थना पद्धातियां को बाद में बहुत आदरण हुआ! बच्चों को क्रियायोग साधना सिखवाइये, उन बच्चों का साथ बैठ के खुद कीजिये! परमात्मा से तादात्म्य होकर निर्णय लेना बच्चों का उपयोगाकारी भी उत्तम भी अवश्य होगा!

आहार 
आहार और आरोग्य का मध्य मे परस्पर संबंध है! मनुष्य और आहार दोनों का कणों में मेधा छिपा हुआ होता है! मन और मस्तिष्क का कणों दोनों में मेधा अपना प्रभाव अवश्य दिखाएगा! कच्चा सब्जियों काष्ठफल(nuts) आहार जैसा लेना व्यक्तियों में प्राणशक्ति अविघ्न रीति में प्रवाहित करेगा! यह आरोग्यकर है! जरूरत से अधिक तरह से पका हुआ सब्जियों अपना शक्ति को खो बैठेगा और अनारोग्य भी है!
मांसाहार में वध किया हुआ उस जीवी का बाधा भय आक्रोश आवेदन और क्रोध इत्यादियो का स्पंदनों निक्षिप्त होता है! ऐसी आहार लेनेवालों में प्राणशक्ति सही तरह से प्रवाहित नहीं होगा! यह खानेवाला का मन  आह्लादकार नहीं होगा और अनारोग्य भी है!

मन को हर समय भौतिक विषयों और भौतिकशरीर का उपर केंद्रीकृत करने से मोह अधिक होजायेगा! अनंत का उपर ध्यान करना चाहिये! ध्यान में ध्याता ध्येय और ध्यान तीनों एक होना चाहिये! मस्तिष्क जो है वह प्राणशक्ति भांडागार है! तकड़ा या जोर से शिर का उपर मार लगने से नक्षत्रों(stars) दिखाईदेगा! ये सब नक्षत्रों प्राणशक्ति का चपला(lightnings)ही है शरीर का झिल्ली, हृदय, फेफड़ों(Lungs), डयाफ्रं(Diaphragm) इन का गति (Movement) के लिए प्राणशक्ति चाहिये! कणविभाजन(Cellular Metabolism), रक्त का रासायनिक परिवर्तन के लिए प्राणशक्ति चाहिये! सेंसरी और मोटार नाड़ियों का काम के लिए प्राणशक्ति चाहिये! विचारे और भावनावों और वांछों के लिए प्राणशक्ति चाहिये! इन सब के लिए प्राणशक्ति कुण्डलिनी द्वारा बहुत खर्च होता है! सेल फोन(Mobile phone) का बाटेरी(Battery) बार बार(often) छार्ज(Charge)करता रहना चाहिए नहीं तो वह फोन(Mobile phone) हम को उपयोगाकारी नहीं होगा! वैसा ही कुण्डलिनी द्वारा बहुत खर्च होनेवाली प्राणशक्ति का हेतु शरीर बलहीन होकर थक जाएगा, आखरी में रोगग्रस्त होकर और  मरजायेगा!  क्रियायोहा साधना का माध्यम से कुण्डलिनी जागृति करना चाहिए! कुण्डलिनी जागृति करना का तात्पर्य शरीर को पुनर्जीवित करना ही है! क्योंकि कुण्डलिनी जागृति का हेतु शरीर से बाहर वृधा गया प्राणशक्ति फिर सही उपयोग में वापस आयेगा! हर दिन सुबह और शाम को नियमानुसार अवश्य इस क्रियायोहा साधना करना चाहिये! इस का हेतु भावना केंद्र हृदय और तार्किक केंद्र मन दोनों एक होजायेगा! ऐसा करके हमारा प्रेम को परमात्मा को भेजना और उन का प्रेम और शक्ति को लभ्य करते रहना है! धन का अवसर मनुष्य को अवश्य है! परंतु उस धन को सही मार्ग में उपयोग करने से वह हम को प्रयोजनकारी होगा नहीं तो हानिकारी होगा! धन ही सब कुछ नहीं है! सब से बढ़कर क्रियायोगसाधना ही महत्वपूर्ण धन है! 

