कनकधारा स्तोत्रम्
कनकधारा स्तोत्रम् – जगद्गुरु
अदि शंकराचार्य.
देवी
लक्ष्मी
कनकधारा का
अर्थ सुवर्णधारा है! इस सुवर्णधारा से ही समस्थ जगत उद्भव हुआ है! इस जगत उत्पत्ति
का आधार इस सुवर्णधारा ही है! धारा धारा
धारा धारा धारा बोलते हुवे राधा बनाता है! राधा का अर्थ विश्व आधारशक्ति है! इस सुवर्णधारा को ही प्रकाश, बिजली, अथवा चेतना कहते है!
सुवर्णधारा को
माया कहते है! मा का अर्थ नहीं, या का अर्थ यदार्थ
है! यह सभी में कुंडलिनी शक्ती का रूप विराजमान है!
परमात्म
चेताना को Potential energy, और स्त्री शक्ति को Female energy को kinetic energy कहते है! इस का अर्थ स्थिर energy को potential energy, और चंचल अथवा moving energy को Female energy कहते है! Stable energy
Potential energy, और स्पंदना
सहित energy kinetic energy.
Cosmic
consciousness का अर्थ ब्रह्मांडा/परमात्म चेतना है! मनुष्य में इस ब्रह्मांड चेतना
परिवर्तन हो कर Krishna consciousness अथवा कृष्ण चेतना कहते है!
परमात्म चेतना को Macro Cosmic consciousness कहते है!
आत्म चेतना को Micro Cosmic consciousness कहते है!
Consciousness = Electron + intelligence.
Consciousness negligible quantity में होने से उस वस्तु को Inert body कहते है!
कुण्डलिनी शक्ती पाँच शिर वाली सांप जैसा है! ओ एक passage व मार्ग है! जो ध्यान करता ही नहीं मनुष्य
में मूलाधार चक्र का पास अपना पाँच शिरों को 31/2 turns करके नीचे रखके, पूंछ उप्पर चक्रों में रखके निद्राण
स्थिथि में रहती है! ध्यान नहीं
करने मनुष्य भगवान को नहीं मानता है! उसका पास दीमाक (intelligence) नहीं होता ही! उसका पास IQ बहुत कम परिमाण में होता है! अधिक परिश्रम नहीं
करेगा! वही ध्यान करने योगी में IQ अधिक
परिमाण में होता है!
मनुष्य गत जनम में किया हुआ कर्मके अनुसार इस जनम में
प्रारब्ध कर्मा का रूप में अनुभव करता है! सद्गुरु का दया का प्राप्त से इन
प्रारब्ध कर्मों भी निकलजायेगा!
मंत्रों स्पंदना स्फोटना शक्तियों से भरा हुआ है! उन
मंत्रों का उच्चारण का हेतु वायुमंडल में परिवर्तन होता है! उससे देवता शक्ति जो
साधारण नेत्रों को दिखाई नहीं देगा वह उद्भव होंगे! यानी वैसा अदभुत शक्ति उस शब्ध
का साथ जोड़ा हुआ होता है!
स (षड्जम्), रि
(रिषभ), ग
(गांधार), म
(मध्यमं), प
(पंचमं), द
(दैवतं), और नि
(निषादम) ये सब सप्तस्वर है! मंत्र मे भाव, स्वर, और पदम् होता है! वह स्फोटनं का मार्ग बनाएगा! इसी
कारण वह ऋषि मंत्रोच्छारण करके फलानी देवता को दर्शन लभ्य करता है! इसी कारण मंत्र
का ऋषि और देवता होते है! श्रवणं, मनानं, और निधिध्यासनं करने से ही मंत्र का भावना स्फुरण में
आयेगा!
देवातावो को उग्र कळा, भोग कळा, और शांत
कळा इति तीन कळा होते है!
उग्र कळा का हेतु
भक्त को अम्मा का रक्षण मिलेगा!
भोग कळा का हेतु
भक्त को अम्मा संपत्ति प्रदान करेगा!
शांत कळा का हेतु भक्त को अम्मा का शांति प्रदान
करेगा!
अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती
भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।
अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला
माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥1॥
भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।
अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला
माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥1॥
अङ्गीकृताखिलविभूतिः अपना बनाया हुआ ऐश्वर्य,
साधारणस्थिति में आदमी का नजर (दृष्टिकोण) भ्रमरं का साथ तूलते है! स्त्री का दृष्टिकोण कुसुमं का साथ तूलते है!
श्रीशैलं एक ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ दोनों एक जगह में हुआ पुण्यक्षेत्र है! यह
पुण्यक्षेत्र आँध्रप्रदेश में है! इधर स्वामी को मल्लिखार्जुन स्वामि और शक्ति
देवता को भ्रमारांबिका कहते है! यह क्षेत्र द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक, और अष्टादश शक्तिपीठो में एक है! इधर अम्मा का नजर
हमेशा स्वामी का दिशामे होता है!
अपांगं का अर्थ तिरची नज़रो से देखना! लीला का अर्थ
अनायास से करनेवाली बंधन (attachment)! मनुष्य
करनेवाली काम को कर्मा कहते है! कर्मा में बंधन
(attachment) होता है!
परमात्मा अथवा परमेश्वरी
नेत्र बंद किया का अर्थ सृष्टि का काम बंद किया है!
परमात्मा अथवा परमेश्वरी नेत्र खोल दिया का अर्थ
सृष्टि का काम बिना बंधन (without attachment) जगद्रचना
शुरुवात किया है और अंतर्गत चेतना को बहिर्गत किया इति! अम्म्नायाक्षी का अर्थ
अम्मा का नेत्रों में वेदों निक्षिप्त हुआ है! आम्नायम का अर्थ पुनः पुनः अध्यन करने
छीज है! इसी कारण आम्नायम कहते है! कामाक्षी, विशालाक्षी, मीनाक्षी इति अन्य नामों से भी पुकारते है!
