KRIYA YOGA SADHANA -
Kriya Yoga Sadhana
క్రియ యోగ సాధన పై శ్రీ కౌతా మార్కండేయ శాస్త్రి గారి ప్రవచనం
క్రియ యోగ సాధన పై శ్రీ కౌతా మార్కండేయ శాస్త్రి గారి ప్రవచనం
ॐ श्रीकृष्ण परब्रह्मणेमः
श्रीभगवद्गीत
द्वितीयोऽध्यायः
संख्यायोगः
संजय उवाच:--
तम् तथा
कृपयाविष्टं अश्रुपूर्णा कुलेक्षनाणम्
विषीदंतमिदं
वाक्यं उवाच मधुसूदन 1
संजय ने कहा:--
हे धृतराष्ट्र
महाराजन, इस प्रकार दया से व्याकुलित होंकर गद्गद स्वर से रोता हुआ अर्जुन को देख
कर भगवान श्री कृष्ण ने ऐसा कहा:
पहले दशा में ही देव साम्राज्य को पाना दुस्साध्य है! एक इंजीनियर,
डाक्टर, अथावा वैग्नानिका शास्त्रवेत्त होने के लिए 15 अथावा 20
वर्षों का कठोर परिश्रम का अवसर है! कुछ तुरंत साध्य करना है सोच के साधना प्रारंभ
करके उस का बाद आगे नहीं बढ़ने साधक अपना मनोव्याकुलता को मधुसूदन, अज्ञान
मिटानेवाले, को निवेदन करता है! ए ही शुद्ध आलोचना शक्ति (संजय) विषयासक्त मन(धृतराष्ट्र महाराज) को
कहते है!
श्री भगवान उवाच:
कुतास्त्वाकश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम
अनार्यजुष्ट मस्वर्ग्य मकीर्तिकरमर्जुन
2
श्री भगवान कहा:
हे अर्जुन,
मूर्ख लोग अनुसरण करने, स्वर्गाप्रतिबंधक , और अपकीर्ति लाने इस मोह इस
युद्ध समय में कहा से आया?
कूटस्थ में दृष्टि स्थिर कर के ध्यान करने ओ साधक, निराशा मत होना,
क्योंकि इस निराशा भौतिक विषयवासना चाहनेवाले लोग करते है! आत्मसाम्राज्य पाने
ध्यान करने तुम को, तुम्हारे दृढ़ निर्णय को नाश् करने प्रतीक्षा करने राक्षस
प्रवृत्ती क्रूर अंतः शत्रुओं को जितने योगसाधाना को इस समय में छोड़ के अपकीर्ति मत पाओ करके शुद्ध
बुद्धि साधक को नीति बोध कर रहे है!
क्लैब्यामास्मागामः पार्थ नैतत्त्वयुपपद्यते
ख्सुद्रम ह्रुदयादौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ट परंतप 3
हे परंतप, साधना को रोखने नकारात्मक अपना अंतः शत्रुवों को तपाने,
अर्जुन, अधैर्य नहीं होना, ये आप के युक्त
नहीं है, इस नीच मनोदुर्बलत्व को त्याग के युद्ध करो, उठो! .
पृथा यानी कुंती वैराग्य को प्रतीक है!
पृथा का पुत्र यानी वैराग्य का पुत्र आत्मनिग्रहशाक्ती अर्जुन, तुम्हारा
इस शक्ती को बलहीन नहीं करो, उठ के युद्ध यानी योग साधना करो!
अर्जुन उवाचा:
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन
इषुभिःप्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदाना 4
अर्जुन कहा:
हे कृष्णा! भीष्म और द्रोण दोनों पूजनीय है! वैसा व्यक्तियों का उप्पर मै
बाणों को कैसा प्रयोग करेगा?
विमान में प्रथम पर्याय सफर करने समय गभराहट होता है!
रेल में सफर करने समय पेड पौधा इत्यादि दिखाई देता है, इसीलिए हम जमीन पर
है कर के धार नहीं होता है!
साधना में क्रमशः भौतिक अहंकार क्षीण होते हुए अनंत का तरफ आगे बढने
स्थिति भीष्म (अहंकार) को वध कर के आत्मनिग्रह बलोपेत होने का स्थिति,
क्रमशः साधक का संस्कारों होते हुए अनंत का तरफ आगे बढने स्थिति द्रोणं
(संस्कारों) को वध कर के दैवाचेतना बलोपेत
होने का स्थिति!
परंतु इस स्थिती में भौतिक मानव चेतना सम्पूर्णता से नहीं मरता है! इसीलिए
कुछ जरूरती छीजे मै खो रहा हु जैसा उत्पन्न हुए संदेहॉ का बाधा से अज्ञानता को दूर
करने मधुसूदन से वादन करने सत्ती है ए!
गुरूनाहत्वाहि महानुभावान् श्रेयोभोक्तुं भैक्ष्य मपीहलोके
हत्वार्थाकामांस्तुगुरूनिहैव भुन्जीयाभोगान् रुधिर प्रदिग्धान् 5
इन गुरों जैसा महानुभावोँ को ह्त्या करने अलावा इस लोक में भिक्षान्न खाना
अच्छी है! उन् को वध करने पश्चात उन् लोगों का रक्त से लेप हुए धनसंपदा काम्यभोगों
को ही आनंद लेना होगा!
अहंकार और संस्कार नाम का गुरों को वध करने से, अगर हमें जब विषयानंद
चाहने से उन् का सहकार नहीं लभ्य होके ओ हमें तकलीफ देंगी करके साधक का संदेह है!
नचैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वाजयेम यदिवानोजयेयुः
यानेवाहत्वा नाजिजीविषामस्तेवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः 6
इस के अलावा, इस युद्ध में हम जीतेंगे अथावा वे जीतेंगे कहा नहीं सकते है!
इस दोनों में कोना सा श्रेष्ठ है हमें पता नहीं है! जिन को वध करके हम जीवित होना
इच्छा नहीं करते है, ओ भीष्म और द्रोण हमारे सामने ही खड़े है!
इस योग साधना युद्ध में अहंकार और इन्द्रियों हमारा दास बनेगा अथावा हमारा
आत्मग्नान उन्हें दास बनेगा पता नहीं है! वैसी सम्देहस्थिती में इन को त्याग करना
युक्त है क्या?
कार्पण्य दोषोपहतस्वभावः पृच्छामित्वां धर्मसम्मूढचेताः
याच्च्रेयास्स्यान्निश्चितंब्रूहि शिष्यस्तेहंशाधिमांत्वांप्रपन्नं 7
ओ कृष्णा, कृपणत्व और आत्मज्ञानशून्यता इति दोष का
हेतु धर्मं विषय में संदेह का कारण मै तुझे पूछ रहा हु, जो श्रेयस्कर है उसे हम को
समझावों—मै तेरा शिष्य हु, तेरा शरण लिया हुआ मुझे ‘इस प्रकार व्यवहार करो’ करके शासन करो!
विद्याभ्यास का प्राथमिक दशा में गणित टेबिल्स रट्टा मारने, साम्घिका
शास्त्र, भूगोल इत्यादि विविध ग्रंथो को पढ़ने में क्या लाभ है विद्यार्थी को पता
नहीं लगता है, और ओ सोचेगा की बेकार में मुझे ए लोग कष्ट करते है, मुझे खेलने नहीं
देते है ए लोग! क्रमशः आगे बढ़ने से तब आस्ते असते समझ आएगा की विद्या की लाभ!
योग साधना का आरम्भा दशा में ऐसे संदेह सहज है! आध्यात्मिक उन्नति ठीक
नहीं होने हेतु, संदिग्ध में भौतिक विषय व्यामोह और नित्य दैवासाम्राज्य इन दोनों
में कोनसा रास्ता लाभदायक है इति सद्गुरु अथावा अपना अंतरात्मा को शरण में आता है
साधक! गणित ठीक से नहीं आने पर अपना गुरु का पूछने का रीति!