आत्मा और परमात्मा एक ही है! समुद्र और समुद्र का तरंग एक ही है! समिष्टि परमात्मा  को व्यष्टि में आत्मा कहते है! आत्मा का अनुसंधान करपाने से परमात्मा का साथ अनुसंधान होईगया करके समझ सकते है! एक रक्त बूंद में मधुमेह(Diabetes) होने से उस व्यक्ति का समस्त रक्त में मधुमेह(Diabetes) होगा ही हैना! श्वास को क्रियायोग साधना का माध्यम से नियंत्रण करने से आत्मा का साथ अनुसंधान होजायेगा! इसी को प्राणायाम मार्ग कहते है! ‘नेति नेति’ कहके सब को त्याग के ब्रहमपदार्ध में पहुचने को ज्ञानमार्ग कहते है! मै मन नहीं हु, मै बुद्धि नहीं हु, मै इन्द्रियों नहीं हु, मै विचारें नहीं हु, मै चित्त(भावना) नहीं हु, मै अहंकार नहीं हु, वैसा आगे बढ़ने को ज्ञानमार्ग कहते है! परंतु यह अधिक जटिल है! ‘अहम् ब्रह्मास्मि(मै स्वयं परामात्मा हु), सर्वं खलु इदं ब्रह्मा’ (सर्व ब्रह्मा पदार्ध से भरा है)! तब कुछ भी मै नहीं हु ऐसा शोचना भी सही नहीं है!
ज्ञानावतार श्री युक्तेस्वर स्वामि श्रीमद्भगवद्गीता सीखने के लिए श्री दब्रुभल्लव का पास जाते थे! श्री दब्रुभल्लव पाठ सिखाने पद्धति सब से वैविध्य है! हर एक श्लोक चार या पाँच बार पढाके उस श्लोक का उपर ध्यान कराते थे! तब गुरु श्री दब्रुभल्लव उस श्लोक का उपर व्याख्यान करेगा! पुनः उस श्लोक का व्याख्यान का उपर थोड़ा समय ध्यान कराते थे! पवित्र ग्रंथों समझता हुआ थोड़ा थोडा पढना चाहिये! तब आत्मसाक्षात्कार के लिए दोहद करेगा! ‘कितना ग्रंथों पढ़ा” यह मुख्य नहीं, ‘कितना ग्रहण किया’ यह मुख्य है! अर्थरहित अनुभवरहित ग्रंथ संख्या आहामकार को वृद्धि करेगा! आत्मसाक्षात्कार लभ्य होना ही पवित्र ग्रंथों का मुख्या उद्देश्य है!
श्री रामकृष्ण परमहंस ऐसा कहते थे—‘अविद्यापरो को देख के सहानुभूति करता हु, आत्मसाक्षात्कार लभ्य हुआ विद्याविहीन को प्रेम करता हु, आत्मसाक्षात्कार नहीं प्राप्त किया विद्वान या पढालिखा मूरख लोगों को तृणप्राय समझता हु’, वैसा ‘आत्मसाक्षात्कार’ का बारे में पूछनेवाले मूरख लोगों को हवा में उड़ा देता हु, परंतु आत्मसाक्षात्कार प्राप्त किया विद्वान लोगों को गौरव करता हु, प्रेम करता हु, और आश्चर्यजनक होता हु!
प्रथम में क्रियायोग साधन करना चाहिये! आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करना चाहिये! उस का पश्चात शास्त्र ग्रंथों पढ़ना चाहिये! तब वो अच्छीतरह समझ आयेगा! कार(Car) चलाना ग्रंथपठनं से नहीं आयेगा और ग्रंथपठनं से नहीं समाप्त होना चाहिये! प्रत्यक्ष रूप में अभ्यास करके सीखना आवश्यक है! वर्षों से किया शास्त्र ग्रंथपठनं एक घंटा साधना का समान नही है और नहीं भी हो सकता है!

साधारणमानुष्य--योगी
साधारण मनुष्य अहंकार से सब कार्य स्वयं ही करता हु ऐसा शोचके जीवन बिताएगा! परमात्मा ही धर्मबद्धयुक्त सर्वकार्यों अपन द्वारा करारहे ऐसा शोचटा हुआ जीवन बिताएगा क्रियायोगी! साधारण मनुष्य धन का अवसर अत्यंत प्राधान्य है! योगी का भी धन का अवसर होता परंतु धन ही मुख्यावसर नहीं है!