ऐश्वर्य का अर्थ केवल धन नहीं है! इस का अर्थ भगवान
नारायण को प्रीतिपात्र होना है! इसी हेतु भवान को प्रीतिपात्र होने के लिए
क्रियायोग ध्यान करना आवश्यक है!
केवल नारायण का प्रीती के लिए ऐश्वर्य को भोगना
चाहिए! नहीं तो नहीं करना चाहिए!
वेदों जगाद्रचना कैसा आरंभ हुआ समझाता है! स अयिक्षता
बहुद्याम् प्रजयायेति इति प्राररंभ होता है! वह (परमात्मा) देखलिया है!
मनुष्य भी नेत्र बांध करता है और खोलता है! परंतु वह
मोह (attachment) का साथ काम करता है!
नेत्र खोला
हुआ परमेश्वरी मुझे मांगळ्य और शुभम् करने हो! परमेश्वरी अपना
नेत्र खोलने को ईक्षण शक्ति कहते है! इस सर्व जगत संकोच और व्याकोच से भरा हुआ
है! सर्व जगत स्पंदनों से बना हुआ है! इसा
का अर्थ Potential energy (क्षितिज ऊर्जा) और kinetic
energy (गतिज ऊर्जा) है!
परमेश्वरी नेत्र बंद करने से लाया है! नेत्र खोलने से सृषटि और स्थिति है!
आदिशंकर ने इस स्तोत्र का फल अपन लेलिया और पश्चात में उस वृद्ध स्त्री को देदिया
था!
अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती का अर्थ:--विष्णु का शरीर है!
वर्णानाम आदिबीजम् अकराम् है! श्रीचक्रम्
मात्रुकान्यासम् में भी प्रारंभाक्षर ‘अ’ है! श्रीविद्या को
मात्रुका विद्या भी कहते है! मात्रुका वर्णंरूपिणी! प्रारंभाक्षर ‘अ’कारम्’
से ‘ह’कारम्’ तक अक्षरों सब अम्मा का ही विविधप्रकार रूप है! सब अम्मा का ईक्षणशक्तियाँ
ही है! इस प्रपंच में हर एक कार्य, नाम, और रूप/स्वरुप
अक्षरबद्ध है! इसी हेतु सर्व प्रपंच ‘अहम्’ में ही निक्षिप्त है!
अगर ‘अहम्’ समाप्त होने से प्रपंच नहीं होंगे!
अक्षराणां अकारोस्ति इति श्रीकृष्णपरमात्मा गीता में समझादिया है!
वह निर्विकारास्वरूप विष्णु काला रंग का तमालवृक्ष जैसा स्थाब्ध है! वैसा
श्रीहरी का आश्रय किया हुआ नजर अम्मा की है! श्रीहरी potential
energy (क्षितिज ऊर्जा), अम्मा श्रीमहालक्ष्मी kinetic
energy (गतिज ऊर्जा)!
इधर स्त्री भ्रमर kinetic energy (गतिज ऊर्जा) है!
अम्मा का नजर वैसा ही kinetic energy (गतिज ऊर्जा) है! वह
नारायण को आश्रय किया हुआ है! मधुराधिपते अखिलं मधुरं यानी नारायण का सर्व चीज
मधुरं है!
मुकुलं यानी कलियों (buds) श्रीविष्णु का उप्पर आभरण(Jewellery)
जैसा दिखता है! कलियों (buds) का साथ खडा हुआ तमाल वृक्ष जैसा है! पुलकितों
excitement) ही उसका कलियों (buds), और वो ही विष्णु का
आभरणों है! प्रेम और आनंद ही पुलकितों है!
**तात्पर्य
अम्मा सर्व ऐश्वर्यशाली है! अम्मा का द्रुक स्त्री
भ्रमर जैसा है! साधारण स्थिति में पुरुष का द्रुक भ्रमर जैसा, और ष्ट्री पुष्प जैसा
होता है! श्रीशैल क्षेत्र (दक्षिण भारत)में है! वह
द्वादश ज्योतिर्लिंगा क्षेत्रो में एक है! मल्लिकार्जुन स्वामी शिव का रूप में, और भ्रमरांब शक्ति का रूप में इस क्षेत्र में उपस्थित
है! इधर अम्मा का द्रुक हमेशा मल्लिकार्जुन स्वामी यानी शिव का तरफ ही है! लीला
अम्मा का काम है! परंतु लीला में बंधन/मोह (attachment)नहीं
होता है! मनुष्य करने काम को कर्मा कहते है! कर्म मे बंधन/मोह (attachment) होता है!
परमेश्वर अथवा परमेश्वरी नेत्र खोलने से
अपना अंतर्गत चेतना को बहिर्गत किया, और नेत्र
बंद करने से बहिर्गत चेतना को अंतर्गत किया इति अर्थ है!
अम्मा का नेत्रों में वेदों निक्षिप्त
है! पुनः पुनः अध्ययन करने चीजों को आम्नायम कहते है!
नारायण प्रीती ही असली ऐश्वर्य है! भक्त
विष्णु का प्रीतिपात्र होने को क्रियायोग ध्यान अवश्य करना चाहिए! केवल नारायण
प्रीती के लिए ऐश्वर्य को भोगना चाहिए!
वेदों जगाद्रचना कैसे आरंभ हुवा विशदीकरण
करते है!
मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या
सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥2॥
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या
सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥2॥
अम्मा और पिताश्री दोनों को जोडके वर्णन करने को समयाचार कहते है! सम्याचार
का अर्थ शिव शक्ति, अथवा लक्ष्मी नारायण दोनों को मिलाके वर्णन अथवा प्रार्थना करना चाहीए! जब अम्मा का प्रार्थना
केरेगा तब अय्या को भी प्रार्थना करना चाहिए!