नहिप्रपश्यामी ममापनुद्याद्यच्चोकमुच्चोषणमिंद्रियाणां 8
इस भूमंडल में शत्रुरहित समृद्ध राज्य और स्वर्ग में देवातावों का उप्पर
आधिपत्य पाके भी, इन्द्रियों को शोष करनेवाले इस दुःख को मिटानेवाली छीज क्या है
मै खोज नहीं पारहा हूँ!
पृथ्वी मानव शरीर का प्रतीक है! इस शरीर का उप्पर भौतिक का अर्थ आरोग्य जीवन, और देवतों का आधिपत्य का अर्थ
व्यर्थ आलो०चना रहित मानसिक आरोग्य पाके भी मै इन्द्रियसुख से नहीं दूर करने मोह
नाम का दुःख को जो मिटा सकते है उसकों मै खोनही पा रहाहू!
संजय उवाच:-
एवमुक्त्वा हृषिकेशं गुडाकेशः परंतपः
नयोत्स्य इति गोविंदं उक्त्वा तूष्णीं बभूवह 9
संजय ने कहा:-
ओ राजा, ऐसा श्री कृष्ण से कह कर, ‘मै युद्ध नहीं करूंगा’ बोल के अर्जुन छुप होगया!
हृषीकेश = इन्द्रियों का राजा,
गुडाकेश = निद्रा जीता हुए साधक,
परंतप = शत्रुवों का दग्ध करनेवाला
साधना में पूर्ण सफलता नहीं पाया हुआ साधक अपना गुरु को इन्द्रियों का
राजा यानी शुद्ध मन जैसा पहचान के और आगे ध्यान करने स्थिति बताकर फिकर से छुप
होगया!
शत्रुवोम को जलाके निद्रा को जित के कुछ योग साधना प्रगति पायाहुवा साधक
का स्थति है ए!
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत
सेनयोरुभयोर्मध्ये विशीदंतमिदं वचः
10
ओ धृतराष्ट्र महाराजन, दोनों सेनाओं का बीच में व्याकुलन करने उस अर्जुन
को देख कर, श्री कृष्ण हसते हुए इस वाक्य कहा!
किताबों का बीच में बैठे गणित सवालों समझ नहीं आने से दुखित होने
विद्यार्थी को देख कर गुरु हसता है! वैसे ही कूटस्थ में दृष्टि निमग्न कर के
सकारात्मक और नकारात्मक अंतः शत्रुवों को देख कर सहायता के लिए अर्थित करते हुए
शिष्य/ साधक को देख कर अंतरात्मा/सद्गुरु दया से प्रहसन करते हुए मुझे देखरहा है
जैसा मन को लगेगा!
श्री भगवान उवाच:-
अशोचानन्व शोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे
गतासून गतासूंश्च नानुशोचंति पंडिताः 11
श्री भगवद्गीता में कही भी श्रीकृष्ण उवाचा का पद प्रयोग नहीं किया है!
श्री भगवान उवाचा का पद प्रयोग ही किया है श्री वेदव्यास महर्षि!
श्री(पवित्र) भ(भक्ती) ग(ज्ञान) वा(वैराग्य) न् यानी पवित्र भक्ती ज्ञान
वैराग्य सहित है श्रीभगवान्!
आकर्षयती इति कृष्णः
श्रीभगवान ने कहा:
हे अर्जुन, तुम जिस के लिए शोक प्रकट नहीं करना है उन् के लिए दुःखित्
हुवा! इस का अलावा बुद्धिवाद वाक्य भी बोल्र रहे हो! ज्ञानी लोग जो मरगये और जीवित
है उन् दोनोँ का बारे में कभी भी दुःखित् नहीं होते है!
इंद्रियों, संस्कारों, इच्छाओं, विशायावांछायें, इत्यादि प्रस्तुत में
होने से भी साधना में क्रमशः मर्जाते है! ओ मर् गया कर के अथावा और है कर के भी
व्याकुलता नहीं होना चाहिए! देव साम्राज्य प्राप्ती के लिए इन का मरण आवश्यक है!
नत्वेनाहम जातुनासम नातवां नेमे जनाधिपाः
नाचैवा न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्
12
अर्जुन, मै, तुम, अथावा इन राजाओं पहले भी थे और आगे भी होंगे!
देहिनोस्मिन यथा देहे कौमारं यौवनं ज़रा
तथा देहांतरप्राप्तिः धीरस्तात्र न मुह्यति 13
जीव को इस शरीर में बाल्य, यौवन, वार्धक्य अवस्थाएँ जैसे प्राप्ती होते
है, वैसे ही मरण का पश्चात दूसरा भौतिक शरीर प्राप्ति भी लभ्य होता है! इसीलिए इस
विषय में ज्ञानि कभी भी दुःख अथावा मोह में नहे फसते है!
उप्पेर तीनों श्लोकों का अंतरार्थ इस प्रकार का है---
इंद्रियविषयों नित्य नहीं है! अनित्य छीजें का बारे में ज्ञान से बात कर
रहा हु जैसा गलत फेमी से अपना अज्ञान को बाहर रखदिया साधक इधर!
आगे बढते हुवे अनित्य इंद्रियविषयों नित्य आत्मसाम्राज्य को कुछ नहीं कर
पायेगा और मर जाएगा!
सृष्टि रहने तक ए राजाओं यानी इंद्रियॉ और इंद्रियविषयों रहेगा! ओ कही
नहीं होंगे, हमारा शरीर का अंदर ही होंगे!
शक्ति नित्य है, ओ नाश् नहीं होता है, शक्ति को कोई सृष्टि नहीं कर सक्ते
है, एक शक्ती को दूसरी शक्ती का रूप में बदल सक्ते है! आत्मस्वरूपी मै और तुम
दोनों भूत में थे, वर्त्तमान में है, और भविष्यत में भी होंगे! शरीरों नश्वर है,
इसीलिए साधक इस का बारे में शोचना अनावसर है!
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः
आगमापायिनो नित्यास्तां स्तितिक्ष्स्वभारत 14
हे अर्जुन(साधक), इंद्रियों का शब्द, स्पर्शा, इत्यादि विषय संयोग कभी शीत
और कभी उष्ण, कभी सुख और कभी दुःख, देते है! ओ आने जाने छीजे है, अस्थिर है! इसीलिएउन् को सहन करो!
यं हि नाव्यथयन्त्ये ते पुरुषं पुरुषर्षभ
समा दुःख सुखं धीरं सोम्रुतत्वाय कल्पते
15
ओ पुरुष श्रेष्ठ अर्जुन, जिस को ए शब्द, स्पर्शा, इत्यादि पीडाजनक नहीं होते है, सुख और दुःखों को समभाव
लेनेवाले साधक धीर ही मोक्ष के लिए अर्ह है!
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः
उभयोरपि दृष्टोंत स्त्वनयो स्त्वत्व दर्शिभिः 16
असत्य, और नाश् स्वभावी देहादियों को अस्थित्व नहीं है! सत्य आत्मा को कमी
नहीं है! इन दोनों का व्यत्यास
तत्वज्ञानियों निश्चय रूप में जानते है!
पदार्थ को दो रूप में समझना चाहिए!
परमात्मा को नहीं बदलते रहने वाला यानी परिवर्तनरहित पदार्थ(शक्ति) जैसा
देखना, जिसको अनुलोम पद्धति कहते है! ये सही पद्धति है! अम्तार्मुख होंकर आखरी में
परामात्मा में ऐक्य होना अनुलोम पद्धति है!