आध्यात्मिक अथवा लौकिक कार्यो दोनों सत्ययुक्त व्यापार सिद्धांतों का आधार होकर करना चाहिये नहीं तो जीएवन दुःखमय होगा!
कार्य भले अच्छा होने पर भी सही ढंग से योजना बनाके तयारी करना चाहिये! सही ढंग से योजना बनाके करना चाहिये! बिना सोचके कभी भी नहीं करना चाहिये अथवा निरर्थक होजायेगा! व्यापाराभिवृद्धि के लिए आध्यात्मिकता को उपयोग करना अत्यंत कल्मष है और क्षमारहित दोष है!
स्वर्ण थाली(Plate) में खाने से भी अथवा साधारण थाली(Plate) में खाने से भी
कोई परख नहीं है! जो भी थाली(Plate) में खाने से भी वह हमारा भूक (Hunger) मिटायेगा! इधर थाली(Plate) मुख्या नहीं उस में दिया हुआ भोजन मुख्या है! अर्थहीन भौतिक सदुपायों का उपर दृष्टि रखा के समय वृधा नहीं करना चाहिये! अधिकाधिक समय क्रियायोग साधना के लिए उपयोग करना अत्यंत आवश्यक है!

कर्म सिद्धांत
वांछनीयता अथवा इचछाओं(Wants) से विमुक्त होजावो नहीं तो उस इचछाओं को संपन्न(fulfil) करने के लिए पुनः इस पृथ्वी पर जन्म लेना पडेगा! क्रियायोग साधना अवश्य करो, प्राणायाम पद्धातिया सीखो, तुम्हारा इचछाओं से विमुक्त होजावो! केवल इस ध्यान द्वारा ही परमात्म तुम से बात करेगा! ध्यान में जितना शांति पायेगा उतना ही तुम परमात्म का सामीप में जाएगा! परमात्म चेतना का साथ ही कार्यों आरंभ करो! हर एक कार्य परमात्म का कार्य समझो! परमात्मा के लिए ही कार्य कररहा हु ऐसा समझके अत्यंत श्रद्धापूर्वक आनंदित होक कार्यों करो!
माहायोगियों
परिपूर्ण मुक्ति प्राप्त किया पुण्य पुरुषों को माहायोगियों कहेगा! वे पिछले जन्मों में ही मुक्ति प्राप्त करके केवल मानवाळि का उपर दया का हेतु परमात्मा का साथ अपना अस्तित्व(Anchored to God) रखता हुआ इस भूमि का उपर अपने आप को व्यक्तीकरण किया कारणजन्म लोग है ये! वे साधारण साधकों जैसा परमात्मा का साथ संबंध बनाने में श्रम करने का आगत्य नहीं है! वे कर्मरहित है! पुनरपि मरणं पुनरपि जननं पुनरपि जननी जठरे शयनंइस आर्योक्ति इन महापुरुषों लोगों का वर्तित नहीं होगा! यह आर्योक्ति साधारण लोगों के लिए वर्तित होगा! केवल परमात्मा का प्रीती के लिए और मानवाळि का हित के लिए ये कारणजन्म लोग जनम लेता है! वे लोग साधारण व स्वाभाविक मरण प्राप्त करा सकते अथवा अपना शरीर को परमात्मा का साथ विलीन भी कर सकते है! वे जननं(birth) का पहले और बाद में भी मुक्त है! वे जन्म लेने का पहले ही मुक्त है इसी हेतु पुनः मुक्त होने को अवसर नहीं है! उन को देख के सीखने का रीति में उन महापुरुषों का प्रवर्तन होता है! कर्मरहित लोगों का उपर जननं(birth) जबरदस्ती नहीं आयेगा! कर्म अवशेष होने से ही पुनः जन्म होगा! कर्म सुकर्म होने से भी दुष्कर्म होने से भी कर्म अवशेष होने से ही पुनः जन्म होगा!