परब्रह्म और उनका शक्ति दोनों का सामरस्य ही असली
आराथाना है! रूप साम्यम्, गुण साम्यम्, नाम साम्यम्, अधिष्ठान साम्यम्, इति इस साम्यम् विविध
प्रकार का है! शिव शक्ति दोनों को मिलाके
आराधना करना चाहिए! दोनों को अलग करके आराधना नहीं करना चाहिए! इसी हेतु
शिवाशाक्त्यायुकता से सौंदर्यलाहिरी आरंभ हुआ है
श्री विष्णु को पुलकित किया हुआ अम्मा का नज़रो का द्रुक माला मुझे अनुग्रह
करानेदो! अम्मा का द्रुक व नज़रो को kinetic energy कहते है! परमात्मा का शक्ति को Potential energy कहते है! इस Potential energy (स्थ्तिजा
ऊर्जा) बिना kinetic
energy (गतिज ऊर्जा) काम नहीं कर सकता है! ऐश्वर्य का लक्षण विष्णुप्रीती है! केवलं भागवत
प्रीती के लिए ऐश्वर्य भोगना चाहिए! सब छीज भगवत प्रसाद का रूप में स्वीकार करना
चाहिए! जो भगवत प्रीतिकर नहीं है उस पदार्थ को कोई भी भक्त स्वीकार नहीं करना
चाहीए! वैसा पदार्थ को भोगने का अर्हता किसी को भी नहीं है! इसी हेतु ‘सर्वं श्री
नारायणार्पणमस्तु’ कहके भोजन
आरंभ करना चाहीए! नहीं तो पाप है!
अम्मा सागरसंबुध्भवी है! अर्थात अम्मा सागर से उद्भव हुआ है! उस अम्मा
मुझको संपत्ति वृद्धि करने दो!
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या मुरारेः वदने का अर्थ :--अम्मा का
नजरो का माला जो श्री मन्नारायण का उप्पर है वह धारा हमको शुभम् करने दो!
मुग्धा मुहुर्विदधती यानी
अम्मा का अनाडी व मायाराहिता नजरो पुनः पुनः मुझको अनुग्रह करा रहे है!
ऐश्वर्य विविध प्रकार का होते है! वो वचनं, धनं, आरोग्यं, पराक्रमम्, और
विद्या इत्यादि! प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि यानी अम्मा का निरंतर अय्या का उप्पर प्रेमपूरक नजरों निरंतर आता जाता है!
सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः यानी उस अम्मा का
नजरो मुझे श्रेयम् व शुभम् देनेदो!
*** तात्पर्य
नारायण को पुलकित किया हुआ अम्मा का नजरों का माला मुझे अनुग्रह कराने दो!
सागर से उद्भव हुआ अम्मा मेरा संपत्ति को वृद्धि करने दो! अम्मा का मायारहित नजरो मुझको अनुग्रह कररहे
है! ऐश्वर्य विविध प्रकार है! वे दासी जनम, भ्रुत्युलोग (servants),
पुत्रों, मित्रों, बंधुगण, वाहनों, धन, और धान्य इत्यादि है!
ऐश्वर्य जो है आयेगा और जाएगा! अम्मा ब्रह्मविद्या स्वरूपिणी है! संसार रचना करते
हुवे भी पानी में पद्मा जैसा मोह नहीं (attachment) है! अम्मा का नजरो
निरंतर परमात्मा का उप्पर ही होता है! भक्त का परमात्मा का बीचा का संबंध हमेशा
होना चाहीए!
विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षम्_
आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि ।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्_
इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥3॥
आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि ।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्_
इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥3॥
विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षम्_
अर्थात् विश्व का अमरेन्द्र पदवी यानी
निश्चल मनस् और उस का अनुसार अर्हता संबंधित वैभव को देने नजर अम्मा को है!
मुरविद्विषोऽपि आनन्दहेतुरधिकं अर्थात्
निर्विकारस्वरुपी नारायण को भी अम्म का नज़र अधिक आनंद का हेतु है! स्त्री
आश्रयाशक्ति है!
त्रयति श्रियति आश्रयति इति स्त्री है! अर्थात रक्षण, शुभम्, और आश्रय देनेवाला
स्त्री है! पद्मिनी, हस्तिनी, चित्तिनी, और शंखिनी इति स्त्री
जाती चार प्रकार का है! श्रुणोति श्रावयति इति स्त्री है!
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्_ अर्थात उस अम्मा का नज़र पलभर के
लिए मेरा उप्पर गिरने दो!
इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः अर्थात
पद्म का गर्भ म्रदु मधुर जैसा है!
अम्मा का नज़र वैसा है! वे मुझे भवसागर से रक्षा करने
दो!
**** तात्पर्य *****
विश्व का अमरेन्द्र पदवी यानी
निश्चल मनस् और उस का अनुसार अर्हता संबंधित वैभव को देने नजर अम्मा को है!
निर्विकारस्वरुपी नारायण को भी अम्म का नज़र अधिक आनंद
का हेतु है! स्त्री आश्रयाशक्ति है! त्रयति श्रियति आश्रयति इति स्त्री है! अर्थात रक्षण, शुभम्, और आश्रय देनेवाला
स्त्री है! पद्मिनी, हस्तिनी, चित्तिनी, और शंखिनी इति स्त्री
जाती चार प्रकार का है! श्रुणोति श्रावयति इति स्त्री है!
उस अम्मा का नज़र पलभर के लिए मेरा उप्पर गिरने दो!
पद्म का गर्भ म्रदु मधुर जैसा है! अम्मा का नज़र वैसा है! वे मुझे भवसागर से रक्षा
करने दो!