परमात्मा को नित्य बदलते रहने वाला यानी परिवर्तनसहित पदार्थ(शक्ति) जैसा
देखना, जिसको विलोम पद्धति कहते है! ये सही पद्धति नहीं है! परामात्म चेतना को
इंद्रियों का माध्यम से ग्रहण कर के बाहर को व्यक्त करना अथावा बहिर्मुख होंकर
अज्ञान में फंसजाने को विलोम पद्धति है!
तत् त्वं ज्ञानं = तत्वज्ञानं = वों तुम्ही है जैसा ग्रहण करने ज्ञान!
अविनाशु तु तद्विद्धि एन सर्वमिदं ततं
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति 17
हे अर्जुन, इस समस्त जगत जिस परब्रह्म से व्याप्ति हुए है, ओ नाशरहित है
करके समझ लो! अव्ययी आत्माको कोईभी विनाश नहीं कर सकते है!
अंतवंता इमेदेहा नित्यस्योक्ताश्शरीरिणः
अनाशिनो प्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्वभारत 18
ओ अर्जुन, नित्य, नाशरहित, और अप्रमेय देही यानी आत्म क इस् देह को
नाश्ववंत कहलाता है! इस देह का अंदर का आत्म शाश्वत है! इसीलिए आत्म का अथावा और
इस शरीर का बारे में शोक त्याग करके युद्ध करो!
युद्ध का अर्थ मुक्ती के लिए करने योग साधना!
एनं वेत्ति हंतारं यश्चैनं मन्यते हतं
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति नहन्यते
19
जो मनुष्य इस आत्मा मरता है अथावा जो मनुष्य इस आत्मा मारता है जैसे भावना
करते है, वों दोनों वास्ताविक नहीं जानते है! वास्तव में इस आत्मा जिसी को भी न
मारते है अथावा जिसे से भी न मरवाते है!
नाजायते म्रियतेवा कदाचित् नायम भूत्वा भवितावा न भूयः
अजोनित्यःशाश्वतोयं पुराणोनहन्यते हन्यमाने शरीरे 20
इस आत्मा न कभी जन्म लेता है, न कभी मारता है! पहले नहीं थे, अभी नया
उत्पन्न होने वाले भी नहीं है! पहले जनम लेके अभी मरने वाले छीज नहीं है! इस को
जनन मरण नहीं है, शाश्वत है, पुरातन है, शरीर मरने से भी आत्मा नहीं मरते है!
वेदाविनाशिनं नित्यं ऐन मजमव्ययं
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हंतिकं 21
ओ अर्जुन, इस आत्मा को जो मनुष्य जनन मरण रहित और नित्य जैसे ग्रहण करते
है, ऐसा आत्म दूसरे को कैसा मार सकता है और मरवा सकता है?
वासांसि जीर्णानि यथाविहाय नवानि गृह्णाति नारोपराणि
तथाशरीराणि विहायजीर्णानि अन्यानिसंयाति नवानिदेहि 22
मनुष्य जैसे फटाहुवा और पुराना कपडे को त्याग के अलग नया कपड़े धारण करते
है वैसे ही देही यानी आत्म शिथिलता शरीर को त्याग के अलग नया शरीरों का धारण करता
है!
नैनं छिंदंति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः
नचैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति
मारुतः 23
इस आत्मा को कोई भी आयुध छेदन नहीं कर सकते है, अग्नि दहन नहीं कर सकते
है, जल् भिगो कर सकते है, और वायु सूखा कर सकते है!
मानव को कारण, सूक्ष्म, और स्थूल करके तीन शरीरों होते है!
कारणशरीर में 43 प्रप्रथम
भावनाओं निक्षिप्त होते है!
इन 43 में सूक्ष्म शरीर में 19 भावनाओं निक्षिप्त होते है! वों पञ्च
ज्ञानेंद्रियों, पञ्च कर्मेंद्रियों, पञ्च प्राणों, और अंतःकरण (मनो, बुद्धि, चित्त, और अहंकार) है!
24
भावनाओं स्थूलशरीर में निक्षिप्त होते है! वों पञ्च ज्ञानेंद्रियों, पञ्च
कर्मेंद्रियों, पञ्च प्राणों, पञ्च तन्मात्राओं, और अंतःकरण (मनो, बुद्धि, चित्त, और अहंकार) है!
पानी घनीकरण होके बरफ बनाने के रीति स्थूलशरीर घनीभूत हुआ स्पंदना शक्ती
ही है!
शक्ती और मन का स्पंदना शक्तियों ही सूक्ष्मशरीर है!
परमात्माका शुद्धास्पन्दाना शक्तियों ही कारणशरीर है!
स्थूलशरीर आहार का उप्पर,
सूक्ष्मशरीर परामात्म शक्ती, इच्छाशक्ति, और विचारों का परिणाम का उप्पर,
और
कारणशरीर ज्ञान और परमानंद का उप्पर आधारित है करके बोल सकते है!
कोई भी कारखाना से कुछ वस्तु उत्पन्न होने समय शब्द पहले निकलते है! वैसा
ही परामात्मा का कारखाना से परामात्माचेतना के हेतु माया से सृष्टि व्यक्तीकरण
होने समय जो शब्द निकालता है ओ ही है ॐकार! इस प्रणवनाद आकार(स्थूल),
उकार(सूक्ष्म), और मकार(कारण) अक्षरों का संयोग है! समिष्टि स्थूल, सूक्ष्म, और
कारण लोकों का समायुक्त इस जगत भगवत् प्रतिरूप इस ॐकार ही है!
अच्चेद्योयमदाह्योयं अक्लेद्यो शोश्ययेवच
नित्यास्सर्वगतस्थ्साणु रचालोयं सनातनः
24
ए आत्म को तोड नही सकते है, दग्ध नही सकते है, पानी में डूब नही सकते है, सूका कर नही सकते है! ए
नित्य है, सर्वव्यापी है, स्थिरस्वरूप है, निश्चल है, और पुरातन है!
षड्भावनायें:--
हर जीवी को षड्भावनायें है! वों है—जनम लेना, वृद्धि होना, परिणाम होना, शुष्क होना, और
नाश् होना!
षडूर्म--
हर मानव को षडूर्म
है! वों—भूक, प्यास, शोक, मोह,
वृद्धावस्था और मरण!
अव्यक्तोयं अचिन्त्योयं अविकार्योंयं उच्यते
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि
25
ए आत्मा इंद्रियों का गोचर होने शाक्य नहीं है, मन से शोचने शाक्य नहीं
है, विकार यानी अनेक रूपी नहीं हेते है, कर के कहलाते है! इसीलिए इस प्रकार ग्रहण
करके दुःख होने योग्य नहीं हो!
आथचैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतं
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हासि
26
ओ अर्जुन, संभवतः ए आत्मा शरीर का साथ निरंतर जनन मरण होने तभ भी तुम
दुक्खित होना युक्त नहीं है!
शारीरक बाधाए, बीमारियाँ, और मृत्यु का बारे में व्याकुलता होने साधक अपना
साधना में पुरोभिवृद्धि नहीं पाया है! .
हर साधक समाधि स्थिति लभ्य होने पर अपने आप को सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापि,
और सर्वज्ञ गैसा ग्रहण करेगा!
आत्मा निश्चल है कहलाने पर भी, ओ हर एक व्यक्ती में व्यक्तीकरणहुआ जैसा
लगता है!
हम दस चीता को नंगे हाथों से मार के खत्म किया करके स्वप्नाया! ओ
स्वप्ना सत्य नहीं हैना, अपना आंखें खोलके
देखने से हम खटिया का उप्पर लेटाहुवा दिखाई देता है!
वैसा ही आत्मा का स्वप्ना है इस शरीर! तीव्र ध्यान, और गहरा नींद में
आत्मा अपना यदार्थ निस्चालास्थिति में ही रहते है!