भूक लगा हुआ मनुष्य को आहार देना सही है! उस को आहार को कैसा संपादन करना सीखना आहार देने से भी उत्तम है! उस को अपना मानसिक शक्ति को वृद्धि करना जिस का माध्यम से सर्वविधों से अपने आप को सुधारना सिखाना और भी उत्तम है! निष्णात् क्रियायोग साधकों को दिखाके उन का पास भेजने को सहायता करके क्रियायोग सिखाने को दोहद करना सर्वश्रेष्ठ है! आहार लेने का तीन घंटो का पश्चात क्रियायोग साधना करा सकता है! साधना में तीव्रता और अधिक समय करना दोनों जरूरत है! साधना कम से कम दो घंटे करना चाहिये! सुख शांति आनंद लभ्य होना ही परमात्मा का समीप में आने का संकेत है! इसी कारण साधना समाप्त करने का बाद तुरंत उठाना नहीं चाहिये! समय देखता हुआ नाम के वास्ते साधना करना अविवेक है! आदते दुष्ट हो शिष्ट हो दोनों मनुष्य का अन्दर स्थिर होने को आठ वर्ष लगेगा! इसी कारण क्रियायोग साधन कम से कम आठ वर्ष करके अच्छी बीज डालने से हम को अधिक से अधिक उपयोगाकारी होगी!
साधक जब अधिचेतानावस्था में प्रवेश करने से परमात्मा शब्द को निश्शब्द स्पंदन नित्यानूताना आनंद प्राकाश और प्रेम जैसा आस्वादन यानी अनुभव व ग्रहण करेगा! इसको सविकल्प समाधि कहते है! साधक जब अपना शरीर और इस जगत सब पानी का बबूला(water bubble) जैसा अवलोकन (Observe) कर सकने से तब वो परमात्मा चेतना यानी साम्राज्य में प्रवेश किया करके परिगण में लेसकता है! इसी को निर्विकल्प समाधि कहते है!
अष्टांगयोग
पतंजलि महर्षि से प्रसादित किया अष्टांगयोग को आठ अंग है! वे:---
1)यम=अहिंसा, सत्यं, आस्तेयं(चोरी नहीं करने का निश्चय), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह यानी अन्यों से जो भी चीज नहीं मांगना
2)नियम=शौचं(शरीर और मन दोनों को शुद्ध रखना), संतोषं(तृप्ति), स्वाध्यायं(शास्त्रपठनं), ईश्वरप्रणिधानं यानी परमात्मा को अंकित होना!
(शास्त्रपठनं) = श्वास को अस्त्र जैसा उपयोग करना ही श्वास्त्र है! श्वास्त्र श्वास्त्र कहता हुआ शास्त्र बनगया! अपना श्वास को अस्त्र जैसा पठनं व पढाई करना ही शास्त्रपठनं है! इस का तात्पर्य ये है की ‘सोऽहं’ प्राणायाम पद्धति करने को शास्त्रपठनं कहते है!    
3)आसन = ध्यान में बैठने में स्थिरत्व साध्य करना!
4) प्राणायाम= श्वास को नियंत्रण करना  
5)प्रत्याहार= इन्द्रियों को इन्द्रिय विषयों को उपसंहरण(withdraw) करना! नाक का विषयवृत्ति गंध, जीब का विषयवृत्ति रस व रूचि, नेत्र का विषयवृत्ति देखना, चर्म का विषयवृत्ति स्पर्श, कान का विषयवृत्ति शब्द, इन सब से मन को उपसंहरण(withdraw) करना है!   
6)धारण= वस्तु एकाग्रता
7)ध्यान= केवल परमात्मा का उपर ही निरंतर एकाग्रता रखना!
8) समाधि= सब रूपों को विसर्जित करना, और परमात्मा में ऐक्य होना!
धारण ध्यान और समाधि इन तीनों को मिलाके सम्यक समाधि कहते है!
ध्यान बीज से आरंभ करके निर्बीज होना चाहिए!
न तस्य रोगों न जरा न मृत्युप्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरं!

रोग, बुढ़ापा, मरण इन सब को त्याग के साधक योगाग्नि से प्रज्वरिल होना चाहिए! 