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम्_
आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् ।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं
भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥4॥
आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् ।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं
भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥4॥
आकाश वायु अग्नि वरुण और पृथ्वी इन पाँच को पंच भूतों
कहते है!
आकाशा को सुनने को शक्ति व श्रवणशक्ति, वायु
को स्पर्श शक्ति, अग्नि को रूप शक्ति, वरुण
को रस व रूचि शक्ति, पृथ्वी को गंध शक्ति, होते है! इन ही शक्तियों को धन कहते है! उन पंच भूतों को
उनुन शक्तियों को पादान करने अम्मा धनलक्ष्मी है!
धनं अग्निः धनं वायुः धनं सूर्यो
धनं वसुः इति वेद मंत्र है! अग्नि वायु सूर्य
वसु इन को धन कहते है! धन्यत देनेवाली छीज
धन है! धन से हम कृतकृत्य होंगे, और होता है! दिक्पालकशक्ति, ग्रहों का आधिपत्य
शक्ति, कुबेरत्व शक्ति, इंद्र का इंद्र शक्ति, इन सब शक्तियों का
हेतु धनलक्ष्मी ही है!
भुजङ्गशयाङ्गनायाः आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं
भूत्यै भवेन्मम अर्थात अम्मा भुजंगो को वश किया विष्णु
का भार्या है, नेत्रों को कोणों से (cornered looks) आने अम्मा का नज़रें मुझे संपत्ति देगा!
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम्_आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम्
अर्थात अर्थानिमीलित नेत्रों, व
योगनिद्रा यानी अंतर्मुखस्थिति में स्थित नेत्रों, अपना
स्थिति में आनंद में हुवा, विष्णु का ओर अम्मा का नज़रो है!
मुक्तिम प्रसादयति इति मुकुन्दं अर्थात मुक्ति
देनेवाले मुकुंदा है!
अम्मा इधर मोक्षलक्ष्मी स्वरुपी है! तंत्रशास्त्र का
अनुसार आदि लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, धैर्य लक्ष्मी,
गज लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी, विजय लक्ष्मी, विद्या लक्ष्मी, और धना लक्ष्मी इति आठ प्रकार का अष्ट लक्ष्मियों है!
सनातन वैदीक धर्मं का अनुसार छह प्रकार का लक्ष्मियों
है! वे सिद्ध लक्ष्मी, मोक्ष लक्ष्मी, जय लक्ष्मी, सरस्वती, श्रीलक्ष्मी, और
वर लक्ष्मी है!
आरम्भ किया काम सिद्धी प्राप्त के लिए सिद्धलक्ष्मी
का अनुग्रह चाहिए! कार्यसिद्धि का पश्चात मोक्ष (rest/relief) प्राप्त के लिए
मोक्ष लक्ष्मी का अनुग्रह चाहिए! मोक्ष का पश्चात कार्य
में जय प्राप्त के लिए जयलक्ष्मी का अनुग्रह चाहिए! कार्य करने ज्ञान के लिए सरस्वती
अम्मा का अनुग्रह चाहिए! उस अनुग्रह आने पशात काम शोभायमान होने के लिए श्रीलक्ष्मी का
अनुग्रह चाहिए! तत पश्चात काम में प्रत्येकता के लिए वरलक्ष्मी का अनुग्रह चाहिए!
ये सब एक का उप्पर एक आधारित है! ये सब को मिलके अम्मा को मांगना चाहिए! अर्थात
पूर्णत्वम् मांगना चाहिए! ये सब एक ही अम्मा का विविध रूप है!
विष्णु का प्रथम किम्करी यानी भक्त लक्ष्मी अम्मा ही
है!
आनंगतन्त्रं का अर्थ आनंद का हेतु मन्मथ युक्ति सहित
अम्मा का नज़र, अनिमेषम् का अर्थ नेत्र एक क्षण व पल के लिए बंद नहीं किया
हुआ अम्मा का नज़र,है! मन्मथ का अंग नहीं होता है! मन को
इच्छावों से मथन करने वाली नज़र मन्मथ का है! उस अम्मा का नज़र क्रियायोग तंत्र से
भरपूर है!
शिवा स्वाधीन वल्लभा अर्थात मन को अध्ययन करने से
क्रमशः वष में आयेगा और निश्चल हो जायेगा! सदा मुकुंदा का उप्पर होने अम्मा का नज़र
का एक पल मेरा तरफ गिरने से काफी है इति भक्त मांगता है !
Computer में सब programmes सर्व स्वतंत्र है! परंतु सब programmes central processing Unit (CPU)को स्पर्श (touch) नहीं करने से
उस programme नहीं काम करेगा! वैसा
ही अम्मा का नज़र परमात्मा का तरफ नित्यं देखते रहता है!
कनकधारा स्तोत्र सिर्फ पढ़ने से ही धन नहीं मिलेगा! कनकधारा सर्वं वेदांत
संबंधित है! इसी हेतु सर्वसंगपरित्यागी आदि शंकराचार्य से इस स्तोत्र लिखवाया गया
है!
आत्मविद्या महाविद्या है! श्रीविद्या कामसेवितः यानी आत्मविद्या ही महाविद्या है! श्रीविद्या निष्कामं से सविता
है! कामं जिसको है उस को ही निष्कामं का बारे में पता लगता है! कामी नहीं होने से
निष्कामी नहीं बन सकता है! अम्मा कामाक्षी को ज्ञान है की मनुष्य को कब कामं से
बांध करना, और कब बंधन से विमुक्ति करना है! अर्हता का अनुसार
पदवी देना चाहिए! मूरख देने से संघ और उस का पश्चात देश नाश हो जाएगा!