जातास्याही ध्रुवो मृत्युः ध्रुवं जन्म मृतस्यच
तस्मात् अपरिहार्येर्थे नात्वं शोचितुमार्हसि 27
जो जनम लिया उसका मृत्यु निश्चय है, जो मृत्यु हुआ उसका जनम निश्चय है! इस
आवश्यक विषय के लिए शोक प्रकट करना उचित नही है!
निर्विकल्प समाधि अथावा महासमाधि में साधक इन स्थूल, सूक्ष्म, और कारण
शरीर स्थितियों को पार करके अपना आत्मस्वरुप स्थिति को पहचानेगा! अज्ञान/संचित,
प्रारब्ध,और आगामी कर्म परिपूर्णता से दग्द्घ होजायेगा! तब तक दुक्खिता होते
रहेगा!
स्थूलशरीर छोडने का अर्थ स्थूल मृत्यु, स्थूल मृत्यु का अर्थ सूक्ष्मलोक
में जनम लेना, सूक्ष्मलोक मृत्यु का अर्थ स्थूललोक यानी पृथ्वी पर जनम लेना यानी
और एक बार स्थूलशरीर धारण करना ही है!
अज्ञानता परिपूर्णता से निवृत्ति होने तक स्थूल से सूक्ष्मलोक, और सूक्ष्म से
स्थूललोक यानी पृथ्वी का उप्पर आना आवश्यक है!
संचित, प्रारब्ध, और आगामी करके कर्म तीन प्रकार का है!
जन्म जन्मों से जोड़ा हुए कर्म को संचितकर्म कहते है!
हमने कमाया हुआ धन को एक दिन में खर्च नहीं कर सकते है! ओ हमको आगे में
काम आएगा करके जोड़ देते है! वैसा ही है संचितकर्म!
जोड़ा हुआ धन में कुछ धन लाके जरूरत के लिए खर्च करते है, वैसा ही है
प्रारब्धकर्म!
प्रारब्ध अनुभव करते हुए, वर्तमान मे हम जो कर्म, अच्छा हो या बुरा हो,
करते है उसकों आगामिकर्मा कहते है!
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना
28
ओ अर्जुन, प्राणियों जनम लेने के पहले नही दिख्ते हुए, जनम का पश्चात्
दिखाई देते हुए, और मृत्यु का पश्चात पुनः नही दिख्ते हुए होते है! वैसे छीजें के
लिए दुक्खित क्यों होना है?
एक अनेक होना ही सृष्टि है! कार्य कारण रूप ही सृष्टि है!
कुम्हार मिट्टी से यंत्र का सहायता से मटका बनाया!
कुम्हार—निमित्त
कारण, मिट्टी—द्रव्य अथवा उपादान कारण, और यंत्र—यंत्र अथवा साधना कारण!
परामात्मा अपना अंदर का माया का हेतु सृष्टि किया! परामात्मा--- निमित्त
कारण,
अपना अंदर का--- द्रव्य अथवा उपादान कारण,
माया--- यंत्र अथवा साधना कारण!
इधर परामात्मा ही निमित्त, द्रव्य अथवा उपादान, और यंत्र अथवा साधना कारण!
परामात्मा का स्वप्ना ही ए सृष्टि है!
एक मनुष्य ने चार चीते को खड्ग से वध किया करके स्व्प्नाया!
मनुष्य---- निमित्त कारण
चार चीते और खड्ग--- द्रव्य अथवा उपादान कारण
खड्ग--- यंत्र कारण
मनुष्य का स्वप्न ही स्वप्न सृष्टि!
जैसे मनुष्य का स्वप्न सृष्टि सत्य नहीं है, वैसा ही परामात्मा का स्वप्न
सृष्टि भी सत्य नहीं है!
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनः आश्चर्यवत्वदति तथैवचानयः
आश्चर्यवच्चैनमन्यश्शृणोति शृत्वाप्येनंवेदानाचैव कश्चित् 29
इस आत्म को कोई आश्चर्य से देखरहा है! कोई आश्चर्यजनक जैसा कहते है! कोई
इस का बारे में आश्चर्यजनक जैसा सुनते है! ऐसा देख कर, सुनकर, और कह कर भी कोई भी
सई तरह से जानता नहीं है!
साधक अपना तीव्र साधना में कूटस्थ में आज्ञा चक्र में सूक्ष्म रूपी तीसरा
आंख यानी ज्ञान नेत्र को देख सकते है!
तीव्र और गहरा ध्यान में योगी आत्म को कूटस्थ में अद्भुत प्रकाश, शुद्ध
ज्ञान, और ॐकारं नाद् जैसे अनुभूति पाटा है! इसी को तीसरा नेत्र कहते है! जितना भी
प्रवचनों सुनने से भी इस अद्भुत अनुभूति मनुष्य को लभ्य नहीं होता है! केवल
योगध्यान से ही इस अनुभूति मिलते है! ध्यान का माध्यम से लभ्य हुआ ज्ञान ही सत्य
है!
इस तीसरा नेत्र में एक त्रिभुज दिखाइ देगा!
उप्पर सफ़ेद, बाए में लाल, और दाए में काला रंगों दिखाई देता है!
सफ़ेद रंग अधिक होने से योगी का चेतना में सात्विक प्रभाव अधिक है,
लाल रंग अधिक होने से योगी का चेतना में राजसिक प्रभाव अधिक है,
और काला रंग अधिक होने से योगी का चेतना में तामसिक प्रभाव अधिक है!
सारे रंगों समान प्रतिपत्ति में होने से योगी क चेतना परिपूर्ण समतुल्यता
में है!
योगी परिपूर्ण समतुल्यता के लिए तीव्र योगसाधना करना चाहिए!
मनुष्य को दो प्रकार का ज्ञान जन्मतः लभ्य होता है!
1)इम्द्रियों
से लभ्य होने मानव तार्किक शक्ती, 2)
परामात्मा से लभ्य होने आत्मशक्ति
देही नित्यमवध्योयम् देहे सर्वस्य भारत
तस्मात सर्वाणि भूतानि नत्वं शोचितुमर्हसि . 30
ओ अर्जुन, प्राणों का देहों में व्यवस्थत इस आत्मा कभीभी मृत्यु नहीं
होगा! इसीलिए किसी प्राणी का बारे में तुम व्याकुलता नहीं होना!
स्वधर्ममपि चापेक्ष्य नविकम्पितुमर्हासि
धर्म्याद्धि युद्धाच्च्रेयोन्यात् क्षत्रियस्य न विद्यते 31
अपना क्षत्रिय धर्म का मुताबिकि भी इस युद्ध में पीछे हटना युक्त नहीं है!
क्योंकि क्षत्रिय को धर्मयुद्ध से आगे बढ़ कर कोई भी श्रेयोदायक नहीं है!
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र वर्णों अपना अपना गुणों का हेतु
बनगया है!
इंद्रियविशायावांछालोलता, शरीरश्रम करना, अथवा केवल शरीर कष्ट का उप्पर
आधार होना शूद्र का लक्षण है!
ज्ञानप्राप्ति के लिए कठोरता से श्रम करना, अज्ञानता को निकलवाकर
आध्यात्मिकता क तरफ मन को रखना, वैश्य का लक्षण है!
अंतः शत्रुवों को निर्मूलन करके आत्मनिग्रह शक्ति को वृद्धि करने
प्रयत्नशीलता, क्षत्रिय का लक्षण है!
योग ध्यान का माध्यम से परामात्मा से अनुसंथान लभ्य करने ब्राह्मण का
लक्षण है!
यदृच्चयाचोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतं
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभंते युद्धमीदृशं 32
ओ अर्जुन, बिना प्रयत्न से लभ्य होने, खुला हुआ स्वर्गद्वार जैसे इस युद्ध
जो क्षत्रिय पाता है, वे निश्चय सुख प्राप्ति करेंगे!