उपनयनं
उप= सामीप में, नयनं= नेत्रं, यानी उपनयन का अर्थ परमात्मा का समीप का नेत्र यानी तीसरा नेत्र है! इसीलिये उस तीसरा नेत्र खोलने से परमात्मा का साथ अनुसंधान अवश्य मिल सकेगा! उस तीसरा नेत्र खोलना ही असली भक्तियोग है! इस को दोहद करनेवाली केवल क्रियायोग साधना ही मार्ग है! क्रियायोग साधना ही कर्मयोग है!
यज्ञोपवीतधारण  
यात् ज्ञात्वा मुक्तिं प्रदाति इति यज्ञम्! इस का अर्थ जिसको जानने से मुक्ति
लभ्य होगा उसको यज्ञम् कहते है! परमात्मा को समीप होने के लिए धारणा यानी एकाग्रता करना चाहिये! परमात्मा का समीप में होने से ही मुक्ति मिलेगा! वैसा मुक्ति के लिए ज्ञानप्राप्ति प्रसादित करनेवाली यज्ञ ही यज्ञोपवीतधारण है! इस के लिए ‘मै तीव्रता से क्रियायोग साधन करूंगा’ ऐसा प्रमाण करके धरनेवाली कंकण ही यज्ञोपवीतधारण है!
पॉचशिखों
पॉचशिखों पॉचमहाभूतों का प्रतीकें है! पॉचमहाभूतों को साक्षीभूत बना कर मै इस यज्ञ करूंगा ऐसा प्रतिज्ञ करने को शिरस में पॉचशिखों रखेगा साधक! मुक्ति और ज्ञान प्रसादित करनेवाली इस यज्ञ के लिए अग्नि का सामने साधक प्रमाण करता है!
गायत्रीमंत्र
ॐ भूर्भवस्वः तत्सवितर्वरेण्यम्
भर्गो देवश्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् 
ओ ॐकार, तुम्ही प्रणव स्वरूप है, दुःखनाश स्वरूप है, सुख स्वरूप है, भगवान का श्रेष्ठ और पापनाश तेजस को ध्यान करेगा! तुम्हारा उस प्रकाश  हमारा मस्तिष्कों को प्रेरणादायक होजाएगा!
गायंतं त्रायते इति गायत्री यानी इस मंत्र जितना गायेंगे इतना हम को इस भवसागर से रक्षा करेगा! इसी हेतु इस को गायत्री कहते है!
ॐकार का वर्णन(Description) ही गायत्री मंत्र है! इस ॐकार का आसरा से ही हम ज्ञानप्राप्ति करेंगे तत् पश्चात् मुक्ति लभ्य करेंगे!
आपस्तंभसूत्र
असंगो शब्दों शरीरों स्पर्शश्च महान् शुचिः
परमात्मा अवयावाराहित है, शब्द स्पर्शादि गुणरहित है, सूक्ष्मातिसूक्ष्म है, तारका का अतीत है, महात्म और शुद्ध है!
आपः का अर्थ जल है! संसार जल जैसा है! संसार नाम का स्तंभ का आधार प्राणशक्ति है! इस जड़(inert) शरीर को परमात्मा का साथ जोड़नेवाली सूत्र(thread) है प्राणशक्ति! क्रियायोग साधना करके प्राणशक्ति का नियंत्रण करना चाहिये! तभी तो मन निश्चल होजाएगा! वह ही मुक्ति का सीढ़ी(ladder) है! क्रियायोग साधना करके प्राणशक्ति का नियंत्रण करके मोक्षसिद्धि प्रापर करना ही आपस्तंभसूत्र है!
रहस्यम्
मुक्ति प्राप्त करने के लिए करनेवाली क्रियायोग साधना अत्यंत रहस्य है!
रहस्य का अर्थ रहित हास्ययुक्त यानी इस क्रियायोग साधना बेकार नेत्र बंद करके बैठनेवाली चीज नहीं है! यह कान में बोलनेवाली रहस्य नहीं, परंतु परमात्मा का साथ अनुसंधान करने के लिए तीव्रता से करनेवाली व्यापार(Serious Business)है यह ही इस का उद्देश्य है!


जैगुरु     ॐ श्री योगानंद गुरु परब्रह्मणे नमः       जैगुरु

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