**** तात्पर्य****
शक्ति प्रदान करनेवाली अम्मा धनलक्ष्मी है! धनप्राप्ति धन्यता देगी! इन से
कृतकृत्य होता है! साँप जैसा इन्द्रयो का वष किया भगवान नारायण का पत्नी अम्मा है! अम्मा का
आँखों का कोने से नारायण को देखनेवाली अम्मा मुझे समाप्ति देगा! योग निद्रा में
अर्थनिमीळित नेत्रों वाला भगवान विष्णु को अम्मा देखा! ऐसी अम्मा का नज़र मुझे
प्राप्त होने दो!
बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला
कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥5॥
भगवान नारायण श्रेष्ठतम मणि कौस्तुभ मणि को अपना वक्षस्थल में पहनता है! वही स्थान अम्मा का है! अम्मा नित्यं भगवान विष्णु का उप्पर प्रेम और आप्यायता का वजह से उन का पादों को आश्रय करता है! इस का अर्थ kinetic energy हमेशा Potential energy का आधारित है!
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला
कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥5॥
भगवान नारायण श्रेष्ठतम मणि कौस्तुभ मणि को अपना वक्षस्थल में पहनता है! वही स्थान अम्मा का है! अम्मा नित्यं भगवान विष्णु का उप्पर प्रेम और आप्यायता का वजह से उन का पादों को आश्रय करता है! इस का अर्थ kinetic energy हमेशा Potential energy का आधारित है!
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति अर्थात उस अम्मा इंद्रा नीला
प्रकाश माला जैसा अम्मा का नजरो की माला
भगवान विष्णु का वक्षस्थल में विराजमान है!
कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः अर्थात पद्मा ही अम्मा का आलय है! अम्म संसार रचना करते हुवे
भी संसार का उप्पर कोई भी मोह नहीं है! वह अम्म मुझे शुबहा करनेदो!
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला अर्थात भगवान का इच्छा रहित इच्छा यानी सृष्टि, स्थिति, और लय करने का इच्छा फलीकृत करनेवाली अम्मा
ही है! श्री विद्योपासन यह ही ज्ञात करती है! इच्छा ज्ञान
क्रियात्मक मायारूपिणी अम्मा स्पंदन रूप में व्यक्त हुआ छीज ही बिंदु है!
हमें दिखाईदेनेवाला आकाशा भूताकाषा है! आकाश का अर्थ
संपूर्ण प्रकाश है! इस संपूर्ण आकाश का पीछे चिदाकाश है! इस चिदाकाश इश्वर का
चित शक्ति विलास है! इस चित शक्ति का आधार से ही इस चराचर जगत चलरहा है! परिवर्तन, परिमाणों में
परिवर्तन सब इस चित शक्ति का विलास है! परंतु अचंचल ईश्वारशक्ति में कोई भी
परिवर्तन नाही ला सकेगा इस चित शक्ती! इस
चित शक्ति पूर्ण रूप में व्याप्त किया हुआ प्रदेश ही ह्रुदयामु, चिदम्बरं, चिदाकाशं है! अम्मा
उस हृदय में दहराकशरूपिणि का स्वरुप में विराजमान है! इसीकारण अम्मा को कमलालय नाम
में भक्तों पुकारते है!
सहस्र अथवा अनेक दळों से समन्वित पद्म को विश्वं कहते है! उस दळों का बीच
में बैठके पालन करने शक्ति एक ही शक्ति मा ही है! उसे शक्ती को वैष्णव शक्ति कहते
है! एकत्वं अनुपश्यति यानी जो भक्त वैसा एकत्वं को देखनेको सक्षम है उस भक्त को
राग द्वेष, शोक मोह नहीं होगा !
हमारा शरीर में एक अन्त्याक्नता सूक्ष्म नाडी है! उस नाडी को सुषुम्ना
सूक्ष्म नाडी कहते है! तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् अर्थात उसी में सर्वं
प्रतिष्ठित है!
****तात्पर्य***
नारायण का कौस्तुभमणि जैसा भगवान विष्णु का वक्षस्थल अम्मा का स्थान है!
परंतु उस का उप्पर प्रेम का हेतु अम्मा नारायण का पैरो का आश्रय करके हमेशा
उपस्थित है! इंद्रनीलकांतियों से प्रकाशित माला जैसा अम्मा का नज़रो की माला विष्णु
का वक्षस्थल में विराजमान है! पद्म पानी में होने से भी सड़ता नहीं है! वैसा ही
संसार रचना करते हुवे भी अम्मा को संसार में मोह नहीं है! वह अम्मा मुझे शुभ करने
दो!
भगवान् का इच्छारहित इच्छा(desire less desire), सृष्टि स्थिति और लाया करने रचना यानी संसार रचना है! उस
इच्छा को सफलीक्रुता करनेवाली अम्मा ही है और कोई भी नहीं ही! अनेक दळों से
समन्वित पद्म को विश्वं कहते है! इस दळों का बीच में उपस्थित शक्ति
उस अम्मा वैष्णव शक्ती ही है! जो भक्त अनेकत्वं में एकत्वं देखते है वह ही असली
भक्त है! उस को शोक मोह इत्यादि नहीं होता है! हमा रा शरीर में एक अत्यंत सूक्ष्म
नाडी सुषुम्ना सूक्ष्मनादी है! उसी में सर्वं प्रतिष्ठित हुआ है!
कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्_
धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव ।
मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्तिर्_
भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥6॥
महनीयमूर्तिर्_ भद्राणि मे दिशतु अर्थात अम्मा का महत्वपूर्ण नज़र मुझे रक्षण् देनेदो!
धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव ।
मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्तिर्_
भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥6॥
महनीयमूर्तिर्_ भद्राणि मे दिशतु अर्थात अम्मा का महत्वपूर्ण नज़र मुझे रक्षण् देनेदो!