जो योगध्यान नहीं करता है ओ ही मनुष्य शूद्र है!
योगध्यान का उपक्रमण करके मूलाधारचक्र का साथ जुदा हुआ निद्राण स्थिति में
हुए कुंडलिनीशक्ती को जागृती करनेवाला मनुष्य ही क्षत्रिय है!
योगध्यान का ताप से जागृती होंकर कुंडलिनीशक्ती का फण उप्पर चक्रों में
जाते रहेगा, उस का पूंछ नीचे चक्रों में आते रहेगा! कुंडलिनीशक्ती मूलाधारचक्र को
स्प्रुशन करने से ओ साधक क्षत्रिय बनता है!
अथाचेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं नया करिष्यसि
तातस्स्वधर्मं कीर्तिंचहित्वा पापमवाप्स्यसि 33
इस धर्मयुक्त युद्ध तुम नहीं करोगे, तब तुम स्वधर्म को निरासित कर के अपना
कीर्ति खोकर पाप पाओगे!
मनुष्य का स्वस्थान परामात्मा प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना! ए ही मनुष्य
का स्वधर्म है! उस के लिए प्रयत्न नहीं करना ही अपना कीर्ति खोकर पाप पाना!
अकीर्तिंचापि भूतानि कथायिष्यंति तेव्यायाम
संभावितस्यचाकीर्तिर्मारणादतिरिच्यते
34
और लोग तुम्हारा अपकीर्ति का बारे में बहुत दिन बोलते रहेगा! जो गौरव से
जिया हुआ मनुष्य को अपकीर्ति मृत्यु से भी अधिक है!
इधर लोग का अर्थ इंद्रियों! उन् क लक्षण ए ही है! धर्मक्षेत्र का माध्यम
से परामात्मा के लिए तपन करने साधक को भौतिक विषय वांछों का तरफ खींचना इंद्रियों
का लक्षण है! ए हे अपकीर्ति है!
भयाद्रणादुपरतं मंस्यंते त्वां महारथाः
येषांचत्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवं
35
और जिन महारथियों से तुम अधिक करके लोग भावना कर रहा है, वे सब तुम को अभी
परिहास करेंगे और युद्ध में भय का वजह भागा हुआ ढरपूक समझेंगे!
दुर्बल साधक ही धर्मयुद्ध में जय पारहे है, और महारथी(दृढ़ आरोग्य
शरीरयुक्त साधक) होंकर तुम जैसे साधक ढरनेसे बाकी साधक परिहास करेंगे!
अवाच्य वादाम्श्चा बहून् वदिष्यन्ति
तवाहिताः
निन्दंतस्तव सामर्थ्यं ततोदुःखतरं नु किम् 36
शत्रु लोग अनेक दुर्भाषपद प्रयोग से तुम को और तुम्हारा सामर्थ्य को दूषण
करेंगे! इससे अतिरिक्त क्या दुक्ख होसकता है?
आत्मनिग्रहशक्ति से सुषुम्ना सूक्ष्मनाडी का माध्यम से कुंडलिनीशाक्ती को
मूलाधारचक्र से अपना स्वगृह परामात्मा यानी सहस्रारचक्र को पहुंचाना तेरा काम है!
उस को बीच में त्याग कर भीरुता से पीछे मोड़ा ना तुम्हारा असमर्थता और भोगालालास को
आदत हुवा तुम्हारा शत्रु इन्द्रियों का असभ्य पदाप्रयोगा सुनने में अत्यंत दुखदायक
होगा! वे तुमको अत्यंत व्यकुलाता में गिरादेंगे! .
हटवा प्राप्स्यसे स्वर्गम जित्वावा भोक्ष्यसे महीम्
तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः 37
अर्जुन, शायद इस धर्मयुद्ध में शत्रुओं तुम को वध करने से भी तुम को
स्वर्ग मिलेगा! अथवा तुम को विजय प्राप्त होने से भूलोक राज्य को अनुभव करोगे! इस
प्रकार दोनों तरफ से लाभ है! इसीलिए युद्ध
के लिए संसिद्ध होजावो!
इस धर्मं युद्ध में भोगालालस को
आदत हुए इंद्रियोंको नियंत्रण करते हुए मृत्यु प्राप्त होने से भी स्वर्ग में आनंद
पायेगा! अगर इंद्रियोंको नियंत्रण करते हुए विजय प्राप्त होने से आत्मनिग्रह शक्ती
से भूलोक में आनंद में रहेगा साधक!
सुखदुखेसमेकृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ
ततो युद्धाय युज्यस्य नैवं पापमवाप्स्यसि
38
सुख और दुःख में, लाभ और नष्ट में, जाय और अपजय में भी समबुद्धि से युद्ध
के लिए संसिद्ध होजावो! ऐसा करने से तुम पापप्राप्ति नहीं होगा!
इस धर्नायुद्ध में यानी आत्मसाम्राज्य में कदम् डालने को शारीरक, मानसिक,
और आध्यात्मिक समबुद्धि होना आवश्यक है! नहीं तों इन्द्रियों का दास हो के जन्म
जन्म पाप और दुःख पावोगे!
एषातेभी हिता सांख्ये बुद्धिर्योगेत्वीमां शृणु
बुद्ध्यायुक्तोययापार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि 39
ओ अर्जुन, अबतक मै तुम को सांख्य शास्त्र में आत्मतत्व निश्चय का बारे में
विशादीकरण किया! अब मै योगशास्त्र में कर्मयोग सम्बन्ध विवेक का ज्ञान देरहा हु!
इस ज्ञान को पाकर तुम कर्मबंधन पाश से सम्पूर्णता से विमुक्त होजावो! इसीलिए
श्रद्धा से सुनो!
साम = सम्पूर्ण, ख्य = ज्ञान, सांख्य = सम्पूर्ण ज्ञान!
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो नविद्यते
स्वल्पमप्यस्यधार्मस्य त्रायते महतो भयात् 40
ए प्रारंभ हुए कर्मयोग कंही भी परिसमाप्ति नहीं होते है! समाप्ति होने का
पहले किसी कारण से रुखने से भी दोष नहीं है! इस कर्मयोगानुष्ठान धर्म स्वल्पमात्र
में करने से भी जनन मरण प्रवाहरूपे संसार भय से मनुष्य को रक्षा करती है!
ध्यान करना कर्म हे है! इस ध्यान कर्म हमारा कर्मो को दग्ध करती है!
व्यवसायात्मिकाबुद्धिःएकेहकुरुनंदन
बहुशाखाह्यनन्ताश्च बुद्धयः अव्यवासायिनाम् 41
हे अर्जुन, इस कर्मयोगानुष्ठान धर्म के लिए निश्चित बुद्धि ही आवश्यक है!
जिन् का बुद्धि निश्चित नहीं है, उनका बुद्धि अनंत प्रकार होता है!
योगी अपना मन को केवल परमात्मा का उप्पर हे केंद्रीकृत करता है! निश्चित
नहीं होने पर साधारण व्यक्ति विविध प्रकार का आलोचनाएं करते है!
