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49 Maruts in Hindi

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  महेश्वर सूत्रोँ अइउण् ऋळुक् एओय्   ऐओच्   हयवराट् लण् ङ्यमण्णनम् जबगाडदस् खपचठदव् कपय् इन शब्दों का हेतु अच्, हल्, और संयुक्ताक्षर बने है!   सूक्ष्म प्राणशक्ति में ज्ञान और शक्ति दोनों है! इस का मूल सहस्रार में है! 49 मुख्य उपवायुवों का मूल सूक्ष्म प्राणशक्ति है! हर एक उपवायु को अपना अपना विशेष विधियों है! आज्ञा चक्र द्वारा विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान और मूलाधार चक्रों में बांटा हुआ है! इन चक्रों का माध्यम से नस केन्द्रों और उन का माध्यम से विविध अवयवों को बांटा हुआ है! ½ स्थूल वायु =   समिष्टि स्थूल व्यान वायु 1/8 स्थूल वायु +1/8 स्थूल आकाश =   स्थूल समिष्टि सामान वायु 1/8 स्थूल वायु +1/8 स्थूल अग्नि =   स्थूल समिष्टि उदान वायु 1/8 स्थूल वायु +1/8 स्थूल जल   =   स्थूल समिष्टि प्राण वायु 1/8 स्थूल वायु +1/8 स्थूल पृथ्वी =   स्थूल समिष्टि अपान वायु पंच प्राण स्थान प्राण (विशुद्ध) गलेमें, अपान(मूलाधार) गुदस्थान व्यान(आनाहत) सर्वशारीर उदान पिट्यूटरी सामा...

Parangipettai meditations.

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Jaiguru, I along with 14 devotees visited Parangipettai around 220km from  Chennai on 13th July 2012. There we meditated for more than 3 Hours. Every one of us felt d presence of Babaji. Parangipettai is the birth place of Mahavatar Babaji.Please view these photos.   .

aksharas & vayus shown in photos of mine in Telugu

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ANUSHTAANA GAYATRI AND JATAKADOSHA NIVAARINEE KRIYAS IN HINDI

13) अनुष्ठान गायत्री: गायंतं त्रायते इति गायत्री इस मंत्र जितना समय गायेगा इतना लाभदायक है और रक्षा करता है! ॐ भूर्भुवस्वः तत्सवितर्वरेण्यं भर्गो देवशय धीमहि धीयोयोंनः प्रचोदयात ॐ = परमात्मा, भूः= आप प्रणव स्वरुप है, भुवः= दुःख नाशकारी है, स्वः=सुख स्वरुप है, तत्= ओ, सवितुः= तेजस यानी प्रकाश रूपी, देवशय=भगवान का, वरेण्यं= श्रेष्ठमय, भर्गः=पापनाशक प्रकाश को, धीमहि=ध्यान करेंगे, यः= जो, नः= हमारा, धियः=बुध्धों को, प्रचोदयात= प्रेरेपण करेंगे!  तात्पर्य:-- परमात्मा, आप प्रणव स्वरुप है, दुःख नाशकारी है, सुख स्वरुप है, ओ,  तेजस यानी प्रकाश रूपी,  भगवान का,  श्रेष्ठमय, पापनाशक प्रकाश को, ध्यान करेंगे, जो, हमारा,  बुध्धों को, प्रेरेपण करेंगे!  पूरक=श्वास को अंदर लेना, अंतःकुम्भक= श्वास को कूटस्थ में रोख के रखना, रेचक= श्वास को बाहर निकाल्देना, बाह्यकुम्भक= श्वास को शारीर के बाहर रोख के रखना! एक पूरक, अंतःकुम्भक , रेचक, और बाह्यकुम्भक, सब मिलाके एक हंसा कहते है! मन में गायत्री मंत्र बोल्तेहुवे एक दीर्घ हंस करना है! पूरक, अंतःकुम्भक , रेचक, ती...