भार्गवनन्दनायाः कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्_ अर्थात् ब्रह्म विद्या स्वरूपिणी अम्मा
का स्थान वर्षित करने लावण्यसहित काला मेघ जैसा भगवान नारायण का वक्षस्थल है! वह
मुझे रक्षण देने दो!
धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव
अर्थात मेघ में आकाशीय बिजली जैसा कन्या अम्मा है!
मातुः समस्तजगतां अर्थात समस्त जगत का माता अम्मा है! उस का नज़र मुझे रक्षण देगा!
अहम् एक मिठास छीज जैसा है! उस का चारों तरफ चीटियाँ लगता है! इसी कारण कैटभारेर्_ का
अर्थ चीटियाँ लगा हुआ अहम् मिठास, और इस अहम् मिठास
निकालने अम्मा का शीतल नज़र मुझे अत्यंत आवश्यक है!
*** तात्पर्य*****
अम्मा का महत्वपूर्ण नज़र मुझे रक्षण देनेदो! अम्मा ब्रह्मविद्या स्वरूपिणी
है! उस का स्थान नारायण का वक्षस्थल है! नारायण का सर्व शक्तियाँ अम्मा ही है! अम्मा
आकाशीय बिजली जैसा है! उस अम्मा का नज़रो मुझे रक्षण देनेदो! अहम् को निकालने को
अम्मा का कारुन्यपूरक नज़रों का द्रुक अत्यंत आवश्यक है!
प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत्प्रभावान्
माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं
मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥7॥
माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं
मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥7॥
मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः मन्थरमीक्षणार्धं अपतेत अर्थात झील (lake) पद्मवासस्थित वह अम्मा का शीतल नज़र मेरा उप्पर एक पल के लिए गिरनेसे भी मेरा जन्मा चरितार्थ हो जाएगा! पद्मा पानी में रहने से भी सड़ता नहीं है! वैसा ही अम्मा संसार रचना करनेसे भी संसार की मोह माया में फसती नहीं है!
माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत्प्रभावान्
अर्थात निर्विकारस्वरूपी परब्रह्मण में ‘सृष्टि रचना करना’
इति इच्छा रहित इच्छा, मन को मथन करने इच्छा,
प्रथम मिठास जैसा स्पंदना अम्मा का नज़रो का वजह से ही उत्पन्न हुआ
है! यह ही big bang
theory है! इस इच्छा मुझे मंगळ
करनेदो! मकर, शंख, पद्म, महा
पद्म, कच्छपं, मुकुन्दं, कुन्दं, नीलं, और वरं ,
इन सब को नवनिधियाँ कहते है! इन का
अधिदेवातायें होते है! ये सब कुबेर का पास होते है! इन सब का मूल अम्मा ही
है!
***तात्पर्य***
पद्मवासस्थित वह अम्मा का शीतल नज़र मेरा उप्पर एक पल
के लिए गिरनेसे भी मेरा जन्मा चरितार्थ हो जाएगा! निर्विकारस्वरूपी परब्रह्मण में ‘सृष्टि
रचना करना’ इति इच्छा रहित इच्छा, मन
को मथन करने इच्छा, प्रथम मिठास जैसा स्पंदना अम्मा का नज़रो
का वजह से ही उत्पन्न हुआ है! यह ही big bang theory है! इस इच्छा मुझे मंगळ करनेदो!
दद्याद् दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम्_
अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे ।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं
नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः ॥8॥
अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे ।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं
नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः ॥8॥
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं अर्थात आदिभौतिक, आदि दैविक, और आध्यात्मिक इति दुष्कर्मों से मुझको रक्षा करदो मा!
दद्याद् दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम्_ अर्थात अम्मा तुम्हारा करुणा
जलधारा मेरा उप्पर बरशनेदो!
अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे अर्थात मेरा पास कुछ भी नहीं है, मै दरिद्र हु! मै
जातकपक्षी हमेशा बारिस का पानी पीने के लिए तड़पता है! वैसा ही मै अम्मा के
करुणापूरक नज़र के लिए तड़प रहा हु!
नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः अर्थात अम्मा भगवान
नारायण का पत्नी है, उस अम्मा का आर्द्रतापूरक नेत्रों से मेरे को अपना नज़र
डालके मेरा उपर उस कनकधारा को प्रसारित
करनेदो! इधर भगवान नारायण Potential energy और उनका पत्नी लक्ष्मी kinetic energy और कनकधारा का अर्थ transfer of energy यानी शक्तिपात है!
** तात्पर्य***
आदिभौतिक, आदि दैविक, और आध्यात्मिक इति दुष्कर्मों से मुझको दूर रखो मा! तुम्हारा दया
अनुग्रहधरा को मेरा उप्पर बरसने दो! मेरा पास कुछ भी नहीं है! मै दरिद्र हु! मै दुःखित
हु! मै वर्ष का पानी के लिए तडपनेवाली जातकपक्षी जैसा तेरा करुना के लिए तडप रहा
हू! अम्मा मेरा उप्पर करुणा, दया, और आर्द्रता पूरक नेत्रों से उस कनकधारा को प्रसारित
करो!
इष्टा विशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र_
दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते ।
दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां
पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥9॥
दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते ।
दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां
पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥9॥
इष्टा विशिष्टमतयोऽपि अर्थात यज्ञकर्मो नहीं जाननेसे भी
यया दयार्द्र_ दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते अर्थात अम्मा का दयार्द्र_ दृष्टि होने से भौतिक सूक्ष्म और कारण तीनों लोकों का आधिपत्य सुलभ रीति में लभ्य
करसकता है!
दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिः
अर्थात कमल का हृदय जैसा अम्मा का नजरो का कांति
पुष्करविष्टरायाः अर्थात पद्मनिवासिनी
अम्मा का अहंकाररहित, निर्वेद निर्विकार दृष्टि
इष्टां पुष्टिं कृषीष्ट अर्थात इष्ट
पुष्टि व ज्ञान समृद्धि हमें लभ्य करनेदो! पुष्टि विविध प्रकार का है! वे धनपुष्टि
ध्यानपुष्टि अर्थपुष्टि ज्ञानपुष्टि और वाक् पुष्टि इत्यादि!
**** तात्पर्य**
यज्ञकर्मो नहीं जाननेसे भी अम्मा का दयार्द्र_
दृष्टि होने से भौतिक सूक्ष्म और कारण
तीनों लोकों का आधिपत्य सुलभ रीति में लभ्य करसकता है! कमल का हृदय जैसा
अम्मा का नजरो का कांति अहंकाररहित, निर्वेद
निर्विकार दृष्टि इष्ट पुष्टि व ज्ञान समृद्धि हमें लभ्य होनेदो! पुष्टि विविध
प्रकार का है! वे धनपुष्टि ध्यानपुष्टि अर्थपुष्टि ज्ञानपुष्टि और वाक् पुष्टि
इत्यादि!
गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति
शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति ।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै
तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥10॥
शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति ।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै
तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥10॥
अम्मा ही गीर्देवता अर्थात ज्ञानदेवता सरस्वती ही
पक्षिवाहन भगवान विष्णु का पत्नी लक्ष्मी है! वह ही शिव का भार्या शाकम्बरी व गौरी
है! सृष्टि, स्थिति, और लया इन तीनों का एक खेल
जैसा भावन करने में संस्थित है! वैसा
तीनों लोको का नायकी और परमात्म शक्ति स्वरूपिणि उस अम्मा परमेश्वरी मेरे उप्पर
करुणा दिखाई देनेदो! अर्थात इस अम्मा ही तीन विविध प्रकार का सृष्टि, स्थिति,
और लया रूपों में काम करती है!
नमः एक प्रणव मंत्र है! ओमकारा, स्वाहाकार, स्वाकार, वषट्कारा, और नमस्कार इन पांचो
पंच प्राणों है! भगवान को आहूति व आह्वान
करने वाचक प्रणव है! विश्वचैतन्य को आह्वानित करने का और अनुग्रह करने का हेतु प्रणव ही है! मनस को और भगवान का
विश्वव्याप्त चैतन्य को अनुसंथान(contact) करने का
हेतु प्रणव ही है! नमः ही मनः और
मनः ही नमः है! हमको शुभ लभ्य करने के लिए योगा का साथ मिलाके एक नमः काफी
है! और बाकी किसी और का सहायता का आवश्यकता नहीं है!
श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै
रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै ।
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै
पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥11॥
रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै ।
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै
पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥11॥
देवतो का बारेमे वेदों में कहागया है! इसी हेतु देवं और वेदं दोनों एक ही
है!
वेदं यानी शब्दं का माध्यम से हमको शक्ति लभ्य होगा!
श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै अर्थात वेदों हमको शुभ का फल प्राप्ति कराएगा! एसी
शब्दों को नमस्कार करता हु!
रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै अर्थात रमणीय और शुभाप्रदायक गुणों में उस दिव्या
माता हमें सहारा अवश्य सहारा देगा इथी मेरा धैर्य है!
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै अर्थात पद्म में आसीन उस अम्मा को नमस्कार करता हु!
पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै अर्थात भगवान नारायण पत्नी
उस अम्मा मुझे रक्षण और पोषण अवश्य देगा इथी मेरा प्रगाढ़ विश्वास है!
नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै
नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूत्यै ।
नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै
नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥12॥
नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूत्यै ।
नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै
नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥12॥
नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै
अर्थात पद्मा जैसा मुख उस अम्मा का है! उस को नमस्कार करता हु!
नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूत्यै अर्थात क्षीरसमुद्र राज तनय उस अम्मा को नमस्कार करता हु!
क्रियायोग साधक को सविकल्प समाधि में पहले क्षीरसमुद्र जैसा प्रकाश कूटस्थ, दोनों भ्रूमध्य का
प्रदेश, में दिखाई देगा! तत पश्चात निर्विकल्प
समाधि में प्रवेश करेगा! अर्थात द्वैत स्थिति से अद्वैत स्थिति में प्रवेश करेगा! नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै अर्थात
साधक का मनस अम्रुतास्थिति प्राप्त करेगा!
नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै अर्थातवैसा नारायण पत्नी को नमस्कार करता हु! कोई भी साधक अम्मा को
पार करके ही अय्या यानी परब्रह्मण को प्राप्त करेगा!
साधन आरम्भा स्थिति में ‘ॐ’ ध्यान करने स्थिति को ॐ स्थिति कहते है! इसी को
क्रैस्तव (christian) संप्रदाय का अनुसार Holy
Ghost स्थिति कहते है! अम्मा को पार
करने स्थिति को ‘तत’ स्थिति कहते है! इसी को क्रैस्तव (christian)
संप्रदाय का अनुसार ‘son of the Father’ स्थिति कहते है! तत
पश्चात अय्या स्थिति में साधक पहुंचते है! इस स्थिति को ‘सत’ स्थिति कहते है! इसी
को क्रैस्तव (christian) संप्रदाय का अनुसार ‘Father’ स्थिति कहते है!
सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि
साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि ।
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि
मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ॥13॥
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि
मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ॥13॥
सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि
अर्थात अम्मा को नमस्कार करने से मेरा सर्व इन्द्रियों को आनंद संपत्ति मिलेगा! न मामा आकार नमस्कार
अर्थात कोई आकार मेरा नहीं है! ऐसा मनसा वाचा कर्मणा त्रिकरणशुद्धि भावना
परिपूर्णभावना होना ही नमस्कार है! वैसा
भावनापूरक नमस्कार से उस मा संतुष्टि होकर मुझे तीन लोकों का साम्राज्य को दान
देगा! वैसा भावनापूरक नमस्कार से उस मा मुझको कष्टों से दूर करेगा! अम्मा, तुम्हारा करुनाधारा
मेरे उप्पर ह्क्मेशा होनेदो!
यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः
सेवकस्य सकलार्थसम्पदः ।
संतनोति वचनाङ्गमानसैस्_
त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥14॥
सेवकस्य सकलार्थसम्पदः ।
संतनोति वचनाङ्गमानसैस्_
त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥14॥
मनसा वाचा कर्मणा त्रिकरणशुद्धि भावना परिपूर्णभावना से अम्मा को नमस्कार करता
हु! वैसा नमस्कार से संतुष्ट हुआ अम्मा का कटाक्ष मेरे को सकल संपदाए देगा! वैसा को नमस्कार करता
हु!
सरसिजनिलये सरोजहस्ते
धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे
त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥15॥
धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे
त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥15॥
अम्मा पद्मनिवासिनी, कमल फूल जैसा तुम्हारा
हाथोंसे यानी दयार्द्र हाथों से, धवल वस्त्रो और चन्दन का
सुगंधसे शोभायमान हुआ ओ मा, स्वच्छता से विराजमान वैष्णवी,
भगवान विष्णु का मनस् जाननेवाली नारायणी, मुझे
तीनों लोको का संपत्ति प्रसादित करो! मुझे अनुग्रह करो!
दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट_
स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम् ।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष_
लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ॥16॥
स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम् ।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष_
लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ॥16॥
दिग्गजों सुवर्ण कळसों लाया है, देवताये
तुम्हे सुंदर मलिनरहित स्वर्ग में बहनेवाली आकाशगंगा से तुमको स्नान कराराहे,
अशेषलोकों का अधिनियम की पत्नी, अम्रुतासागारापुत्री,
तुम को प्रातः ही नमस्कार करता हु!
कमले कमलाक्षवल्लभे
त्वं करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः ।
अवलोकय मामकिञ्चनानां
प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥17॥
त्वं करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः ।
अवलोकय मामकिञ्चनानां
प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥17॥
अम्मा, पद्मनिवासिनी, न्भागावान नारायण
पत्नी, मुझे करुणापूरक नज़रो से देखो, मुझको तुम्हारा
प्रथम भक्त समझके दया प्राप्त करो, मुझे अनुग्रह करो!
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं
त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् ।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो
भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥18॥
त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् ।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो
भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥18॥
जो भक्त इस स्तोत्र को पुनः पुनः पढ़ते है, तीनों वेदों का माता, और तीनों लोको का
माता है वह दिव्या माता! इस अम्मा का गुण जो गायेगा, उन भक्तों सद्गुणवंत
और संपत्ति का साथ अब और आगे धन्य होंगे!
नमोस्तु हेमांबुज पीठिकायै
नमोस्तु भूमंडल नायिकायै
नमोस्तु देवादि परायै
नमोस्तु शांर्ंगायुध वल्लभायै
18
समस्त सूर्य मंडल को चेतना देने अम्मा, तुझ को नमस्कार!
समस्त भूमंडल को चेतना देने अम्मा, तुझ को नमस्कार!
समस्त भूमंडल और भूमंडल का बीच में स्थित
मध्य मंडल में रहनेवाले समस्त देवतावों को चेतना देने अम्मा, तुझ को नमस्कार!
बाण ही अंग और आयुध जैसा धरा अम्मा, कुण्डलिनी शक्ति, तुझ को नमस्कार!
सहस्रार चक्र में रवि, आज्ञाचक्र में बुध, विशुद्धचक्र में शुक्र, अनाहत चक्र में चंद्र, मणिपुरचक्र में कुज, स्वाधिष्ठान चक्र में बृहस्पति व गुरु, मूलाधार चक्र में शनि देवातावों का स्थान है!
सहस्रार चक्र परमात्मा चैतन्य, आज्ञाचक्र कृष्ण चैतन्य, विशुद्धचक्र आकाशा चैतन्य, अनाहत चक्र वायु चैतन्य, मणिपुरचक्र अग्नि चैतन्य, स्वाधिष्ठानचक्र जक्ला चैतन्य, और मूलाधारचक्रगंध चैतन्य, का स्थान है!
नमोस्तु देव्यै भृगुनन्दनायै
नमोस्तु विष्णोरुरसि स्थितायै
नमोस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायै
नमोस्तु दामोदर वल्लभायै 19
भृगु महर्षि का बेटी लक्ष्मी अम्मा को
नमस्कार, भगवान विष्णु का हृदय स्थित
उस लक्ष्मी अम्मा को नमस्कार करता हु! अर्थात स्थितिज ऊर्जा (potential energy) से आने गतिज ऊर्जा (kinetic energy) को नमस्कार करता हु! पद्मनिवासिनी
नारायणी अम्मा को नमस्कार करता हु!
नमोस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायै
नमोस्तु भूत्यै भुवन पासूत्यै
नमोस्तु देवादिभि रर्चितायै
नमोस्तु नन्दात्मजा वल्लभायै 20
पद्मनिवासिनी अम्मा को नमस्कार करता हु!
सकलाभुवानो का माता, तुझ को नमस्कार करता हु! देवतायो से पूजा लेनेवाली अम्मा,
तुझ को नमस्कार करता हु!
सर्वव्यापी भगवान् विष्णु पत्नी, तुझ को नमस्कार करता
हु!
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