यामिमां पुष्पिता वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः 42
कामात्मानः स्वर्गपराजन्म कर्मफलप्रदां
क्रियाविशेषबहुलां गतिं प्रति 43
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापह्रुतचेतसाम्
व्यवसायात्मिकाबुद्धिः समाधौ न
विधीयते 44
ओ अर्जुन, वेदों में कर्मो का फल का बारे में विशादीकरण किया हुआ अध्याय
में इष्ट प्रकट करने लोगों, उन् अध्यायो में स्वर्गादि फल का बारे में लिखा हुआ है
जिस से गरिष्ट छीजें और कुछ नहीं करके वादन करने लोगों, विषयवांछों से भरा चित्
जिन को है वे लोग, स्वर्गाभिलाषी अल्पज्ञ लोग, जनम्, कर्मो, कर्मफलों, भोगैश्वर्य
सम्प्राप्ति के लिए विविध कार्यों सहित फलों सहित वाक्यों यानी उपदेश देते है, ऐसा
वाक्यों में चित्त निमाग्निता लोग, उस उपदेश को विशवास रख के द्रश्य व्यामोह में
गिरनेवाले भोगैस्वर्य प्रिया लोग, दैवाध्यान में यानी समाधि निष्ठा में निश्चित
रूप में बुद्धि एकाग्रता नहीं मिलते है!
सांख्य ज्ञान परिपूर्ण ज्ञान है!
चारों वेदां में ऋग्वेद प्रथम वेद है! उस से ही बाकी यजुर्वेद,
सामवेद, और अथर्ववेद उत्पन्न हुए है!
वेदां में मुख्य छीजें इन प्रकार का है---
1) संहिता:- ए वृक्ष जैसा है! मंत्रों से
समायुक्त है!
2) ब्राह्मणों :- ए पुष्प जैसा है! मंत्रों से समायुक्त यज्ञ है!
मंत्रों का अनुसार यज्ञ करना!
3) अरण्यकों:- ए फल जैसा है! परा और अपरा का बेचा
का दीवार को पार करना है!
उपनिषद:- वेद का सारांश, अंतर्मुख होंकर परामात्मा में लीं हो जावो!
वेदों प्राकृतिक शक्तियों का आराधना से आरंभ करके परामात्मा में लीं होने
तक क्रमशः पाठ सिखायेगा! यानी मनुष्य का मानसिक अभिवृद्धि का बारे में बोला हुआ
है! ए वेदों में मुख्य संदेश है!
वेदों को कर्मकांड और ज्ञानकांड करके दो भाग है बोल सकते है! कर्मकांड
मनुष्य क अपना विद्युक्त धर्मों का बारे में, और ज्ञानकांड परामात्मा को पहचान के
उन् परामात्मा में लीं कैसा होने शुद्ध ज्ञान का बारे में उद्बोधन करते है!
कर्मकांड को पूर्व मीमांसा, और ज्ञानकांड को उत्तर मीमांसा करके कहते है!
साधारण मनुष्यकेवल वेदों में कर्मकांड को अनुसरण कर के अल्प फल लभ्य होने
प्रयत्न करते है!
ज्ञानी लोग स्वर्ग से कई बार अधिक फल देने वेदों का ज्ञानकांड को अनुसरण
कर केपरामात्मा को पाने प्रयत्न करते है!
त्रैगुण्यविषयावेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् 45
ओ अर्जुन, वेदों का पूर्वभाग में कर्मकांड और त्रिगुणात्मक रूपी समस्सारा
विषयों का प्रस्तावना ही है! तु त्रिगुणों को त्यगा हुआ, द्वंद्वरहित, निरंतर
शुद्ध सत्व को आश्रय किया हुआ है, आत्म ज्ञानी होजाओ!
यावानार्ध उदापाने सर्वतस्सम्प्लुतोदके
तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः 46
स्नान पान के उपयुक्त स्वल्प जलयुक्त कुआं इत्यादि में जितना प्रयोजन है,
उस से अत्यधिक प्रयोजन हरतरफ पानी से भरा हुआ महत्तर जलप्रवाह में छिपा हुआ है!
वैसा ही वेदों में प्रस्तावित हुआ समस्त कर्मो में जितना प्रयोजन है, उस से अधिक
प्रयोजन परमार्थातत्व जाननेवाले ब्रह्मानिष्ट का ब्रह्मानान्द में क्षिपा हुआ है!
कर्मण्येवाधिकारस्ते माफलेषु कदाचन
माकर्माफलहेतुर्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि 47
अर्जुन, तुम को कर्म करने में ही अधिकार है, कर्मफल का मांगे अधिकार कभी
नहीं है! तुम कर्मफल का हेतु नहीं होना, और कर्म नहीं करने में भी तुम को रूचि नहीं
होना चाहिए!
विद्यार्थी का दृष्टि विद्या का उप्पर ही केन्द्रीकृत होना चाहिए!
आगे कुछ नौकरी प्राप्त होगा करके मन में नहीं पढते है!
वैसा ही साधक का दृष्टि कूटस्थ में ही केन्द्रीकृत होना चाहिए! आगे कुछ फल
लभ्य होंगे करके मन में नहीं होना चाहिए! ध्यान कर्म को निर्विघ्न से आगे बढ़ाना
चाहिए!
योगस्थः कुरुकर्मानी संगम् त्यक्त्वा धनञ्जय
सिद्ध्य सिद्ध्योःसमोभूत्वा समत्वं योग उच्यते 48
ओ अर्जुन, तुम योगनिष्ठा में निमग्न होंकर, संग त्याग कर, कार्य सफल होने
से भी नहीं होने से भी, स्थिर और सम चित्त होंकर कर्मो को यानी प्राणायाम
ध्यानाकर्मो करो! ऐसा समत्वबुद्धि ही योग कहलाते है! .
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगात् धनंजय
बुद्धौशरणमन्विच्च कृपणाः फलहेतवः 49
ओ अर्जुन, समत्वबुद्धिसहित निष्कामाकर्म से, फलापेक्षसहित काम्यकर्मों
बहुत अल्प है! समत्वारूपी निष्कामाकर्मानुष्ठानबुद्धि का ही तुम आश्रय लेना!
फलाकांक्षी लोक अल्पज्ञ है!
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृत दुष्कृते
तस्मात् योगायायुज्यस्व योगःकर्म सुकौशालं 50
समत्व बुद्धि जिस को है ओ मनुष्य पुण्य और पाप दनों को इसी जनम में ही
मिटादेता है! इस समत्वा बुद्धी के लिए यातना करो! कर्मों में निपुणता ही योग है! .
कर्मजं बुद्धियुक्ताहि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः
जन्म बंध विनिर्मुक्ताः पदं गच्छंत्य नाममयं 51
समत्वबुद्धियुक्त विवेकी कर्म करने से भी उन् का फल को त्याग करके जानन्
मरण रूपी संसार बंधनों से विमुक्त होंकर दुक्खाराहिता मोक्ष लभ्य करता है!
संसार कभी भी साधक को परमात्मा को पाने क प्रतिबंध नहीं होसकता है!
योगीराज श्री श्री लाहिरी महाशय चार बच्चों वाले संसारी है!
यदाते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितारिष्यति
तदा गंतासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्यच 52
अर्जुन, तुम्हारा बुद्धि जब अज्ञान मालिन्य को निकलवाकर परीशुद्द होगा, तब
सुनने और सुनवाने में विरक्त होगा!
यानी इन्द्रिय शब्दों में आसक्ति छोड़कर केवल ॐकार शब्द में ही आसक्त होना
चाहिए!
श्रुति विप्रतिपन्नाते यदा स्थास्यति निश्चला
समाधावचला बुद्धिः तदायोगमवाप्स्यसि 53
नानाप्रकार के इन्द्रिय शब्दों को श्रवण करके विछलित हुआ तुम्हारा बुद्धि
जब स्थिर होंकर परामात्मा का ध्यान में निमग्न होजायेगा, तब तुम आत्म साक्षात्कार
पावोगे!
अर्जुन उवाच—
स्थितप्रज्ञस्य काभाषा समाधिस्थस्यकेशवा
स्थितधीःकिं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किं 54
अर्जुन ने कहा—
हे कृष्णा, समाधि में निमग्न हुआ स्थितप्रज्ञतायुक्त जीवन्मुक्त का लक्षण
क्या है? ओ कैसा बात करेगा? उन् का रीति क्या है?
श्री भगवान् उवाच—
प्रजहातियदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्
आत्मन्येवात्मनातुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते 55
श्रीकृष्ण ने कहा—
हे अर्जुन, मनुष्य जब अपना मन का इच्छावों को सम्पूर्णता से त्यगेगा और
निर्मल चित् से अपना आत्मा में निरंतर
संतुष्ट पायेगा तब उस साधक को स्थितप्रज्ञ कहते है!
ध्याता, ध्यान, एयर ध्येय एक होना चाहिए!
दुःखेषु अनुद्विग्नमानाः सुखेषु विगतस्पृहः
वीतरागभयक्रोधः स्थितथीर्मुनिरुच्यते 56
दुःख में सम्तुलता, और सुखों में निरासक्तता, अनुराग, भय, और क्रोध से
मुक्त हुआ साधक को स्थितप्रज्ञ कहते है!
यस्सर्वत्रानभि स्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभं
नाभिनन्दति नद्वेष्टि तस्य प्रज्ञाप्रतिष्ठिता 57
जो साधक समस्त बंधू और भोगादि विषयों में रागाराहित होते है, प्रिय और
अप्रिय संभव होने से संतुष्ट अथवा द्वेष भाव नहीं होते है, उस का ज्ञान स्थिर है!
यदासम्हरातेचायम कूर्मोऽङ्गानीवसर्वशः
इन्द्रियाणीन्द्रियार्धेभ्यः तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता 58
कछुआ अपना अवयावयों को अंदर की तरफ जैसा खींचता है, वैसा ही योगी जब
इन्द्रियों को इन्द्रियार्थ विषयों से सर्वत्र पीछे हट जाता है, तब उस का ज्ञान
अधिकतर से स्थिर है!
मन ही देखता है, स्वाद लेता है, बोलता है, शोचता है, सूंघता है, यानी सबके
लिए मन ही प्रधान है! मगर इस मन का प्राण साथ देने से ही कुछ भी काम होसकता है!
साधक का मन मूलाधारचक्र का उप्पर हुआ प्राणशक्ति से मिलाने से गंध को
पहचानेगा! मूलाधाराचक्र पृथ्वीतत्व यानी गंध का प्रतीक है! अपना अपना अभिरुचि का
मुताबिक़ किसी किसी को सुगंधद्रव्यों जैसा छीजों में, खाने का पदार्थों का गंध का
उप्पर व्यामोह होता है!
साधक का मन स्वाधिष्ठानचक्र का उप्पर हुआ प्राणशक्ति से मिलाने से रूचि को
पहचानेगा! स्वाधिष्ठानचक्र वरुणतत्व यानी रस का प्रतीक है! अपना अपना अभिरुचिका
मुताबिक़ विभिन्न स्वादिष्ट भोजन पदार्थों का उप्पर व्यामोह होता है!
साधक का मन मणिपुरचक्र का उप्पर हुआ प्राणशक्ति से मिलाने से रूप को
पहचानेगा! मणिपुरचक्र अग्नितत्व यानी रूप का प्रतीक है! अपना अपना अभिरुचिका
मुताबिक़ विभिन्न सिनेमा इत्यादि विषयों का उप्पर व्यामोह होता है!
साधक का मन अनाहतचक्र का उप्पर हुआ प्राणशक्ति से मिलाने से स्पर्श को
पहचानेगा! आनाहतचक्र वायुतत्व यानी स्पर्श का प्रतीक है! अपना अपना अभिरुचि का
मुताबिक़ स्त्री विषयों का उप्पर व्यामोह
होता है!
साधक का मन विशुद्धचक्र का उप्पर हुआ प्राणशक्ति से मिलाने से शब्द को
पहचानेगा! विशुद्धचक्र आकाशतत्व यानी शब्द का प्रतीक है! अपना अपना अभिरुचि का
मुताबिक़ संगीत विषयों का उप्पर व्यामोह होता है!
उदाहरण के लिए मधुमेह व्याधि व्यक्ति लाडू इत्यादि मीठा छीजें खाने के दिल
होने से भी नहीं खा सकते है! मगर जिह्वा चंचलता को कैसा काबू में रखेगा? प्राणायाम
पद्धतियों का माध्यम से मन और प्राण को स्वाधिष्ठानचक्र का उप्पर से निकालना
चाहिए!
मूलाधारचक्र नाक को, स्वाधिष्ठानचक्र जीब को, मणिपुरचक्र आंख को, अनाहतचक्र चर्म को,
विशुद्धचक्र कान को प्रतीके है!
मन जब तक इन्द्रियोंके संग् में रहेगा, वों अपना असली आनंद क्या है पहचान
सकता है! साधक अपना मन को इन्द्रियों से विमुक्त करके अंतर्मुख होंकर परमात्मा का
साथ अनुसंथान होजाने लगता है, तब उसका मन
को पता लगेगा क्या मै खो रहा हूँ ! तब परिपूर्ण आनंद क्या है समझ कर पश्चात्ताप से
मन जलेगा!
शरीर को इंद्रियों का साथ अनुसंथान करनेवाले छीज प्राणशक्ति ही है!
क्रियायोग में साधक अपना प्राणशक्ति और मन को इंद्रियों से उपसंहरण करता है! इसी
को मनको नियंत्रण करना कहते है!
श्वास का नियंत्रण करने से ह्रुदय और प्राणशक्ति अपना आपी नियंत्रित
होते है! ह्रुदय नियंत्रण का हेतु इंद्रियों का नियंत्रण करने का मार्ग आसान बनाता
है! ए सब एक गणित समीकरण जैसे है! इस का अर्थ ए नहीं है की श्वास को जबरदस्त
फेफड़ें में रोखाना नहीं चाहिए! सद्गुरु मुखता इस क्रिया योग को अभ्यास करना चाहिए!
मानसिक ध्यान का माध्यम से मन को नियंत्रण करने को अधिक समय लगेगा! क्रियायोग
वायुयान जैसा शीघ्र ही श्वास को नियंत्रण कर के मन को अंतर्मुख होने सहायकारी
होगा!
किडनी(kidneys): ए रक्त
का मलिन और व्यर्थ रासायनिक पदार्थों को छानकर शुद्ध करेगा!
ह्रुदय:- ए प्राणवायु(Oxygen) सहित रक्त को पूरा शरीर में वितरण करते है! शरीर में शिरों
को प्राणवायु(Oxygen) सहित रक्त को वितरण कर के
फिर प्राणवायुरहित रक्त को ह्रुदय में वापस लाया जाएगा! इस प्राणवायुरहित रक्त को फेफडों में प्राणवायु के लिए भेजवा जाएगा! इधर कार्बन डयाक्सैड(CO2) मुक्त
करा के प्राणवायु से भार्वाके हृदय में वापस लोटायेगा!
फेफड़ें:-- ए
श्वास को अंदर लेकर उसका अंदर का
कार्बन डयाक्सैड(CO2) को छानेगा! इसी को श्वास लेना कहते है!
ह्रुदय
को नियंत्रण करने को 1) कार्बन डयाक्सैड(CO2) को कम करने अधिक तरह फलों का आहार लेना, 2) क्रिया योगाभ्यास करना चाहिए! इन का वजह से कार्बन डयाक्सैड(CO2) सहित रक्त को फेफडों में शुद्धीकरण के लिए भेजने का अवसर
ह्रुदय को कम हो जायेगी! क्रमशः ह्रुदय स्थिर हो जायेगी! परिश्रम कम होके ह्रुदय
विश्राम मिलेगा! प्राणशक्ति इन्द्रियों से उपसंहरण किया जाएगा! इन्द्रियों से छोटा
दिमाग यानी Cerebellum का अंदर स्थित मन को संकेत नहीं मिलेगा! मन चंचल नहीं होगा! परामात्मा का उप्पर ही मन लगन होगा! कछुआ अपना रक्षा
के लिए अंगों को अंदर की तरह खीचता है! वैसा ही साधक मन का अंगों यानी इन्द्रियों
को विषयों से उपसंहरण करता है!
विषया
विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः
रसवर्जं
रसोप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते 59
जो साधक
शब्दादि विषयों को स्वीकार नहीं करने से भी ओ हट जाएगा, मगर उन् का वासनाएँ नहीं जाएगा! परमात्मा
का दर्शन होने से विषयों का साथ वासनाएँ भी हट जाएगा!
विषयों से
भौतिक रूप के अलावा मानसिक रूप में भी साधक दूर होना चाहिए! जबरदस्ती एक दिन उपवास
क बरत रख के नहीं भोजन करनेवाले मनुष्य, भोजन पदार्थों को देखने से उस का भूक अधिक
रूप से बढ़ता है! वैसा ही इच्छाओं को दबाने से, विषयों का साथ थोड़ा सा संपर्क होने
से भी उनका उप्पर आसक्ति अधिक रूप से होता है!
यातातोह्यपि
कौंतेय पुरुषस्य विपश्चितः
इन्द्रियाणि
प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः 60
ओ अर्जुन,
इंद्रियों महा शक्तिशाली है! आत्मावलोकन के तीव्र प्रयत्न करने योगसाधक का मन को
भी तीव्र बल से विषयों का उप्पर लेजायेगा!
नारंगी कपड़ा
पहनने, अथावा शादी नहीं करने मात्र में इंद्रियों का प्रभाव से बचाव नहीं कर सकते
है! बाक्टीरिया(Bacteria) मनुष्य को तुरंत रोग फायदा नहीं करेगा, शरीर जब बलहीन होजाते है तब
बाक्टीरिया विज्रुम्भन करता है! वैसा ही साधना थोड़ा सा भी बलहीन होने पर इन्द्रिय
विषय वासनाओं साधक का उप्पर आक्रमण करेगा!
तानी सर्वाणि
संयम्य युक्त आसीत मत्परः
वशेहि
यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्टिता 61
वैसा प्रबल
इन्द्रियोंको अछ्छीतरह वश में रख कर, साधक मनः स्थिरत्व होंकर आत्म का उप्पर ही
आसक्त्युत मन होना चाहिए! जिस का इन्द्रियों स्वाधीन में है, उस साधक का ज्ञान ही
सुस्थिर रहता है!
साधक को दो
छीज अवसर है, वों है 1) इन्द्रियों को उपसंहरण, 2) उपसंहरण किया हुआ मन को परमात्मा का उप्पर केंद्रीकृत होना!
ध्यायते विषयां पुंसः संगस्तेषूपजायते
संगात्संजायते कामः कामात् क्रोधोभिजायते
62
क्रोधात् भवति सम्मोहःसम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः
स्म्रुतिभ्रम्शात बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति 63
मनुष्य शब्दादि विषयोंका बारे में ध्यान देने से उन् छीजों का उप्पर
आसक्ती उत्पन्न होजाता है, आसक्ती का हेतु इछ्छा उत्पन्न होते है, इछ्छा का वजह
क्रोध उत्पन्न होजाता है, क्रोध से अविवेक, अविवेक से भुलक्कडपन, इस से बुद्धिनाश
क्रमशः सम्भव होते है! बुद्धिनाश से आखरी में परिपूर्ण स्थिती से बुद्धि नाश होते
है!
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानि इंद्रियैश्चरन्
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति 64
रागद्वेषरहित और इन्द्रियनियंत्रित साधक, इन्द्रिय संबंधित अन्न इत्यादि
छीजों को अनुभव करने से भी मनोंइर्मलात्वा पाता है!
प्रसादे सर्वदुःखानां हानि रस्योपजायते
प्रसन्नचेतसोह्यासु बुद्धिः पर्यवतिष्ठति 65
मनोनिर्मलत्व होने पर मनुष्य समस्त दुःखों से उपशमन लभ्य होता है!
निर्मलमनस्क को परामात्मा के उप्पर स्थिरत्व शीघ्र ही लभ्य होते है!
नास्तिबुद्धिरयुकतस्य नचायुक्तस्य भावना
नचाभावयतःशांतिः अशान्तस्य कुतः सुखं
66
इन्द्रिय निग्रह और मनःसंयमं नहीं हुआ मनुष्य को विवेकबुद्धि नहीं होता है
और आत्मचिंतन भी संभावित नहीं है! आत्मचिंतन नहीं होने पर शांति भी लभ्य नहीं
होगा! जिस को शांति नहीं है उस मनुष्य को सुखा कहा से प्राप्त होगा?
इन्द्रियाणां हि चरतां यान्मनोनुविदीयते
तदास्यहरती प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि 67
विषयों में प्रवर्तित मन जिस इन्द्रिय को मन अनुसरण करती है, ओ मनुष्य
विवेक को—जैसा पानी का अंदर का नय्या
को प्रतिकूल वायु दूसरे दिशा में खींचने—हरण करती है!
तस्मादस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः
इन्द्रियाणि इन्द्रियार्धेभ्यः तस्यप्रज्ञाप्रतिष्ठिता 68
ओ अर्जुन, जो साधक अपना मन को इन्द्रियों को विषयोंका उप्पर नहीं जाने
सर्वविधों से पूरी तरह निरोध करता है, उस का ज्ञान अत्यंत स्थिर है!
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी
यास्याम जाग्रतिभूतानि सा निशा पश्यते मुनेः 69
समस्त मनुष्यों को जो परमार्थातत्व दृष्टि को गोचर नहीं हो के रात लगता
है, ओई रात इन्द्रियों को अपने वश में रखा हुआ योगी को दिन लगेगा और उसी में
सचेतसा से जागेगा! जिस शब्दादि विषयों में प्राणी जगता है, यानी आसक्ति से रहता
है, परमार्थतत्व का दर्शन करने योगीका दृष्टि को गोचर नहीं होंकर रात जैसा लगेगा!
अपूर्वामाणमचालप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्
तद्वत्कामायं प्रविशंति सर्वे स शांतिमाप्नोति न कामकामी 70
पूरा नादीयां का पानी आके भरने से भी समुद्र निश्चल रहता है, वैसा ही
भोग्य विषय सभी जिस ब्रह्मनिष्ठ को पाकर उसकों विछलित करने में अशक्त होंकर हर
जाता है, वैसा योगी शांति प्राप्ति करेगा, मगर विषयासक्त मनुष्य कभी भी शांति
प्राप्ति नहीं करेगा!
विहायकामान् यस्सर्वान् पुमांश्चरति निस्पृहः
निर्मामोनिरहम्कारः सशान्तिमधिगच्छति 71
जो साधक समस्त इच्छाओं, शब्दादि विषयों को त्यगा के उन् में लेशमात्र भी
आसक्ति नहीं रखता है, अहम्कार और ममकार वर्जित होता है ओई शांति प्राप्त करता है!
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति
स्थित्वास्यामंतकालेपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति 72
हे अर्जुन, ए सब ब्रह्म स्थिति है! ऐसा ब्रह्म स्थिति प्राप्तकर्ता कभी भी
व्यामोह में नहीं पडता है! अंत्यकाल में भी इस स्थिति में जो रहता है, उस साधक
ब्रह्मानान्दा मोक्षस्थिति को प्राप्त कर्ता है!
ॐ तत् सत् इति श्रीमद्भगवाद्गीतासूपनिषत्सु
ब्रह्मविद्यायाम योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे अर्जुन सांख्ययोगो नाम
द्वितीयोऽध्यायः
Comments
Post a Comment